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एतिहासिक

‘9 अगस्त 1942 – अँग्रेजों, भारत छोडो!’ : स्वराज के लिए ‘जनक्रान्ति’ की अठहत्तरवीं जयंती 

 

यह सर्वविदित है कि भारत दो सौ बरस तक ब्रिटेन के अधीन रहा और भारत के लोगों को अँग्रेजी राज से अपनी आज़ादी हासिल करने के लिए 1857 से 1947 तक लम्बा अभियान चलाना पड़ा। लेकिन विदेशी राज से मुक्ति के सात दशकों बाद बहुत कम लोगों को स्मरण है कि भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के पूरे इतिहास में 9 अगस्त, 1942 का अत्यधिक महत्व है और 9 अगस्त 1942 से चले ‘अँग्रेजों, भारत छोडो’ आन्दोलन का देश की आज़ादी में अनुपम योगदान है। वैसे भारत में हर साल 15 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस का उत्सव मनाया जाता है लेकिन स्वतन्त्रता संग्राम की दृष्टि से 9 अगस्त का असाधारण स्थान है। स्वतन्त्रता सेनानी और समाजवादी चिन्तक डॉ. राममनोहर लोहिया ने लिखा भी है कि ‘9 अगस्त जन-दिवस है। कोई एक दिन ऐसा जरुर आएगा जब 9 अगस्त के आगे 15 अगस्त फीका पड़ेगा और हिन्दुस्तान अमरीका और फ़्रांस के 4 और 14 जुलाई, जो जन-दिवस है, की तरह 9 अगस्त को मनाएंगे।’

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स्वराज के लिए 1921 से आन्दोलनरत भारतीयों ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के मंच से 8 अगस्त 1942 को प्रस्ताव पारित करके ब्रिटेन से माँग की थी कि द्वितीय विश्वयुद्ध में नात्सी और फाशिस्ट ताकतों के गंठजोड़ को पराजित करने के लिए और जापान से चीन और भारत को बचाने के लिए देश को पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए। अन्यथा भारत को गुलाम रखते हुए अँग्रेजों का स्वतन्त्रता और मानवता की रक्षा के लिए युद्ध करने का दावा खोखला बना रहेगा। बम्बई के ऐतिहासिक गवालिया टैंक मैदान में आयोजित अखिल भारतीय काँग्रेस महासमिति की बैठक में इस आन्दोलन का प्रस्ताव 8 अगस्त को जवाहरलाल नेहरु ने रखा और सरदार पटेल ने इसका समर्थन किया। इसके बाद गाँधीजी का  ऐतिहासिक भाषण हुआ। सरदार पटेल इस बैठक के पहले 26 जुलाई को अहमदाबाद आर 2 अगस्त को बम्बई में विशाल जनसभाओं को सम्बोधित कर चुके थे। उन्होंने 28 जुलाई को अहमदाबाद में विद्यार्थियों की एक सभा में यह भी कहा था कि यह गाँधीजी का यह  अन्तिम आन्दोलन होगा।Why Gandhi Did Not Select Sardar Patel India S First Prime ...

काँग्रेस के शिखर नेतृत्व में गाँधीजी के अतिरिक्त सरदार पटेल ‘भारत छोडो आन्दोलन’ के प्रति सबसे ज्यादा उत्साहित थे। गाँधी के प्रस्ताव को सोशलिस्टों का भी पूर्ण समर्थन मिला। सोशलिस्ट नेता युसूफ मेहर अली ने ही इस आन्दोलन के लिए ‘भारत छोडो’ (‘क्विट इण्डिया!’) का नाम सुझाया और गाँधीजी समेत सभी ने इसे सहर्ष अपना लिया। नरेंद्र देव और फरीदुल हक़ अंसारी जैसे सोशलिस्ट नेता तो शरू में ही कैद करके अहमदनगर किले में बाकी राष्ट्रीय नेताओं के साथ 1945 तक बन्द रखे गये। लोहिया 1944 तक आन्दोलन के संचालन में जुटे रहे। जयप्रकाश अपने सोशलिस्ट साथियों के साथ हजारीबाग जेल से फरार होकर दुबारा गिरफ्तार होने तक आन्दोलन के मार्गदर्शक बने रहे। अच्युत पटवर्धन और अरुणा असफ अली जैसे सोशलिस्ट स्वतन्त्रता सेनानी तो अन्त तक गिरफ्तार ही नहीं किये जा सके। दूसरी तरफ, मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग और सावरकर की हिन्दू महासभा के साथ अधिकांश देशी रियासतों के राजा और नवाब इस आन्दोलन के विरोधी थे।

जून, 1942 में सेवाग्राम में एक हफ्ता अगातार गाँधीजी से बातचीत करनेवाले पत्रकार लुइ फिशर ने लिखा है कि  अँग्रेजी राज की लगातार वायदाखिलाफी और ‘बाँटो और राज करो’ की नीति की निरन्तरता से निराश होकर गाँधीजी ने 72 बरस की उम्र में इसे स्वराज के लिए अपने जीवन-काल का अन्तिम सत्याग्रह बनाया। 9 अगस्त को ही गाँधीजी समेत पूरी काँग्रेस कार्यकारिणी समिति और प्रादेशिक स्तर तक के काँग्रेस नेतृत्व को नजरबन्द किये जाने के बाद अँग्रेज सरकार द्वारा गाँधीजी और काँग्रेस के खिलाफ ‘भारत छोडो आन्दोलन’ के दौरान देशभर में हिंसा और अराजकता फैलाने का आरोप देश-दुनिया में प्रचारित किया गया। इस असत्य से गाँधीजी बहुत आहत हुए। उन्होंने प्रतिवादस्वरूप 10 फरवरी ’43 से 3 मार्च ’43 तक उपवास किया। उनके साथ अस्वस्थता के बावजूद कस्तूरबा भी गिरफ्तार रहीं। इसी नजरबन्दी  में पहले गाँधीजी के 25 बरस से सहयोगी महादेव देसाई का 15 अगस्त ’42 को और फिर 22 फरवरी ’44 को कस्तूरबा का देहांत भी हुआ। गाँधीजी भी 21 माह तक नजरबन्दी के बाद ही 6 मई ’44 को बेहद अस्वस्थ दशा में रिहा किये गये। अँग्रेजों ने काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के लोगों को इस आन्दोलन का सबसे खतरनाक सूत्रधार माना।

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‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की निर्णय प्रक्रिया के चरमबिन्दु के बारे में डॉ. सुशीला नायर के प्रत्यक्षदर्शी विवरण में लिखा गया है कि ‘बापू पूरे दो घंटे एक सांस में बोले। अद्भुत भाषण था और बापू की वाणी में और दलीलों में अद्भुत शक्ति थी।’ गाँधीजी ने भी इस भाषण के बारे में बताया कि ‘जब मैं बोलने को उठा था, मैं नहीं जानता था कि मैं क्या कहने वाला हूँ। अब मेरी समझ में आ रहा है कि कल रात मैं क्यों नहीं सो सका। मेरे मन पर बोझ था कि इतना कहना है, कैसे कह पाऊंगा। मगर मैंने सोचा, अगर ईश्वर को मुझसे कुछ कहलाना होगा तो वह मेरी ज़बान खोल देगा, वरना मैं तो इस बात के लिए भी तैयार था कि सिर्फ यह कहकर बैठ जाऊं कि ‘मुझे कुछ सूझता नहीं, मैं आपसे क्या कहूँ?’। लेकिन ईश्वर ने मेरी जबान खोल दी।’ गाँधीजी ने अपने भाषण में तीन बातों को स्पष्टत: कहा – एक, यद्यपि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई है लेकिन उनके मन में ब्रिटिश लोगों के बारे में कोई नफरत नहीं है। दूसरे, काँग्रेसजनों के ह्रदय में जापान की सेनाओं के प्रति कोई सहानूभूति नहीं है क्योंकि उनकी विजय से चीन और सम्भवत: रूस के खात्मे का खतरा है। तीसरे, इस आन्दोलन में किसी भी हालत में अहिंसा को नहीं छोड़ना है और हिंसा का सर्वथा त्याग करना है।फेक क्रांतिकारी कन्हैया कुमार ने ...

इतिहासकार रामचन्द्र गुहा के अनुसार (‘गाँधी – द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड’ (2018), गाँधीजी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी की देशभर में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। लेकिन कहीं भी भीड़ द्वारा हथियारों के इस्तेमाल अथवा शासन से जुड़े व्यक्तियों को चोट पहुँचाने की घटना की जानकारी नहीं आई। लेकिन हर तरफ सरकारी दफ्तरों विशेषकर डाकघर, टेलीफोन, स्टेशन, कचहरी और सड़कों को क्षतिग्रस्त करने की ख़बरें आती रहीं। दिल्ली में बाजार बन्द रहे और विद्यार्थियों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया। अलग अलग क्षेत्रों में जुलूस निकाले गये। स्वतन्त्रता सेनानियों ने पुलिस के सख्त प्रबन्ध के बावजूद टाउनहाल के मुख्य भवन पर तिरंगा फहराया। दिल्ली में चले भारत छोड़ो आन्दोलन का दिलचस्प विस्तृत विवरण स्वतन्त्रता सेनानी और गाँधीजी के सहयोगी ब्रजकृष्ण चांदीवाला की ओर से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया है। बम्बई में पूर्वघोषित समय पर सोशलिस्ट नेता अरुणा आसफ अली से झंडा फहराकर पूरे शहर में उत्साह और प्रतिरोध की लहर दौड़ गयी। बम्बई में कई जुलूस निकले। कच्छ जगहों पर भीड़ ने स्थानीय ट्रेन, टेलीफों खम्भों, और सरकारी संपत्ति को क्षति भी पहुँचाई। महानगर के बाजार बन्द रहे। सभी स्कूल-कालेज बन्द कर दिए गये। इन गतिविधियों में विद्यार्थियों ने जादा सक्रियता दिखाई। पूना, अहमदाबाद, सूरत और अहमदनगर के विरोध प्रदर्शन कम उग्र थे।

बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रबल विरोध हुआ। सैकड़ों जगहों पर डाकघर, सार्वजनिक यातायात और सरकारी इमारतों को आक्रोश का निशाना बनाया गया। अदालतों का बहिष्कार किया गया। विद्यार्थियों ने विद्यालयों से जुलूस निकाले और सरकारी भवनों पर तिरंगा झंडा  लगाया। मिदनापुर में आन्दोलनकारियों ने जिला प्रशासन की जगह लोक-प्रशासन को स्थापित कर दिया। असम में बंगाल जैसे हालात थे। राज्य प्रशासन ने पूरे असम में धरा 144 लगाकर महिलाओं समेत सैकड़ों व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया। ओडिशा में अधिकांश राजनीतिक कार्यकर्ता शुरू में ही गिरफ्तार कर लिए गये। लेकिन विद्यार्थियों ने प्रतिरोध कार्यवाही की अगुवाई की। कोरापुट के आदिवासी इलाकों में सरकार के खिलाफ उग्र कार्यवाहियाँ की गयी।भारत छोड़ो आंदोलन ने अंग्रेज हुकूमत ...

दक्षिण भारत के आन्ध्र क्षेत्र में गुंटूर, बेल्लारी, कर्नूल, कृष्णा, गोदावरी और विशाखापत्तनम में रेल स्टेशन, पोस्ट आफिस, कचहरी और कालेजों में भीड़ द्वारा तोड़फोड़ की गयी। प्रशासन की तरफ से तेनाली, गुंटूर, और भीमावरम में गोली चलाई गयी। इससे तीस लोग शहीद हुए। कर्नाटक में बेलगाम, धारवाड़, गडग, बेंगलुरु, मैसूर, मंगलोर से लेकर बीजापुर, बेल्लारी, और सिरसी तक विद्यार्थियों द्वारा कक्षा बहिष्कार और प्रदर्शन सबसे उल्लेखनीय घटना थी। उदाहरण के लिए, 23 अक्टूबर को धारवाड़ में दो छात्राओं – शेनोलिकर और गुलावदी ने जिला कचहरी पर तिरंगा फहराया और जिलाधिकारी को बर्खास्त करने का निर्णय सुनाया। फिर पर्चे वितरित करते हुए निकल गयीं।

बिहार, संयुक्त प्रान्त और मध्य भारत में लम्बे अरसे तक आन्दोलन की सरगर्मी रही। संयुक्त प्रान्त के बनारस में एक बड़े जुलुस ने जिला कचहरी पहुँचकर तिरंगा फहराया और सरकारी कागजात की होली जलाई। विद्यार्थियों की उग्रता देखते हुए काशी विद्यापीठ पर सरकारी ताला लगा दिया गया और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को बन्द करके सेना का पहरा बैठा दिया गया। इससे बड़ी संख्या में विद्यार्थी अपने शिक्षकों के सहयोग से पूरे उत्तर भारत और मध्य भारत में फ़ैल गये और विभिन्न तरीकों से आन्दोलन को गतिशील बनाया। इसमें पटना, गाजीपुर और चौबेपुर में गोलीवर्षा में नौजवानों और किसानों की शहादत की स्मृतियाँ आजतक जागृत हैं। आन्दोलनकारियों द्वारा बलिया में जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान को गिरफ्तार करके एक स्वतन्त्रता सेनानी किसान नेता चित्तू पाण्डेय को प्रमुख बनाना और एक अरसे तक ‘जनता सरकार’ का शासन दिलचस्प प्रकरण रहा।

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अगस्त-क्रान्ति के दौरान हजारीबाग जेल में बन्द स्वतन्त्रता सेनानियों का सोशलिस्ट नेता जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में जेल से फरार होकर नेपाल के जंगलों में भारत छोड़ो आन्दोलन के सेनानियों को एकत्रित करना एवं  छापामार दस्तों का निर्माण बेहद रोमांचक घटना थी। अँग्रेज़ सरकार के इशारे पर नेपाल सरकार द्वारा जयप्रकाश, लोहिया और उनके साथियों को गिरफ्तार करना और फिर आज़ाद दस्ते द्वारा हनुमाननगर में पुलिस कैम्प पर हमला करके अपने नेताओं को छुडा लेने की घटना ने सभी आन्दोलनकारियों को बेहद मजबूती दी। जयप्रकाश, लोहिया, अच्युत पटवर्धन, रामनंदन मिश्र आदि के मार्गदर्शन में पूरे देश के अन्दर ‘भूमिगत’ गतिविधियों का असरदार ताना बाना बना। इन देशभक्त नेताओं ने जान हथेली पर रखकर रेडियो, बुलेटिन, पर्चों और पुस्तिकाओं का माध्यम इस्तेमाल करके आन्दोलन का उत्साह बनाए रखा। इससे एक बिलकुल नयी पीढ़ी का राष्ट्रीय आन्दोलन में असरदार योगदान सम्भव हुआ।भारत छोड़ो': देश का सबसे बड़ा आंदोलन ...

काँग्रेस सोशलिस्टों की तरफ से भारत की आज़ादी के लिए एक निर्णायक सिविल नाफरमानी आन्दोलन की जरुरत के बारे में गाँधीजी और काँग्रेस नेतृत्व से 1941 के अन्तिम महीनों से ही लगातार बातचीत चल रही थी। इसमें लोहिया की विशेष सक्रियता थी। इस बारे में लोहिया 29 अप्रैल को सेवाग्राम में गाँधीजी से मिले और तीन दिन तक संवाद जारी रहा। 19 अप्रैल 1942के ‘हरिजन’ में गाँधीजी ने  लोहिया का लिखा  ‘विश्वासघाती जापान या आत्मसंतुष्ट ब्रिटेन’ शीर्षक लेख भी छापा। इसी प्रसंग में समाजवादियों के कुल-प्रमुख आचार्य नरेन्द्रदेव विचार विमर्श के लिए जून, 1942 में सेवाग्राम भी गाँधीजी के पास रहे।  डॉ. लोहिया ने फिर कुछ ठोस सुझावों के साथ 29 जुलाई को गाँधी जी से मुलाक़ात की। जब काँग्रेस कार्यसमिति द्वारा भारत छोडो आन्दोलन का प्रस्ताव स्वीकारा गया तो  डॉ. लोहिया ने खुफिया पुलिस की लगातार कोशिशों के बावजूद 8 अगस्त ’42 से 20 मई ’44 तक बम्बई और कलकत्ता से लगातार इसका सक्रिय नेतृत्व किया। उन्होंने विचार पक्ष और प्रचार का जिम्मा संभाला। उनकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने इनाम भी घोषित किया। लेकिन लोहिया के प्रयास से बम्बई में स्थापित ‘काँग्रेस रेडियो’ ने 13 अगस्त से 14 नवम्बर ’42 तक के 94 दिनों में क्रान्ति का लगातार मार्गदर्शन किया। कलकत्ता के ‘काँग्रेस रेडियो’ ने भी प्रचार कार्य चलाया। ‘करेंगे या मरेंगे’ भूमिगत पत्रक की शुरुआत हुई।  

काँग्रेस सोशलिस्टों के प्रमुख नायक अच्युत पटवर्धन ने न सिर्फ काँग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में आन्दोलन के लिए लगातार गाँधी की दृष्टि का समर्थन किया बल्कि 9 अगस्त ’42 से भूमिगत रहते हुए महाराष्ट्र के एक बड़े इलाके में समानांतर सरकार चलाने की शुरुआत की। महाराष्ट्र के सतारा जिले में यह सरकार बहुत सफल रही। समानांतर सरकार ने जिले के प्रशासन पर कब्ज़ा कर लिया और आज़ादी के आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी बना। इससे गावों और कस्बों में ब्रिटिश प्रशासन पूरी तरह ध्वस्त हो गया। सतारा में समानांतर सरकार दो साल चली और अपनी बहादुरी, राजनीतिक कौशल और वैचारिक दृढ़ता के कारण अच्युत पटवर्धन जननायक हो गये। उनका नाम ‘सतारा के सिंह’ पड़ गया। अँग्रेज़ सरकार ने उन्हें सबसे बड़ा आतंकवादी घोषित कर उन्हें पकड़ने के लिए एक लाख रूपये का इनाम घोषित किया था। 8 August History On this day mahatma Gandhi started the Quit India ...

ब्रिटिश शासन के अपने सूत्रों के अनुसार, सिर्फ 9 अगस्त और दिसम्बर, 1942 के बीच ही ‘भारत छोडो आन्दोलन’ को दबाने के लिए सेना ने 68 जगहों पर और पुलिस ने 602 स्थानों पर आन्दोलनकारियों पर गोलीवर्षा की। सेना की गोलीबारी से 297 भारतीय शहीद हुए और 238 लोग घायल हुए। पुलिस की गोली का सामना करते हुए 763 आन्दोलनकारियों ने अपने को कुर्बान किया  और 1341 लोग घायल हुए। अँग्रेजों ने पाँच जगह हवाई जहाज़ों से प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ दागीं। 2562 आन्दोलनकारियों को कोड़ों की सजा दी गयी। शुरूआती 17 महीनों में ही 9,836 भारतीयों को गिरफ्तार भी किया गया। आन्दोलनकारियों की तरफ से ब्रिटिश शासन के किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कोई प्राणघातक हिंसा नहीं की गयी। लेकिन ब्रिटिश शासन व्यवस्था को ठप्प करने के लिए देशभर में 208 पुलिस थाने और 749 अन्य सरकारी इमारतें जरुर क्षतिग्रस्त की गयीं। बम-विस्फोट की 668 वारदातें हुईं। डाक-तार विभाग के 945 कार्यालय में भी तोड़-फोड़ हुई। 474 सड़कों पर आवागमन रुक गया। रेल के 382 स्टेशनों पर आन्दोलनकारियों ने धावा बोला। 268 रेल-डिब्बों में तोड़-फोड़ हुई। 411 स्थानों पर रेल की पटरियाँ उखाड़ दी  गयीं। रेल परिवहन में गंभीर बाधाओं की 66 घटनाएँ दर्ज की गयीं। संयुक्त प्रान्त, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र समेत कई प्रदेशों का प्रशासनिक इंतजाम बाढ़ग्रस्त हुआ। इस अवधि में सरकार की 27,35,115 रूपये की संपत्ति की और अन्य पक्षों की 30,07,274 रूपये की हानि हुई। सरकार की तरफ से 173 स्थानों पर सामूहिक जुर्माना लगाया गया और 90,07,382 रुपयों की जुर्माने के रूप में वसूली की गयी। (सूत्र: गृहविभाग, पोलिटिकल (1) फ़ैल संख्या 3/52/43। देखें (विवेकशक्ति (कानपुर), अगस्त, 2103)

इतिहासकारों के अनुसार, ‘9 अगस्त – अँग्रेजों, भारत छोडो!’ आन्दोलन में कुल मिलाकर देशभर में 40,000 स्त्री-पुरुष गिरफ्तार किये गये और इसकी गूँज बम्बई से लेकर मणिपुर और बनारस से लेकर बंगलौर तक हुई। इसने अगस्त 1942 से अप्रैल 1946 के बीच स्वतन्त्रता आन्दोलन की प्रक्रिया को एक नयी रफ़्तार दी। इससे अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के लिए निर्णायक दबाव पैदा हुआ और अन्तत: 15 अगस्त को दो सौ साल लम्बी ब्रिटिश गुलामी से स्वतन्त्रता मिली। अपने इतिहास के इस प्रकाश-स्तम्भ को राष्ट्र-निर्माण का मार्गदर्शक बनाए रखना हम सबकी साझी जिम्मेदारी है। ‘9 अगस्त – भारत छोड़ों आन्दोलन’ के अमर शहीदों को सादर नमन! इस आन्दोलन में अपने को आगे लाकर विदेशी राज को आखिरी धक्का देनेवाले महावीर स्त्री-पुरुषों का हार्दिक आभिनंदन! जय हिन्द! जय जगत!

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