
‘एवं अन्य’…। ये जो ‘अन्य’ हैं, क्या ये मुख्यधारा के लोग हैं? भारत में सरकारों (केन्द्र या राज्यों) के किसी भी नागरिक दस्तावेज में—चाहे पहचान पत्र हो, आधार कार्ड हो, पासपोर्ट के लिए आवेदन हो, या किसी सरकारी पद के अभ्यर्थी की नौकरी अथवा प्रोन्नति—इन सबमें इतनी सतहें हैं कि समझना मुश्किल हो जाता है कि मुख्यधारा मानी जाने वाली नागरिकता कौन है।
क्या आप अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति हैं? क्या आप पिछड़े वर्ग,अति-पिछड़े वर्ग से हैं?
क्या आप धार्मिक अल्पसंख्यक,भाषाई अल्पसंख्यक हैं? क्या आप पूर्व सैनिक हैं? इन तमाम कोष्ठकों के बाद आता है—‘अन्य’।
किसी भी अंकगणितीय आकलन में ये ‘अन्य’ 16 से 18 प्रतिशत के बीच ठहरते हैं। कुछ राज्यों में ये मात्र 10 प्रतिशत ही रह जाते हैं—जैसे कर्नाटक। कुल मिलाकर ये सारे हाशिये पर बताए जाने वाले लोग सरकारी अभिलेखों में मुख्य रूप से दर्ज हैं। तब प्रश्न उठता है—हाशिये पर कौन है?
सम्पत्तिवान, शोषक, दुष्ट दबंग— आखिर कौन हैं ये लोग, और क्या वे इन कोष्ठकों की श्रेणियों से बिल्कुल परे हैं? शायद नहीं। कभी पूरे देश के ग्रामीण समाज में जो भूमि-स्वामित्व को नियंत्रित करते थे, उस दौर के मानकों पर वे यह सब हो सकते थे। आज भी देश में अनेकों ऐसे दुष्टों के आधिपत्य में चलने वाले द्वीप बचे हुए हैं, लेकिन उनका बृहत्तर भाग अब देश का शहरी या अर्द्धशहरी मध्यम वर्ग हो गया है।
यही वे ‘अन्य’ हैं, जो राजनीतिशास्त्र की क्लासिक अवधारणा में नागरिक हैं। भारत में, चूँकि अप्रत्यक्ष करों से ही सरकारों को महत्तम आय होती है, पर देश की राज-व्यवस्था में उनकी कोई भागीदारी नहीं होती। मध्यम वर्ग से न तो कोई सांसद चुना जाता है, न ही विधायक; न ही बजट पर होने वाली बहसों में कभी नागरिकों पर लादे गये करों पर सवाल उठाया जाता है।
इस देश में मध्यम वर्ग को करों के एवज में सरकारें कुछ भी नहीं देतीं। न ही यह नागरिक सरकारों की औपचारिक बन गयी सेवाएँ (सर्विसेज) लेता है। न इस मध्यम वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, न सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जाते हैं। देश के तमाम शहरों में, कुछ वीआईपी क्षेत्रों को छोड़कर, सड़कें खस्ताहाल बनी रहती हैं।
शहरों में आए दिन घण्टों-घण्टों बिजली नहीं रहती, मगर खेतों में सिंचाई के नाम पर 18 घंटे बिजली सप्लाई निश्चित रूप से मुहैया कराई जाती है और अनेकों राज्यों में तो बिजली मुफ्त है। दबंग जातियों के गाँवों में बिजली का बिल कोई नहीं देता और मुस्लिम बस्तियों में तो मीटर रीडर पत्थरबाजी के खतरों से डरता है, कभी उधर रुख भी नहीं करता।
लेकिन वही मीटर रीडर शहरी परिवारों की लाइन काटने निर्धारित तारीख से पहले ही पहुँच जाता है। ट्रैफिक पुलिस के कर्मचारी आए दिन घात लगाकर बाइक या कार वालों को फाइन लगाने का भय दिखाकर पैसे वसूलते रहते हैं। कोई ऐसा नागरिक जीवन का क्षेत्र नहीं है जिसमें वे संत्रास न भोगते हों, फिर भी वे देश की सारी विसंगतियों के लिए जिम्मेदार ठहराए जाते हैं।
दरअसल, अँग्रेजों के जमाने से, जब उन्हीं लोगों ने भारतीय इतिहास को ढूँढ़ना शुरू किया, तो जानबूझकर विभेद करने वाली हिन्दू जीवन-पद्धति को डिस्क्रिमिनेटरी बताया गया, जो एक तरह से गलत भी नहीं था। पर आगे भारतीयों ने भी जब उस इतिहास को उधेड़ना शुरू किया, तो अनेकों विसंगतियाँ खड़ी हो गईं और देश में स्वतन्त्रता के बाद तो एक वितण्डावाद ही खड़ा हो गया—जो आज और भी तीव्र होता जा रहा है।
आशंका और समाजशास्त्रीय अवधारणाएँ
ब्रिटिश इण्डिया की राजधानी 1912 में कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट हुई। अँग्रेज आए दिन के आन्दोलनों और बम-विस्फोटों से तंग आ गये थे। बंगाली क्रान्तिकारियों के रोज-रोज के विरोधों से वे छुटकारा चाहते थे। दिल्ली उन्हें ज्यादा स्थिर क्षेत्र लगा। वैसे भी भारत के बड़े राजतन्त्र दिल्ली में ही बने थे, भले ही समय ने उन्हें नष्ट भी कर दिया हो।
अँग्रेजों को लगा कि वे एक आधुनिक और लोकतान्त्रिक राज्य बना रहे हैं, तो दिल्ली में वे एक स्थिर तन्त्र बना पाएँगे। पुरानी दिल्ली से अलग हटकर नई दिल्ली का निर्माण 1912 से 1929 के बीच हुआ, जो यूरोपीय शैली के एक बड़े राजधानी नगर के रूप में विकसित की गयी। जीनियस आर्किटेक्ट लूटियन की नई दिल्ली, जिसकी भव्यता के सामने लन्दन भी फीका पड़ गया। 1931 में अनेकों समारोहों और बड़ी-बड़ी पार्टियों के बीच इसका औपचारिक उद्घाटन नये नियुक्त वाइसराय लॉर्ड इरविन के हाथों हुआ।
एक ब्रिटिश महिला ‘इरीश पोर्टल’, जिसके पिता लम्बे समय से दिल्ली में रहे थे और उनकी यह बेटी दिल्ली में ही पली-बढ़ी थी। एक तरह से वह दिल्ली की ही निवासी थी, जिसने इस ऐतिहासिक नगर के बारे में ढेर सारी किंवदंतियाँ भी सुन रखी थीं। उसके पिता उदासी से भरा एक फारसी शेर सुनाते थे—दिल्ली के बारे में। वे कहते थे कि जिस किसी ने भी इस नगर का नव-निर्माण किया, उसके हाथ से यह नगर छिन गया। वे कहते थे—‘पाण्डव ब्रदर्स’, पृथ्वीराज चौहान, फिरोजशाह तुगलक, फिर शाहजहाँ। इरीश पोर्टल ने गहरी आशंका जतायी—“उन सभी ने इसका नव-निर्माण कराया और अपने भव्य नगर गँवा बैठे। हम लोग (यानि अँग्रेज) अपवाद नहीं साबित होने वाले।” मात्र 16 वर्षों में अँग्रेजों को यह नगर भारतीयों को देकर जाना पड़ा।
1931 के उद्घाटन समारोहों में भाग लेने ब्रिटिश लेखक-उपन्यासकार अल्डस हक्सले भी आये थे। उन्होंने भी चिन्ता जाहिर की। दिल्ली और नया भारत एक बड़ा नाटक, क्षणिक प्रहसन दिखता है, जो बदलने का भरोसा दिलाता है, पर इसके कितने ही निहितार्थ बड़े ही दुःखान्त होने वाले हैं। हक्सले इशारा करते हैं—अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के बीच टकराव, जातियों-उपजातियों के आपसी विरोध, यहाँ तक कि समुदायों के प्रतीक ‘रंगों’ के लिए भी गहरी घृणा, समाज के एक तबके का दूसरों पर अधिपत्य और लगातार उन पर अनेक विभेद थोपना, अनेक स्तरों पर उन्हें डिप्राइव्ड रखना। नया भारत क्या और कैसे इनसे मुक्त हो पाएगा?
एक दूसरे बड़े समाजशास्त्री, बल्कि शोसल-एन्थ्रोपोलॉजिस्ट डी. फ्रांसीस पोकॉक ने भारतीय समाज के बारे में एक नया ही रहस्योद्घाटन किया। 25 वर्षों तक, हर पाँच वर्ष पर, वे कुछ चुने हुए गुजरात और महाराष्ट्र के गाँवों में एक-एक परिवार के जीवन में क्या परिवर्तन आये, इसे रिकॉर्ड करते रहे। साथ ही सामाजिक सम्बन्धों में क्या बदलाव दिखाई पड़े, वे सारे तथ्य भी संग्रहित करते गये।
उनका निष्कर्ष— पोकॉक एक उदाहरण के साथ अपनी बात रखते हैं। किसी भी बड़े-मझोले रेलवे स्टेशन पर हर समय पाँच सौ से हजार लोग जमा रहते हैं। हर समय आने-जाने की चिन्ता और अफरा-तफरी में संलग्न, इंतजार करते, थके हुए, कितने ही प्लेटफॉर्म पर चादर बिछाए सोए हुए भी दिखते हैं। सैकड़ों लोगों का कुछ समय के लिए अस्थायी ‘घर’ भी वही बन जाता है।
लेकिन क्या ये ठहरे हुए लोग कोई समाज बनाते हैं? क्या वे कोई स्थायी समाज हैं? नहीं। भारत के गाँव भी ऐसे ही हैं। वे कहते हैं—एट बेस्ट ए डेमोग्राफिक एंटिटी, बट नो सोसाइटी ऐज सच। यह घरों-परिवारों का समुच्चय सिर्फ एक जनसंख्यात्मक इकाई है—एक जीवन्त, आपस में सहज सम्बन्ध रखने वाला कोई समाज तो यह है ही नहीं।
गाँव, गाँव की भलाई, सबको बढ़ने का अवसर—ये गाँव देते ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के निषेध में संलग्न रहते हैं। इन अलग-अलग कोष्ठकों में रहने वाले लोगों की आस्था के केन्द्र इनके गाँव नहीं, बल्कि दूसरे गाँवों में रह रहे इनके जाति या कुल के लोगों तथा उनके नामी केन्द्रों के प्रति इनकी निष्ठा होती है। किसी भी मनमुटाव या टकराव की स्थिति में ये अपनी जाति के दूसरे गाँवों में रह रहे लोगों को बुलाते हैं—सामूहिक रक्षा के लिए।
इस नामी केन्द्र और उनकी डिफेंस प्रणाली के अलग-अलग नाम प्रचलित हैं, अलग-अलग क्षेत्रों और प्रदेशों में। बिहार में इसे ‘गोहार’ नाम दिया गया है, जो 1980–90 के दशक में सेनाओं के नामकरण से जानी गयी—जैसे कुर्मी रिजर्व पुलिस, यादवों की लोरिक सेना या भूमिहारों की ब्रह्मर्षि सेना।
इसी तरह कर्नाटक में, जब रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व में दूसरी बार जनता पार्टी चुनाव जीती, तो विधायक दल के नेता के चुनाव के लिए देवेगौड़ा के समर्थकों ने किसी पब्लिक प्लेस में जनता की उपस्थिति में चुनाव कराने की माँग रखी। राज्य भर से बुलाए गये हरवे हथियार से लैस वोक्कालिगा जाति के लोगों ने पब्लिक प्लेस को घेर लिया। डेढ़ सौ से ऊपर विधायक डरे बैठे रहे; चाहते हुए भी वे हेगड़े का समर्थन नहीं कर सके। देवेगौड़ा नेता चुन लिए गये। एक सक्षम ब्राह्मण नेता पद से डिप्राइव्ड हो गया और उसके राजनीतिक जीवन का अन्त हो गया।
दरअसल यही है—कोष्ठकों में बँधा भारतीय समाज। यहाँ सभी हाशिये पर हैं—अलग-अलग जगह, अलग-अलग परिस्थितियों में। आर्थिक उन्नयन, सामाजिक न्याय, आरक्षण—इन सभी ने कुछ को अति सबल बनाया है तो कुछ को अत्यन्त निरीह।
आमतौर पर दलितों को हाशिये पर रहने वाले लोग माना जाता है। पर बिहार में मुशहर और भुइयाँ जाति के लिए ‘महादलित’ की अवधारणा क्यों आई? क्यों कांशीराम–मायावती की पार्टी बिहार के रविदासों की पार्टी नहीं बन पायी? क्यों पासवान ही हर जगह छाए रहे? यहाँ तक कि आंध्र प्रदेश/तेलंगाना में दो बड़ी दलित जातियाँ—‘माडिगा’ और ‘माला’—में गहरे अन्तर्विरोध खड़े हो गये हैं।
सालों से आन्दोलन और धरने चल रहे हैं—एस.सी. की रिजर्व सीटों और नौकरियों के अवसर में एक और भीतरी रिजर्वेशन लागू हो, ताकि माला जाति की सीटों पर माडिगा कब्जा न कर सकें। हाशिये के भीतर भी हाशिया? क्या ये बातें भारत के वामपन्थी बुद्धिजीवियों में कभी विमर्श का हिस्सा बनती हैं?
मात्र अन्तिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए ‘अन्त्योदय’ या कल का गरीब-गुरबा, दलित-आदिवासी पर टिके रहना अब निरर्थक हो गया है। आर्थिक पैरामीटर्स बेकार हो गये हैं। कभी डॉ. लोहिया की संसद की बहस ‘चार आना बनाम छह आना’ से लेकर, फिर वर्ल्ड बैंक के पैमाने ‘वन डॉलर ए डे इनकम’ प्रति गरीब परिवार के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण, टू डॉलर, पॉवर्टी लाइन के ऊपर लेकिन फिर भी गरीब ही—से लेकर अर्थशास्त्रियों द्वारा अन्य ‘माल-न्यूट्रिशन’ को आधार बनाया जाना—गरीबी और हाशिये पर रह रहे लोगों की अन्तहीन कथा चलती ही रहेगी।
पर किसी भी आर्थिक-सामाजिक कार्यक्रम का हस्तक्षेप अपने टारगेट पर नहीं पहुँचा। समाज की अपनी इवोल्यूशन इसे आज वहाँ ले आयी है, जहाँ बीस-तीस वर्षों पहले कोई सोच भी नहीं सकता था।
हाँ, हाशिये पर आज भी कुल जनसंख्या के 2 या 3 प्रतिशत लोग जरूर मौजूद हैं—एबोरिजिन प्राथमिक स्तर के मानव समूह। जैसे दक्षिण भारत में चेंचू, झारखंड की बीहड़ पहाड़ियाँ, राक्षस जैसे छोटी जनजातियाँ, या इनके समक्ष छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी समूह। ‘हैंडिकैप्ड’ या अपंग लोग, जो कार्यक्षम नहीं हो पाते, जिन्हें अब दिव्यांग कहा जाने लगा है। लेकिन अन्तिम निष्कर्ष में ये ‘डिप्राइव्ड’ तो नहीं ही हैं—प्रकृति-जन्य अविकास से ग्रसित हैं।
‘विभेदकारी’ तथा निषेधकारी सामाजिक मान्यताओं से मुक्ति पाने की सबसे अच्छी रणनीति डॉ. अम्बेडकर ने 1948 में ही सुझा दी थी—संविधान सभा की बहसों में। वे कहते हैं— “असमानता, संसाधन-विहीनता को जनता की निचली सतहों पर थोपते रहना भारतीय समाज की संरचनात्मक धुरी है। इसे राजनीतिक अधिकार देना एक बड़ी गलती होगी, जिससे देश और भी गहरे घाव से कटेगा। यही होगा कि ऐसी नीतियाँ बनाई जाएँ कि जल्द से जल्द इन गाँवों को ध्वस्त कर शहरीकरण की लपेट में ले लिया जाए। इससे पहले सच्चे अर्थों में समान नागरिकता वाला भारत नहीं बन सकता। अब तक के अनुभव यही बताते हैं।”










