देश

कैसा लोकतंत्र! जहां मासूमों के जान की क़ीमत नहीं

 

  • महेश तिवारी 

 

कोटा के जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौतों के बाद देश भर के सरकारी अस्पतालों की कलई खुलकर एक बार फिर सामने आ गई है। सिस्टम के सभी दावों और वादों की परतें जग ज़ाहिर हो रही, कि जन स्वास्थ्य और सर्वसमावेशी विकास को लेकर वह कितना सज़ग और चौकन्ना है। ऐसे में जनता के ज़ेहन में सवाल कौंध रहा, कि लोकतंत्र के साये तले उसके जीवन से खिलवाड़ क्यों? क्यों उन्हें जीवन जीने का स्वतंत्र अधिकार आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी मुहैया नहीं करा पा रही रहनुमाई व्यवस्था? क्यों सरकारी अस्पतालों की स्थिति बेहतर करने को तत्पर नहीं हमारा तंत्र और लोकशाही सिस्टम? जब सरकारी अस्पताल ही आम नागरिकों के हिस्से की बात है, फ़िर वह भी ख़ुद वेंटिलेटर पर क्यों? एम्स की तरफ़ तो आम आदमी नज़र उठाकर देख नहीं सकता, देखेगा भी तो कैसे? उसकी जेब तो पहले से ढ़ीली रहती। वह अपने परिवार का पेट पाल ले। उतना ही काफ़ी उस देश में जहां समानता की लंबी लंबी बातें संविधान में की गई है। अरे भई उसी संविधान में जिसे बचाने के लिए आएं दिन रैलियां होती। लेकिन कभी ऐसा नहीं होता कि समानता के उस अनुच्छेद को साकार रूप देने की बात हो। आम आदमी और उसके नौनिहाल पहले भी मरते आ रहे थे और आज भी मरते आ रहें हैं। इन सब के बाद भी सरकारी व्यवस्था में ऐसा कोढ़ लग गया है, जो दूर होने का नाम नहीं ले रहा। जन सरोकार और लोक कल्याण की बात तो सिर्फ़ उनके भाषणों में ही दिखती। धरातल पर सब शून्य बटे सन्नाटा।

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वैसे देश में सिर्फ़ राजस्थान के कोटा शहर का जेके लोन अस्पताल ही नहीं जहां बच्चे बे-मौत मारे जा रहें। पूरे देश की हालत एक सी है। क्या उत्तरप्रदेश, क्या मध्यप्रदेश और क्या गुजरात। सभी जगह बच्चे बेमौत मर रहें हैं और हमारी दलीय व्यवस्था चैन से बांसुरी बजा रही है। उसे फ़िक्र कहाँ नवजात बच्चों की। वे देश का भविष्य ही तो हैं। मर रहें तो मरने दो। कहाँ अभी उनकी उम्र हुई जहां से उर्वर मततंत्र की पैदावार होगी! शायद यहीं सोचते हमारे माननीय सियासी शूरवीर। तभी तो वे अपनी सियासी धुन में मग्न रहते। बच्चें मर रहें तो कौन सा सियासत के खिलाड़ियों के ऊपर कोई कोप का छींटा पड़ने वाला। उनके लिए तो है ही जनता के टैक्स पर विदेशी और उच्च स्तरीय स्वास्थ्य व्यवस्था फीर काहे का सुध लेंगे माननीय जिला अस्पतालों की स्थिति सुधारने की। उन्हें तो अपने वोटबैंक की सदैव पड़ी रहती। तभी तो कोई सीएए और एनआरसी के विरोध में संविधान बचाने को लेकर रैलियां कर रहा, तो कोई कुछ अन्य पैंतरे से अपने वोटबैंक को मजबूत कर रहें हैं। अरे सियासतदानों कभी कभार मासूमों और अवाम की भी सोच लो। वैसे भी संविधान को कुछ नहीं हुआ पिछले सात दशकों में। फ़िर आज भी कुछ नहीं होगा। हां बशर्तें एक बात है जब लोग ही नहीं बचेंगे। जिनका ज़िक्र सबसे पहले संविधान की प्रस्तावना में “हम भारत के लोग से” होता है। फ़िर क्या करेंगे लोकतंत्र और संविधान का।

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अब बात मध्यप्रदेश की करें, तो सूबे की सत्ता में आने के पहले कांग्रेस ने बड़े- बड़े दावे ठोके थे। साथ में वचनपत्र भी जारी किया था, लेकिन आज हालत क्या है। सब जग जाहिर है। प्रदेश में हर वर्ष 25 हजार से ज़्यादा नवजात मर जाते हैं स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में। प्रदेश में प्रति हजार जन्म लेने वाले बच्चों पर 32 नवजात महीने भर भी नहीं जीवित रह पाते। वहीं प्रति हज़ार पर 55 बच्चे अपना पांचवा जन्मदिन भी नहीं मना पाते। मीडिया रिपोर्ट्स कहती की देश के 21 बड़े राज्यों में यह मृत्यु दर सबसे अधिक है। इसके अलावा नीति आयोग के एक ताज़ा आंकड़े के मुताबिक स्वास्थ्य से जुड़े 23 इंडिकेटर्स के आधार पर तैयार रिपोर्ट में मध्यप्रदेश सूबा 17 वें स्थान पर है। इतना ही नहीं ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं की तो हालत पतली है। डॉक्टर ग्रामीण स्वस्थ केंद्रों पर तैनाती लेने से कतराते हैं। मध्यप्रदेश का हर सातवां बच्चा कम वज़न का है। बात यहीं ख़त्म नहीं होती एसडीजी इंडिया इंडेक्स-2019 के अनुसार मध्यप्रदेश में जहाँ 2018 में प्रति हज़ार 922 बेटियाँ पैदा हुई थी वहीं 2019 में उनकी संख्या घटकर 916 हो गई है। यानी लिंगानुपात भी सूबे में एक वर्ष में ही छह अंक नीचे आ गया। यह एक बहुत ही चिंताजनक व गंभीर विषय है। जिस पर प्रदेश की कमलनाथ सरकार को तो ध्यान देना ही चाहिए, साथ ही समाज को भी जागरूक करने की ज़रूरत है सर जी! ऐसे में जब हालत देश के दिल मध्यप्रदेश का इतना ख़स्ताहाल है। फ़िर बाक़ी हिस्से का अनुमान लगाकर ही रूह कांप जाती है।

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ इन तीनों राज्यों में 2018 के आखिरी से लेकर 2020 के आगमन तक सत्ताधारी दल बदल गए,  बदल गई राजनीतिक आबोहवा। बदल गए राजनीतिक दावे और वादे। सुर बदल गया, रंग बदल गया, बदल गया वर्ष, बदल गया खूंटी पर टँगा कैलेंडर इन सब के बाद इन राज्यों में कुछ नहीं बदला, तो वह है सिस्टम के काम करने का तरीका। ऐसे में कहें भी तो क्या। सिर्फ़ इतना कह सकते, सरकारें आती जाती रहती है और नहीं बदलता कुछ तो वह है लोकतांत्रिक देश के संविधान की प्रस्तावना में सबसे पहले लिखित उन लोगों की क़िस्मत और दशा। जिसे लोकतंत्र में सर्वोच्च बताया गया है। लेकिन काहें का सुप्रीम भई। दुखिया तो वहीं है। उसे तो कभी कभी लगता बस मत देने भर का अधिकार है, उससे ज़्यादा इस लोकतंत्र के साए तले कोई हक नहीं। ऐसा कहने के पीछे वाज़िब कारण है। याद कीजिए 2018 के आखिर में हुए मध्यप्रदेश और राजस्थान सरीखे राज्यों में हो रही चुनावी रैलियों को सभी दल के अपने- अपने नारे थे। कोई वचनपत्र जारी कर रहा था तो कोई किसी अलग तरीके से बेचारी जनता को सुहाने सपने दिखा रहा था।

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आज के दिन स्थिति क्या है। सबकुछ स्पष्ट है। राजस्थान के कोटा में बच्चे दम तोड़ रहें। मध्यप्रदेश की हालत भी खस्ताहाल है। पांच साल तक के 53.5 फीसदी बच्चों में एनिमिया है। वही छत्तीसगढ़ में 41.6 फीसदी महिलाओं और 5 साल तक के 40.8 फीसदी बच्चों में एनीमिया है। लेकिन नेतागण सीएए और एनआरसी के पक्ष या विपक्ष में झंडा बुलंद किए फीर रहें। इतना ही नहीं कोटा के जिस अस्पताल में आएं दिन अनगिनत बच्चें दम तोड़ रहें। वहां कि लीला तो बड़ी ही अलबेली है भाई। मंत्री जी के आगमन पर वहां कालीन बिछाई जाती है। अस्पताल का रंग-रोगन कराया जाता है। अरे कोई तो इन सत्ता के हुक्मरानों और उसके आला अफसरों को समझाएं, कि लोकतंत्र में लोक पहले आता। उन्हें क्यों भूल जाते हैं ये सियासत के शूरवीर। चलिए बिछाई कालीन तो ठीक है लेकिन माननीय को जब ये पता था कि उनके अस्पताल जाने से स्थिति सुधर जाएगी! अस्पताल की गंदगी दूर हो जाएगी! डॉक्टरों को अपने धरती के भगवान होने का भान हो उठेगा! फ़िर कोटा के उस अस्पताल में पहुँचने में इतना समय आख़िर क्यों मंत्री जी? क्या आप सैकड़ों बच्चों की मौत का इंतजार कर रहें थे? या बच्चों की मौत से फ़र्क़ नहीं पड़ता? वैसे भी सूबे के सियासी सरदार तो पिछली सरकार से कम मौत होने की गिनती गिनाकर ही अपने को महान साबित कर रहें। हद होती है निर्लज्जता की। आख़िर कब शर्म आएगी हमारे देश के हुक्मरानों को? उन्हें जहां अपना मत तंत्र मजबूत होते दिखता वहां तो धूनी रमाकर बैठ जाते, लेकिन बच्चों की मौत पर सिर्फ़ ज़ुबानी बाण चला अर्जुन बनने की फ़िराक में कब तक रहेंगे?

वैसे बच्चों की मौत से पीड़ित अकेला राजस्थान का कोटा शहर हो और उस सूबे की हुक्मरानी व्यवस्था सीएए और एनआरसी के विरोध में ही संलग्न हो या अन्य सियासी कार्यों में। ऐसी स्थिति पहली बार निर्मित नहीं हुई। देश के लगभग सभी हिस्सों का हाल यूँही बेहाल है। उसके पीछे का कारण हो सकता बच्चें लोकतंत्र में मत देने के हक़दार नहीं। तभी उनकी मौत की चीख़ से सत्ता और विपक्ष दोनों घबराती नहीं। याद करिए बिहार और उत्तरप्रदेश को। घबराइए नहीं वर्षों पुरानी घटना याद करने को नहीं कह रहें। याद तो होगा ही उत्तरप्रदेश के गोरखपुर अस्पताल की घटना।  जब वहां 2017 के अगस्त महीने में मासूम बच्चे इंसेफ़लाइटिस से जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। तब योगी आदित्यनाथ के जिम्मेदार स्वास्थ्य मंत्री जी यह याद दिला रहे थे, कि अगस्त माह में ज्यादा बच्चे मरते है। वहीं स्थिति बीते वर्ष बिहार में हुई। उसी बिहार में जहां सुशासन बाबू का पहरा कल था और आज भी है। तब उनके मंत्री बच्चों की अकाल मौत को प्राकृतिक आपदा बता रहें थे।

 

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पहले उत्तरप्रदेश, फिर बिहार और अब राजस्थान का कोटा शहर। इन तीनों राज्यों में काफ़ी असमानताएं है। तीनो राज्यों में अलग-अलग दल की सरकारें हैं। एक सूबे का सारथी साधू सन्यासी तो दूसरे का सुशासन बाबू। तीसरे का सबसे पुरानी पार्टी का मुख्यमंत्री। तीनों दलों के झंडे अलग अलग। फ़िर भी सोच तीनों ही दलों के माननीयों की एक सी दूषित। यहीं एक समानता है, जो अब आवाम से चीख़ चीख कर कह रहीं। मत बदलिए सरकारें किसी राज्य या दिल्ली के दरबार की, क्योंकि कोई असर नहीं पड़ता इन्हें आपके और आपके चीख और दर्द की। बदलना है तो व्यवस्था बदल डालिए, क्योंकि सोच तो है सभी दलों की एक सी।

यहां एक बात ये भी, अवाम चाह भी ले तो व्यवस्था बदलने का माद्दा कहाँ उसमें। उसे तो सिर्फ़ संविधान के अनुच्छेद में अधिकार देकर ही चुप करा दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से यह तथ्य निकलकर सामने आता है, कि कोटा में हुए 100 से ज्यादा बच्चों की मौत जन्म के समय कम वजन के कारण हुई है। तो यहां एक बात समझना होगा, कम वचन के बच्चों की तो देश भर में संख्या बहुत अधिक है। ऐसे में क्यों नहीं उन्हें कुछ ऐसी सुविधा दी जाती। जिससे वे भी इस धरती पर बेहतर जीवन जी पाएं। रहनुमाई तंत्र का तो यह काम है, कि सभी को जीवन जीने की स्वतंत्रता और अवसर उपलब्ध कराएं। फ़िर वह इसमें शिथिल क्यों पड़ जाती? क्यों स्वहित के आगे जनकल्याण के मुद्दे कमज़ोर पड़ जाते जनता को इसका जवाब मांगना चाहिए। बात राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश की हुई है तो आगे के हिस्से में एक बार फिर बात मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों की करेंगे।

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संविधान का अनुच्छेद -21 सभी को निर्बाध जीवन जीने की स्वतंत्रता देता। बच्चें देश का भविष्य होते हैं। इसके लिए संविधान बच्चों को कई अधिकार देता है। साथ ही साथ यूनाइटेड नेशन द्वारा जारी चाइल्ड राइट्स कंवेंशन पर सभी देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। जिनमें भारत भी शामिल है। इन सब के बाद भी बच्चें स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में देश के लगभग सभी हिस्से में दम तोड़ रहें। फ़िर मध्यप्रदेश भी इससे अछूता कैसे रह सकता। मीडिया रिपोर्ट्स कहती 2016 से जनवरी 2018 के बीच अकेले मध्यप्रदेश राज्य में 57,000 बच्चों ने कुपोषण के कारण दम तोड़ दिया था। मध्यप्रदेश का आलम यह है, कि कुपोषण की वजह से ही श्योपुर ज़िले को भारत का इथोपिया वर्तमान समय में कहा जाने लगा है।

अकेले सितंबर 2016 में श्योपुर ज़िले में कुल 116 बच्चों की मौत कुपोषण के चलते होती है। यहीं स्थिति खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक की है, और ऐसा भी नहीं कि नई सरकार आने के बाद स्थिति बदल गई है। हाल पहले से भी बेहाल है। खालवा में 70 फीसदी महिलाएं एनीमिया ग्रस्त है । श्योपुर के कराहल ब्लॉक और खंडवा के खालवा ब्लॉक, जो आदिवासी क्षेत्र हैं वहां के लोगों के खाने में विविधता नहीं है। प्रोटीन की कमी है। बाज़ार और पैसे की बढ़ती मांग के कारण कृषि में बदलाव हो चुका है। सिर्फ़ नकदी फसल उगाने के कारण आदिवासी अपने पारम्परिक भोजन से दूर हो गए हैं। अपनी अलग बोली और संस्कृति को सहेजने के कारण उनका समाज से जुड़ाव भी ज़्यादा नहीं दिखता। ऐसे में जब देश के अधिकतर हिस्सों में बच्चें मर रहें। फ़िर पहली ज़रूरत तो यह होनी चाहिए कि बच्चों को बेहतर चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिए सभी दलों को आगे आना चाहिए। बच्चें हमारे देश का भविष्य हैं, तो उनके आज को सुरक्षित करने के लिए क्यों नहीं कोई दल, कोई नेता आगे आता? क्यों किसी की अंतरात्मा बच्चों की दुर्दशा देख कर नहीं जागती? यह इस लोकतंत्र के सापेक्ष बड़े बहस का विषय है। जिस पर चर्चा होनी चाहिए। सिर्फ़ चर्चा न हो बल्कि सूरत भी बदलनी चाहिए और बच्चों की मौत पर सिर्फ़ राजनीति न होकर एक ऐसे परिवेश के निर्माण पर सभी दल सहमत हो। जिसमें बच्चों को भी अपने जीवन जीने की स्वतंत्रता का अधिकार सुरक्षित हो सके।

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ऐसे में अगर सच में बच्चों को मौत के मुंह से बाहर निकालना चाहते। तो कुछ कदम सियासतदानों को उठाने होंगे। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के अनुसार,  प्रति एक हजार व्यक्तियों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। उस लिहाज से देखें तो हमारे देश में डॉक्टरों का यह अनुपात तय मानकों के मुकाबले 11 गुना कम है। वहीं बिहार,राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में तो तस्वीर और भी धुंधली है। बिहार में 28,391 लोगों की आबादी पर एक एलोपैथिक डॉक्टर उपलब्ध है। फ़िर ऐसे में कहीं न कहीं बिहार ही क्या नए दौर के भारत के सामने बेहतर स्वस्थ सुविधाओं के लाले पड़ते दिखाई पड़ रहे। अवाम सुविधाओं के अभाव में मर रही। सियासतदां बड़े और विदेशी अस्पताल की सुविधाएं जनता के पैसों पर ले रहे। जो लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है, क्योंकि जिस लोकतंत्र में पहले लोक और संविधान की प्रस्तावना में हम भारत के लोग आता। उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं ख़ासकर उन मासूम नौनिहालों का जो मततंत्र का हिस्सा नहीं होते! जिस सूरत को बदलने वाला कोई भगीरथ पैदा होना अब वक़्त की मांग है।

लेखक टिप्पणीकार है तथा सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन करते हैं|

सम्पर्क- +919630377825, maheshjournalist1107@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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