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स्वतन्त्रता संघर्ष का रोमांचक आख्यान

सच्चिदानन्द सिन्हा जी की ढाई दर्जन पुस्तकों में मुझे ‘एडवेंचर्स ऑफ लिबर्टी’ सबसे अधिक रोमांचित करती रही है। इस पुस्तक में उन्होंने आजादी के लिए किए गये संघर्षों की विस्तृत चर्चा की है।

आजादी का इतिहास मनुष्य-जीवन के इतिहास से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। लोकतन्त्र में आत्मशासन निहित रहता है और आत्मशासन में सामूहिक निर्णय की भावना होती है। सच्चिदा जी पहले ही अध्याय में चुनाव सम्पन्न कराने के लिए निष्पक्ष एजेंसी की बात करते हैं और स्वतन्त्र न्यायपालिका की वकालत करते हैं। यदि वर्तमान चुनावी व्यवस्था और न्यायपालिका पर दृष्टि डालें तो सच्चिदा जी भविष्यद्रष्टा प्रतीत होते हैं।

सभ्यता को सच्चिदा जी एक बड़ी उपलब्धि के साथ-साथ विपत्ति के रूप में भी रेखांकित करते हैं, क्योंकि इस सभ्यता ने लूटमार को पनपाते हुए मनुष्यों को मनुष्यों के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। जब गुलामी का एक प्रकार समाप्त होता है, तभी मनुष्यों को बन्धन में डालने के लिए दूसरी तरकीबें सामने आ जाती हैं। पूँजीवादी सभ्यता में सम्पत्ति को केन्द्रीय तत्त्व समझा जाता है। आजादी का संघर्ष अक्सर छिपे रूप में, किन्तु अनवरत चलता रहता है।

गुलामों को अपने लोगों से अलग कर दिया जाता है। उन्हें अपनी जीवन-पद्धति, पूजा और विश्वास से दूर कर दिया जाता है। पराए आराध्य को अंगीकार करना पड़ता है। फल यह होता है कि उनका परंपराबोध समाप्त हो जाता है। उनका यह बोध भी निःशेष हो जाता है कि कभी वे खुशहाल थे।

ईसा-पूर्व की सभ्यता में हम देखते हैं कि गुलामी एक अपरिहार्य तत्त्व थी। सच्चिदा जी बताते हैं कि वर्तमान पूँजीवादी सभ्यता में ‘आंतरिक उपनिवेश’ सेफ्टी वाल्व का काम करता है, उसके लिए प्राणवायु है।

वे बताते हैं कि ईसा-पूर्व पहली सदी के उत्तरार्द्ध तक इटली में बीस से तीस लाख गुलाम थे, जो कुल आबादी का 35 से 40 प्रतिशत था। छह हजार गुलामों को मार डाला गया। जब विशेषाधिकार खतरे में पड़ते हैं तो तथाकथित सभ्य लोगों की शिष्टता क्रूरता में बदल जाती है।

सच्चिदा जी का अध्ययन मुख्यतः यूरोप-केन्द्रित है। वे एक मिथक की चर्चा करते हुए बताते हैं कि—
“अंग्रेज जहां भी जाते हैं, अधिकार भी उनके साथ जाता है।”
इसी से “नो टैक्सेशन विदआउट रिप्रेजेंटेशन” का सिद्धान्त उद्भूत हुआ। हम देखते हैं कि ‘अंग्रेजों के अधिकार’ से ‘मनुष्यों के अधिकार’ तक पहुंचना संभव हो सका।

इसके बाद दास-विद्रोह की चर्चा की गयी है। गौरतलब है कि रोम में दास विद्रोह की एक लम्बी प्रक्रिया रही है। स्पार्टकस के नेतृत्व में हुए विद्रोह से रोमन समाज में भूचाल आ गया था। यह विद्रोह ईसा-पूर्व 73 में हुआ था। स्पार्टकस ने दासों की एक मजबूत सेना खड़ी कर ली थी, किन्तु एक युद्ध में वह अपनी अधिकांश सेना के साथ मारा गया। इस विद्रोह से रोम के निवासियों को यह सबक मिला कि गुलामों के प्रति नरमी का व्यवहार आवश्यक है। इसी स्पार्टकस से प्रेरित होकर अमेरिकी साहित्यकार हावर्ड फास्ट ने स्पार्टकस उपन्यास लिखा था, जिसका हिन्दी अनुवाद प्रेमचन्द के छोटे पुत्र अमृत राय ने किया।

आजादी की रोमांचक गाथा एथेंस के महात्मा सुकरात के बिना अधूरी रह जाती है। सुकरात पर आरोप लगाया गया कि वह युवाओं को बरगला रहे हैं। उन्हें दो विकल्प दिए गये—पहला, देश छोड़ देना; दूसरा, विषपान करना। सुकरात ने दूसरे विकल्प को चुना। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि उनका शिष्य प्लेटो लोकतन्त्र का विरोधी बन गया और अपने तर्कों को सही ठहराने के लिए रिपब्लिक ग्रन्थ लिखा। प्लेटो का शिष्य अरस्तू था, जिसका मानना था कि निरंकुश शासक ‘भाषणवीर’ होते हैं।

दुनिया का दारोगा अमेरिका में काले लोगों की आबादी पर्याप्त थी और 1961 तक वे स्वतन्त्र नहीं थे। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1920 में महिलाओं को मताधिकार मिला, किन्तु इसमें भी कतर-ब्योंत की गयी। केवल वही महिलाएँ मतदाता बन सकती थीं जो तीस वर्ष की हो चुकी हों और जिनकी कुछ आर्थिक हैसियत हो। यह विषमता 1928 में समाप्त की गयी। ध्यान रहे कि इंग्लैंड के चार्टिस्ट आन्दोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था और वे सभाओं में वक्ता भी होती थीं।

आजादी की इस जद्दोजहद में प्रथम विश्वयुद्ध के साथ ही कामगारों, किसानों और मजदूरों की विप्लव गाथा भी दिखाई देती है। 1917 में रूस में बोलशेविकों ने सत्ता सम्भाली। जर्मनी में 1918 में कामगारों के विद्रोह ने सरकार को राजनीतिक स्वतन्त्रता और प्रतिनिधि सरकार की गारंटी देने को बाध्य किया। 1920 में इटली में हड़ताल के दौरान कुछ कारखानों पर मजदूरों का कब्जा हो गया। जर्मन सोशल डेमोक्रेट नेता कार्ल काउत्स्की ने चेतावनी दी थी—
“जैसे ही मजदूरों का अधिकार संसदीय संस्थाओं पर होगा, शासक वर्ग का उन संस्थाओं पर से विश्वास समाप्त होने लगेगा।”

अपनी इस पुस्तक में सच्चिदा जी विचार की स्वतन्त्रता के साथ-साथ वैज्ञानिक सोच से आए परिवर्तन को भी समझाते हैं। निकोलस कोपरनिकस ने ईसाई होने के बावजूद यह सिद्धान्त रखा कि सूर्य केन्द्र में है और पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है। उसने यह ग्रन्थ पोप को समर्पित किया था और प्रकाशित होने के कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी, फलतः वह धर्म के कोप का भाजन बनने से बच गया। दार्शनिक ब्रूनो इसी सिद्धान्त-निष्ठा के कारण जीवित जला दिया गया। गैलीलियो ने अपनी दूरबीन से खगोलीय पिण्डों की खोज की। उसे धार्मिक न्यायालय ने गिरफ्तार कर लिया। ब्रूनो और कोपरनिकस का हश्र सामने देखकर उसने अपने विचारों से औपचारिक रूप से पीछे हटने की घोषणा की। कहा जाता है कि घुटनों के बल खड़े होकर उसने धीमे स्वर में कहा—
“पृथ्वी फिर भी घूमती है।”

भारत के सन्दर्भ में गुलामी का दूसरा रूप सच्चिदा जी जाति-प्रथा में देखते हैं। वंचित शूद्र इसी कोटि में आते थे। भारत में शूद्रों ने भाग्यवादी होकर आत्मसमर्पण कर दिया। त्रेता युग में शम्बूक और द्वापर में एकलव्य इसके उदाहरण हैं, जिन्होंने क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रिय कर्म करने का दुस्साहस किया था। भक्ति आन्दोलन में कबीर, रैदास, चोखामेला, नामदेव, लालबेग और तुकाराम ने ब्राह्मणवादी ढाँचे को तोड़ने का प्रयास किया। यह मान्यता प्रचलित थी (और है) कि अछूतों से ब्राह्मण देवता भी प्रदूषित हो जाते हैं। भक्ति आन्दोलन ने व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर बल दिया। यह भी आजादी का एक बड़ा आन्दोलन था।

सच्चिदा जी कहते हैं—
“वह कानून जो आजादी और मर्यादा का उल्लंघन करता हो, कानून हो ही नहीं सकता।”

वे नेपोलियन की उक्ति भी स्मरण कराते हैं—
“चार अखबार किसी खुले मैदान में उपस्थित एक लाख लोगों की भीड़ से अधिक खतरनाक हैं।” अकबर इलाहाबादी ने कहा—“खींचो न कमान, न तलवार निकालो,जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।” स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। संघर्ष आज भी जारी है। मिर्जापुर के पत्रकार पवन कुमार जायसवाल ने सरकारी स्कूल में मिड-डे मील में छात्रों को नमक-रोटी खाते दिखाया तो उन पर एफआईआर हो गयी। हाथरस गैंगरेप मामले की रिपोर्टिंग के लिए जाते समय सिद्धिक कप्पन को मथुरा में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

सच्चिदा जी बताते हैं कि मराठी पत्रिका केसरी के सम्पादक बाल गंगाधर तिलक को राष्ट्रवादी लेख छापने के अपराध में कारावास हुआ और बर्मा की मांडले जेल भेजा गया। ऐसे अनेक पत्र-पत्रिकाएँ थीं जिनके सम्पादकों को जेल जाना पड़ा, जुर्माना भरना पड़ा और प्रकाशन बन्द करना पड़ा।

उन्होंने सोवियत रूस की तानाशाही पर विस्तार से प्रकाश डाला है। पूर्वी जर्मनी (1953), हंगरी (1956), चेकोस्लोवाकिया (1966) और पोलैंड (1980) के विद्रोहों का वर्णन किया है। रूसी क्रान्ति में लेनिन ने किसानों को साथ लेकर क्रान्ति की थी, पर बाद में कम्युनिस्ट किसान-विरोधी हो गये। द्वितीय विश्वयुद्ध में यूक्रेन के किसानों ने नाजी सेना का स्वागत तक किया। यह पुस्तक 1984 में लिखी गयी थी। 1990 के दशक में सोवियत संघ विघटित हो गया।

आजादी गहराई से समानता से जुड़ी है। स्वाधीनता की संस्कृति और गुलामी की विकृति के विरुद्ध हर युग में संघर्ष चलता रहा है। साठ के दशक में अंग्रेजी पत्रिका करेंट के सम्पादक अबू सईद ने डॉ. राममनोहर लोहिया का साक्षात्कार लिया। उन्होंने पूछा—
“यदि समाजवाद और लोकतन्त्र में से किसी एक को चुनना पड़े तो आप किसे चुनेंगे?”
लोहिया ने कहा—
“ऐसी स्थिति आएगी ही नहीं।”
जब दोबारा पूछा गया तो उन्होंने कहा—
“समाजवाद।” यह पढ़कर मुझे असमंजस हुआ। मैं सच्चिदा जी से मिला। उन्होंने कहा—
“मैं तो लोकतन्त्र को चुनूंगा, क्योंकि जो इसे दे सकती है, वही इसे छीन भी सकती है।”
मेरी दुविधा समाप्त हो गयी।

पुस्तक में सात अध्याय हैं। अंत में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को शामिल किया गया है।

आज विश्व में दक्षिणपन्थी प्रतिगामी शक्तियाँ उभार पर हैं। भारत में भी लोकतान्त्रिक आवरण में प्रच्छन्न तानाशाही चल रही है। ऐसे समय में इस पुस्तक की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

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अच्युतानन्द किशोर नवीन

लेखक समता युवजन सभा एवं समाजवादी जनपरिषद से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ता तथा ‘सामयिक वार्ता’ में सम्पादकीय सहयोगी रहे हैं। संपर्क - +919470268745
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