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ब्राण्ड योगी
जन गण मन

ब्राण्ड योगी : भारतीय राजनीति का भविष्य!

 

पिछले दिनों सम्पन्न पाँच राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मणिपुर, गोवा और पंजाब के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। पहले चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारों की वापसी हुई है। इनमें से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की जीत विशेष रूप से उल्लेखनीय है।  वह दूरगामी महत्व की है और नए राजनीतिक प्रतिमान स्थापित करने वाली है। उत्तर प्रदेश से लोकसभा के लिए 80 सांसद चुने जाते हैं। यह अकारण नहीं कहा जाता कि केंद्र में सरकार बनाने का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। विधान सभा चुनाव-2022 के परिणामों ने न सिर्फ लोकसभा चुनाव-2024 के परिणामों की पूर्वपीठिका तैयार कर दी है; बल्कि प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकार सम्बन्धी प्रश्न का भी सुनिश्चित जवाब दे दिया है।

कोरोना की तीसरी लहर के तुरन्त बाद जून-जुलाई में हुए भारतीय जनता पार्टी के आंतरिक सर्वे में मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा की हालत बहुत खराब दिखायी गयी थी। योगी के बढ़ते कद से असुरक्षित और आशंकित पार्टी की एक लॉबी इसी सर्वे की आड़ में उन्हें पदच्युत करना चाहती थी। मीडिया का भी एक बड़ा हिस्सा यही राग अलाप रहा था। परिणामस्वरूप उत्तराखण्ड, गुजरात और कर्नाटक आदि राज्यों में धड़ाधड़ नेतृत्व परिवर्तन किया भी गया। लेकिन योगी संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आश्वस्त करते हुए अपने काम के बल पर चुनावी जीत दिलाने का वायदा करके अपनी कुर्सी बचा ले गये। अंततः चुनाव परिणामों ने भी उनके विश्वास और विकास को मोहरबंद कर दिया।

सत्ता विरोधी रुझान भारतीय लोकतन्त्र का एक अनिवार्य अभिलक्षण है। जो नेता या दल सरकार में होता है, उससे असंतुष्टि या आक्रोश स्वाभाविक है। सबको संतुष्ट करना असम्भव कार्य होता है। यह असंतुष्ट वर्ग सरकार द्वारा किये गए कामों और निर्णयों को अपर्याप्त मानते हुए उसकी खिलाफत के लिए लामबंद होता है। सत्तारूढ़ दल या नेता से यही असंतुष्टि सत्ता विरोधी रुझान कही जाती है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात, शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश और रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में इस सत्ता विरोधी रुझान की अवधारणा को ख़ारिज करते हुए उसका सफल प्रबन्धन किया। उन्होंने इसके बरक्स सत्ता समर्थक रुझान की सर्वथा नयी अवधारणा का सूत्रपात करते हुए लगातार चुनावी जीत दर्ज कीं। भारतीय राजनीति में यह अभूतपूर्व उपलब्धि थी।

इससे पहले केंद्र में कांग्रेस पार्टी और पश्चिम बंगाल में वामपंथी गठबन्धन ने भी बारम्बार चुनावी जीत दर्ज की थी, लेकिन सत्ता समर्थक रुझान के सूत्रपात का श्रेय भाजपा के मुख्यमंत्रियों को ही दिया जाता है। संभवतः इसकी वजह यह है कि कांग्रेस और वामपंथी गठबन्धन की जीत में “सरकार से संतुष्टि” से ज्यादा “विकल्पहीनता” का तत्व सक्रिय रहता था। उत्तर प्रदेश में लगभग 38 साल बाद सत्तारूढ़ पार्टी ने लगातार दूसरी बार चुनाव जीता है। इसीप्रकार लगभग 70 साल बाद योगीजी 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा करके दूसरी बार मुख्यमन्त्री बनने वाले नेता बने हैं। यह विशिष्ट कीर्तिमान है। इसके अलावा योगीजी ने ‘नोएडा के अभिशाप’ को भी गलत साबित कर दिया है। 1989 से उप्र की राजनीति में यह धारणा घर की हुई थी कि जो भी मुख्यमन्त्री नोएडा जायेगा उसकी कुर्सी चली जाएगी। योगी आदित्यनाथ इस मिथ्या धारणा  को झुठलाते हुए कई बार नोएडा जाकर भी न सिर्फ मुख्यमन्त्री बने हैं ; बल्कि पहले से भी कहीं अधिक मजबूती और भरोसे के साथ सत्तारूढ़ हुए हैं।

सत्ता विरोधी रुझान, किसान आन्दोलन से उपजी नाराजगी और विरोध, कोरोना आपदा के तथाकथित कु-प्रबन्धन, पार्टी की आंतरिक गुटबाजी और असहयोग, ओमप्रकाश राजभर, स्वामीप्रसाद मौर्या, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी जैसे पिछड़ी जाति के नेताओं का पलायन और ब्राह्मण समाज की मीडियाघोषित नाराजगी आदि तमाम कारणों को धता बताते हुए हासिल की गयी यह ऐतिहासिक जीत विशिष्ट विश्लेषण की माँग करती है। दरअसल, जब यह सब बताया-दिखाया जा रहा था; ठीक तभी उत्तरप्रदेश की मूकनायक जनता के मन-मस्तिष्क में ब्राण्ड योगी आकार ले रहा था। यह चुनाव परिणाम इन “मूकनायकों की मौन-क्रांति” है।

दरअसल, उत्तरप्रदेश का मतदाता जातिवादी और परिवारवादी राजनीति से ऊब चुका है। भ्रष्टाचार और अपराध इस राजनीति की अपरिहार्य फलश्रुति रही है। इन जातिवादी और परिवारवादी दलों ने सामाजिक-न्याय की आड़ में सामन्तवादी राजनीति करते हुए भ्रष्टाचार और अपराध को प्रश्रय देने के अभूतपूर्व कीर्तिमान बनाये हैं। सेक्युलरिज्म की आड़ में धर्म विशेष के लोगों का तुष्टिकरण भारतीय राजनीति का सार्वभौम तत्व है। उप्र भी उसका अपवाद नहीं है और तुष्टिकरण और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला रहा है। सबके वोट लेकर जाति विशेष और धर्म विशेष के लोगों को सत्ता सुख देना पूर्ववर्ती राजनीति का अनिवार्य तत्व था। योगी आदित्यनाथ ने सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की नीति पर काम किया।

उन्होंने भ्रष्टाचार और अपराध पर जबर्दस्त कुठाराघात किया और ‘बुलडोजर बाबा’ की संज्ञा पायी। वर्षों बाद प्रदेश में कानून-व्यवस्था की बहाली से अपराधियों में सरकार-शासन की दहशत पैदा हुई। बाबा जी की ‘ठोको नीति’ ने प्रदेश में अमन-चैन कायम किया और आमजन को अपना मुरीद बना लिया।  इसीप्रकार केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन ने योगी को अभूतपूर्व लोकप्रियता दी। मुफ्त राशन योजना, किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना, प्रधानमन्त्री आवास योजना, प्रधानमन्त्री शौचालय योजना जैसी आम आदमी के जीवन को गुणवत्तापूर्ण बनाने वाली तमाम योजनाओं की पारदर्शिता और वास्तविक लाभार्थी तक पहुँच ने समाज के दीन-दुखी और वंचित वर्गों को योगी के पक्ष में लामबंद किया।

उल्लेखनीय है कि यही वर्ग सर्वाधिक मतदान भी करता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन आख़िरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति की कल्याणकामना से अभिप्रेरित था। योगी ने उपरोक्त कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के माध्यम से इस दर्शन को साकार किया और उनके नेतृत्व में उप्र ने एक कल्याणकारी राज्य की पहचान बनायी।  परिणामस्वरूप जनता ने उन्हें भरपूर प्यार और समर्थन का प्रतिदान दिया। समर्थन को मतदान में बदलने में बूथ स्तर के सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ताओं की निर्णायक भूमिका होती है। श्री अमित शाह और श्री सुनील बंसल द्वारा खड़े किए गए मजबूत संगठन के सामने विपक्ष का संगठन रेत का किला साबित हुआ जो योगी की आँधी में सहज धराशायी हो गया।

सत्ता वापसी के निहितार्थ

योगी के नेतृत्व में मिली इस चुनावी जीत के गहरे निहितार्थ हैं। अब भारतीय राजनीति मंडल और कमंडल जैसे 30 साल पुराने मुद्दों की केंचुल को तजकर ‘कल्याणकारी’ हो रही है। यह शुभकर है कि आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर भारतीय लोकतन्त्र के केंद्र में जनता प्रतिष्ठापित हो रही है। अब भारतीय लोकतन्त्र सच्चे अर्थों में जनता का, जनता के लिए जनता द्वारा शासन बनने की ओर अग्रसर है। कल्याणकारी नीतियों के कार्यान्वयन और सुशासन की रेसिपी में हिंदुत्व का मद्धम तड़का लगाकर योगी ने भारतीय राजनीति का आस्वाद बदल दिया है। यह चुनाव परिणाम आम जनता के लिए इसलिए भी आश्वस्तिकारी है, क्योंकि इसने प्रधानमन्त्री मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में योगी को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित कर दिया है।

अत्यंत मजबूत इरादों वाले लोकोपकारक सन्यासी-नेता की छवि ने एक नए राजनीतिक ब्राण्ड “योगी ब्राण्ड” का निर्माण किया है। योगी ब्राण्ड आने वाले लोकसभा चुनावों में मोदी ब्राण्ड का संपूरक और सहयोगी साबित होगा। इस चुनावी जीत के बाद भले ही योगी मोदी के बाद निर्विवाद नंबर-2 नेता बन गए हैं; लेकिन उन्हें अपनी राजनीतिक शैली में अपने बढ़ते कद के अनुरूप संशोधन/परिवर्द्धन करने की भी आवश्यकता होगी। भाषा और व्यवहार में संयम बड़े नेताओं की पहचान होती है।

निश्चय ही, योगी अब एक बड़े नेता हैं। उनके खुद के जीवन में जैसी सादगी और शुचिता है, वैसी ही उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों और नौकरशाहों के जीवन में भी होनी चाहिए। इससे उनकी छवि में चार चाँद लगेंगे। भ्रष्टाचारी, परिवारवादी और अपराधी किसी भी जाति, धर्म या दल के हों, उन्हें हाशिये पर रखना उनकी केन्द्रीय प्रतिज्ञा होनी चाहिए। चुनावी राजनीति की बाध्यताओं के नाम पर किये जाने वाले समझौतों से बचकर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अन्त्योदय दर्शन’ को अपनाकर ही वे देश को नयी दिशा दे सकते हैं। अन्त्योदय ही भारतोदय की कुंजी है। योगी जी को सचेत और सावधान रहना होगा कि कल्याणकारी नीतियों और मुफ्तखोरी की राजनीति के बीच बहुत बारीक रेखा होती है। तमिलनाडु के द्रविड़ दलों (डी एम के और ए आई डी एम के) और दिल्ली की आम आदमी पार्टी की ‘मुफ्तखोरी’ की राजनीति श्रेयस्कर नहीं। योगी अपनी कल्याणकारी नीतियों को मुफ्तखोरी की राजनीति का प्रतिरूप न बनने दें।

आज भारतीय लोकतन्त्र पूंजीपतियों और अपराधियों की गिरफ़्त में छटपटा रहा है। उप्र की नवगठित विधानसभा से लेकर देश की संसद तक धनपशुओं और अपराधियों का बोलबाला है। ज्यादातर कुर्सियों पर रंगे सियार या सफ़ेद बगुले बैठे हैं। कारपेटी और कॉर्पोरेटी संस्कृति भारतीय राजनीति का वर्तमान है। भारतीय लोकतन्त्र को ऐसे तत्वों और वी.आई.पी. कल्चर से मुक्ति दिलाना ब्राण्ड योगी की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। उन्हें घनघोर कलयुग में रामराज्य की संस्थापना का लक्ष्य-संधान करना है। जनाकांक्षाओं से उद्भूत इस यूटोपिया का क्रियान्वयन योगी की असली अग्नि-परीक्षा होगी। यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि वे राजनीतिक बाध्यताओं के कलयुगी तिलिस्म को कैसे और कितना तोड़ पाएंगे!

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14Jun
उत्तरप्रदेश

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