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और कितने टुकड़े
पुस्तक-समीक्षा

“और कितने टुकड़े”

 

 टुकड़ों में तकसीम होने का अर्थ है-बिखर जाना। बिखर जाने जा मतलब है वजूद का नष्ट हो जाना। विक्रम सिंह के कथा- संग्रह “और कितने टुकड़े” को संवेदनहीनता में आकंठ डूबे और अपनी ही कमजोर सोच के कारण हारे हुए लोगों को आईना दिखाने का एक सफल प्रयास कहा जा सकता है। इंसानियत की सूखती बेल और रिश्तों के मुरझाते पौधे भले कथा – कहानियों को पूरी ताकत से पीछे धकेलने में लगे हों, पर कहानियों की तो सिफत ही होती है आत्म-विश्लेषण की ताकीद करना। अतीत में झांकते हुए वर्तमान संवारने का परामर्श देना।

 “कीड़े ” हमारे सामाजिक और पारिवारिक हालातों का प्रतीक है। एक ही परिवार के कई-कई सदस्य घर छोड़कर अलग-अलग दिशाओं में रोजी-रोटी की तलाश में निकल पड़ते हैं। कुछ स्थितियों में जहां तम्बू गाड़ते हैं, वहीं के होकर रह जाते हैं। अपना-अपना दुख ढोते हुए, अपने-अपने हिस्से का सुख भोगते हुए। अपनी तकदीरी खोल में जीने को अभिशप्त। अपने आपको अपनी स्थितियों के बरक्स रखकर ही कुछ भी सोचते या करते है। कोई जीवन भर बंगाल में नौकरी करके भी पंजाब के अपने पैतृक गांव में घर बनाने की सोचकर भीतर ही भीतर पुलकित होता है तो कोई इसे उसकी बेवकूफी का नाम देते हुए ठहाके लगा लेता है। जो लोग बदलते माहौल में अपनी जड़ें भूल रहे हैं, उनके कान खींचने का काम कर सकती है यह कहानी। कान में घुसने वाले कीड़े कोयम्बटूर में भी अपना काम कर सकते हैं और करनाल, कोहिमा में भी।

दरअसल, मानव मन में चल रहे आंधी-तूफान को शब्दों की शक्ल देना कोई आसान काम नहीं होता। लेखक की सबसे बड़ी पूंजी होती है उसका संवेदनशील मन। विक्रम सिंह इस पूंजी से महरूम नहीं, वरना इन कहानियों का प्रजनन ही संभव नहीं होता। गांव घरों से और शहर-मुहल्लों से बनते हैं। एक जगह का आदमी रोजी-रोटी की तलाश में दूसरी जगह चला जाता है। दूसरी का तीसरी और तीसरी का चौथी जगह आना-जाना चलता रहता है। जिस जगह से पहला खाली हाथ लौट जाता है, दूसरे को वहां बहुत कुछ मिल जाता है। दूसरा जहां असफल हो जाता है, तीसरे के लिए वहीं साम्राज्य स्थापना की सम्भावना निकल आती है।

 मगर सबको एक चीज़ ज्यादा या कम जरूर मिलती है- तकदीर, अच्छी या बुरी, ‘सजा ‘ में उन मासूम लोगों का चित्रण है, जिन्होंने अनजाने में निष्कपटता और जरूरतों के मिट्टी-गारे से एक मिनी हिंदुस्तान का टाउनशिप बसा देते हैं और जो बिहार, बंगाल से लेकर अंडमान निकोबार और पांडिचेरी तक परिलक्षित है। साथ रहते-रहते पनपता है भाईचारा। अंकुरता है दो दिलों के बीच प्रेम का बीज और यहीं से बदलने लगते हैं परिदृश्य। देश – विदेश में घटने वाली घटनाएं चाहे वो तकनीकि विकास से जुड़ीं हो या धर्म के धंधे अथवा नस्लवाद के कैंसर से, सबको प्रभावित करती हैं रिश्तों और वजूद समेत। मुस्लिम लड़का बुलबुल और हिन्दू लड़की मोम की प्रेमकथा में समाज की विसंगतियों और परिस्थितियों का सुपर क्लोज-अप लिया गया है। प्रेमपुष्प खिलाने का काम करते हैं प्रेमी मगर उन्हें जड़ से उखाड़ने का तुष्ट कर्म सम्पन्न करते हैं, मनचढ़े मुल्ले और पगलाए पंडित। कलमकार समाज के नंगे सच की तरफ बार-बार इशारा करते रहते हैं, मगर विडंबना है कि उस पर कपड़े डालने की जिम्मेदारी किसकी है, अभी तक तय नहीं हो पाया।

 विक्रम सिंह की इस कहानी में मोहब्बत उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरती हुई अंत में उसी मजहबी ताबूत में समा जाती है, जिस पर टंगी तख्ती पर लिखा है “सजा-ए-मोहब्बत”। लेखक अपनी तरफ से उसके नीचे कुछ शब्द और टांक देता है “यह सजा किस गुनाह की? प्यार करने की या मुस्लिम होने की”? यहीं यह साबित भी हो जाता है कि एक लेखक के चश्मे में ईमानदारी और निष्पक्षता के लेंस लगे होते हैं। 

‘चक्रव्यूह’ आदमी के सपनों को अवसरवादियों द्वारा फांसी लगा देने के षड़यंत्र की दास्तान है। एक आम आदमी छोटी-छोटी हसरतें पालता है, मगर उसके लिए उसे मुश्किलों की दुर्गम घाटियों और विरोध के दुरूह दर्रों से गुजरना पड़ता है। सपने अन्ततः आदमी को दुश्वारों के चक्रव्यूह में फंसा ही देते हैं। “चक्रव्यूह” अपनी अंतर्दृष्टि का कैमरा उन शातिरों पर भी फोकस करता है, जो लोगों के सपनों से खेलते हुए अपनी जेबें भरते हैं और उन्हें किसी पेड़ से लटकता हुआ छोड़कर किसी और खुशनुमा पड़ाव की तरफ बढ़ जाते हैं। आदमी को मालदार बनाने का उद्घोष करते हुए, उनका माल समेटते हुए फायनांस कंपनियां कब रूपोश हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता। चिटफंड कम्पनियों की कारगुजारियों का अच्छा चित्रण किया है  कथा कार ने।

‘ गणित का पंडित’ कहानी का लब्बोलुआब यही है कि पढ़े-लिखे और मेधावी लोग इस देश में थक-हारकर उदास चेहरे लिए उनलोगों के ही सामने दयनीय अवस्था में उठ खड़े होते हैं, जो कभी फिसड्डी माने जाते थे, मगर आज कामयाबी के मामले में जो सबसे आगे हैं। कुल मिलाकर इस कहानी में लेखक स्व-अर्जित अनुभव से इस सच को स्थापित करता है कि आइएएस अफसर की तकदीर सातवीं फेल मिनिस्टर लिखता है। 

“कोलम्बस एक प्रेमकथा” यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि आदमी चाहे, कितनी भी बड़ी उपलब्धि हासिल कर ले, यह जरूरी नहीं कि वो विजयी ही हो। जिन्दगी बड़े-बड़े विजेताओं को भी पराजय की हथकड़ी पहना देती है। श्याम और मेघना एक दूसरे से प्यार जरूर करते हैं, पर एक बेरोजगार युवक को कोई अपनी बेटी क्यों सौंपे? मेघना की शादी किसी और से हो जाती है। श्याम आइएएस कर लेता है। श्याम के मन में वो मेघना बसी है, जिसकी अपनी ससुराल में किसी से नहीं बनती। वो अपने पति को तलाक देकर श्याम से शादी करना चाहती है, इसलिए नहीं कि वो उसका पहला प्यार है, बल्कि इसलिए कि उस पर एक आइएएस अफसर की पत्नी बनने की सनक सवार है। 

श्याम को लगता है कि उसे छोड़कर चली जाने वाली मेघना अंततः उसके पास आने को लालायित है, लाचार है और इसी में उसकी जीत है। जीत के मद में दोनों हैं पर सच यही है कि दोनों ही अपनी-अपनी सोच के युद्धबंदी हैं। जिन्दगी गोल- गोल घूमती नहीं, आदमी को घुमाती भी है और मगरूर आदमी इस भ्रम में जीता है कि वो अपने नाम की अमिट लकीरें खींच रहा है। 

‘पावर, पैसा और परिवार ‘ सम्पन्नता के बावजूद आदमी की विपन्नता पर रोशनी डालता है। पावर और पैसे के आगे परिवार आज नगण्य हो गया है। आदमी न ईमानदार रहा, न वफादार। सर्वसम्पन्न व्यक्ति भी आज अपने साथी से वफ़ा नहीं कर पाता, मगर साथी के बेवफा हो जाने पर उसे माफ करने की उदारता भी नहीं दिखा पाता। कथा नायक पर जब अपनी पत्नी की पंक्तियां” आप तो बूढ़े माँ-बाप का घर छोड़कर चले गए। अगर मैं भी चली गयी तो इन्हें कौन देखेगा? “उसके जमीर और फर्ज़ अदायगी पर चाबुक फटकारती है। उसे अपना परिवार पावर और पैसे से कहीं ऊपर नजर आने लगता है। 

‘ सांप-सीढ़ी’, गुल्लू उर्फ उल्लू’, नैनो प्लांट, ‘पसंद-नापसंद’ के जरिए लेखक की बोधक्षमता उजागर होती है। उन्होने एक संवेदनशील मन पाया है और जीवन के हर खट्टे-मीठे अनुभव से कुछ सीखने और उसे सहेजने का हुनर हासिल किया है। दूसरों के दुखदर्द को अभिव्यक्त करने की क्षमता ही आदमी को लेखक या कवि बनाती है। शब्दों के जरिए आदमी को चेतानेवाला बौद्धिक चौकीदार होता है – कलमकार। 

अंत में उस कहानी की बारी आती है, जो कथा-संग्रह का शीर्षक भी है यानी “और कितने  टुकड़े । “लेखक हमें हर तरफ घुमाने के बाद इस बार पंजाब की तरफ ले जाता है और एक चिर प्रश्न से रू-ब-रू कराता है। वो प्रश्न है “और कितने टुकड़े?” यह पंजाब में खलिस्तान की मांग को लेकर चल रहे दिग्भ्रमित उग्रवाद के दुष्प्रभाव की कथा है। लेखक शब्द चित्र दिखाकर यह साबित करना चाहता है कि उग्रवाद या आतंकवाद मानवता विरोधी विचारधारा है, किसी का समर्थक, संरक्षक या शुभचिंतक नहीं। यह जिनके कंधों की मदद लेकर खुद को खड़ा करता है, उन्हें ही मुंह के बल गिराता है। एक बार दमित हो चुकने के बाद फिर से खालिस्तानी बिच्छू रेंगने लगे हैं।

लेखक बदलाव का पहाड़ भले न तोड़ पाए पर छैनी-हथौड़ा तो जरूर चला सकता है, जो कम से कम उसमें दरार तो पैदा कर दे। लोगों को झकझोरने और सोचने को विवश कर दे। कथा-कहानियों का उद्देश्य ही होता है बेतहाशा दौड़ रहे आदमी को दो पल के लिए रोककर सुस्ताने की सलाह देना और सकारात्मकता की ओर मोड़ देना। अगर आपमें दूसरों का दर्द सहन करने की सलाहियत हो, मन में संवेदनाओं की लहरें उठती हों, अन्याय विचलित करता हो, कहानी एक पौष्टिक आहार की तरह रुचती हो तो इसे जरूर पढ़िए और इस सवाल को कुछ और लोगों की तरफ जरूर उछालिए कि “और कितने टुकड़े?” 

प्रकाशक – के. एल. पंचोरी प्रकाशन
मूल्य हार्ड बॉन्ड -₹ 375.00
पृष्ठ संख्या 159

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