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मैं कहता आँखन देखी

निर्मला सीतारमण का परिवार प्याज-लहसून नहीं खाता

  • नवल किशोर कुमार

मामला 4 दिसंबर का है। लोकसभा में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुछ ऐसा कहा है, जिससे आप सोच में पड़ जाएंगे कि वह देश की वित्त मंत्री हैं या फिर केवल एक गृहणी। एक ऐसी गृहणी, जिसे केवल अपने घर की चिंता है। उनके बच्चे भर-पेट खा लें, उनके पति खा लें और जो थोड़ा बहुत बचे, उससे खुद संतुष्ट हो जाएं। सचमुच कुछ ऐसा ही कहा है निर्मला सीतारमण ने। बढ़ती महंगाई और आर्थिक मारामारी के माहौल में उनका यह बयान साबित करने के लिए काफी है कि मौजूदा हालात को काबू में लाना तो छोड़िए, नरेंद्र मोदी सरकार समझने में भी अक्षम है।

दरअसल, एनसीसी सांसद सुप्रिया सुले ने कल एक सवाल रखा। उनके सवाल के दो हिस्से थे। पहला सवाल था कि मुदा लोन में एनपीए 53 फीसदी कैसे हो गई और सरकार ने नियंत्रण क्यों नहीं रखा। प्रश्न के इस अंश में ही उन्होंने यह भी जानना चाहा कि आखिर वे कौन हैं, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है, जिन्होंने मुद्रा लोन लिया और अब वापस नहीं कर रहे हैं। सरकार को यह हिसाब संसद में रखना चाहिए। सुप्रिया सुले के प्रश्न का दूसरा हिस्सा प्याज से जुड़ा था। उनका सीधा सवाल था कि प्याज कम क्यों पड़ गए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारत में प्याज की खेती करने वाले किसान बड़े भूधारी किसान नहीं होते हैं। वे छोटी जोत वाले किसान होते हैं। जब भारतीय किसान प्याज उपजाते हैं तब उन्हें जो कीमत मिलती है, वह इतनी भी नहीं होती है जिससे लागत की भरपाई हो सके। करोड़ों टन प्याज बर्बाद हो जाते हैं। फिर यह नजारा सामने आता है कि प्याज की कीमत आसमान छूने लगती है।

जाहिर तौर पर सुप्रिया सुले का इशारा जमाखोर व्यापारियों पर था। वह यह जानना चाहती थीं कि सरकार ने जमाखोरों के खिलाफ कोई कार्रवाई की है या नहीं। लेकिन उनके सवालों के जवाब में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो कहा वह चौंकाने वाला है।

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उन्होंने शुरूआत में ही (किसी अन्य सांसद के टोकने पर) गर्व से कहा कि वह लहसून-प्याज नहीं समझती हैं। वे जिस परिवार से आती हैं, उसके सदस्य लहसून और प्याज नहीं खाते। इस प्रकार केंद्रीय वित्त मंत्री ने पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया।

अब सवाल उठता है कि उनका परिवार क्या है और कैसा है उनका परिवार?

एक केंद्रीय मंत्री का परिवार क्या केवल उसके अपने परिजनों तक सीमित है? क्या केंद्रीय मंत्री की जिम्मेदारियों में देश के सभी परिवारों के प्रति जवाबदेही शामिल नहीं होती है? जिस परिवार की बात वह कह रही हैं, वह ब्राह्मणवादी परिवारों में होता है। वे लहसून-प्याज नहीं खाते। मांस और मदिरा को तो छूते तक नहीं। बिलकुल शाकाहारी और शुद्ध। लेकिन जो ऐसे होते हैं, वह इसका भी दावा करते हैं कि धरती पर रहने वाले सभी उनके परिजन हैं। वसुधैव कुटुम्बकम्। फिर वह चाहे इंसान हो या फिर कोई पशु-पक्षी। कायदे से सभी इस कुटुम्ब का सदस्य माना जाना चाहिए।

लेकिन जिस गर्वानुभूति के साथ निर्मला सीतारमण ने इसकी उद्घोषणा की कि उनके परिवार में कोई लहसून-प्याज नहीं खाता, वह ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्व को बनाए रखने का समर्थक है।

सवाल यह है कि ऐसे परिवारों में प्याज क्यों त्याज्य है?

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ब्राह्मणवादी लहसून और प्याज को इसलिए त्याज्य मानते हैं क्योंकि इनकी गंध तीखी होती है। उनकी मान्यता यह भी है कि इनकी तासीर गर्म होती है। तासीर गर्म होने का एक आशय यह भी है कि यह एक खास हार्मोन को सक्रिय कर देता है जो शरीर में ऊर्जा का संचार करता है। कुछ लोग लहसून और प्याज को यौन शक्ति वर्द्धक भी मानते हैं।

दूसरी ओर, लहसून और प्याज उनके लिए महत्वपूर्ण है जो श्रमिक परंपरा से आते हैं। नून, प्याज और रोटी खाकर खेत में काम करने वाले मजदूर समझ सकते हैं कि प्याज का महत्व क्या है। गरीब परिवारों में बच्चों को जब सर्दी लगती है तब माताएं सरसों तेल में लहसून भूनकर उन्हें खिलाती हैं और तेल से उनके शरीर पर मालिश करती हैं। ऐसा करते समय उन्हें तीखी गंध परेशान नहीं करती है।

बहरहाल, निर्मला सीतारमण इसे कैसे समझ सकती हैं कि लहसून और प्याज का महत्व क्या है। वह महज एक घर की गृहणी हैं और उनका परिवार लहसून-प्याज नहीं खाता है।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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