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क्रान्तिकारियों के राजनीतिक दर्शन
एतिहासिकशख्सियत

क्रान्तिकारियों के संघर्ष का राजनीतिक दर्शन

 

देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देने वालों ने अंग्रेजों से देश की आज़ादी चाही ही थी, लेकिन वे इसी से सन्तुष्ट रहने वाले नहीं थे। वे इस देश और इसमें रहने वालों को सुखी देखना चाहते थे। देशवासियों के जीवन की बेहतरी के लिए भी उनकी कुर्बानी थी। आज जब हम शहीदों को याद करते हैं तो हमें ठहर कर देश के भविष्य के प्रति उनकी सोच के बारे में भी ध्यान देना चाहिए। क्या थे उनके सपने भविष्य के भारत के? अगर वे होते तो क्या खुश होते?

क्रान्तिकारियों के भविष्य के स्वप्न की बात करने के पूर्व उनके इतिहास के बारे में बात करना जरुरी है। कौन थे ये क्रान्तिकारी और वे क्या चाहते थे? उनके स्वप्न एक से रहे या बीतते समय के अनुसार उनके स्वप्नों का नवीकरण भी हुआ?

 इस प्रसंग में तीन बातें विशेष महत्त्व की हैं।

पहली बात: क्रान्तिकारी एक राजनीतिक दर्शन के साथ शुरू से थे। ऐसे भी युवा थे जो भावुकतावश हिंसा के पथ पर चले। ऐसे नौजवान एक ही बात समझते थे कि देश के लिए सबसे जरूरी है पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ना। उनको यह बात कचोटती थी कि विदेशी देशवासियों को अपमानित करते हैं, उनको हीन समझते हैं। वे गोरों को मार भगाना चाहते थे। लेकिन यह एक पक्ष है। ये क्रान्तिकारी सोचते भी थे। कम से कम स्वदेशी आन्दोलन के बाद से ही एक राजनीतिक दर्शन उनके साथ जुड़ा हुआ रहा। यह जुड़ाव क्रान्ति धारा के साथ स्वदेशी आन्दोलन के बाद के दौर से चालीस के दशक तक बना रहा।

 दूसरी बात : क्रान्तिकारी धारा से जुड़े लोग गुप्त संगठनों के साथ जुड़कर काम करते थे, पर 1920 के द्वितीयार्द्ध में उनके बीच भी यह स्पष्ट हो गया कि जनता को इससे जोड़ने की जरुरत है। जनता को जगाने के लिए ही भगत सिंह ने असेम्बली में बम फोड़ा था, यह सभी जानते हैं। लेकिन यह विचार कि जनता के जागरण के बिना देश को स्वाधीन नहीं किया जा सकत़ा भगत सिंह के पहले ही आ चुका था। कम से कम रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा को ध्यान से पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है।

 तीसरी बात, जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है वह है इस क्रान्तिकारी धारा का कांग्रेस के नेतृत्व के साथ सम्बन्ध। लोग एक साँस में कांग्रेस के महान नेताओं और क्रान्तिवीरों को याद करते हुए ऐतिहासिक रूप से परस्पर विरोधी बातों को मिलाकर एक भ्रामक तस्वीर ही पेश करते हैं। यह जरुरी है कि इन दोनों धाराओं के वैचारिक विरोधों को समझा जाए।

बम फेंकने वाले क्या चाहते हैं इस विषय पर ऐतिहासिक महत्त्व का पहला महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का लिखा – ‘द कल्ट ऑफ़ बम’। इसके अलावा अरबिंदो घोष ने अपने सम्पादकीय में अखबारों में जिस राजनीतिक दर्शन को प्रस्तुत किया उसमें राष्ट्रवाद एक धर्म की तरह आया। बाल गंगाधर तिलक, लाजपत राय, अरबिंदो घोष ने स्वदेशी आन्दोलन के दौरान और उसके बाद जो आन्दोलन करना चाहा उसमें जो राजनीतिक दर्शन था उसके साथ देश के युवाओं का एक समूह राजनीतिक स्तर पर जुड़ा था। इस तरह के लोग राष्ट्रवादी कहलाते थे। इन्होंने ही गरम दल के रूप में राजभक्त कांग्रेसियों के साथ टक्कर ली। इस राजनीतिक लड़ाई में जो मुख्य प्रश्न था वह था कि हम अंग्रेजों से लड़ें या संवैधानिक तरीके से उनपर दबाव डालें। 1906 में मतभेद इस तरह बढ़ गए कि दोनों दलों में जूतम पैजार की नौबत आ गयी। जिसे इतिहास पुस्तक में गरम दल बनाम नरम दल कहा जाता है उसे राष्ट्रवादी दल के समर्थक राष्ट्रवादी बनाम राजभक्त के रूप में देखते थे। अंग्रेजों के साथ मिल जुलकर संवैधानिक तरीके से काम करने वाले राष्ट्रवादियों को पसन्द नहीं करते थे।

1906 में तिलक ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पेश किया। नरमपंथी उसके विरोध में थे। वे साम्राज्य के भीतर रहकर ही राजनीतिक अधिकारों के लिए प्रयासरत रहने के हामी थे। यही पथ था जिसे ‘डोमिनियन स्टेटस’ के लिए लड़ना कहा जाता रहा। दूसरी तरफ वे लोग थे जो सहयोग नहीं संघर्ष के संकल्प के साथ राष्ट्रीय आन्दोलन कर रहे थे।

उसी समय थोड़े लोगों ने यह सोचा कि देश की स्वाधीनता की लड़ाई को विदेश में रहकर अन्तर्राष्ट्रीय मदद से भी लड़ने की जरुरत है। ऐसे लोग विदेश में –कनाडा, फ़्रांस, जर्मनी, दक्षिण पूर्व एशिया और इंग्लैण्ड में- रहकर प्रयास करते रहे। उन लोगों का इतिहास भी एक तरह से क्रान्तिकारियों के इतिहास की धारा का ही प्रतिनिधित्व करता है। ये लोग सशस्त्र क्रान्ति के पक्ष में और यौद्धिक प्रयासों से देश से अंग्रेजी राज को समाप्त करने के लिए ही लड़ते रहे। इतिहास में इन लोगों को समुचित स्थान नहीं मिलता।

अरबिंदों के बाद बाघा जतीन ने क्रान्तिकारी धारा को जीवित रखा। उनके सबसे प्रिय शिष्य, जो बाद में एम एन राय के नाम से प्रसिद्द हुए, 1915 में भारत से बाहर हथियारों के लिए गए थे। यह ठीक वही समय था जब भारत में गाँधी अहिंसा का मन्त्र लेकर दक्षिण अफ्रीका से आए।

1917 से 1921 के बीच भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन ने जोर पकड़ा और कांग्रेस के नेता के रूप में गाँधी ने एक वर्ष में आजादी का आश्वासन दिया। उस दौर में क्रान्तिकारियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ अपना तादात्म्य स्थापित किया। लेकिन जब चौरी चौरा के बाद अचानक गाँधी ने आन्दोलन को स्थगित कर दिया तो क्रान्तिकारियों ने गाँधी के इस निर्णय का तीव्र विरोध किया।

 1920 के दशक में क्रान्तिकारियों ने देश के विभिन्न भागों में अपने को संगठित करने की कोशिश की। दुर्भाग्य से ये आपस में राष्ट्रीय स्तर पर मिलकर कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बना सके। इसके बिना क्रान्तिकारी क्या चाहते हैं इसको लेकर जनता के बीच एक भ्रम की स्थित्ति बनी रही। अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले और हँसते हँसते फाँसी पर चढ़ने वाले इन युवा क्रान्तिकारियों के प्रति जनता में अगाध श्रद्धा थी, परन्तु राजनीतिक रूप से उनके प्रयासों के साथ चलने का कोई स्पष्ट रूप उनके लिए नहीं बना । इसी कारण से क्रान्तिकारियों की कार्यवाहियाँ हुईं लेकिन कोई राजनीतिक आन्दोलन वे शुरू नहीं कर सके। ऐसे वीरों के साथ राष्ट्रीय आन्दोलन के बड़े काँग्रेसी नेताओं का सम्बन्ध भी रहा है यह ध्यान देने की बात है। इलाहाबाद के चन्द्रशेखर आजाद को उस शहर के आनन्द भवन से आर्थिक मदद मिलती थी ऐसे प्रमाण हैं। बाद में भी क्रान्तिकारियों के साथ काँग्रेसी नेताओं का सम्पर्क बना रहा।

क्रान्तिकारियों के बीच क्या चल रहा था यह हमारे लिए विचार का प्रश्न होना चाहिए। बीस के दशक के पूर्व क्रान्तिकारियों के बीच धार्मिक प्रभाव रहा था, लेकिन बीस के दशक में क्रान्तिकारियों की सोच में एक गुणात्मक अन्तर आना शुरू हुआ। इस प्रसंग में बहुधा भगत सिंह के कम्युनिज्म के प्रति झुकाव के रूप में देखने की बात की जाती है। निश्चित रूप से भगत सिंह का झुकाव साम्यवादी विचारों के प्रति था। भगत सिंह एक प्रखर पत्रकार बन रहे थे। कनक तिवारी ने उनके पत्रकार रूप को ही सबसे महत्त्वपूर्ण माना है। लेकिन भगत सिंह से पहले रामप्रसाद बिस्मिल में जो वैचारिक परिवर्तन दिखता है वह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। भगत सिंह से चार वर्ष पूर्व ही बिस्मिल को फाँसी हुई थी। फाँसी के लिए इन्तजार करते हुए बिस्मिल ने एक महान आत्मकथा लिखी है। उसमें उन्होंने यह लिखा है : “मैं इस समय इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि यदि हमलोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो हमारा उद्योग क्रान्तिकारी आन्दोलन से कहीं अधिक लाभदायक होता, जिसका परिणाम स्थाई होता। अति उत्तम होगा कि भारत की भावी सन्तान तथा नवयुवक वृन्द क्रान्तिकारी संगठन की अपेक्षा जनता की प्रवृत्ति को देश सेवा की ओर लगाने का प्रयत्न करें और श्रमजीवियों तथा कृषकों का संगठन करके उनको जमिन्दारों तथा रईसों के अत्याचारों से बचावें।”

इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि सभी क्रान्तिकारी संगठन से विमुख हो गए थे। अगर हम 1926-27 से 1942 के बीच के समय में क्रान्तिकारियों में आए वैचारिक परिवर्तनों की समीक्षा करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि वे आन्दोलन के लिए प्रयत्नशील हुए थे। क्रान्तिकारियों में से कई लोग बाद में लेखन और अन्य रचनात्मक विधाओं से जुड़े क्योंकि उनको लगा कि देश की जनता को जागृत करने का काम भी उतना ही जरुरी है।

तीस के दशक में भारत के नवनिर्माण का एक नया स्वप्न युवाओं में उभरा। खुद जवाहरलाल नेहरु ने 1931 में एक अद्भुत लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजनीतिक आन्दोलन तो अब पुरानी बात हो गयी है अब तो हम क्रान्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं। समाजवादी, साम्यवादी और काँग्रेस के वामपन्थी रुझान से लोगों में देश के बारे में स्वप्न देखते हुए आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों का महत्त्व बहुत बढ़ा इसमें कोई सन्देह नहीं। विभिन्न भाषाओं के साहित्य में जो उस समय नए प्रकार का स्वप्न बना उसमें राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ ही सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में बदलावों को कम महत्त्व नहीं मिला। हिन्दी में प्रेमचंद के साहित्य में यह बहुत स्पष्ट रूप से उभरता है किस प्रकार लेखकों और पढ़े लिखे लोगों में आजाद भारत की तस्वीर बदल गयी। रामवृक्ष बेनीपुरी, यशपाल और दर्जनों लेखकों की रचनाओं में यह स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है।

इस कथा में इस बात का उल्लेख जरुरी है कि 1906 में जो तिलक का पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव था उसको काँग्रेस ने कैसे 1930 में अपना राजनीतिक लक्ष्य बनाया। इस प्रस्ताव को 1928 में जवाहरलाल नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस जैसे युवा नेता पास करवाना चाहते थे, लेकिन गाँधी और मोतीलाल इसके विरुद्ध थे। युवा लोग आन्दोलन के पक्ष में थे और पुराने नेता चाहते थे कि अंग्रेजों के साथ बातचीत करके हल निकल जाए। आखिरकार गाँधी ने दोनों युवाओं को इस बात के लिए राजी कर लिया कि अंग्रेजों को समय दिया जाए। गाँधी दो साल का समय देना चाहते थे, पर दोनों नेता नहीं माने इसलिए अन्त में एक साल का समय दिया गया। इस एक साल में अंग्रजों ने देश के सभी साम्यवादी नेताओं को जेल में बंद कर दिया। आन्दोलन को पीछे धकेलने के कारण फायदा अंग्रेजों का ही हुआ। पर आखिरकार 1930 में डोमिनियन स्टेटस का दौर खत्म हुआ और काँग्रेस ने आखिरकार पूर्ण स्वराज को अपना राजनीतिक लक्ष्य मान लिया।

इतिहास के इन प्रसंगों की चर्चा, आज उनके स्वप्न का क्या हुआ, इस प्रश्न का उत्तर देते समय स्मरण करना जरुरी है। क्रान्तिकारियों का सपना और अधिकतर काँग्रेस नेताओं का सपना एक नहीं था यह कहते हुए इतिहासकारों को बहुत दिक्कत होती है।

क्रान्तिकारियों के राजनीतिक दर्शन

 तीस के दशक से ही क्रान्तिकारी धारा से जुड़े लोग सिर्फ राजनीतिक स्वाधीनता के लिए नहीं लड़ रहे थे इसको समझने के लिए यशपाल के साहित्य से गुजरना ही यथेष्ठ है। कैसे वे क्रान्तिकारी के स्वप्न को समाज के नवनिर्माण के समाजवादी स्वप्न के साथ जोड़ते हैं इसे समझने के लिए उनके कुछ उपन्यास विशेष रूप से सहायक हैं। ‘दादा कामरेड’ का नायक क्रान्तिकारी था, लेकिन उसके बाद वह मजदूरों को संगठित करने के लिए काम करते हुए सगर्व अपने प्राणों की आहुति देता है। अगले उपन्यास – ‘देशद्रोही’ का नायक भी इसी तरह समाजवादी संकल्प के साथ है। इस उपन्यास में स्त्री स्वतन्त्रता और उसके जुड़े आर्थिक मुद्दों पर विशेष बल है। अगले उपन्यास – ‘गीता’ में भी समाज का नवनिर्माण ही केंद्र में है।

भारत की हर प्रमुख भाषा में ऐसे उपन्यास हैं जो भारतीय क्रान्तिकारियों के विजन के विस्तार की गवाही देते हैं। बँगला का एक उदाहरण भी यहाँ दिया जा सकता है। यह उदहारण क्रान्तिकारी के विजन के विस्तार की गवाही तो देता ही है, काँग्रेस के साथ जुड़े एक सुविधावादी वर्ग के साथ उनकी लड़ाई को भी समझने में मदद देता है। हेमेन गुप्त एक नौजवान क्रान्तिकारी थे जिनको सविनय अवज्ञा के दौर में कई खतरनाक केसों में कड़ी सजा मिली थी। तीस के दशक में वे कई वर्षों तक कठोर कारावास में रहे। उसी दौरान यशपाल की तरह बौद्धिक विमर्श की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिली। जेल में रहकर उन्होंने अध्ययन किया और फिल्म की तकनीक का अध्ययन किया।

चालीस के दशक में उन्होंने फिल्म निर्माण के माध्यम से देशवासियों के राजनीतिक आन्दोलन को चित्रित करने का प्रयास किया। आज़ादी के बाद उनकी एक फिल्म – ‘बेयाल्लिस ‘ (1942) रिलीज के लिए तैयार हुई। इस फिल्म में 1942 के आन्दोलन के एक प्रमुख केन्द्र मिदनापुर में मातंगनी हाजरा के बलिदान की कहानी कही गयी थी। यह सत्य घटना पर आधारित थी। इस घटना में एक पुलिस अधिकारी की गोली से वृद्ध गाँधीवादी मातंगनी हाजरा मारी गयी थीं। इस फिल्म को आज एक क्लासिक का दर्जा प्राप्त है, लेकिन आज़ादी के बाद इस सत्य घटना पर आधारित फिल्म को प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली क्योंकि जिस पुलिस अधिकारी की गोली से मातंगनी हाज़रा मारी गयी थी वह आजाद भारत में पश्चिम बंगाल की पुलिस के सबसे बड़े अधिकारी बन चुके थे! बहुत कठिनाई से काट छाँट के बाद इस फिल्म को प्रदर्शित किया जा सका। हेमेन गुप्त ने बाद में ‘आनंद मठ’ और ‘काबुलीवाला’ और कई अन्य देशभक्ति पर आधारित फिल्मों का निर्माण किया।

 कई भूतपूर्व क्रान्तिकारियों के जीवन पर दृष्टिपात करने से यह पता चलता है कि बम फेंकने की मानसिकता से वे बहुत दूर हो गए थे और पहले सुभाष चन्द्र बोस के साथ और फिर विभिन्न फ्रण्टों पर भूतपूर्व क्रान्तिकारियों ने साहित्य, सिनेमा से लेकर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में प्रगतिशील मूल्यों के साथ जनता की शक्ति को सम्मान देते हुए काम किया। इस सन्दर्भ में जोगेश चन्द्र चटर्जी, भूपेन्द्रनाथ दत्त, पन्नालाल दासगुप्त और मन्मथनाथ गुप्त की पुस्तकों का अवलोकन विशेष रूप से हमारी मदद करते हैं। जो लोग सुभाष के साथ जुड़े उनमें से बहुत सारे लोग क्रान्तिकारी धारा से जुड़े थे। कालान्तर में उनमें से कई क्रान्तिकारी विचारों के प्रति सम्मानशील रहते हुए राजनीतिक रूप में विभिन्न दलों से जुड़ गए। अधिकतर कम्युनिस्ट पार्टी, रेवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी और फॉरवर्ड ब्लाक में गए पर ऐसे भी लोग थे जिन्हें काँग्रेस ने अपने साथ ले लिया। कैसे भूतपूर्व क्रान्तिकारी लोग काँग्रेस में गए, ऊँचे ऊँचे पदों पर गए, एमएलए-एमपी बने (कुछ तो मंत्री भी बने) इस तरफ अब तक इतिहासकारों का ध्यान नहीं गया है।

इन क्रान्तिकारियों के बारे में चाहे वे किसी भी दल में गए हों यह तो कहा ही जा सकता है कि वे क्षेत्रवाद, जातिवाद और सम्प्रदायवाद के समर्थक नहीं हुए। क्रान्तिकारियों को क्षेत्रीय, जातिवादी और साम्प्रदायिक आधार पर देखने की परिघटना बाद की है। जब क्रान्तिकारियों का इतिहास लिखा गया तब उनको इस तरह की संकीर्ण दृष्टियों से देखा गया।

भगत सिंह सिक्ख बन गए और बंगाल के क्रान्तिकारी बंगाली और महाराष्ट्र के मराठी! क्रान्तिकारियों के उफान के दौर –स्वदेशी आन्दोलन के समय से सुभाष चन्द्र बोस के समय तक- इन संकीर्णताओं से क्रान्तिकारी आन्दोलन के लोग मुक्त थे। कहीं-कहीं कुछ क्षेत्रीय समीकरण थे लेकिन यह कहना सही होगा कि क्रान्तिकारी किसी क्षेत्र, जाति या सम्प्रदाय के लिए नहीं बल्कि देश के लिए लड़ने में विश्वास करते थे। याद आता है बंगाल के जुगांतर पत्रिका ने हिन्दी प्रदेशों में अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए आन्दोलन 1857 के आन्दोलन की सबसे पहले सकारात्मक समीक्षा की और इसे राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में देखा। उन्ही के प्रयास से पहली बार इसे गदर या बलवा नहीं एक राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में देखने की दृष्टि मिली।

तिलक को बंगाल के क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपना माना और पंजाब के गदर आन्दोलन के लिए देश भर के क्रान्तिकारियों के बीच आदर था। आज इस बात का स्मरण करने की जरुरत है कि यह क्रान्तिकारी आन्दोलन का आदर्श ही था जिसके कारण युवा भगत सिंह की सबसे पहले प्रेरणास्रोत बंगाली बाघा जतीन थे और आर्य समाजी रामप्रसाद बिस्मिल के सबसे प्रिय बन्धु अश्फाकउल्ला खान थे।

क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़े लोगों ने इस बात पर बहुत क्षोभ प्रगट किया था कि देश में संकीर्णता के कारण विभिन्न सम्प्रदायों ने अपने अपने क्रान्तिकारियों को अपनी क्षेत्रीय अस्मिताओं में समेटने की कोशिश की। मन्मथनाथ गुप्त ने इस बात पर बहुत क्षोभ प्रगट किया था कि भगत सिंह की हैट वाली फोटो पर प्रतिबन्ध लगाने की पहल पंजाब में हुई। इसका समर्थन राजनीतिक दलों ने भी किया। भगत सिंह को सिर्फ पगड़ी में ही चित्रित करने का पंजाब की असेम्बली तक में ऐसा आग्रह क्यों? आज सुभाष चन्द्र बोस को आदर्श बंगाली महापुरुष के रूप में पेश करने की भी कोशिशें हो रही हैं। क्या वे सिर्फ इस अंचल के ही थे? हर अंचल में कौन कहाँ का है यह विचार इतना महत्त्वपूर्ण कैसे हुआ?

क्रान्तिकारियों के राजनीतिक दर्शन

 1960 के दशक तक के क्रान्तिकारियों के किसी भी इतिहास में देश भर के क्रान्तिकारियों के चित्र होते थे। काली चरण घोष की एक पुस्तक है ‘रोल ऑफ़ ऑनर’ जिसमें क्रान्तिकारियों की तस्वीरों में देश भर के क्रान्तिकारियों की तस्वीरें हैं और चन्द्रशेखर आजाद की पूरे पृष्ठ की तस्वीर है। आज बंगाल के किसी भी क्रान्तिकारियों की पुस्तक में ऐसा होना संभव नहीं। खोज खोज कर बंगाल के क्रान्तिकारियों की तस्वीरें ही डाली जाती हैं। कम्युनिस्ट के साहित्य में भगत सिंह पर फोकस होता है पर उनके साथियों को भुला दिया जाता है। कोशिश की जाती है कि क्रान्तिकारियों का कोई जातीय या क्षेत्रीय आधार ढूँढा जाए। हाल ही में भुला दिए गए महेंद्र प्रताप पर लोग जोर शोर से बोलने लगे। पर फ़ौरन ही यह समझ में आ गया कि उनके जाट होने के कारण उनपर फोकस है ताकि जाटों को अपने पक्ष में किया जा सके!

आज का भारत कैसा है इसको समझने के लिए यह काफी है कि जिन जिन क्रान्तिकारियों को ज्यादा याद किया जाता है उनकी जाति बिरादरी का जोर इस समय है। जो क्रान्तिकारी ऐसे हैं जिनके नाम पर राजनीतिक लाभ नहीं मिल सकता उनको याद करना जरुरी नहीं लगता। क्या आज बीरेन चट्टोपाध्याय या अबनी मुखर्जी को याद किया जाता है? दोनों का ही योगदान भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन में है और दोनों ही 1937 में रूस में मार डाले गए थे। शायद एम एन राय का भी यही हश्र होता, यदि वे किसी तरह भागकर भारत नहीं आ गए होते। ये सभी कम्युनिस्ट रूस के साथ मिलकर भारत की राजनीतिक मुक्ति और समाजवाद के प्रचार में लगे थे। अबनी मुखर्जी के पिता त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती की क्या दुर्दशा हुई पूर्वी पकिस्तान में! पूर्वी पकिस्तान में वे बस एक हिन्दू के रूप में ही देखे गए।

देश के लोगों को आज अपने शहीदों के सपनों को याद दिलाने की जरुरत है। इस दिशा में सबसे पहले जरुरी है कि यह बताया जाए कि क्रान्तिकारी हिंसक मार्ग पर चलने वाले वाले मतवाले लोग नहीं थे बल्कि वे एक राजनीतिक धारा का प्रतिनिधित्व करते थे जो लड़कर अपनी आजादी लेना चाहते थे। याद रहे कि जब चन्द्रशेखर आजाद ने जवाहरलाल नेहरु के मुँह से क्रान्तिकारियों के लिए ‘फासिस्ट ‘ शब्द सुना तो उन्हें बहुत पीड़ा हुई। यशपाल ने लिखा है –“नेहरु जी ने आजाद की बातों में फासिज्म की गन्ध कैसे पायी, यह समझा नहीं जा सकता।”

उस समय से लेकर आज तक क्रान्तिकारियों के राजनीतिक दर्शन पर ठीक से सोचना चाहिए। वे हिंसावादी नहीं थे। वे देश के लोगों को विश्व के अन्य आजाद देश के लोगों की तरह आगे बढ़ते हुए देखना चाहते थे। उनकी मूर्तियों पर माला चढ़ाने से ज्यादा जरूरी है देश के लोगों की बेहतरी के लिए सोचना। जाति, धर्म और क्षेत्रीय संकीर्णताओं से बजबजाते देश के लिए खुदीराम, बिस्मिल और भगत सिंह हँसते हँसते फाँसी की बलिवेदी पर नहीं चढ़े थे

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