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	Comments on: शाकाहार बनाम मांसाहार का बवंडर	</title>
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	<description>सच के साथ, सब के साथ</description>
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		<title>
		By: DHIRENDRA		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[DHIRENDRA]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Jul 2024 03:52:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://sablog.in/whirlwind-of-vegetarianism-vs-non-vegetarianism/19150/#comment-3775&quot;&gt;Richa Verma&lt;/a&gt;.

सुभाष राय जी की यह टिप्पणी मानीखेज है,
सुशोभित की किताब &#039;मैं वीगन क्यों हूँ&#039; पर &#039;सबलोग&#039; में छपी धीरेन्द्र प्रताप सिंह की एक टिप्पणी पर प्रतिक्रिया।

प्रकृति हमेशा एक संतुलन पर चलती है। यहां कोई भी जीवन निरर्थक या अन्य नहीं है। सभी अन्योन्याश्रित हैं। गौरैया और गिद्ध के कम होने या विलुप्ति की कगार पर पहुँचने से सारी दुनिया आखिर क्यों चिंतित हो रही है? उनका कुछ योगदान इस प्रकृति के संतुलन में जरूर होगा। इसी तरह सारे जीवों के बारे में कहा जाना चाहिए। एक पौधा या एक जीव भी अतिरिक्त नहीं है। इसलिए किसी भी जीव की हत्या तर्कसंगत नहीं है। प्रकृति ने संतुलन बनाये रखने के लिए ही कुछ जानवरों को मांसाहारी बनाया है। वह जंगल का कानून है। हम भी जब जंगली थे, यही हमारे लिए भी काम्य था। हमारे पुरखे जानवरों को मारकर खाते थे। धीरे-धीरे मनुष्य ने अन्न, फल की खोज की। प्रकृति ने उन्हें पहले से ही रच रखा था। उसे पता था कि एक दिन मनुष्य अपने लिए उनकी खोज कर लेगा। और अब जब हमारे लिए पर्याप्त अन्न,फल, फूल है, दूध, दही सब कुछ है तो आखिर किसी को मारकर खाने का क्या औचित्य ? यह गलत है। जो भी ऐसा करते हैं, वे जंगली ही कहे जायेंगे। यह धर्म का मामला भी नहीं हैं। विभिन्न धर्मों ने इसे प्रकृति के नियमन से ही ग्रहण किया है। कोई भी धर्म जो जीव हत्या का समर्थक है, वह धर्म कहे जाने योग्य नहीं है। यह तर्क भी सही नहीं है कि दाल, चावल, आटा से सस्ता मांस मिलता है। जिन्होंने होटलों में मांस खाया होगा, वे इस तथ्य को जानते हैं। यह विशुद्ध प्रकृति के संरक्षण, संतुलन का मामला है। जो लोग मांसाहार के समर्थक हैं, उनके लिए यह मांसाहार का नहीं स्वाद का मामला है। अगर यह केवल मांसाहार का मामला होता तो जो लोग बकरा, मुर्गा खाते हैं, उन्हें कीड़े, मकोड़े खाने में क्यों एतराज होता? खैर यह बड़ा विषय है। इस पर लम्बी बात की जा सकती है लेकिन फिलहाल इतना ही।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://sablog.in/whirlwind-of-vegetarianism-vs-non-vegetarianism/19150/#comment-3775">Richa Verma</a>.</p>
<p>सुभाष राय जी की यह टिप्पणी मानीखेज है,<br />
सुशोभित की किताब &#8216;मैं वीगन क्यों हूँ&#8217; पर &#8216;सबलोग&#8217; में छपी धीरेन्द्र प्रताप सिंह की एक टिप्पणी पर प्रतिक्रिया।</p>
<p>प्रकृति हमेशा एक संतुलन पर चलती है। यहां कोई भी जीवन निरर्थक या अन्य नहीं है। सभी अन्योन्याश्रित हैं। गौरैया और गिद्ध के कम होने या विलुप्ति की कगार पर पहुँचने से सारी दुनिया आखिर क्यों चिंतित हो रही है? उनका कुछ योगदान इस प्रकृति के संतुलन में जरूर होगा। इसी तरह सारे जीवों के बारे में कहा जाना चाहिए। एक पौधा या एक जीव भी अतिरिक्त नहीं है। इसलिए किसी भी जीव की हत्या तर्कसंगत नहीं है। प्रकृति ने संतुलन बनाये रखने के लिए ही कुछ जानवरों को मांसाहारी बनाया है। वह जंगल का कानून है। हम भी जब जंगली थे, यही हमारे लिए भी काम्य था। हमारे पुरखे जानवरों को मारकर खाते थे। धीरे-धीरे मनुष्य ने अन्न, फल की खोज की। प्रकृति ने उन्हें पहले से ही रच रखा था। उसे पता था कि एक दिन मनुष्य अपने लिए उनकी खोज कर लेगा। और अब जब हमारे लिए पर्याप्त अन्न,फल, फूल है, दूध, दही सब कुछ है तो आखिर किसी को मारकर खाने का क्या औचित्य ? यह गलत है। जो भी ऐसा करते हैं, वे जंगली ही कहे जायेंगे। यह धर्म का मामला भी नहीं हैं। विभिन्न धर्मों ने इसे प्रकृति के नियमन से ही ग्रहण किया है। कोई भी धर्म जो जीव हत्या का समर्थक है, वह धर्म कहे जाने योग्य नहीं है। यह तर्क भी सही नहीं है कि दाल, चावल, आटा से सस्ता मांस मिलता है। जिन्होंने होटलों में मांस खाया होगा, वे इस तथ्य को जानते हैं। यह विशुद्ध प्रकृति के संरक्षण, संतुलन का मामला है। जो लोग मांसाहार के समर्थक हैं, उनके लिए यह मांसाहार का नहीं स्वाद का मामला है। अगर यह केवल मांसाहार का मामला होता तो जो लोग बकरा, मुर्गा खाते हैं, उन्हें कीड़े, मकोड़े खाने में क्यों एतराज होता? खैर यह बड़ा विषय है। इस पर लम्बी बात की जा सकती है लेकिन फिलहाल इतना ही।</p>
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		<title>
		By: Richa Verma		</title>
		<link>https://sablog.in/whirlwind-of-vegetarianism-vs-non-vegetarianism/19150/#comment-3775</link>

		<dc:creator><![CDATA[Richa Verma]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Jul 2024 15:27:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[खान पान और कपड़े यह बहुत कुछ मनुष्य जहां रहता है उसके भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। भूख ना देखें सूखी रोटी नींद ना देखे टूटी खाट। भूख लगेगी तो इंसान को जो भी उपलब्ध होगा इंसान क्या जानवर की किसी को भी जो भी उपलब्ध होगा वह तो खाएगा ही। वीगन , वेजीटेरियन या नॉन वेजिटेरियन यह सब शब्दावली बाद में आईं पहले तो इंसान ने भोजन करना शुरू किया। बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है तो क्या वह सोचती है क्यों वेजिटेरियन है या नॉनवेजिटेरियन है। जो सभ्यता नदी और मैदान में पनपी वहां के लोग वेजीटेरियन खाना खाए जहां फल फूल सब्जी नहीं प्राप्त था वहां के लोग जानवरों को मार कर खाएं। आज के जमाने में दो शब्द बहुत ही ट्रेंड कर रहे हैं वे हैं ट्रेडिंग और ट्रोलिंग... आजकल वीगन शब्द ट्रेंड में है..]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>खान पान और कपड़े यह बहुत कुछ मनुष्य जहां रहता है उसके भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। भूख ना देखें सूखी रोटी नींद ना देखे टूटी खाट। भूख लगेगी तो इंसान को जो भी उपलब्ध होगा इंसान क्या जानवर की किसी को भी जो भी उपलब्ध होगा वह तो खाएगा ही। वीगन , वेजीटेरियन या नॉन वेजिटेरियन यह सब शब्दावली बाद में आईं पहले तो इंसान ने भोजन करना शुरू किया। बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है तो क्या वह सोचती है क्यों वेजिटेरियन है या नॉनवेजिटेरियन है। जो सभ्यता नदी और मैदान में पनपी वहां के लोग वेजीटेरियन खाना खाए जहां फल फूल सब्जी नहीं प्राप्त था वहां के लोग जानवरों को मार कर खाएं। आज के जमाने में दो शब्द बहुत ही ट्रेंड कर रहे हैं वे हैं ट्रेडिंग और ट्रोलिंग&#8230; आजकल वीगन शब्द ट्रेंड में है..</p>
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		By: DHIRENDRA		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[DHIRENDRA]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Jul 2024 07:27:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://sablog.in/whirlwind-of-vegetarianism-vs-non-vegetarianism/19150/#comment-3754&quot;&gt;विनोद अनुपम&lt;/a&gt;.

पूर्वग्रह और फालतू की बात आपकी दृष्टि है। क्या इसमें कोई संदेह है कि जैनी अंकुरित चना केवल इसलिए नहीं खाते कि उसमें जीव होता है और वही जैनी कन्या भ्रूण हत्या भी करा देते हैं। बड़े-बड़े मांस उद्योग के व्यापारी हैं... यह द्वैत ही तो है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://sablog.in/whirlwind-of-vegetarianism-vs-non-vegetarianism/19150/#comment-3754">विनोद अनुपम</a>.</p>
<p>पूर्वग्रह और फालतू की बात आपकी दृष्टि है। क्या इसमें कोई संदेह है कि जैनी अंकुरित चना केवल इसलिए नहीं खाते कि उसमें जीव होता है और वही जैनी कन्या भ्रूण हत्या भी करा देते हैं। बड़े-बड़े मांस उद्योग के व्यापारी हैं&#8230; यह द्वैत ही तो है।</p>
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		<title>
		By: विनोद अनुपम		</title>
		<link>https://sablog.in/whirlwind-of-vegetarianism-vs-non-vegetarianism/19150/#comment-3754</link>

		<dc:creator><![CDATA[विनोद अनुपम]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 Jun 2024 05:49:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निहायत पूर्वाग्रही और फालतू लेख।जैनी लड़की पैदा होने पर भ्रुणहत्या करा देते हैं.. अधिकांश मांसाहारी आश्चर्यजनक रूप से जनपक्षधर, परहितकारी र सामाजिक मनुष्य होते हैं। इतना सामान्यीकरण...यह सब लोग की आवाज नहीं हो सकती]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>निहायत पूर्वाग्रही और फालतू लेख।जैनी लड़की पैदा होने पर भ्रुणहत्या करा देते हैं.. अधिकांश मांसाहारी आश्चर्यजनक रूप से जनपक्षधर, परहितकारी र सामाजिक मनुष्य होते हैं। इतना सामान्यीकरण&#8230;यह सब लोग की आवाज नहीं हो सकती</p>
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		<title>
		By: Sarvagya Pandey Advocate		</title>
		<link>https://sablog.in/whirlwind-of-vegetarianism-vs-non-vegetarianism/19150/#comment-3747</link>

		<dc:creator><![CDATA[Sarvagya Pandey Advocate]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Jun 2024 16:48:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बहुत बढ़िया]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत बढ़िया</p>
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