गाँधी से मुलाकात

मनुष्य के गुणों के लिए उनकी पूजा की जाए

गांधी से मुलाक़ात (भाग 4)

 

  • हेमन्त

 

उसे सोने को कहा। लेकिन उसका मन चक्कर खा रहा था। चुप कैसे रहता? उसने कहा – “एक बात। अगर इजाजत हो तो।“
वे हल्के-से मुस्कराए और बोले – “अच्छा, पूछो।”
“आप एक बार कह रहे थे कि मनुष्य को उसकी कृति से अलग करके विचार नहीं किया जा सकता। आपको जो लोग पूजते हैं, उन्हें आपके कार्यों के कारण ही पूजना चाहिए। आप हमें बार-बार कहते हैं कि मुझे पूजना हो, तो मेरे कार्यों को पूजो। कार्यों को पूजो माने कि आपके कार्यों का आचरण करो। लेकिन आज सुबह आपने कहा कि ‘हमें मनुष्य के प्रति तिरस्कार कैसे हो सकता है? उसके कार्य के प्रति हो सकता है।’ अगर आपका पहले का कथन सच है, तो इस दूसरे में ज़रा त्रुटि तो आ ही जाती है। जैसे, हम मनुष्यों को उसके कार्यों से अलग करके नहीं पूज सकते, वैसे ही एक आदमी की उसके कार्यों से अलग रख कर निंदा भी नहीं कर सकते।”
वे बोले – “तुम भूल कैसे जाते हो? कार्य के लिए तिरस्कार हो, तो वह हमें ऊपर उठाता है। मनुष्य के लिए तिरस्कार हो, तो वह हमें गिराता है। और उस मनुष्य का कुछ भी लाभ नहीं करता। मनुष्य की उसके गुणों के लिए पूजा की जाए, तो हम ऊपर उठते हैं।”
“नैतिक दृष्टि से आपकी बात स्वीकार्य है। परन्तु मानस-शास्त्र के ख्याल से वह असम्भव लगती है।”
उनके चेहरे पर बच्चों की-सी पोपली मुस्कान तिर आयी। वे बोले – “तुमने तो इस तरह गणित का त्रैराशिक पद रख दिया कि मनुष्य के गुणों के लिए उसकी पूजा की जाए, तो उसके दोषों के लिए उसकी निंदा की जाए। परंतु यह बात ठीक नहीं। मनुष्य हमेशा गुणों या कार्यों की पूजा नहीं कर सकता। जैसे, ‘शा’ और ‘न’ को मेरे बहुत से काम रद्दी मालूम पड़ते हैं, परंतु मुझे वे खूब पूजते हैं। तब जैसे उनके लिए मुझे पूजने की खातिर मेरे कार्यों को पूजने की खातिर मेरे कार्यों को पूजना कठिन हो जाता है, वैसे ही मनुष्य को बुरे कामों के लिए उस मनुष्य की निंदा से दूर रहना साधारण आदमी के लिए कठिन है। इसलिए मानस-शास्त्र की दृष्टि से तुम्हें यह असम्भव प्रतीत होता है। परंतु मुझे ज़रा भी नहीं होता। देखो, उस दिन मैं ‘महामहिम’ से मिला था न। उन्होंने अत्यंत खराब उद्गार प्रकट किए। किंतु मुझे उनके प्रति तिल भर भी रोष नहीं हुआ। मुझे मौक़ा मिले, तो मैं इस आदमी की खूब सेवा कर डालूं। मुझे किस कारण उनके प्रति तिरस्कार पैदा हो? संसार में तो एक भी मनुष्य यह समझ कर कि ‘मैं दुष्ट हूँ’, दुष्कर्म नहीं करता। वह स्वभाव के अनुसार काम करता है। मुझे उनके प्रति ज़रा भी तिरस्कार नहीं होता… ।”
“इसका कारण क्या है?”
“क्योंकि मैं देख सकता हूँ कि शासन करने वाली जातियां-प्रजातियां ऐसा ही करती हैं। मेरा फर्ज है उसकी ‘सेवा’ करके उसे सुधारना। आजकल की नेता श्रीमती ‘बे’ जितना जहर उगल रही हैं, उतना कोई उगल रहा है? उतना किसीने उगला है? परंतु क्या उनके प्रति मुझे ज़रा भी तिरस्कार है? उन्होंने इतने बरस देश की सेवा की और अब उनकी मति फिर गयी, तो उनकी निंदा की जाए या उन्हें दया का पात्र माना जाए? निंदा करना तो गिरे हुए को लात मारने के बराबर है।”

Related image
“पिछले सप्ताह उनकी सभा की खबर अख़बारों में छपी थी कि उसमें कुछ दर्शकों ने उनके खिलाफ नारे लगाए थे। आप उनके बगल में बैठे थे। अखबारों में जो छपा कि आपने लोगों को…।”
वे हंसे और बोले – “उस दिन की संगोष्ठी में मैं तो खास तौर से उनके पास की कुर्सी पर बैठा था। और इस बात की बराबर सावधानी रख रहा था कि कोई उनका अपमान न करे। कोई अपमान करता, तो तुरंत उसे धमाका देता। मनुष्य की तिरस्कार-वृत्ति उसकी दुर्बलता की सूचक है। तिरस्कार कमजोर आदमी को ही हो सकता है। प्रेम कहो या दया, वह बलवान मनुष्य की निशानी है। मनुष्य की दया उदारता में निहित है। उदारता ही दया में निहित है। और ऐसे उदारचरित ही सच्चे इन्सान हैं। तिरस्कार-वृत्ति धर्म-वृत्ति का आभाव भी सूचित करती है।”
वह निरुत्तर-सा हो गया। फिर भी दो शब्द बोलने की हिम्मत दिखाई – “मैंने मानस-शस्त्र की दृष्टि से असम्भव कहा। लेकिन अब सच मालूम होता है कि इसी प्रकार की मेरी मानसिक दशा में यह वृत्ति कि कार्यों की निंदा की जाए, कार्य करनेवाली की निंदा न की जाए – असम्भव है। मेरी धर्म-वृत्ति शिथिल है, इसमें आश्चर्य नहीं। मैं इन दिनों इस शिथिलता के वशीभूत हूं। मैं श्रीमती ‘बे’ को, ‘पटे’ को, ‘महामहिम’ को मैं धिक्कारता आया हूं। यह मेरे दिमाग की कमजोरी जाहिर करता है…।”
“हां, यह समझ में आने योग्य है। मुझे ज़रा भी तिरस्कार नहीं होता, यह मैं ठीक कहता हूं, लेकिन यह कह कर मैं अपने में भारी उदारता होने का आरोप मोल लेता हूं।.. खैर, कोई हर्ज नहीं। जो वस्तु मुझमें है, उसके कहने में संकोच कैसा? मेरी उम्र 50 वर्ष हो गयी, तो क्या मैं किसी से उनचास कहूंगा? मेरा शरीर घट रहा हो या बढ़ रहा हो, जैसा हो वैसा मुझे कहना ही चाहिए। उदारता से सम्बंधित बात भी ऐसी ही है। मैं उदारता में प्रतिदिन आगे बढ़ रहा हूं। यह वृत्ति मैं अस्वीकार कैसे कर सकता हूं? ऐसा करूं, तो इसे मिथ्या विनय कहा जाएगा। मैं कहता हूं, आजकल मुझमें यह चीज अच्छी तरह प्रकट हो रही है। मेरे परिवार में कुछ सदस्य शराबी हैं, चोरी करनेवाले हैं, बीडी-सिगरेट पीनेवाले हैं। क्या मैं उन्हें धिक्कारता? नहीं, मैंने उनसे कहा – भई, मैं तब तक आपके साथ सम्बंध नहीं रखूंगा, जब तक आप ये बुराइयां नहीं छोड़ दोगे…। हां, यह सब प्रेम से ही कहा…।”

Related image
उसने तपाक से कहा – “इस मिसाल में तो यह जवाबनुमा सवाल उछाला जा सकता है कि वे आपके भाई-बंधु हैं, इसलिए आप प्रेम से व्यवहार कर सकते हैं।”
उन्होंने तुरंत उत्तर दिया – “ठीक है। इसीलिए मैंने लेख लिखा कि कुटुंब में प्रेम से बर्ताव करनेवाला इन्सान पशु की श्रेणी से निकल कर एक सीढ़ी चढ़ जाता है। वही प्रेम अपने गांव के लोगों के प्रति अनुभव करनेवाला मनुष्य उससे भी ज़रा आगे बढ़ा हुआ होता है। प्रांत के सभी लोगों के लिए अनुभव करनेवाला उससे भी कुछ आगे बढ़ा हुआ है। इसी तरह सारे संसार में अपना कितना भी विरोध हो, उसके साथ तिरस्कार, द्वेष न करके प्रेम से व्यवहार करनेवाला – सत्याग्रह पर चलनेवाला – कोई होगा, तो वह होगा ‘वसुधैवकुटुम्बकम’ को माननेवाला उदारचरित मनुष्य। इस उदारता की यही तो जबर्दस्त खूबी है! मनुष्य राजा की तरह व्यवहार कर सकता है, फिर भले कितने ही प्रहार क्यों न होते रहें…।”
वह उनको निहारता रहा। चेहरे से थकन झलक रही है, लेकिन वे तो रौ में आ गए! पल भर रुक कर उन्होंने पूछा – “तुमने ‘गुलिवर’ को पढ़ा है?
“जोनाथन स्विफ्ट की गुलिवर की यात्राएं? ‘गुलिवर्स ट्रैवल्स’, जिसमें गुलिवर नाम के मनुष्य की पृथ्वी के दूर-दूर के विचित्र देशों में की गयी यात्राओं का वर्णन है?
“हां, वही। उसमें पढ़ी बातें कुछ याद है?”

ये भी पढ़िए –  गाँधी से मुलाकात (भाग 3)

“हां, विचित्र देशों में लिलिपुट और ब्रॉबडिंगनेग नाम याद हैं। लिलिपुट के लोग पिद्दी हैं। ब्रॉबडिंगनेग के लोग इन्सान से दस-बारह गुने ऊंचे और लम्बे-चौड़े राक्षसी कद के हैं। गुलिवर और भी विचित्र लोगों के देशों में सफ़र करता है…। विचित्र देशों की विचित्र कल्पना है।”
“यह पुस्तक व्यंग्य साहित्य में उत्कृष्ट मानी जाती है। यूरोप की सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं, राजनीतिज्ञों के दांव-पेंचों, राज्य-विस्तार की लालसा, युद्ध वगैरह पर सख्त कटाक्ष है। पुस्तक की खूबी यह है कि उसके मनोरंजक वर्णन बालक और प्रौढ़ दोनों को पसंद आनेवाले हैं…।”

Related image
“हां, यह तो है। मैंने दस साल पहले संघर्ष के दौरान यह उपन्यास पढ़ा था। उसमें गुलिवर एक जहाज के साथ डूब जाता है और जब उसे होश आता है, तो वे अपने आप को एक कैद में पाता है। जिन लोगों ने उसे बंधक बनाया है उनका आकार सामान्य मानव के आकार से बारह गुना कम है, वे लिलिपुट के निवासी हैं। उसमें वर्णन है कि गुलिवर की हथेली पर लिलिपुटियन बैठते, उन्हें चिमोटियां भरते, मारते-पीटते, खून निकाल देते। गुलिवर को यह सब गुदगुदी-सी लगती है। फिर जब आगे बढ़ता हुआ जहाज एडवेंचर तूफ़ान के कारण अपने रास्ते से भटक जाता है और ताज़े पानी की खोज में उसे मजबूरन भूमि की तरफ जाना पड़ता है, तब गुलिवर के साथी गुलिवर को छोड़ देते हैं। अब वह एक किसान को मिलता है, जो 72 फीट लंबा है। वह ब्रॉबडिंगनेग देश का निवासी है। साहित्य के इस पुस्तक में गणित जैसा वर्णन है कि लिलिपुटियन का पैमाना 1:12 है, तो ब्रॉबडिंगनेगियन का पैमाना 12:1 है। गुलिवर को लगता है कि ये सब मनुष्य की ही एक प्रजातियां हैं…।”
“यह तो है। पुस्तक में मार्के की बात यह है कि उसमें आधुनिक सभ्यता का, व्यं‚ग्यात्मक शैली में, बहुत ही सुंदर खंडन किया गया है ; यह पुस्तक इतनी सरल है कि बालक भी आनं‹दपूर्वक पढ़ सकते हैं और ज्ञानी भी उसके गूढ़ार्थ का मनन करते हुए उसमें गोता लगा सकते हैं…। लिलिपुट में गुलिवर जितना ऊपर चढ़ा , ब्रॉबडिंगनेग में उसे उतना ही नीचा देखना पड़ा। लिलिपुट में भी बौने लोगों का वर्णन करते हुए लिखा है कि उनकी कुछ शक्तियां गुलिवर की अपनी, यानी साधारण मनुष्यों की, शक्तियों की अपेक्षा …ज्यादा बढ़ी-चढ़ी हैं…। इसी तरह हमें करना है…।”
इतना कह कर उन्होंने बिस्तर पर अपने पांव सिकोड़ लिये और ऊपर चादर तानते हुए कहा – “बाकी बातें कल होंगी। जाओ, सो जाओ। कल भी समय से पहले उठना है। कई काम पूरे करने हैं…।”
वह फिर चक्कर खा गया! उसका अंतर उदारचरित आत्मा के लिए उमड़-सा पड़ा। उसकी आँखें कुछ नम-सी हो आयीं। उसने नमस्कार करके कहा – “सॉरी, आपकी नींद में खलल…।”
“कोई बात नहीं, सो जाओ, शुभरात्रि…!”
वह सोने चला गया – प्रेम के अज्ञात सुगंध-स्पर्श से पगा…।”
+++

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार हैं|

सम्पर्क- +919430887611

.

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

One thought on “मनुष्य के गुणों के लिए उनकी पूजा की जाए

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *