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स्वामी सहजानन्द
एतिहासिक

स्वामी सहजानन्द सरस्वती, जमीन्दारी प्रथा और उनके समकालीन राष्ट्रीय नेतागण

 

 स्वामी सहजानन्द सरस्वती की पुण्यतिथि (26 जून) पर विशेष

आज महान स्वाधीनता सेनानी व क्रान्तिकारी किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती की पुण्यतिथि है। आज ही के दिन उनका निधन 1950 में 61 वर्ष की अवस्था मे हुआ था। जबसे किसानों का सवाल राजनीति के केंद्र में आता जा रहा है स्वामी सहजानंद के बारे में नए सिरे से दिलचस्पी जागी है। स्वामी सहजानंद सरस्वती की रचनाओं के अँग्रेज़ी में अनुवाद हो रहे हैं उनपर केंद्रित शोध पत्रों की संख्या बढ़ने लगी है। अमेरिका के वर्जीनिया विश्विद्यालय ने तो अपने अंडर ग्रेजुएट कोर्स में उनके संस्मरणों की किताब ‘मेरा जीवन संघर्ष’ को ही शामिल कर लिया है।

स्वामी सहजानन्द के साथ काम कर चुके चर्चित सीपीआई नेता त्रिवेणी शर्मा ‘सुधाकर’ ने स्वामी जी के निधन के पश्चात का एक दिलचस्प किस्सा सीताराम आश्रम, बिहटा 26 जून 2013 को सुनाया था। उस किस्से से, पता चलता है कि, स्वामी जी को लेकर स्वतंत्रता आन्दोलन के बड़े नेताओं का उनके प्रति कैसा दृष्टिकोण था? त्रिवेणी शर्मा’ सुधाकर’ अपने बचपन के दिनों में स्वामी जी के साथ सीताराम आश्रम में रह चुके थे। जैसा की उन्होंने खुद बताया था वे स्वामी जी के पैरों में कडुआ तेल (सरसों तेल) की मालिश किया करते थे।

सुधाकर जी ने अपने सम्बोधन में बताया था ” जब स्वामी जी का मुजफ्फरपुर में निधन हुआ, तब उनके शव को पटना के गाँधी मैदान, दर्शनार्थ, लाया गया। उस दिन बहुत बारिश हो रही थी। उसके बाद शव बिहटा ले आया गया। यहीं स्वामी जी को दंडी सन्यासी होने के कारण दफनाया गया।” सुधाकर जी ने आगे कहा ” उनके लिए एक स्मारक बनाने के बात तय हुई। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह को उस स्मारक समिति का अध्यक्ष बनाया गया। स्मारक बनने की बात ज्योंहि काँग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं को पता चली उसमें से दो महत्वपूर्ण नेता ने श्रीकृष्ण सिंह को पत्र लिखा कि श्री कृष्ण सिंह ये आप क्या कर रहे हैं? सहजानन्द के नाम पर बनने वाले जिस स्मारक के आप संयोजक बने हैं यह स्मारक कल को काँग्रेस की ही जड़ खोद देगा।” अंत मे सुधाकर जी ने उन नेताओं का नाम बताया ” ये दो नेता थे राजेन्द्र प्रसाद और सरदार पटेल”।

उसके बाद सभा में थोड़ी देर के लिए निःस्तब्धता छा गई थी। राजेन्द्र बाबू व सरदार पटेल ऐसा करेंगे? सहसा यकीन न हो रहा था।

राजेन्द्र प्रसाद और सरदार पटेल

राजेन्द्र बाबू से स्वामी जी का मतभेद बिहार में पहले भी कई बिंदुओं पर हुआ था। गया जिले के किसानों की स्थिति पर तैयार रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का मामला हो या 1937 में बनी श्रीकृष्ण सिंह के मुख्यमंत्रीत्व ( तब उस पद को प्रधानमंत्री कहा जाता था) में किसानों को लेकर जो लागू किये कानूनी प्रावधान। इन सबको लेकर उनके बीच गहरे मतभेद थे।

राजेन्द्र बाबू ने लेख लिखकर इन कानूनी प्रावधानों की भूरि-भूरि यह करते हुए किया कि किसानों पर केंद्रित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस द्वारा पारित ‘ फैजपुर प्रस्ताव’ को बिहार की काँग्रेस सरकार ने अक्षरशः लागू किया है। स्वामी सहजानन्द ने राजेन्द्र बाबू के दावों की पोल खोलते हुए अँग्रेज़ी में अपनी चर्चित पुस्तिका ‘ द अदर साइड ऑफ द शील्ड’ लिखी।

किसान आन्दोलन और स्वामी जी से काँग्रेस नेताओं की दूरी इतनी बढ़ गई थी कि स्वामी जी के दो अनन्य सहयोगियों राहुल सांकृत्यायन और कार्यानन्द शर्मा को उसी काँग्रेसी सरकार ने गिरफ्तार कर लिया जिसको 1937 के चुनाव में जितवाने में किसान सभा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। राहुल जी की पुलिस द्वारा कमर में रस्से से बांधकर पुलिस की ले जाती अखबारों में तस्वीर छपी। जवाहर लाल नेहरू के हस्तक्षेप से राहुल जी जब छोड़ा गया तो सरदार पटेल ने आक्रोश में चिट्ठी लिखी की राहुल सांकृत्यायन को रिहा क्यों किया गया?

स्वामी जी के जमींदार विरोधी रुख को लेकर सरदार पटेल तो इस कदर स्वामी जी से चिढ़े थे कि उन्हें ” डर्टी सन्यासी” की संज्ञा दी डाली थी। सरदार पटेल किसान सभा के मुखर विरोधी थे। स्वामी सहजानन्द ने सरदार पटेल का नाम लेकर कहा था ” कौन नहीं जानता कि सरदार बल्लभ भाई से बढ़के शायद ही कोई किसान सभा का दुश्मन हो? “

महात्मा गाँधी से मतभेद

गाँधी जी से सहजानन्द का निर्णायक विच्छेद बिहार के सबसे बड़े जमींदार दरभंगा महाराज के सवाल पर हुआ। 1934 के भूकंप के दौरान दुर्दिन में रहे किसानों से लगान वसूले जाने की शिकायत जब गाँधी जी से की गई तो उसके निवारण के बजाए गाँधी जी ने दरभंगा महाराज के काँग्रेसी मैनेजर से मिलने की सलाह दे डाली। इस प्रकरण ने ऐसा तूल पकड़ा कि खुद को ‘पक्के गाँधीवादी’ मानने वाले सहजानंद सरस्वती का महात्मा गाँधी से हमेशा के लिए मोहभंग हो गया।

1939 में जब सुभाषचन्द्र बोस के काँग्रेस अध्यक्ष पद पर गाँधी जी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारामय्या को हराकर चुने जाने के बाद कार्यकारिणी की सूची में गठन में स्वामी सहजानन्द के नाम को लेकर भी बहुत जिच था।

जवाहर लाल और किसान सभा का झंडा

स्वामी सहजानन्द सरस्वती को प्रति काँग्रेस पार्टी के हर बड़े नेता उनके जमींदार विरोधी रुख के कारण शंका की नजरों से देखा करते थे। यहां तक की जवाहर लाल नेहरू, जो अमूमन किसान सभा के शुभचिंतक माने जाते थे, किसान नेताओं के मामले फूंक-फूंक कर कदम रखा करते। अखिल भारतीय किसान सभा के गठन के बाद जब संगठन का झंडा तय करने सम्बन्धी बैठक नियामतपुर आश्रम (गया) में हो रही थी। इसमें जवाहर लाल नेहरू को भी भाग लेना था। नेहरू की गाड़ी लेट हो गई। जब तक नेहरू सभास्थल पहुंचते किसान सभा के झंडे का चुनावचिन्ह निर्धारित हो चुका था। सभा में आचार्य नरेन्द्रदेव के विरोध के बाबजूद स्वामी सहजानन्द ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर झंडे का चिन्ह हसिया-हथौड़ा रखवाया जबकि नेहरू की इच्छा थी कि झंडे का चिन्ह चरखा हो। नेहरू स्टेशन पर ही थे जब उन्हें पता चला कि झंडा का रंग लाल और चिन्ह हसुआ-हथौड़ा हो गया है तो वे उल्टे पांव वहीं से वापस हो गये।

सुभाष बोस और सहजानन्द

राष्ट्रीय नेताओं में स्वामी जी के सबसे करीबी थे सुभाषचंद्र बोस। बल्कि सुभाषचंद्र के अध्यक्ष पद पर चुनाव में स्वामी जी ने काफी जोर लगाया था। काँग्रेस से बाहर निकलकर 1940 में स्वामी जी व सुभाषचन्द्र बोस ने काँग्रेस सम्मेलन के समानांतर रामगढ़ में जो समझौता विरोधी सम्मेलन आयोजित किया उसने काँग्रेस नेताओं की नींद उड़ा थी। कहा जाता है कि 1941 में देश छोड़ने से पूर्व सुभाष बोस की कलकत्ते में स्वामी जी से गुप्त मुलाकात हुई थी।

भगत सिंह की पहली शहादत और स्वामी सहजानन्द

इस सभा मे त्रिवेणी शर्मा सुधाकर ने ही यह भी बताया कि स्वतंत्र भारत में भगत सिंह की पहली शहादत दिवस (23 मार्च) के मौके पर पंजाब के लोगों ने स्वामी सहजानन्द को आमंत्रित किया। ज्योंहि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो को स्वामी जी के आगमन का पता चला उन्होंने उस पूरे इलाके में धारा 144 लागू कर दिया। अब सभा निर्धारित स्थल पर नहीं हो सकता था।

तब स्वामी जी इस चुनौती का मुकाबला पंजाब के साथियों के साथ मिलकर इस प्रकार किया कि धारा 144 वाले इलाके से बाहर जाकर भगत सिंह की सभा रात में आयोजित हो सकी। उस अर्द्धरात्रि में भी स्वामी जी को सुनने के लिए 25 हजार से अधिक लोग इकट्ठा हुए थे।

1942 का आन्दोलन और जयप्रकाश नारायण

स्वामी जी द्वारा स्थापित किसान सभा 1942 तक एक ऐसा संगठन था जिसमें सोशलिस्ट व कम्युनिस्ट दोनों मिलकर जमींदार विरोधी संघर्ष कर रहे थे। 1942 में जब विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर द्वारा कम्युनिस्ट रूस पर हमला किया गया तो कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘पीपुल्स वार’ का नारा दिया। इस नारे में सोवियत संघ को फासीवादी खतरे से बचाने के लिए अँग्रेजों से संघर्ष तात्कालिक रूप से स्थगित करने की बात थी। यानी अन्तराष्ट्रीय प्रतिबद्धता को ध्यान में रखते हुए अपने राष्ट्रीय कार्यनीतियों को समायोजित करना था। स्वामी सहजानन्द ने, जो धीरे-धीरे मार्क्सवादी दर्शन अपना चुके थे, कम्युनिस्ट पार्टी के इस नारे का समर्थन किया।

एक गेरुआ वस्त्र धारी सन्यासी दुनिया के पहले समाजवादी मुल्क को बचाने की बात कर रहा था। जबकि स्वाधीनता आन्दोलन के सबसे बड़े इन्टरनेशलिस्ट माने जाने वाले जवाहर लाल नेहरू उस नाजुक वक्त पर पीछे हट  गये थे।

स्वामी सहजानन्द को इसकी बड़ी कीमत चुकानी बड़ी। किसानो-मज़दूरों के मुल्क सोवियत संघ के अस्तित्व पर मंडराते खतरे की चिंता में अपने दुश्मन अँग्रेज़ों तक के सहयोग की बात की गई। स्वामी जी की अब तक पूरी लड़ाई ही जमींदारों के विरूद्ध थी जो अँग्रेज़ी शासन का मूलाधार था। अँग्रेजों के सहयोग का मतलब उसके देशी आधार जमींदारों का सहयोग करना था। अब जिन जमींदारों को स्वामी जी वर्गशत्रु कहा करते थे अब उन्हीं के खिलाफ संघर्ष को स्थगित रखना था। इस बात ने किसानों के मन मे काफी उलझन पैदा की। स्वामी जी का इस मुद्दे सोशलिस्टों से खासकर जयप्रकाश नारायण से भी मतभेद हुआ। बाद में जब 1942 का आन्दोलन हुआ और जयप्रकाश नारायण उसके नायक बन कर उभरे। इसने शक्तिशाली किसान सभा में फूट पैदा कर दी।

स्वामी सहजानन्द अपने विचारों और जिस चीज को सही समझते थे उसके लिए किसी से भी टकरा सकते थे। इन्हीं वजहों से काँग्रेस के राष्ट्रीय नेतागण उनको लेकर संशकित रहा करते। काँग्रेस नेतृत्व से सहजानन्द का विरोध जमींदारों को लेकर था। काँग्रेस के नेतागण जमींदारी के सवाल को आजादी मिलने तक टाल देने की बात किया करते थे क्योंकि इससे आपसी संघर्ष की संभावना थी। स्वामी जी पर आरोप लगता कि आप अँग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चे को कमजोर कर रहे हैं।

अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी सभाओं में जब स्वामी जी जमींदारी के खिलाफ भाषण देते तो कुछ नौजवान आकर यही तर्क दुहराते कि आप अँग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष को भटकना चाहते हैं। अपनी संस्मरणों की पुस्तक ‘मेरा जीवन संघर्ष’ में स्वामी जी ने इस बात का जिक्र करते हुए बताया है कि समान्यतः इन बातों को उठाने वाले अधिकांश लड़के जमींदारों के बच्चे हुआ करते थे।

जमींदारों से संघर्ष करने से प्रधान लड़ाई में बाधा आएगी। आपस मे ही लड़ने से अँग्रेजों को फायदा होगा। स्वामी जी इस दृष्टिकोण की जोरदार मुखालफत करते।

‘किसानों के दोस्त और दुश्मन’ शीर्षक अपने लेख में स्वामी जी ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए लिखा “जो लोग अँग्रेजी सरकार से लड़ते और लड़ना चाहते हैं उन्हें जमींदारी के खिलाफ लड़ने में जो आनाकानी होती है वह हमारी समझ में नहीं आती। आमतौर से देहातों में अँग्रेजी सरकार का तो कहीं पता नहीं रहता। मगर जमींदार सरकार तो हर गाँव में विराजती है और किसानों तथा गरीबों का शोषण और उत्पीड़न सैकड़ों प्रकार से करती रहती है।


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फलतः इस शत्रु का अनुभव किसान बराबर करता रहता है। जब हम निरन्तर छाती पर सवार रहने वाले शत्रु से लड़ाई की बात नहीं करके मेल की बात करते हैं और उस शत्रु से लड़ना चाहते हैं, जिसका अनुभव दैनिक जीवन में सर्वसाधारण किसान मजदूरों को बराबर नहीं होता, तो वह लोग हमारी बात समझ नहीं सकते और आश्चर्य में पड़ जाते हैं, मौत सदा सिर पर सवार है और उसका दुःख सबसे ज्यादा होता भी है। मगर उससे बचने की कोशिश कौन करता है? हाँ जब बीमारी होती है तभी यत्न किया जाता है। लेकिन जूते की काँटी बराबर चुभती है तो जी जान से उसे दूर करने की कोशिश की जाती है। जमींदारी जूते की कॉटी और विदेशी शासन मौत का दुःख है यह हमें भूलना न चाहिए।”

स्वामी सहजानन्द आगे जोड़ते हैं ” एक बात और बिहार में अँग्रेजी सरकार को हम करीब पाँच करोड़ देते हैं जिनका एक बड़ा हिस्सा या अधिकांश किसानों से ही लिया जाता है। इस रकम में एक अच्छा हिस्सा बड़ी-बड़ी तनख्वाहों में खर्च होता है बेशक और उसे हम रोक भी नहीं सकते। फिर भी बहुत बड़ा हिस्सा स्कूल, कालिज, अस्पताल, दवाखाना औषधालय, सफाई, सड़क, कुएँ, नहर आदि में खर्च होता है जिससे जनता की भलाई है। पुलिस, कचहरियों का खर्च भी बहुत अंश में जनता के हित में है। मगर जमींदार लोग तो 20 करोड़ से कम वसूल नहीं करते और इसमें से भरसक एक पैसा भी जनता के काम में खर्च करना नहीं चाहते, खर्च नहीं करते। हाँ टायटिल और उपाधि के लिए या अधिकारियों को खुश करने के खयाल से भले ही कुछ दे दिया करते हैं या स्कूल और अस्पताल बनवा दिया करते हैं। कितने जमींदार हैं जिन्होंने देहातों के बीच केवल किसानों के ही लाभ के लिए औषधालय या स्कूल खोले हैं?

अपने और अपने नौकरों-चाकरों के लिए स्कूल और अस्पताल बनवा दिए और उससे यदि कुछ गरीबों का भी लाभ हो गया तो इससे क्या? यह तो मजबूरी की बात हो गई। यहाँ तक देखा जाता है कि यदि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की ओर से दवाखाने या अस्पताल खुलते हैं तो वह भी जमींदारों के घरों और महलों के ही पास खुलें ऐसी कोशिश होती है। स्कूलों और सड़कों के बारे में भी यही होता है। यह भी देखा जाता है कि स्कूल और अस्पताल खुलवाते हैं जमींदार अपने नाम से और उनका खर्च वसूल होता है किसानों से। यदि गाँव में चोरी-डकैती हो तो अँग्रेजी सरकार की पुलिस खबर पाते ही दौड़ पड़ती है। मगर हजार खबर देने पर भी जमींदार अपना यह फर्ज ही नहीं समझता कि उस जगह पर जाएँ। ऐसी दशा में यदि सरकार से करते हैं तो उससे कई गुना भीषण युद्ध इस ‘मुफ्तखोरी की संस्था’ जमींदारी के खिलाफ छेड़ना चाहिए। सरकार तो 5 करोड़ का हिसाब पेश करती और उसकी मंजूरी लेती है। मगर ये 20 करोड़ हजम करनेवाले जमींदार? इन्हें हिसाब-किताब से क्या काम? “

किसान सभा, खेत मजदूर और जगजीवन राम

लेकिन गाँधी जी के नेतृत्व में चला किसान आन्दोलन जमींदारी को लेकर स्प्ष्ट रुख लेने से बचता था। सम्भवतः इसी कारण काँग्रेस पार्टी के अंदर किसान सभा की स्थापना का सबसे अधिक मुखर विरोध किया गया। किसानों की अलग से संगठन बनाने की क्या जरूरत है? काँग्रेस तो खुद किसानों का संगठन है।

किसानों के संगठन को लेकर काँग्रेस के भीतर एक हमेशा उलझन में रही है। अन्यथा मज़दूरों हको-हुक़ूक़ के लिए जिस एटक ( ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काउंसिल ) की स्थापना 1920 में ही हो गई थी वहीं किसानों के अधिकार उठाने के लिए बने संगठन किसान सभा की स्थापना में 16 वर्ष देर से हो सकी। दरअसल किसान सभा बनाकर काँग्रेस जमींदारों को नाराज नहीं करना चाहती थी। अंततः काँग्रेस को 1936 में, किसान सभा का अखिल भारतीय स्तर पर ही गठन करने पर मजबूर होना पड़ा।

लेकिन प्रारम्भ से ही काँग्रेस नेतृत्व किसान सभा की काट की जुगत भिड़ाने लगा। दलित नेता जगजीवन राम को आगे कर खेत मज़दूरों का संगठन खड़ा करने का प्रयास किया। खेत मज़दूरों का संगठन सिर्फ बिहार में ही बनाया गया जहां किसान सभा सबसे सशक्त थी। स्वामी सहजानन्द ने जगजीवन राम पर किसानों को बांटने का आरोप लगाया।

1938 में बिहार सरकार के संसदीय सचिव के रूप में जगजीवन राम ने पटना व शाहाबाद जिलों के खेत मज़दूरों संबन्ध में जयप्रकाश नारायण को पत्र लिखा कि “किस प्रकार किसान खेत मज़दूरों का उत्पीड़न करते हैं।”

वे खेत मज़दूरों को दलितों के रूप में प्रस्तुत कर इस जातीय उत्पीड़न के मामले में तब्दील करते । लेकिन जब जगजीवन राम दलित उत्पीड़न की बात उठा रहे थे डॉ भीमराव अंबेडकर ने जगजीवन राम के बजाए स्वामी सहजानन्द के साथ मोर्चा बनाने का प्रयास कर रहे थे। महाराष्ट्र के कोंकण जमींदारों के विरुद्ध किसानों के ऐतिहासिक बंबई मार्च के दौरान जब अंबेडकर की स्वामी जी से मुलाकात हुई तो इस संबन्ध में दोनों की बात हुई। स्वामी सहजानन्द और आंबेडकर में कई बुनियादी मुद्दों और सहमति थी लेकिन काँग्रेस से संबन्ध को लेकर थोड़ा मतभेद था।

स्वामी जी तब काँग्रेस पर सुभाषचन्द्र बोस के माध्यम से कब्जा कर उसे जमींदारों के बजाए किसानों के संगठन में बदलकर समाजवादी रास्ते की ओर आगे बढाने का सोच रहे थे। परन्तु सुभाष बोस के काँग्रेस से निकलने के बाद यह सम्भावना खत्म हो गई थी।

सहजानन्द सरस्वती काँग्रेस के नेताओं में संघर्ष जमींदारी के प्रति रुख को लेकर था। सहजानन्द इसमें कोई समझौता करने को तैयार न थे । बड़े नेताओं से उनका संघर्ष इसी बात को लेकर था कि वे जमींदारी के प्रति ढुलमुल रवैया अपनाते हैं। कृषि प्रधान भारत के ग्रामीण जीवन को जमींदारी जकड़न से निकाले बिना कोई प्रगति सम्भव नहीं है। स्वामी सहजानंद कहा करते ” हमारा तो खयाल है कि जमींदारी सड़ा हुआ मुर्दा है और जब तक इसे जला या दफना न देंगे इससे बराबर दुर्गन्ध आती और बीमारी फैलती रहेगा।”

स्वामी जी कितने सही थे इसे आगे आने वाले समय ने भी सही साबित किया।

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