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विद्याभूषण द्विवेद्वी
शख्सियतसंस्मरण

विद्याभूषण द्विवेदीः एक संस्मरण

 

एक्टीविस्ट संस्कृतिकर्मी विद्याभूषण द्विवेदी (जिन्हें बिहार का सफ़दर हाशमी कहा जाता था) की मृत्यु के 25 साल

लगभग दो महीने रहने के पश्चात 16 जुलाई, 1996 को विद्याभूषण द्विवेदी वापस दिल्ली जा रहे थे। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) का प्रथम वर्ष पूरा करने के पश्चात वे गर्मी की छुट्टियों में पटना आए थे। पटना जंक्शन के प्लेटफॉर्म न. 2 पर उनके चाहने वाले उन्हें विदा करने पहुँचे थे। खासी संख्या में प्रेरणा के साथी इकट्ठे थे। इसके अलावा उनको जानने वाले कुछ और लोग भी मौजूद थे। उनके साथ कनुप्रिया (उषाकिरण खान की पुत्री) भी दिल्ली जा रहीं थीं। कनुप्रिया का उसी साल NSD के लिए चयन हुआ था। वे दोनों तब स्लीपर क्लास में साथ-साथ जा रहे थे। विद्याभूषण और कनुप्रिया दोनों खिड़की के किनारे आमने-सामने बैठने लगे। जब बगल की सीट वाले यात्री आ गए तो कनुप्रिया ने विद्याभूषण को अपने बगल में बैठने को कहा। वे थोड़े संकोच और झिझक के साथ कनुप्रिया के बगल में बैठे। हम सभी विद्याभूषण के संकोच को उत्सुकतापूर्वक देखते रहे।

गाड़ी खुलने वाली थी। तब-तक उन्हें छोड़ने वालों की संख्या बढ़ गयी थी। गाड़ी ने अन्तिम सीटी दी और गाड़ी खुल पड़ी। हम सबों ने विद्याभूषण से खिड़की के बाहर से हाथ मिलाया। तभी सीढ़ी से उतरकर दौड़ता हुआ आनंद (Super 30) नजर आया। किसी तरह दौड़कर वो विद्याभूषण से खिड़की से ही हाथ मिला पाया। हम सबों की विद्याभूषण द्विवेदी से ये अन्तिम भेंट थी।

 पटना से जाने के पूर्व विद्याभूषण द्विवेदी ने कई महत्वपूर्ण काम अपने दो महीनों की छुट्टी के दौरान किया था। NSD से पहले साल का प्रशिक्षण लेकर आने के बाद जून में एक अर्से पश्चात प्रेरणा से जुड़े लोगों की मंचीय गतिविधि हुई। प्रेरणा के साथी तब दो भागों में विभाजित थे। ‘प्रेरणा’ और ‘अनुकृति’। अनुकृति की स्थापना 1994 में प्रेरणा से निकलकर कुछ साथियों ने की थी। जिसमें मेरे अलावा राकेश रंजन, सज्जन, राजेश चंद्र ठाकुर संभवतः अशोक मिश्रा भी प्रमुख लोगों में थे। ‘अनुकृति’ के सारे साथी ‘प्रेरणा’ से निकाल दिए गए थे। निकालने की वजह थी 1994 में अनिरूद्ध पाठक के नेतृत्व वाली ‘थियेटर यूनिट’ के महोत्सव में प्रेरणा के साथियों की संगठन की इजाजत के बगैर भागीदारी। मैंने हांलाकि ‘थियेटर यूनिट’ के उस महोत्सव में भाग तो नहीं लिया था लेकिन वहाँ जाने वाले साथियों का समर्थन किया था। इस कारण 7 प्रमुख साथियों सहित मुझे भी विद्याभूषण द्विवेदी की पहलकदमी पर संस्था से बाहर कर दिया गया था।

वीरेन डंगवाल के काव्य पाठ के दौरान ‘प्रेरणा’ के रंगकर्मी। पहली पंक्ति में संजय मिकलु, अमरेंद्र कुमार, राजेशचंद्र, सज्जन, राकेश रंजन। दूसरी पंक्ति में अमरेंद्र कुमार, रविशंकर, विद्याभूषण।

 विद्याभूषण द्विवेदी अन्तिम दफे दिल्ली जाने के पूर्व इन दोनों संगठनों का विलय कराने में सफल हो गए थे। यह कोई आसान काम न था। मुझे उस एकताबद्ध संगठन का सचिव काफी जद्दोजहद के बाद चुना गया था। 

विद्याभूषण द्विवेदी मुझसे पहले काफी लम्बे समय से (लगभग 8-10 साल से) ‘ प्रेरणा’ के सचिव थे। प्रेरणा’ का पूरा नाम था प्रेरणा ( जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा)। उनके बाद मैं सचिव बना। तब प्रेरणा का सचिव बनना आसान न था। एक होने की प्रक्रिया में भी सचिव पद के लिए मेरी और राकेश रंजन के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा थी। लेकिन विद्याभूषण द्विवेदी का मेरे प्रति उस समय झुकाव और राकेश रंजन का एक अस्थायी किस्म की नौकरी में होने के कारण पलड़ा मेरी तरफ झुक गया। वैसे दोनों संगठनों के एक होने की शर्त थी राकेश रंजन का ‘प्रेरणा’ का सचिव बनाया जाना। फाइनल मीटिंग के पूर्व अनौपचारिक तौर पर ये तय भी हो गया था। बिछड़े साथियों के एकजुट होने के बाद विद्याभूषण को बस सचिव का नाम प्रस्तावित करना था।

मीटिंग में तृप्ति नारायण शर्मा (टी.एन शर्मा), जो प्रेरणा के संरक्षक भी थे, मौजूद थे। विद्याभूषण ने सचिव पद के लिए वादे के प्रतिकूल दो नाम प्रस्तावित कर दिया। राकेश रंजन और मेरा। राकेश रंजन के नौकरी की बात को आधार बनाकर सभी साथियों ने अन्ततः मुझे ‘प्रेरणा’ का सचिव चुन दिया। शाम में प्रेरणा में यह सब कुछ हुआ। फिर हम सभी साथी कालिदास रंगालय गए जहाँ विद्याभूषण द्विवेदी ने प्रेरणा के नये सचिव के रूप में मेरा परवेज अख्तर सहित कई लोगों से मेरा परिचय कराया गया। मैं अगले चार वर्षों तक फिर प्रेरणा का सचिव बना रहा। वहीं सुनील राज (अब दैनिक जागरण, पटना में सवांददाता) ने विद्याभूषण की पटना में आखिरी तस्वीरें खींची थी।

 मैं विद्याभूषण द्विवेदी से ट्युशन पढ़ा करता था। वे मुझसे तीन-चार क्लास सीनियर थे। हम दोनों की पढ़ाई कदमकुआँ में जयप्रकाश नारायण के घर के ठीक सामने स्थित सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल से हुई थी। नवें क्लास में विद्याभूषण से ट्युशन पढ़ने का निर्णय स्कूल के मेरे सहपाठी अंजनी तिवारी द्वारा लिया गया था। विद्याभूषण का अंजनी तिवारी के घर काफी आना-जाना था। उनकी छवि बेहद तेज एवं होनहार विद्यार्थी की थी। हम दोनों उनसे ट्युशन पढ़ने लगे। मैट्रिक की परीक्षा नजदीक थी। वहाँ अच्छे नम्बरों से पास होने का दबाव बहुत ज्यादा था ताकि अच्छे कॉलेज में एडमिशन हो सके। मैट्रिक के बाद हमदोनों को साइंस लेना था इस कारण अच्छे मार्क्स का दबाव कुछ ज्यादा ही था। विद्याभूषण को हमें सभी विषयों की तैयारी करानी थी। मैं मैथेमेटिक्स में उस वक्त थोड़ा अच्छा माना जाता था। अंजनी तिवारी के तब के पीरमुहानी वाले किराए के मकान में ट्युशन का सिलसिला शुरू हुआ। 75 रूपया, ट्युशन फी तय किया गया।

कुछ दिनों के बाद विद्याभूषण की पढ़ाई में कमजोरी उजागर होने लगी। खासकर मैथेमैटिक्स में। तब तक पढ़ाई से उनका नाता टूट चुका था। 10 वें क्लास के मैथेमैटिक्स के कठिन सवाल हल करने में उन्हें कठिनाई होती। नाटकों की दुनिया से उनका जुड़ाव हो चला था। मैट्रिक की परीक्षा की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उनसे ट्युशन जारी रखना खतरे से खाली न था। लेकिन इन बातों के बावजूद विद्याभूषण से ट्युशन जारी रहा। उसकी प्रमुख वजह थी उनका सम्मोहक व्यक्तित्व। हम दोनों उनसे बॅंधे से थे। अब ट्युशन के दौरान पढ़ाई कम इधर-उधर की बातें ज्यादा होने लगी। हमें मजा आने लगा था। बातों में साहित्य, नाटक और थोड़ी बहुत राजनीति की बातें होती। जब विद्याभूषण दिनकर के ‘रश्मिरथी’ की ये पंक्तियां

हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे
पद के नीचे पाताल देख
मुट्ठी में तीनों काल देख
मेरा स्वरूप विकराल देख

कुछ इस अंदाज में सुनाते कि हम हिप्नोटाइज से हो जाते।

गांधी संग्रहालय में कथा-96 के प्रदर्शन के बाद। साथ में हैं हरेंद्र विद्यार्थी, अंजनी तिवारी, गौतम, जावेद और अनीश अंकुर

 बहरहाल मैट्रिक की परीक्षा के बाद मैं और तिवारी विद्याभूषण का द्वारा अभिनीत नाटक ‘हस्तक्षेप’ का मंचन देखने गए। उसमें उन्होंने हीरो ‘मंगला’ का रोल अदा किया था। देखने में वे लम्बे और गोरे थे। उस वक्त ‘हीरो’ की प्रचलित छवि के अनुकूल। फिर हम दोनों ने, प्रेरणा में शामिल होकर, पटेल नगर में कहीं पर, नुक्कड़ नाटक ‘जंगी राम की हवेली’ का कुछ दिनों तक रिहर्सल भी किया था। इसी बीच ‘हस्तक्षेप’ की समीक्षा गोष्ठी में भी हमदानों शामिल हुए जिसमें छोटी-छोटी बातों को लेकर उभरने वाले मतभेद तब हास्यास्पद से नजर आए। उसके बाद काफी दिनों तक विद्याभूषण से सम्पर्क टूट सा गया।

 पहला नाटक जो मैंने किया वो ‘आदि विद्रोही स्पार्टाकस’ था। विद्याभूषण द्विवेदी ने इसे निर्देशित किया था। हार्वड फास्ट प्रख्यात के उपन्यास पर आधारित नाटक ‘आदि विद्रोही स्पार्टाकस’ संभवतः विद्याभूषण का भी पहला निर्देशन था। प्रेरणा का कार्यालय तब कंकड़बाग रेलवे काठपुल के दक्षिणी छोर स्थित जहाजीकोठी के एक छोटे से कमरे में चला करता था। जहाजीकोठी में ही सी.पी.एम CPI(M), की पटना जिला का कार्यालय भी अवस्थित था।

जहाजीकोठी पहले गुंडों के कब्जे वाले मकान के रूप में बदनाम था। सी.पी.एम के लोगों ने जहाज की शक्ल वाले जहाजीकोठी को अन असामाजिक तत्वों से मुक्त कराया था जिसके एवज में कुछ कमरे इन्हें दि गए थे। इसी में से एक कमरा प्रेरणा को दिया गया था। पुल से उतरने वाली जगह को ‘लेनिन पथ’ के रूप में नामकरण किया गया। ‘लेनिन पथ’ पर हमेशा कूड़ा-कचरा भरा रहता। यहीं कई मंच और नुक्कड़ नाटकों के रिर्हसल होते। ‘मारीच का एक और संवाद’, ‘पूर्वाद्ध’ जैसे मंच नाटकों के प्रर्दान यहीं रहते किए गए। नाटक में लड़के-लड़कियां रहा करती। आस-पास के आते जाते लोगों को पता चला कि यहाँ नाटक होता है। एकाघ दफे कुछ छुटभैया किस्म के कुछ शोहदे हल्की टीका टिप्पणी कर दिया करते। विद्याभूषण के नेतृत्व बार पश्चिम लोहानीपुर के ऐसे ही दो शोहदों की जमकर ठुकाई हुई। फिर किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई।

1990 में लालू यादव के सत्तासीन होने के बाद ‘प्रेरणा’ का कार्यालय गाँधी मैदान के उत्तरी-पचिमी छोर में अवस्थित रामदेव वर्मा-मंजूप्रकाश के फ्लैट में स्थानांतरित हुआ। ये दोनों पति-पत्नी CPI(M) के नये विधायक बने थे लिहाजा दोनों को एक ही साथ एक बड़ा सा बंग्ला प्रदान कर दिया गया। ‘प्रेरणा’ का कार्यालय भी यहीं स्थानांनतरित गया। यहाँ कार्यालय आने में विद्याभूषण की बड़ी भूमिका थी। मंजूप्रकाश से उनके अच्छे रिश्ते के कारण ये संभव हो पाया था। मंजूप्रकाश विधायक बनने के पूर्व जहाजीकोठी में रिहर्सल देखा करतीं थीं। वैसे पार्टी से सम्बन्ध भी प्रमुख कारण था ही।

 इससे पहले 1989 में सफदर हाशमी की हत्या ने नुक्कड़ नाटक की गतिविधियों को बड़ा आवेग प्रदान किया। 1989 के अगस्त में हमलोगों का मसौढ़ी एक कामरेड जयप्रकाश की शहादत दिवस पर जाना हुआ। वहाँ पुलिस द्वारा लाठी से पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया। तब घर से चोरी-छुपे जाना हुआ था। थाना में गिरफ्तार होने पर माँ-पिता का बहुत डर था। वहाँ से लौटकर उसी जहाजीकोठी में ‘कलाकार संधर्ष समिति’ (तब पटना के कलाकारों का संयुक्त मोर्चा) की ओर से दो प्रतिनिधि तनवीर अख्तर और अपूर्वानंद चोटिल कलाकारों से मिलने आए।

उस दौरान विद्याभूषण ने सफदर हाशमी की हत्या को केंद्र में रखकर एक लोकप्रिय नुक्कड़ नाटक लिखा जिसका नाम था ‘एक्सीडेंट’। इस नाटक के सैंकड़ों प्रर्दशन हुए। इस नाटक के ढे़र सारे प्रदर्शनों में मैं शामिल था। उस्ताद-जमूरा के फॉर्मेट में ये नाटक लिखा गया था। इस नुक्कड़ नाटक में विद्याभूषण उस्ताद और मैं जमूरा की भूमिका किया करता। संतोष झा नेता की भूमिका किया करता। इस नाटक में उसकी हॅंसी तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह से मिला करती थी।

1989 में पहली बार किसी तरह घर की इजाजत लेकर नवादा सी.पी.एम, के चुनाव प्रचार में गया। वहीं पहली बार हरिकिशन सिंह सुरजीत (1992-2008 तक CPI(M) महासचिव) को देखा था। उनकी सभा के लिए भीड़ जुटाने का काम हमारी टीम को दिया गया था। उस वक्त हरिकिशन सिंह सुरजीत सी.पी.एम के महासचिव नहीं थे। बी.टी.आर को भी उस सभा के लिए आना था पर वे आए नहीं। इन नेताओं को देखने और इनके बारे में जानने का यह पहला अनुभव था। उस चुनाव में सी.पी.एम की ओर से प्रेम प्रदीप उम्मीदवार थे। एक अतिसामान्य कार्यकर्ता। कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं की सादगी देख हम सभी प्रभावित होते। चुनाव में प्रेमप्रदीप विजयी हुए और सासंद बने। 

 उसी चुनाव में एक मुस्लिम बस्ती में नाटक करने के दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने एक गाय की आँख पर पट्टी बाँधकर नाटक देख रही भीड़ की ओर धकेल दिया। नाटक के दौरान भगदड़ मच गयी। कई कलाकारों एवं दर्शकों को चोटें आईं। असगर वजाहत के नाटक ‘सबसे सस्ता गोश्त’ का उस समय मंचन चल रहा था। मैं हिंदू या मुस्लिम नेता की भूमिका कर रहा था। मैंने दूर से आँख में पट्टी बॅंधे गाय को ज्योंहि आते देखा किसी तरह बचा लेकिन नाटक में ‘आम जनता’ की भूमिका कर रहे कुछ कलाकार जिनकी पीठ गाय की ओर थी, उन्हें खासी चोटें आईं।

 1990 के विधानसभा चुनाव में हमलोग हिलसा गए जहाँ से गोविंद प्रसाद सी.पी.एम के उम्मीदवार थे। वे बड़े जुझारू लगे थे। बाद के दिनों में गोविंद प्रसाद की लालू राज के दौरान संभवतः 1993 में बेरहमी से हत्या कर दी गयी। हिलसा के बाद टीम हजारीबाग गयी जहाँ रमणिका गुप्ता चुनाव में खड़ी थी। हमें बताया गया कि वे पहले भी विधायक रह चुकी हैं। वहाँ का माहौल तब बेहद सांप्रदायिक था। कुछ दिन रहने के बाद एक दिन अचानक विद्याभूषण ने हमें चलने को कहा। रमणिका गुप्ता टीम की चुनाव प्रचार में उपयोगिता देख रोकना चाहती थीं लेकिन लगता है विद्याभूषण, रमणिका गुप्ता की किसी बात से चिढ़े थे इस कारण टीम वहाँ से लौट गयी।

विद्याभूषण की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में जनगीत गाते सुरेंद्र सिंह नेगी ( स्पेनिश भाषा के प्रोफेसर, इंग्लिश एन्ड फॉरेन लैंग्वेजेज यूनिवर्सिटी, हैदराबाद)

इसी चुनाव के बाद लालू यादव सत्तासीन हुए और ‘प्रेरणा’ का कार्यालय गाँधी मैदान आ गया। चुनाव के अलावा विद्याभूषण के साथ हम लक्खीसराय, सोनपुर की यात्राओं की मुझे याद है। सोनपुर की यात्रा किसी शहीद की याद में आयोजित कार्यक्रम में टी.एन शर्मा की पहलकदमी से जाना हुआ था। बहुत बाद में जाकर पता चला कि हमलोग उस वक्त शहीद महेश्वर सिंह की शहादत दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में नुक्कड़ नाटक करने गए थे। शहीद महेश्वर सिंह फणीश सिंह के श्वसुर थे। (1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान पुलिस की गोली से, सोनपुर रेलवे स्टेशन पर मारे गए थे)।

शहीद महेश्वर सिंह हमारे गाँव के चिंताहरण सिंह के सहपाठी भी थे। चिंताहरण सिंह के पुत्र हैं डॉ. सत्यजीत जो पटना में ‘रुबन मेमोरियल हॉस्पीटल’ के संचालक है। लेकिन यह सब बहुत बाद में जाकर पता चल पाया। सोनुपर हमलोग साईकिल से नाटक करने गए। गंगा नदी पार करने के लिए साईकिलों को नाव पर लाद दिया गया था। फिर उतरकर रेत पर चलाते हुए सोनपुर पहुंचना हुआ था। लौटते समय गाँधी सेतु का रूट हमने पकड़ा था।

 तब तक विद्याभूषण तरह नाटक में डूब गए। ‘प्रेरणा’ निरन्तर बढ़ती जा रही थी। नये-नये लोग आते जा रहे थे। राजेंद्र मंडल, निशा सहित और कुछ पुराने लोग प्रेरणा से विदा हो चुके थे। उनकी शख्सियत बनने लगी थी। वे प्रेरणा में उनका नेतृत्व स्थापित हो चुका था। तब सुरेंद्र आनंद, नीलम, नवीन, मीना, संतोष झा, राकेश रंजन, गोपाल कुमार गोपी आदि प्रेरणा के प्रमुख लोगों में गिने जाते थे। गोपी भाई, विद्याभूषण के कट्टर समर्थक हुआ करते थे। इसी बीच 1990 में प्रेरणा के अधिकांश लोग केरल में साक्षरता आन्दोलन में भाग लेने गए। मेरे अलावा विद्याभूषण द्विवेदी केरल नहीं गए थे। विद्याभूषण के छोटे भाई विद्यासागर भी उस यात्रा में शामिल थे।

वहाँ ‘प्रेरणा’ के इन साथियों ने पहली बार गाय का माँस चखा था। केरल से लौटने के पश्चात ‘प्रेरणा’ के साथियों का आपसी समीकरण बदलने लगा था। सुरेंद्र आनंद की नीलम से और नवीन की मीना से नजदीकियां बढ़ चुकी थी। बाद के दिनों मे इन दोनों जोड़ों की शादी हो गयी। प्रेरणा में ये पहली अन्तर्जातीय थी। नीलम और मीना दोनों सगी बहने थीं। लेकिन इसी के साथ इन लोगों के आपसी मतभेद भी बढ़ने लगे थे। विद्याभूषण, सुरेंद्र आनंद और नीलम के रिश्ते में कुछ ऐसा पेंच था जिस कारण सब कुछ गड़बड़ होता जा रहा था। अन्ततः सुरेंद्र आनंद, नीलम, नवीन और मीना को प्रेरणा से निकाल दिया गया। इन्हें निकालने में विद्याभूषण द्विवेदी की सबसे अहम भूमिका थी। इन दोनों जोड़ों को निकालने में संस्था के बाकी लोग, खासकर गोपी भाई और राकेश रंजन विद्याभूषण के साथ थे। इसी के साथ ही सुरेंद्र आनंद का नाटक की दुनिया से भी हमेशा के लिए विच्छेद हो गया।

  लगभग उसी दौरान प्रेरणा में जातिसूचक टाईटल का इस्तेमाल बदलने का चलन शुरू हुआ था। सुरेंद्र शर्मा का नया नाम सुरेंद्र आनंद हो गया। गोपाल सिंह, गोपाल गोपी। बाद में यही नाम स्थायी सा हो गया। नीलम को नीलम निशांत, सुनील को सुनील शशांक, प्रमोद को प्रमोद प्रशांत इसी तरह मेरा नाम अनीश कुमार से अनीश अंकुर हो गया जो आगे आने वाले वर्षों में यही नाम ज्यादा प्रचलित हुआ। इन तमाम तब्दीलियों के पीछे थे विद्याभूषण द्विवेदी। लगभग सभी नाम उनके द्वारा ही सुझाए गए थे। लेकिन उनके नाम के आगे द्विवेदी को बदलने के लिए कोई उपयुक्त शब्द ढूंढ़ना था जो कोई साथी नहीं कर पाए। पुराने साथियों के निकाले जाने के पश्चात फिर नये-नये साथी जुड़ते जाते और कुछ दिन तक कमी खलने के बाद पुराने लोग धीरे-धीरे विस्मृत होते जाते। विद्याभूषण अभी भी टीम के केंद्रक थे। सब कुछ उनके इर्द-गिर्द घूमता।

इसी के आस-पास एक बार गाँधी मैदान के भीतर से गोपी भाई और नीलम प्रेरणा कार्यालय जा रहे थे। मंदिरी मुहल्ले के लड़कों की टीम गाँधी मैदान के दक्षिणी पश्चिम छोर, जहाँ आज कल गाँधी की बड़ी प्रतिमा लगी है, क्रिकेट खेल रही थी। मंदिरी मुहल्ला अपनी आपराधिक गतिविधियों को लेकर तब काफी बदनाम हुआ करता था। आए दिन मारपीट, छुरेबाजी और हत्या जैसी घटनाएं आम बात थी। उन आवारा लड़कों ने गापी भाई के साथ नीलम को देख फब्तियां कसीं। गोपी भाई मन मसोस कर रह गए। रिहर्सल में आए तो चुपचाप, गुमसुम। विद्याभूषण के पूछने पर उन्होंने सारा माजरा बताया। विद्याभूषण ने उन लड़कों को सबक सिखाने का फैसला किया।

गोपी भाई तो जैसे इसी ताक में थे। जिसको जो सामान मिला, डंडा, पैना, लाठी वगैरह, उसे लेकर तुरंत गाँधी मैदान के भीतर पहुंचे। क्रिकेट वाले लड़के 14-15 की संख्या में थे और नाटक वाले भी लगभग उतने ही। विद्याभूषण ने रणनीति बनायी। क्रिकेट खेलने वाले प्रत्येक लड़के के पीछे एक साथी तैनात किया गया। गोपी भाई और विद्याभूषण विकेटकीपर के पास गए। बाकी सभी मैदान में फैले, फील्डिंग कर रहे एक-एक लड़के के पीछे। इशारा मिलते ही एकबारगी हमला हुआ। गोपी भाई ने सारे विकेट उखाड़ लिये। अचानक हुए इस हमले से सारे लड़के भौंचक्के रह गए, सभी गिरते-पड़ते भागे। बैट, बॉल, विकेट, ग्लप्स इत्यादि सब कुछ जब्त कर लिया गया।

   1992 में ब्रेख्त के नाटक ‘गैलीलियो’ का कालिदास में मंचन हुआ। इसी साल प्रेरणा ने चतरा, गिरीडीह की यात्राएं कीं। 1993 में ‘ज्योति प्रकाश मेमोरियल लाईब्रेरी’ के उद्घाटन के समय टीम बक्सर गयी। तब टीम काफी बड़ी थी। इसी के आसपास टीम में फिर कुछ मतभेद बढ़ने लगे। टीम की एक लड़की से सम्बन्धित भी कुछ विवाद था। चतरा यात्रा में कुछ ऐसा घटित हो गया था जो बड़े विवाद का कारण बना। दरअसल उस लड़की का एक हाथ थोड़ा टेढ़ा सा था। हल्का विकलांग (हालांकि इस शब्द अब प्रचलन से बाहर है) कह सकते हैं। उसे अपने उस हाथ को लेकर थोड़ा काम्प्लेक्स सा था। चतरा में किसी साथी ने विद्याभूषण को उस लड़की का हाथ अपने हाथ मे लेकर यह कहते सुना लिया ‘ ये हाथ तुम मुझे दे दो।” विद्याभूषण ने उस लड़की को ये बातें सम्भवतः उसे सांत्वनास्वरूप सहानुभूति में कही। इस छोटी सी बात ने बतंगड़ का रूप ले लिया।

विद्याभूषण द्विवेदी

 इस बार उन्होंने खुद को संगठन से किनारा ले लिया। वे नवभारत टाइम्स के लिए लिखने लगे। सांस्कृतिक प्रतिनिधि के बतौर जल्द ही उनकी पहचान बन गयी। नवभारत टाइम्स में उनकी रिपोर्ट पढ़ी जाती। शहर में उस पर चर्चा होती। रिपोर्ट के बीच में उनकी टिप्पणियां खास तौर पर महत्वपूर्ण होती। हिन्दी भाषा पर उनकी पकड़ अच्छी थी। धीरे-धीरे वे पत्रकारिता के मोर्चे पर भी अपनी पहचान बनाने में कामयाब होते गए। उस वक्त ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक थे अरूण रंजन। अरूण रंजन का विद्याभूषण से बहुत स्नेह था। इस मोड़ पर विद्याभूषण अब रंगकर्म छोड़ पत्रकार बनने का सपना देखने लगे थे। उनके द्वारा लिखी गई कई रिपोर्ट आज भी मेरी याद में ताजा है। एक बार हमलोगों ने विद्याभूषण की किसी बात को लेकर आलोकधन्वा से शिकायत की तो उन्होंने जवाब में कहा ‘‘तुम लोग पढ़ते हो उसकी रिपोर्ट? कैसी टिप्पणियां लिखता है विद्याभूषण, देखा है तुमलोगों ने कभी? सीखो, उससे सीखो!’’

इसी के आसपास जब वे एक बार काफी दिनों पश्चात प्रेरणा दफ्तर आए। ये 1994 की बात है। ‘प्रेरणा’ के दफ्तर (आज इस जगह पर ज्ञान भवन बन चुका है) के बाहर पोर्टिको में पुराने वाले घने आम के पेड़ के नीचे आजाद से एक किताब को लेकर काफी झगड़ा हो गया। मारपीट की नौबत आ गयी। बीच-बचाव कर मामला शांत किया गया। विद्याभूषण की स्वीकृति संगठन में कम होती जा रही थी।

 उस वक्त मैं भी संस्था से थोड़ा कटकर अपनी पढ़ाई-लिखाई को पटरी पर लाने में मशगूल हो गया। उसी दौरान मेरे पिता जी कहीं से एक गाय खरीद कर ले आए। मुझ पर गाय के सानी-पानी की जिम्मेवारी आ पड़ी। सुबह-शाम उसे चारा देना, उसकी देखभाल करना मुझ पर सौंप दिया गया। अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ मुझे ये भी करना था। उस दौरान शाम में विद्याभूषण, अंजनी तिवारी और सुनील राज के साथ, मेरे घर, दूध पीने आते। मैं अपनी पढ़ाई-लिखाई का ध्यान रख कहीं निकलता न था। लेकिन जब वे लोग रात में दूध पीने आते तो दुनिया जहाँ की बातें करते। वहीं एक दिन अंजनी तिवारी को विद्याभूषण से कहते सुना ‘‘नामवर सिंह तो आलोकधन्वा को पहचानते हैं? नहीं?’’ विद्याभूषण का जवाब था ‘‘अरे? क्या बात करते हो?’’

विद्याभूषण की स्मृति में माध्यमिक शिक्षक संघ भवन ( जमाल रोड) में आयोजित कार्यक्रम के दौरान शफी मशहदी, व्यास जी मिश्रा, खगेन्द्र ठाकुर और आलोकधन्वा

इसी दरम्यान 1993 में आलोकधन्वा की शादी हुई। सभी काफी प्रसन्न थे। काफी लोग उसमें शामिल हुए। वो शादी हम सबों के लिए एक खास मौका और अनुभव था। विद्याभूषण ने उस विवाह समारोह का संचालन किया था। धीरे-धीरे वे अपने लेखन के फलस्वरूप लोकप्रिय होते चले गए। एक समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने प्रख्यात हिन्दी कवि बाबा नागार्जुन को एक समारोह में च्यवनप्राश भेंट किया था। विद्याभूषण ने इस पर व्यंगात्मक शैली पर बहुत अच्छी रिपोर्ट लिखी थी। ऐसे ही सोवियत संघ के विघटन पर कई प्रमुख लोगों से बातचीत पर आधारित रिपोर्ट की मुझे याद है। अरूण रंजन वगैरह के साथ रहते-रहते वे एस.पी. सिंह की चर्चा किया करते। मानसिक रूप से पत्रकारिता में ही कैरियर बनाने की सोचने लगे थे। ‘प्रेरणा’ उस वक्त जैसे-तैसे चल रही थी। रंगमंच से उनका नाता लगभग टूट चुका था।

1995 का चुनाव होने वाला था। नीतीश कुमार लालू प्रसाद से अलग होकर समता पार्टी बना चुके थे। चुनाव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थी। भाकपा (माले-लिबरेशन) एवं समता पार्टी साथ-साथ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। प्रेम कुमार मणि तब समता पार्टी में थे, बल्कि उसे बनाने वाले प्रमुख लोगों में थे। वामपंथी पार्टियों के चुनाव प्रचार में वाम सांस्कृतिक संगठन से जुड़े रंगकर्मी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार किया करते थे। एक बार किसी पत्रकार ने प्रेम कुमार मणि से पूछ लिया कि क्या आप भी वामपंथी पार्टियों की तरह रंगकर्मियों द्वारा नुक्कड़ नाटक की तरह चुनाव प्रचार करवाएंगे।

प्रेम कुमार मणि ने एक विवादास्पद बयान दे डाला ‘‘समता पार्टी चारण और भांटों का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में नहीं करेगी’’ रंगकर्मियों के लिए ‘चारण भांटों’ शब्द का उपयोग प्रेम कुमार मणि की खासी आलोचना हुई। विद्याभूषण ने नवभारत टाइम्स में लगभग प्रेम कुमार मणि के विरूद्ध अभियान सा छेड़ दिया। हर तरफ से प्रेम कुमार मणि के बयान की आलोचना हुई। वैसे विद्याभूषण की मुत्यु के बाद होने वाली लोकसभा में मणि जी शामिल हुए और उन्हें अपना अनुजवत बताया। विद्याभूषण ने भी एन. एस. डी से पहले वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद जिन पाँच कथाकारों की कहानियों को मंचन के लिए चुना। उसमें मणि जी की कहानी ‘खेल’ भी थी।

राजेन्द्र मण्डल लिखित ‘मारीच का एक और संवाद’ के प्रदर्शन के बाद विद्याभूषण द्विवेदी। साथ में हैं संजय सोनू, अवधेश मिश्रा, प्रदीप तिवारी, गोपाल गोपी, देवाशीष सरकार, अनीश अंकुर तथा गोपी जी के रिश्तेदार (मूंछ वाले)

राजनैतिक तौर पर ‘प्रेरणा’ में होने के कारण स्वाभाविक रूप से वे सी.पी.एम के समर्थक थे। वे पार्टी के कार्डहोल्डर थे। लगभग इसी समय नवभारत टाइम्स बन्द हो गया और उनकी नौकरी छूट गयी। विद्याभूषण की पारिवारिक पृष्ठभूमि एक गरीब किसान परिवार की थी। माँ-पिता काफी वृद्ध थे। दो भाई एवं चार बहने थीं। बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी। उनके एक बड़े चचरे भाई शशिभूषण द्विवेदी, जो कि काफी प्रतिभाशाली माने जाते थे, के साथ उन्होंने पटना में रहकर पढ़ाई की। बाद में शशिभूषण द्विवेदी पटना से कहीं चले गए। विद्याभूषण ट्युशन पढ़ाकर अपना गुजारा चलाते थे। वे कई ट्युशन पढ़ाते। चूंकि पढ़ाई-लिखाई में उनकी काफी ख्याति थी इस कारण उन्हें कई जगहों से ट्युशन पढ़ाने को आमंत्रित किया जाता। मैं और अंजनी तिवारी उसी दरम्यान उनसे ट्युशन पढ़ने को आगे आए।

चॅुंकि मैं उनसे ट्युशन पढ़ चुका था इस कारण हमेशा एक दूरी सी बनी रहती हालांकि बाद के दिनों में ऐसा न था। लेकिन मुझमें और अंजनी तिवारी में विद्याभूषण, अंजनी तिवारी से ज्यादा सहज और घुले-मिले थे। मुझसे कभी-कभी किसी बात को लेकर मनमुटाव भी हो जाता। ‘प्रेरणा’ की कार्यकारिणी समिति में काफी जद्दोजहद के बावजूद मेरा चुनाव न हो सका।

लेकिन रंगमंच से जुड़ने के पश्चात धीरे-धीरे ट्युशन का सिलसिला बन्द होने लगा। ऐसी स्थिति में पटना में टिके रहने एवं अपने भाई को टिकाए रखने के लिए नौकरी उनकी मजबूरी भी हो गयी थी। वैसे रहने के लिए ‘प्रेरणा’ कार्यालय कैंपस में एक कमरा उन्हें मिल गया था। नवभारत के अचानक बन्द होने से आय का स्रोत बन्द हो गया था। पर उसी दरम्यान ‘आद्री’ से निकलने वाली पत्रिका ‘सुबह’ से विद्याभूषण जुड़ गए जिससे उन्हें तात्कालिक राहत मिली होगी। ये 1995 की बात है। मार्च-अप्रैल की। सुबह पत्रिका एक अस्थायी सा काम था।

इसी वर्ष जनवरी में एन.एस.डी रेपर्टरी की टीम पटना आई थी। सतीश आनंद उस पूरे आयोजन के संयोजक थे। कीर्ति जैन उस समय एन.एस.डी की निदेशक थीं। गाँधी संग्रहालय में पटना के रंगकर्मियों के साथ बात-चीत का आयोजन किया गया। कीर्ति जैन के वक्तव्य के बाद उनसे सवाल-जवाब का एक सेशन था। विद्याभूषण ने उनसे एन.एस.डी को लेकर कई चुभने वाले सवाल पूछे। इसी महोत्सव के बीच सतीश आनंद के इकलौते पुत्र की मौत हो गयी थी।

उसके पहले सतीश आनंद और हृषीकेश सुलभ और चर्चित झगड़ा घटित हो चुका था। विद्याभूषण ने इस लड़ाई में हृषीकेश सुलभ के बजाए सतीश आनंद का साथ दिया था। अपने पुत्र की मौत के पश्चात अगली शाम को सतीश आनंद कालिदास रंगालय आए। एन.एस.डी रेपर्टरी का नाटक चल रहा था। वे कालिदास रंगालय के स्टेज की तरफ जाने वाले दरवाजे पर अकेले चुपचाप, उदास खड़े थे। सभी इतने दुःखी थे कि कोई उनसे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। विद्याभूषण को मैंने उनके करीब जाते देखा। वे देर तक सतीश आनंद के साथ खड़े रहे और धीमे-धीमे स्वर में उनसे कुछ बात करते रहे।

  1995 में एन.एस.डी परीक्षा के लिए अप्लाई कर दिया। विद्याभूषण 2-3 वर्षों से एक तरह से सक्रिय रंगमंच से अलग हो चुके थे। उनके एन.एस.डी के लिए फॉर्म भरते ही पटना के एन.एस.डी भरने वालों के बीच सरगर्मी बढ़ गयी। उस वर्ष कई प्रमुख रंगकर्मी एन.एस.डी के लिए दावा ठोक रहे थे। अनिरूद्ध पाठक, दीपक बंधु, रामबहादुर रेणु, सहित ढ़ेरों चर्चित दावेदार थे। एन.एस.डी में विद्याभूषण का होगा या नहीं? यह सबों की दिलचस्पी का विषय था। एक तो रंगमंच से कई वर्षों से अलग रहना और दूसरा वामपंथी होना विद्याभूषण के विरूद्ध जाता था। वाम रूझानों वाले रंगकर्मियों का एन.एस.डी में नामांकन नहीं होता है ऐसी उस समय आम मान्यता थी। राकेश रंजन, गोपाल गोपी कई दफे छॅंट चुके थे। बाद के वर्षों में रविशंकर एवं राजेश चंद्र ठाकुर के साथ भी यही हुआ था।

 विद्याभूषण ने काफी तैयारी की, उनमें आत्मविश्वास काफी था। पी.टी में वे चुन लिए गए। उनके साथ अनिरूद्ध पाठक, दीपक बंधु सहित और रंगकर्मी भी चुने गए। उसके बाद मेन्स आया। पूरे पटना रंगमंच में उस समय काफी उत्तेजना थी। मेन्स का परिणाम क्या होगा इस पर सबों की नजर थी। सारे रंगकर्मी मेन्स के लिए दिल्ली गए थे। उस समय परीक्षा का परिणाम अन्तिम वर्कशॉप की समाप्ति के साथ ही प्रकाशित हो जाता था। सबों की आशा के विपरीत पूरे पटना से एकमात्र विद्याभूषण चयनित हुए।

कालिदास रंगालय में परिणाम के दिन इकट्ठा हुए कुछ रंगकर्मियों ने विद्याभूषण के चयन को पटना रंगमंच का ‘काला दिन’ तक कह डाला। विद्याभूषण ने दिल्ली से लौटने के बाद हमलोगों को बताया कि दिल्ली से लौटने के दरम्यान बाकी रंगकर्मी, जिनका चयन न हुआ था और वे खुद को ज्यादा योग्य समझते थे, काफी रिएक्शन में थे। विद्याभूषण ने बाद में हमलोगों को बताया ‘‘वे लोग इतने रिएक्शन में थे कि ऐसा लग रहा था कि मुझे ट्रेन से ही फेंक डालेंगे’’। वैसे विद्याभूषण एन.एस.डी के कटु आलोचक थे। लेकिन संगठन और नौकरी से अलगाव की स्थिति में उन्होंने एन.एस.डी का फॉर्म भर दिया। बंसी कौल ने, जो उनके एन.एस.डी विरोधी रूख से परिचित थे, उन्हें एन.एस.डी में देखकर कहा था ‘‘आखिर! आप भी यहाँ आ ही गए!’’

विद्याभूषण द्विवेदी

सफ़दर हाशमी रंगभूमि , गांधी मैदान (पटना) में ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं’ करते विद्याभूषण ( हरी पट्टी वाले)

 उसी साल अनुकृति की ओर से सार्त्र के नाटक मौत के साये में (Men without shadow) का मंचन किया गया था। विद्याभूषण का एन.एस.डी में होना उस वक्त एक ‘फिनोमिना’ की तरह लगता था क्योकि उसके पूर्व किसी भी एक्टीविस्ट रंगकर्मी का एन.एस.डी में चयन नहीं हुआ था। पटना रंगमंच में बाद में वैसी ही खुशी शशिभूषण वर्मा के चयन वक्त देखी गयी थी। दुर्भाग्य से इन दोनों का एन.एस.डी में ही असमय निधन हो गया।

 एन.एस.डी में चयन के बाद विद्याभूषण के सामने ये समस्या उठ खड़ी हो गयी कि उनके पास ग्रैजुएशन की डिग्री न थी। नामांकन के पूर्व डिग्री प्रस्तुत करना आवश्यक था। बहरहाल उन दिनों मगध विश्वविद्यालय में पैसे देकर डिग्री करा लेने का चलन जोरों पर था। विद्याभूषण परीक्षा तो दे चुके थे पर परिणाम अधर में था। किसी तरह उनकी स्नातक डिग्री का प्रबन्ध किया गया और वे 1995 के जुलाई में एन.एस.डी चले गए। जाने के पूर्व अंजनी तिवारी और सुनील राज ने मिलकर विद्याभूषण का एक साक्षात्कार लिया। वो साक्षात्कार टेप भी हुआ था। विद्याभूषण की आवाज में वो एक शानदार इंटरव्यू था। उस वक्त के रंगमंच एवं सामाजिक माहौल के के बारे में वो बहुत अच्छी बात-चीत थी। विद्याभूषण उसमें एक विचारक की तरह बोलते नजर आते हैं। उस साक्षात्कार का कैसेट सुभाष (अब बंगलौर में एक कम्पनी में कार्यरत) की गलती से कहीं गुम हो गया।

  1996 की फरवरी में मैं पहली बार दिल्ली गया तो उनसे एन.एस.डी में भेंट हुई। वहाँ उन्होंने अपनी मूंछ हटवा ली थी और बाल भी छोटे-छोटे करवा लिए थे। उन्होंने संक्षेप में बताया कि यहाँ कैसे लड़के-लड़िकयों के रिश्ते यांत्रिक एवं कंज्युमरिस्ट हैं। ऐसा लगता था कि वे खुद को अनफिट महसूस कर रहे थे।

वैसे मात्र छह महीनों के अंदर वे पॉपुलर से हो चले थे। वहीं मुझे अनामिका हक्सर ने मिलने के लिए बुलाया था। उनसे 1995 में एन.एस.डी रेपर्टरी वाले महोत्सव के दौरान लम्बी बातें हुई थी। एन.एस.डी के कैंपस में वे मुझसे मिलने आईं। मैंने अपने साथ, उनका मेरे द्वारा लिया साक्षात्कार, जो पाटलिपुत्र टाइम्स में छपा था, भी लेते गया था। अनामिका हक्सर के एन.एस.डी कैंपस में पहुंचते ही वहाँ के छात्र उनसे मॉम-मॉम करते मिलने चले आए। विद्याभूषण भी उन लड़कों में थे।

बंगाल के वामपन्थी जनगायक अजीत पांडा का नवभारत टाइम्स के लिए इंटरव्यू करते विद्याभूषण द्विवेदी

अनामिका हक्सर ने उन लोगों से कहा कि वे अभी पटना से आए इस रंगकर्मी से बात करने यहाँ आयीं है अतः अभी वे अकेला बात करने के लिए छोड़ दें। मैं अनामिका हक्सर के व्यवहार से थोड़ा अचंभित था। उस वक्त विद्याभूषण को पढ़ने-लिखने वाला समझदार रंगकर्मी मान बाकी लोगों की तुलना में ज्यादा महत्व दे रहीं थीं। खैर बाकियों के जाने बाद अनामिका हक्सर देर तक मुझसे बातें करते रहीं। मेरे साथ उस वक्त मेरा भांजा टिंकू भी मौजूद था। हमदोनों अपने प्रति सम्मान देख एक तरह अभिभूत से थे। विद्याभूषण भी, हमदोनों के प्रति अनामिका हक्सर के झुकाव को देख, जो महज औपचारिकता भर था, थोड़े चकित से थे।

विद्याभूषण की मौत के एक वर्ष बाद अनामिका हक्सर 1997 के दिसम्बर में ‘हूरिया’ नाटक की टीम के साथ पटना आयीं। विद्याभूषण की स्मृति में उनके इस चर्चित नाटक का शानदार मंचन हुआ। उस नाटक की प्रस्तृति आज भी पटना के दर्शकों के जेहन में ताजा है। उस नाटक के दौरान ‘प्रेरणा’ की पूरी टीम ने काफी मेहनत की थी। हम सभी नये और अनुभवहीन थे लेकिन सब कुछ सफलता से संपन्न हुआ। इस प्रर्दशन के लिए अनामिका हक्सर ने हमलोगों से एक भी पैसा नहीं लिया। बल्कि उनका कुछ पैसा भी इस दौरान गुम हो गया था।

 विद्याभूषण एक साल की पढ़ाई कर गर्मी की छुटि्टयों में पटना लौटे। हमलोगों ने बिहार के पाँच समकालीन कथाकारों की कहानियों का मंचन करना तय किया। कथाकार थे मधुकर सिंह, हृषीकेश सुलभ, प्रेम कुमार मणि, मिथिलेश्वर और उषा किरण खान। ‘प्रेरणा’ के दफ्तर के पीछे आम के बगीचे में स्टेज बनाना हमने तय किया। एक नये और अनूठे स्टेज की परिकल्पना की गयी। लेकिन बारिश के कारण हमें स्टेज बनाने का प्लान अधूरा छोड़ना पड़ा।

अन्ततः गाँधी संग्रहालय में उन पाँचो कहानियों का नाट्य वाचन हुआ। मुझे उषा किरण खान की कहानी मंचित करने की जिम्मेवारी दी गयी थी। मेरे अलावा अशोक मिश्रा, रविशंकर, अमरेंद्र अनल और सज्जन थे। काफी लोग उस प्रस्तृति को देखने आए। प्रस्तुति के दौरान वहाँ की बिजली गुम हो गयी थी। मोमबत्ती की रौशनी में हमने वो मंचन किया। ‘प्रेरणा’ के हम सभी अभिनेताओं के लिए उन कहानियों का मंचन एक अलहदा अनुभव था।

विद्याभूषण की मौत के बाद हमने ‘आद्री’ में भी उन कहानियों का मंचन किया ताकि कुछ पैसे विद्याभूषण के परिवार के लिए इकट्ठा किया जा सके। ‘आद्री’ के सभी कर्मचारियों ने अपने एक दिन की सैलरी भी उस कोष में जमा किया था। सम्भवतः 25-30 हजार रुपये शैवाल गुप्ता ने इकट्ठा कर दिया था। बाद में उनके छोटे भाई विद्यासागर को ए.जी ऑफिस में, अरूण कुमार सिंह (तब बिहार के प्रधान महालेखाकार) की वजह से सरकारी नौकरी हो गयी। हमलोगों ने अरुण कुमार सिंह के गाँव कुबौलीराम (समस्तीपुर) जाकर कई दिनों तक नाटक भी किया था

उसी दौरान गाँधी मैदान में विद्याभूषण हमलोगों नुक्कड़ नाटक देखने आए। ‘भिखारी ठाकुर’ रंगभूमि पर संभवतः सफदर हाशमी रचित ‘समरथ को नहीं दोष गुसांई’ का प्रर्दशन चल रहा था। प्रदर्शन की समाप्ति के पश्चात उन्होंने कहा ‘‘ नुक्कड़ नाटक को कैजुअल तरीके से करने की आदत हमलोगों को छोड़नी चाहिए। इसे भी मंच नाटक जैसी गंभीरता से करने पर ही इसके आलोचकों को जवाब दिया जा सकेगा।’’

 1996 में ही दिल्ली में संयुक्त मोर्चा की सरकार का नेतृत्व करने के लिए ज्योति बसु को प्रधानमंत्री पद का प्रस्ताव किया गया था जिसे सी.पी.एम की केंद्रीय समिति ने ठुकरा दिया था। विद्याभूषण की राय थी की पार्टी ने सही कदम उठाया क्योंकि, जैसा कि वो कहने लगे ‘‘ मान लो ज्योति बसु ने कोई हल्का सा भी रैडिकल कदम उठाया और शासक वर्ग को हमला हो तो दो-तीन राज्यों को छोड़ खुद को कहीं बचा पाने की स्थिति में नहीं होगा। हिन्दी इलाके में क्या शासकवर्गीय हमले से बच पाएगा लेफ्ट?

इसलिए पार्टी ने सोच-समझकर सरकार में नहीं शामिल होने का निर्णय ठीक ही किया। ’’ मैं भी बहुत लम्बे वक्त तक ऐसा ही सोचता था जब तक कि 2001 में ‘फिलहाल’ पत्रिका द्वारा आयोजित सेमिनार में प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक को न सुना। उनके अनुसार ज्योति बसु को बनना चाहिए था क्योंकि प्रधानमंत्री एजेंडा सेट कर सकते थे। कुछ भी काम जनता के भले के लिए करवा पाते तो बड़ी उपलब्धि होती और सबसे बढ़कर तब संभवतः दक्षिणपंथ को इतना मौका न मिला होता। ऐसे ही एक बार विद्याभूषण से बिनोबा भावे को ‘जमींदारों का दलाल’ कहते हुए सुना था।

लालू यादव की लोकप्रियता उस समय शिखर पर थी। दिल्ली में रहते हुए उन्हें बिहारियों के खिलाफ पूर्वाग्रह का अंदाजा हो चला था। ऐसे सारे लोग बिहार के साथ-साथ लालू प्रसाद से भी चिढ़ते थे। विद्याभूषण प्रतिक्रिया में कहते ‘‘ मुझे तो लगता है लालू को ही प्रधानमंत्री बना दिया जाए ऐसे लोगों के अक्ल ठिकाने आ जाऐंगे।’’

उनके पटना रहने के वक्त ही वीरेन डंगवाल का काव्य पाठ हुआ था। विद्याभूषण के कहने पर प्रेरणा के 20-25 साथी काव्य-पाठ में गए। हम में अधिकांश के लिए वो काव्य पाठ एक यादगार अनुभव था। वीरेन डंगवाल के साथ विद्याभूषण की एक तस्वीर भी थी जिसमें उन्होंने नीले रंग की गोल गले वाला टीशर्ट पहना हुआ था।

कनुप्रिया और गौरी के साथ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में विद्याभूषण द्विवेदी

 इसी बीच उनके राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय NSD दिल्ली लौटने का समय होने लगा। संभवतः जुलाई का प्रथम सप्ताह। 1996 में ही कनुप्रिया का चयन हुआ था। उन्होंने मुझे ‘प्रभात खबर’ के लिए कनुप्रिया का साक्षात्कार करने के लिए कहा गया। उनके कहने पर मैंने सुनील राज (वे तब छायाकार थे) , के साथ जाकर उनका इंटरव्यू लिया।

 विद्याभूषण को चिट्ठी लिखने की आदत थी। लोगों से आत्मीय रिश्ता बनाए रखने में यह उस समय बेहद कारगर था। दिल्ली लौटने के बाद 4 अगस्त को मुझे भी उन्होंने एक पत्र भी लिखा था जिसमें उस अधूरे स्टेज का जिक्र करते हुए एक बीत दिनों को लेकर इमोशनल टच था।

 5 सितंबर 1996 को NSD में एक अभ्यास के दौरान विद्याभूषण को रीढ़ की हड्डी में चोट लगी। उन्हें सफदर जंग हॉस्पीटल ले जाया गया। उस दिन मैने विद्याभूषण की हालत के बारे में उनसे एक साल सीनियर पटना के ही संजय सोनू से बात की। लगभग ढ़ाई महीनों तक उनका इलाज वहाँ चला। उनके छोटे भाई विद्यासागर को दिल्ली भेजा गया। क्या इलाज हुआ, हमलोगों को ठीक से पता भी नहीं चल सका। शशिभूषण वर्मा की मौत (2009)  के समय एन.एस.डी का जो उपेक्षापूर्ण रवैया हमने बाद में देखा लेकिन उससे हमलोग तब थोड़े अनजान थे।

   27 नवंबर 1996 को पटना जंक्शन के प्लेटफॉर्म न.1 से मैंने रविशंकर को दिल्ली जाने वाली ट्रेन में चढ़ाया। उस वक्त मेरे साथ प्रेरणा के कुछ और साथी भी थे। रविशंकर को संस्था की ओर से विद्याभूषण द्विवेदी के इलाज में सहायता के लिए भेजा जा रहा था। दिल्ली से उनके भाई विद्यासागर ने एक और साथी की जरूरत महसूस की थी ताकि मरीज की देखभाल ठीक से हो सके। रविशंकर को रवाना कर ज्योंहि मैं अंजनी तिवारी के घर पहुंचा, उनकी माँ ने विद्याभूषण की मृत्यु की सूचना दी। रविशंकर जब  दिल्ली पहूंचे, विद्याभूषण की जीवन लीला समाप्त चुकी थी।

   विद्याभूषण जैसी अतुलनीय प्रतिभा, संगठनकर्ता, बेहतरीन अभिनेता, सृजनशील निर्देशक, अनूठे पत्रकार, कवि और सबसे बढ़कर आकर्षक व सम्मोहक व्यक्तित्व का स्वामी पटना के सामाजिक-सांस्कृतिक जगत में फिर दूसरा नहीं हुआ। सभी विद्याभूषण के नजदीक होना चाहते थे। लोग उनकी स्मार्टनस के कायल थे। बहुत सारे युवाओं में उन्होंने रंगकर्म और वामपंथ के प्रति रूझान पैदा किया। लोगों को समझने के मामले में भी वे पारखी थे। हालांकि कहीं-कहीं डिक्टेटोरियल एटीट्यूट भी उनमें झलकता था। जैसे बहुत पुराने साथियों का बचाया जा सकता था। अभावों में रहने बावजूद अपनी गरिमा वे हमेशा बरकरार रखते। अपनी बातचीत में मुदभाषी होने के साथ-साथ हमेशा शुद्ध हिन्दी बोला करते, उनका ‘सेंस ऑफ हयूमर’ भी लाजवाब था। बहुतों के लिए वे एक आदर्श की तरह थे।  

उनकी मौत के पश्चात साहित्यकार, रंगकर्मी सभी काफी शोकसंतप्त थे। प्रेरणा कार्यालय में विद्याभूषण की बड़ी शोकसभा हुई। बहुत लोग आए थे। अपूर्वानंद ने उस शोकसभा का संचालन करते हुए कहा ‘‘ हम सब कल को बूढ़े हो जाएंगे लेकिन विद्याभूषण की स्मृति हमारे जेहन हमेशा युवा रहेगी।’’ आलोकधन्वा बोले ‘‘शोषण विरोधी संघर्ष में हमने अग्रिम पंक्ति का एक सिपाही खो दिया है।’’

बिहार के जनपक्षधर रंगकर्म और नुक्कड़ नाटकों के उनके अप्रतिम योगदान के लिए कई लोग उनको बिहार का सफदर हाशमी भी कहा करते। मृत्यु के वक्त उनकी उम्र मात्र 27 वर्ष थी। उनकी मौत के बाद अगले दो-तीन महीनों तक विद्याभूषण को केंद्र में कर कोई न कोई आयोजन होता रहता। इसी दौरान बिहार के एक NSD पासआउट एक रंगकर्मी ने मुझसे कहा ‘‘ अरे यार तुमलोग उसको सफदर हाशमी बनाने पर क्यों तुले हो? अब बहुत हो गया।’’ वैसे हिन्दी-मगही के कवि हरेंद्र विद्यार्थी (तब जलेस से जुड़े थे) ने उन्हें ‘बिहार के सफ़दर हाशमी’ की ही उपाधि दी डाली थी। तब नुक्कड़ नाटकों के लगातार प्रदर्शन किए जाते थे। आज की तरह नुक्कड़ नाटकों का एनजीओकरण नहीं हुआ था।

   दिल्ली जाने के एक दो दिन पूर्व उमा सिनेमा के दक्षिण, पीरमुहानी कब्रिस्तान की ओर जाने वाली सड़क में देवी दयाल उच्च विद्यालय के पास शाम के वक्त वे अचानक मिल गए। वे साइकिल से थे। देर तक खड़े होकर हम दोनों बातें करते रहे। याद नहीं हमदोनों के साथ कोई और था या नहीं। बहुत सारी बातें होती रही। अतीत के अपने कठिन संघर्षों को वे याद करते रहे। उनको लग रहा था कि अब अच्छे दिन आने वाले हैं। मैं सुनता रहा। विदा होते समय हल्के दार्शनिक अंदाज में उन्होंने एक अजीब सी बात कही ‘‘ मैं दुर्गा हूँ , दुर्गा। दुर्गा को कई देवताओं ने मिलकर बनाया है। वैसे ही मुझे बनाने में बहुत सारे लोगों की मेहनत लगी है, कईयों का योगदान है मेरे होने में। आसानी से नष्ट नहीं किया जा सकूंगा।’’

 लेकिन, विद्याभूषण बहुत आसानी से नष्ट हो गए।

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