
हमें एक स्वस्थ लोकतंत्र की आवश्यकता है पर दुःख की बात यह है कि हमें पता ही नहीं है कि इस प्रकार के लोकतंत्र को निर्मित करने, उसे बचाने और उसका विकास करने के तौर-तरीके कौन से हैं। देश की आम जनता ही नहीं बल्कि शिक्षित वर्ग भी व्यवस्था में जन-भागीदारी के प्रश्नों पर उदासीनता प्रकट करता है। सामाजिक परिवेश को हिंसा व राजनीतिक निरंकुशता से बचाने के लिए तथ्य व कल्पना, झूठ व सत्य, विश्वासघात तथा समर्पण आदि में किस प्रकार से भेद करना चाहिए, इस बारे में सजगता का चिंताजनक अभाव है। 2018 में अमेरिका के हावर्ड विश्वविद्यालय के राजनीति वैज्ञानिकों स्टीवेन लेवित्स्की तथा डैनियल जिब्लाट ने सहलेखन के रूप से एक किताब प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था ‘हाऊ डेमोक्रेसीज डाई’। इसमें उन्होंने विस्तार से उन राजनीतिक प्रक्रियाओं का विवेचन किया था जिसके द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि अपनी शक्ति के विस्तार के लिए लोकतंत्र को कमजोर करने लगते हैं। वे किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रतिरोध आंदोलन या सामान्य विपक्ष तक के लिए भी तिरस्कार व उपहास का भाव पैदा करते हैं। यहाँ तक कि लोकतंत्र में जनता की सहभागिता के पूरे विचार को ही बदल दिया जाता है और आम जनता की राजनीति के प्रति उदासीनता इसमें मददगार साबित होती है। चंद मीडिया घरानों के बल पर खड़ी की गई उग्र राष्ट्रवाद की हवा तथा दिखावे की आक्रामक विदेश नीति के बल पर लोकतंत्र में भागीदारी के प्रश्नों को दबा दिया जाता है। इसी प्रकार सूचना व प्रसारण के सारे अंगों को लोकतंत्र के प्रति विरक्ति जगाने में भी इस्तेमाल किया जाने लगता है। इस पुस्तक में तथाकथित निर्वाचित तानाशाहों का कारनामों का विवरण देते हुए लिखा गया है- ‘वे अदालतों और अन्य निष्पक्ष संस्थाओं को भी अपना हथियार बना सकते हैं, इसमें एक-एक कर समस्त मीडिया व निजी क्षेत्र को खरीदा जाता है (या फिर डरा-धमकाकर उन्हें चुप करा दिया जाता है), राजनीति के नियमों को फिर से लिखा जाता है ताकि विपक्ष के उभार की कोई संभावना न शेष रहे। चुनावी प्रक्रियाओं से अधिनायकवाद की स्थापना का सबसे बुरा पहलू यह है कि इसमें लोकतंत्र के कातिल बहुत होशियार होते हैं तथा लोकतंत्र को खत्म करने के लिए लोकतंत्र की संस्थाओं को ही धीरे-धीरे, कानूनी ढंग से या अन्य सूक्ष्म तरीकों से समाप्त करते हैं।’
संसार के राजनीतिक इतिहास का घटनाक्रम दर्शाता है कि इतिहास के अलग-अलग पड़ावों पर विभिन्न प्रकार के संविधानों, संसदीय प्रणालियों, स्थानीय निकायों व नगर परिषदों का गठन नागरिकों के राजनीतिक हस्तक्षेप को संभव बनाने के लिए होता रहा है। चौथी सदी ईसापूर्व एथेंस में भी ‘प्रत्यक्ष लोकतंत्र’ के प्रयोग हो रहे थे जिसमें सिटी-स्टेट के गणतंत्र में नागरिक स्वयं निर्णय लेते थे, समय-समय पर अपनी नौकरशाही को स्वयं चुनते व बदलते थे तथा निजी व सार्वजनिक जीवन में कोई अंतर नहीं रखते थे। सभी नागरिकों को शासन चलाने के तरीके सीखने का अवसर मिलता था और नागरिक- परिषद साल में चालीस बार विभिन्न विषयों पर निर्णय करने व नीति निर्धारित करने के लिए बैठकें करती थी। राजव्यवस्था में प्रत्यक्ष भागीदारी को राजनीति से कोई अलग या बाहरी चीज नहीं बल्कि सामाजिक जीवन का स्वाभाविक विस्तार माना जाता था। राजनीति वैज्ञानिक राबर्ट डेहल ने अपनी किताब ‘डेमोक्रेसी एंड इट्स क्रिटीक’ में एथेंस के इस प्राचीन लोकतंत्र के विषय में लिखा है कि तब ‘नागरिकों का राजनीतिक जीवन उनके अपने ही आत्मजगत के साथ सुसंगत संबंध रखता था तथा उसी का विस्तार था।’ एथेंस के इस लोकतंत्र की समस्या यह थी कि इसमें स्त्रियाँ, गुलाम व विदेशी लोगों की नागरिक नहीं माना जाता था। पहले से समान लोगों को ही लोकतंत्र का नागरिक समझा जाता था। लेकिन इसके बावजूद इसने प्रत्यक्ष भागीदारी, प्रतिनिधित्व तथा सहभागिता का अनोखा आदर्श पेश किया जिसने यूरोपीय पुनर्जागरण में लोकतंत्र व मानवतावाद के उभार में निर्णायक भूमिका अदा की।
संसार में लोकतंत्र का पहिया कई बार दौड़ता तथा कई बार कीचड़ में फंसता हुआ दिखाई देता है। कई बार लोकतंत्र आगे बढ़ा पर कई बार प्रतिक्रियावादी ताकतों के हाथों उसे कुचला भी गया। वर्तमान भारत में भी गत दो दशकों से लोकतंत्र के भविष्य को लेकर आशंकाएँ जन्म लेती रही हैं। इस सदी के आरंभ में भी हिंदुत्ववादी विचारधारा के आधार पर मिलीजुली सरकार बनी थी। 1999 में 182 सीटें जीतकर भाजपा ने कई प्रमुख सहयोगी दलों जैसे समता पार्टी, शिवसेना, टीएमसी, टीडीपी, बीजेडी, डीएमके, इंडियन लोकदल आदि के साथ मिलकर सरकार बनाई थी जो पांच साल चली। तभी यह खतरा जताया जाने लगा था कि भारतीय लोकतंत्र दक्षिणपंथी समूहों की बढ़ती शक्ति का सामना कर सकेगा या नहीं! इस्लामिक आतंक का उदय भी हिंदुत्ववाद को जायज ठहराने का काम कर रहा था। इसी के समानांतर भूमंडलीकरण के बाद पूंजी के बढ़ते संकेद्रण ने भारत में दक्षिणपंथी राजनीति को ढेर सारी ऑक्सीजन उपलब्ध करा दी थी। लेकिन 2004 में फीलगुड के नारे पर सवार होकर भाजपा ने छह महीने पहले ही चुनाव करा दिये और उन चुनावों में उसकी 44 सीटें घट गईं तथा वो 138 पर सिमट गई जबकि कांग्रेस की 31 सीटें बढ़ीं और उसे 145 सीटें प्राप्त हो गईं। लेफ्ट तथा समाजवादी पार्टी व बसपा आदि के सहयोग से कांग्रेस नेतृत्व की सरकार बनी और उसी दौर में भारतीय लोकतंत्र को भी स्थिरता प्राप्त हुई। कई प्रमुख कानून जैसे मनरेगा, सूचना का अधिकार कानून आदि लागू हुए जिसमें भारतीय लोकतंत्र व उसकी संस्थाओं को अधिक मजबूती प्रदान की। आगे का इतिहास भी लोकतंत्र के लिए बहुत अच्छा नहीं तो बहुत बुरा भी नहीं रहा। 2009 के चुनाव में कांग्रेस जीती 209 सीटें जबकि भाजपा को मिलीं केवल 116 सीटें। फिर से कांग्रेस नेतृत्व की सरकार बनी जिसे पांच साल चलना था। लेकिन 2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत ही प्राप्त कर लिया। माना जाता है कि मीडिया, प्रशासन के कुछ अंग, नागरिक समाज व कैग जैसी सरकारी संस्थाएँ यूपीए-दो की सरकार को निरंतर भ्रष्टाचार के मामलों में घेर रही थीं और उसका व्यापक प्रभाव मतदाताओं के मन पर पड़ा। लोकतंत्र के विरोध में सरकारी तंत्र के अंदर ही एक ‘डीप स्टेट’ निर्मित हो चुका था जिसकी ओर लोगों का ध्यान देर से गया। लोग ये मानते थे भ्रष्टाचार भारत के लोकतंत्र को खोखला कर रहा है पर उन्हें इस बात का भान तक न था कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ही लोकतंत्र को और अधिक कमजोर करने में प्रयोग किया जाने लगेगा। इस प्रकार भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों की लहर पर सवार होकर भाजपा-संघ ने भारत सरकार की समस्त संस्थाओं पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। पहले यह आसानी से माना जाता था कि भारतीय लोकतंत्र में निहित लचीलापन किसी भी विचारधारा को आसानी से पचा सकता है तथा सभी विचारधाराओं को लोकतंत्र की कार्यप्रणाली व उसके संस्थानिक नियमों का पालन करने के लिए मजबूर होना पड़ जाता है। लेकिन गत एक दशक के राजनीतिक परिवर्तनों ने भारतीय लोकतंत्र के बारे में इस विचार की खामियों को प्रकट कर दिया है जब सांप्रदायिक राजनीतिक ने भारतीय राज्य पर कब्जा करने के बाद लोकतंत्र में जनभागीदारी व सहभागिता के पूरी परिभाषा को ही बदलना आरंभ कर दिया। अब आर्थिक नीतियों, सामाजिक निर्णयों व नागरिक समाज में भागीदारी के स्थान पर धार्मिक आयोजनों में भागीदार व धार्मिक पहचान से जुड़े अधिकारों के लिए संघर्ष को लोकतंत्र के प्रमुख लक्षणों से जोड़ा जाने लगा। राममंदिर, कुंभ पर्व तथा कांवड़ यात्रा आदि को केवल धार्मिकता से नहीं जोड़ा गया बल्कि नई राजनीतिक क्रांति का प्रतीक बनाया गया जिसमें दमित जनता को धार्मिक अधिकार प्राप्त हुए जिन्हें धर्मनिरपेक्षता के दबावों के कारण उनसे छीन लिया गया था। धार्मिक पहचान पर गर्व करने की संस्कृति ने लोकतंत्र व संविधान से मिली नागरिक पहचान को क्षति पहुंचाई। धार्मिक आयोजनों में सदियों से भीड़ जुटती रही है और उस भीड़ को कभी लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रतीक बनाने की कोशिश नहीं की गई है। लेकिन नई राजनीतिक संस्कृति में अंधविश्वास व आस्था के कारण उमड़ी उस भीड़ को ही ऐसे प्रस्तुत किया जाने लगा जैसे वह भीड़ अब अपने अधिकारों का उपयोग कर पा रही है। तिरंगे व भगवे को ही आपस में एकजुट नहीं दिखाया गया बल्कि पूरा प्रशासनिक अमला, जो धार्मिक मसलों में राज्य-संस्था की निष्पक्षता के लिए डिजाइन किया गया था, वो भी इसी भीड़ का अंग बन गया। इसी प्रकार लोकतंत्र में प्रत्यक्ष भागीदारी का यह भी अर्थ हो गया देश की सैन्य गतिविधियों व राष्ट्रीय सुरक्षा के विषयों पर अधिक मुखर हो जाना। जिन भी सूचनाओं व विचारधारात्मक उत्तेजनाओं की आपूर्ति सरकार द्वारा इन विषयों पर की जा रही है, उसका बगैर किसी प्रश्न के समर्थन करना। एक नया राजनीतिक कामनसेंस तैयार किया गया जो आम जनता के राजनीतिक अधिकारों के लिए घातक हो गया। इसमें सेना और धर्म के पक्ष में बोल रहा व्यक्ति लोकतंत्र का सबसे जिम्मेदार नागरिक मान लिया गया जबकि समाज में बराबरी, जीविका व संवैधानिक अधिकारों के लिए चिंतित नागरिक को खलनायक बनाया जाने लगा। नई सत्ता-संरचना के अंतर्गत लोकतंत्र के अपने ही संरक्षकों यानी बुद्धिमान नागरिकों को सार्वजनिक शत्रु घोषित कर दिया। बहुत चालाकी से बार-बार ‘इकोसिस्टम’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है ताकि लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए उस राजनीतिक संस्कृति को बदनाम किया जा सके जिसमें लोग प्रश्न पूछने की आजादी को स्वाभाविक मानते थे। यानी लोकतांत्रिक चेतना को हताश करने के लिए बड़ी सावधानी से चौतरफा विचारधारात्मक प्रयास किये जाते रहे हैं। प्रतिनिधित्व व सहभागिता को पूरी तरह नकारा नहीं गया बल्कि उसे सतत वैचारिक प्रक्रियाओं से पुनर्परिभाषित किया गया है। सेना का आक्रामक महिमामंडन उस नागरिक को लोकतंत्र के केंद्र से विस्थापित करने के लिए किया गया जो लोकतंत्र के माध्यम से चुनी गई सरकार से जवाबदेही की मांग कर सकता था। इसमें नागरिक व राजनीतिक दल के रिश्तों में भी बुनियादी बदलाव पैदा किया गया। आम जनता को यह अहसास कराया गया है कि अब राजनीतिक दल भी, खासकर सत्ता-च्युत व छोटे या साधारण दल, उसके जीवन की समस्याओं से उसे निजात नहीं दिला सकते हैं। भारत के बहुदलीय लोकतंत्र ने विभिन्न नागरिक समूहों को अपने-अपने राजनीतिक दल के माध्यम से अपना प्रतिनिधित्व तलाशने का मौका दिया है पर चुनावों में पूंजी के बढ़ते महत्त्व ने छोटे दलों के अस्तित्व को लगभग असंभव बना दिया है। छोटे दल ही नहीं बल्कि मुख्य विपक्षी दल भी संसाधनहीनता का शिकार बना दिया जाता है और व्यवहारिक स्तर पर धीरे-धीरे एकदलीय लोकतंत्र ही बचता है। कोई सबसे शक्तिशाली राजनीतिक दल अन्य दलों को या तो अपने से जोड़ लेता है, उन्हें समाहित कर लेता है या फिर वो अन्य दलों की चुनावी उपस्थिति के बावजूद हर संस्था पर नियंत्रण के कारण अपना सर्वसत्तावादी शासन बनाए रखता है। जर्मन यहूदी महिला हन्ना आरेंट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द ओरिजिन्स आफ टोटेलिटेरियनिज्म’ (1950) में लिखा था कि सर्वसत्तावाद किसी भी परंपरागत तानाशाही या आम निरंकुशता से अधिक प्रभावशाली होता है क्योंकि ये सत्ता के सभी अंगों को अपने अनुकूल ढाल लेता है। ये अपनी नई राजनीतिक संस्थाएँ खड़ी करता है तथा राजनीति, कानून व समाज की समस्त पुरानी व परंपरागत संस्थाओं को नष्ट कर डालता है।
लोकतंत्र में कई बार शासकवर्गीय शक्तियाँ बहुदलीयता के प्रति विरक्ति तथा एकदलीय शासन के प्रति लोगों के मन में उत्साह पैदा करने का भी काम करती हैं। वे यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न करती हैं कि बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली लोकतंत्र को अराजक व शोरगुल से भरा बना देती हैं तथा भ्रष्टाचार में हिस्सा मांगने वाले विशाल राजनीतिक वर्ग को जन्म देती हैं। वे जनता के मन में यह विश्वास भी पैदा करती हैं कि भ्रष्टाचार व बहुदलीय लोकतंत्र परस्पर पर्याय बन जाते हैं और एकदलीय लोकतंत्र प्रणाली में भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होता है लेकिन कम से कम भ्रष्टाचार में हिस्सा लेने वाले राजनीतिक वर्ग का आकार अवश्य घटा दिया जाता है। जहाँ पहले बहुत सारे दल व उनके नेता भ्रष्टाचार करते हैं, वहीं बाद में केवल एक दल व उसका नेतृत्व-समूह ही भ्रष्टाचार करता है। इस प्रकार राजनीतिक वर्ग का आकार छोटा कर भ्रष्टाचार की मात्रा भी घटाने का स्वप्न दिखाया जाता है। भ्रष्टाचार में कटौती को लोकतंत्र में कटौती से जोड़ा जाता है। पर यह नहीं बताया जाता है कि आकार में छोटे प्रतीत होते राजनीतिक वर्ग द्वारा किये भ्रष्टाचार की मात्रा भी विशाल राजनीतिक वर्ग द्वारा किये गये ‘प्रतियोगी भ्रष्टाचार’ की मात्रा से अधिक हो सकती है। यह भी स्पष्ट नहीं होने दिया जाता कि एकदलीय लोकतंत्र में कोई एक दल यदि अधिक भ्रष्टाचार में लिप्त होगा तो वो निरंकुश व विपक्षहीन शासनप्रणाली के बल पर भ्रष्टाचार के बारे में वास्तविक सूचनाओं को उजागर करने की प्रतियोगिता समाप्त करेगा तथा भ्रष्टाचार संबंधी वास्तविक आंकड़ों को नियंत्रित करने में अधिक सफल हो जाएगा। जबकि बहुदलीय लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को उजागर करने की प्रतियोगिता भी अधिक बड़े पैमाने पर होती है और भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त होती है। कुल मिलाकर वर्तमान भारत में लोकतंत्र तिहरे प्रहार से जूझ रहा है। संवैधानिक संस्थाओं को संविधानसम्मत तरीकों से कमजोर करने, नागरिक की परिभाषा बदलने तथा राजनीतिक दल-प्रणाली में बुनियादी परिवर्तन लाने से। यह खुली हुई सचाई है कि भारत के लोकतंत्र को केवल सत्ता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता बल्कि उसे नागरिक समाज में फैले अपने वास्तविक अभिभावकों से समर्थन प्राप्त करना होगा। उसके ये वास्तविक अभिभावक जाति-धर्म-क्षेत्र व भाषा की संकीर्णता से लड़ने वाले विवेकवादी नागरिक ही हो सकते हैं।










