स्त्रीकाल

‘इज्जत’ की धुनाई

 

  • रश्मि रावत 

 

चंद रोज पहले मेरी एक छात्रा ने दिमाग में कई सवाल जगा दिए। नई पीढ़ी दिमाग को उर्वर बनाने में बड़ी मदद करती है। पहले हल्के-फुल्के मजाक के अंदाज में बोल उठी “मैडम ‘इज्जत घर’ से आ रही हूँ”। कक्षा में सब हँस पड़े तो अचानक चुप हो गई। पता नहीं उसके मन में ये सवाल पहले से सिर उठा रहे थे या अचानक सबकी सामूहिक हँसी ने उसे चेताया कि यह हँसने का सहज विषय नहीं मालूम होता। क्या लड़कियों और लड़कों की हँसी में कुछ फर्क रहा होगा जो अचानक वह पूछ बैठी कि सिर्फ हम लड़कियों के लिए ही यह इज्जतघर है लड़कों के लिए नहीं? लड़कों ने कहा “क्यों हमारे लिए क्यों नहीं है?” तो बोली “विज्ञापन में तो यही दिखाते हैं कि बहू-बहन-बेटियों की इज्जत के लिए घर में शौचालय होना चाहिए। प्रत्येक गाँव के हर घर में शौचालय हो। घर में शौचालय हो तो घर की इज्जत है। यह सिर्फ शौचालय नहीं न्यू इंडिया का सपना है।” मैंने उसे कहा कि क्लास के बाद बात करते हैं। लड़कों के माथे  की सलवटें साफ बता रही थीं कि उनके दिमाग में सवाल का बीज तो पड़ ही गया है। इस विषय पर आगे जिन्हें बात करनी हो, उन्हें कॉलेज परिसर के मैदान में आने के लिए कह कर मैं क्लास ले कर बाहर निकल गई। 5 मिनट बाद मैंने पाया कि लड़कियों के साथ क्लास के अधिकतर लड़के भी मैदान में मौजूद थे।

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इस बार बात लड़कों ने ही आगे बढ़ाई, “जब देखो तब लड़कियों की इज्जत की बात होती है। हमारी अपनी इज्जत नहीं होती क्या? हमें कौन सा खुले में शौच करना अच्छा लगता है। लड़की ने कहा, “तुम्हारे पास तो खुले में जाने का विकल्प होता है। यात्रा पर निकले हुए हों तो बाहर जाने की जरूरत पड़ ही जाती है। कभी शौचालय नहीं होता। कभी पानी नहीं आ रहा होता। कभी हाइजीन का इतना बुरा हाल होता है कि स्वास्थ्य की कीमत पर ही तथाकथित इज्जत मिलती है।” लड़के ने कहा, “मजबूरी होने पर तुम्हें बाहर जाने पर कौन रोक रहा है?” तो दूसरी लड़की बोल उठी, “‘इज्जत’ की जरूरी शर्त बंद चारदीवारी बन जाए तो खुले में कुछ करने पर हमें बेशरम समझा जाएगा। समाज का सामूहिक मन जिस चीज को भी इज्जत या चरित्र से जोड़ देता है। उसकी लक्षमण रेखा शब्दों की बारम्बार गूँज से और-और मजबूत होती जाती है। उस सीमा रेखा के बाहर कदम रखने पर लड़कियों को बागी या इज्जतविहीन समझा जाएगा कि जब इसे अपनी इज्जत की खुद ही परवाह नहीं है तो इसके साथ कोई भी छूट लेने का हमें हक है।” मेरे दिमाग के भीतर कौंध रहा था कि समाज के भीतर बसे सामंती दिमाग को ‘बिगड़े हुए’ को ‘ठीक करना’ आता भी खूब है। ‘ठीक करने’ और ‘सभ्य’ बनाने का लम्बा अभ्यास जो है। महाश्वेता देवी के साहित्य में इस तरह की अनगिनत घटनाएँ आती हैं, जब प्रशासन आदिवासियों को ‘ठीक’ कर देता है। उन्हें याद करके मेरी कँपकँपी छूट गई।

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एक और लड़की बोल उठी, “वैसे इसमें तो कोई संदेह नहीं कि इस बीच शौचालयों का निर्माण जोर-शोर से हुआ है। लोग इस बुनियादी जरूरत को लेकर संवेदनशील हुए हैं। शौचालय न होने पर कहीं शादियाँ रुक रही हैं तो कहीं टूट रही हैं। बहू, बेटियों की इज्जत की खातिर पुरुष लोग भी शौचालय के इस मिशन में अधिक मुस्तैदी से सहयोग कर रहे हैं। मगर दो जुदा बातों को आपस में जोड़ने से इज्जत के नाम पर होने वाली जकड़बंदियाँ और मजबूत हो गई हैं। तुम लड़कों का क्या है? तुम्हारे पैरों में तो कोई बेड़ियाँ नहीं डाल रहा है? तुम्हें तो अपने घर की लड़कियों की ही इज्जत करनी है।” वह उस लड़के को जवाब दे रही थी जो पूछे जा रहा था, “हद हो गई हमारी कोई इज्जत नहीं होती क्या? हमें क्या शर्म नहीं आती? हमारी किसी को परवाह नहीं।” फिर से लड़की ने कहा “तुम्हारी अपनी इज्जत होती हो या न होती हो। बहन या पत्नी के साथ कुछ गलत होने पर कहा तो यही जाता है कि अमुक पुरुष की इज्जत चली गई। मान-मर्यादा-प्रतिष्ठा होती तो पुरुषों की ही है स्त्रियों को तो उन्हें बस ढोना होता है। इसलिए इन शब्दों पर और चारदीवारियाँ डाली जाती हैं, और ताले डाले जाते हैं तो मन का बोझ सा बढ़ जाता है। लड़का बोला, “इतने भारी भरकम शब्द नहीं आते मेरी समझ में। मैं अपनी खुद की इज्जत की बात कर रहा हूँ। हमेशा लड़कियों को लेकर ही ये शब्द इस्तेमाल होते हैं और हमें सहज ढंग से शरमाने का भी हक नहीं दिया जाता। शौचालय बनने के पक्ष में जितने भी तर्क दिये जाते हैं, उन सबका पुरुषों से भी पूरा सम्बंध है। फिर भी उनको ले कर बात नहीं होती। हमें लगता है जैसे हम शराफत का जो भी काम करते हों बस अपनी बहनों के लिए ही करते हों। तो अपने लिए फिर हम क्या करें? कह कर उसने ढीठ नजरें लड़की की ओर फेंकीं तो लड़की चिढ़ गई। झल्ला कर बोली, “देखा मैडम आपने कैसे देखता है ये, तमीज नहीं है इन्हें ठीक से बिहेव करने की। हमें इज्जत हमेशा, हर जगह और हर चीज में चाहिए। व्यक्ति के तौर पर हमारी जो बुनियादी जरूरतें हैं, उन्हें इज्जत से जोड़ कर देखने से यही होता है। लगता है जैसे इनके कर्तव्यों की इति श्री हो गई। लड़का भी जल उठा, “तुमसे ज्यादा ढिठाई तो नहीं है मुझमें। मैडम! आप पूरी क्लास में किसी से भी पूछ लीजिए कि हम दोनों में कौन ज्यादा दबंग और ढीठ है। कौन ज्यादा लिबर्टी लेता है।” सबकी उंगलियाँ लड़की की ओर इशारा कर रही थी और सबके होंठों में स्वस्थ मुस्कान थी। सबकी उंगलियों से शह पा कर बोला, “मेरी अपनी इज्जत का क्या। हम पुरुषों की अपने लिए भी कोई इज्जत होती है कि नहीं। जरा सा देख लो तो बेशरम कह दिया जाता है। भीड़ में धक्का लगने से गलती से छू जाओ तो स्त्रियाँ इतना घूर कर देखती हैं जैसे पुरुष और शरीफ एक साथ नहीं हुआ जा सकता। उस वक्त तो मन करता है कि काश मैं भी लड़की होता तो शराफत से रहता। हुंह..बड़ी आईं। शराफत की सारी जमींदारी तुम्हीं लोग घेर कर बैठी हों।

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हरियाणा के गाँव से आने वाले एक अन्य छात्र ने अपने गाँव का अनुभव बताया कि उनके गाँव में पहले से शौचालय बने हुए थे। मगर लोग निवृत्त होते बाहर ही थे। शौचालय के हाइजीन से वे आश्वस्त नहीं थे और उन्हें लगता था कि पेट ठीक से साफ खुले में ही होता है। “स्वच्छता अभियान के बाद से सरपंच की मदद से दल बना-बना कर पुरुषों ने भी जागरुकता फैलाई। अब 3-4 साल से बाहर शौच जाना बिल्कुल बंद हो गया है। इस अभियान के तहत काम तो हो ही रहे हैं। मगर उससे पहले के माहौल से शायद आप लोग परिचित न हों तो वह बताता हूँ। गाँव में आज तक कभी छेड़ छाड़ की कोई घटना कम से कम उस दौरान नहीं हुई। अन्यत्र होती होंगी या हो सकती होंगी, इस आशंका से मना नहीं कर रहा हूँ। पुरुषों और स्त्रियों के लिए अलग-अलग शौच-स्थल तय होते थे। दोनों ओर जाने का रास्ता भी अलग-अलग था। बचपन से ही घरों में सिखा दिया जाता था कि उस ओर नहीं देखना है। बीच में एक चौपाल थी बड़ी सी। स्त्रियों के स्थल की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ बंद की हुई थीं। उसने जो पूरा विवरण गाँव का दिया तो मुझे पता चला कि ‘खुला’ भी उतना खुला नहीं था। उसमें भी एक व्यवस्था थी। आँखों की लिहाजदारी उस व्यवस्था की सबसे अहम बात थी। एक लड़की जिसने शायद बात पूरी न सुनी हो, बोली “तो शौचालय न प्रयोग किया करें?” लड़के ने जवाब दिया, “मैं सिर्फ ये कह रहा हूँ कि हम पहले भी इज्जत से रहते थे और दूसरों को इज्जत देना जानते थे। ऐसा नहीं है कि गाँव के बाहर के लोगों ने हमें आ कर सभ्य बना दिया हो।” फिर किसी अन्य छात्र ने कहा, “गाँव में सीवर के लिए छोटे-छोटे गड्ढे बनवाए जाते हैं। गड्ढे भर जाते हैं तो बहुत समस्या पैदा हो जाती है। कई बार पानी की समुचित व्यवस्था नहीं होती। मल व्यवस्था का भी कोई उचित समाधान अब तक मिला नहीं है। इस तरह के अनेक कारणों से बाहर शौच जाने वालों की संख्या बनी रहेगी और बाहर शौच करने वाले लोग भी अपनी गतिविधियाँ इज्जत से ही सम्पन्न करते होंगे। क्या ये मानने में तुम लोग को दिक्कत है?” कह कर सबको देखने लगा। इस पर एक लड़की बोली, “हम इन बुनियादी जरूरतों को इज्जत से जोड़ कर वैसे भी नहीं देखना चाहते। जीवन के हर आयाम में ही इज्जत चाहिए होती है। अगर बुनियादी जरूरतों तक ही खुद को सीमित करुँ तो भी सब चाहिए इंसान को, इज्जत की रोटी, इज्जत की नींद, इज्जत का बसेरा…..”  लड़की की बातों से आने वाली सर्दी की सिहरन महसूस होने लगी है और मन में ये शुभेच्छा जगी कि लोगों को गरमी वाली रजाई मिल जाए, रैन बसेरे मिल जाए तो जाड़े से ठिठुरती मौतों की खबर कम आए। इज्जत वाली रजाई पर फिर कभी सोच लेंगे। ‘इज्जत का रोजगार’ तो अब बहुत बड़ा सपना लगता है, मेरी नन्ही आँखों के लिए।

लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अध्यापन और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित लेखन करती हैं|

सम्पर्क- +918383029438, rasatsaagar@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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