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स्टेज एप्प का संकटमोचन ‘कॉलेज कांड’

 

क्षेत्रीय सिनेमा के मामले में पंजाब का ‘चौपाल’ ओटीटी प्लेटफॉर्म सबसे उम्दा किस्म का सिनेमा परोस रहा है तो वहीं हरियाणा में एकमात्र नाम है ‘स्टेज’ का ओटीटी। ‘कॉलेज कांड’ हो या कोई भी बड़ी फिल्म, सीरीज उसके प्रमोशन के लिए अब स्टेज एप्प ताबड़तोड़ काम करने लगा है। इतना ही नहीं इनके ओटीटी पर अबकी बार काम भी उम्दा किस्म का आया है।

इधर 16 सितम्बर को गुरुग्राम में ‘कॉलेज कांड’ की हुई स्पेशल स्क्रीनिंग में एक सवाल मैंने पूछा – क्या जिस तरह बड़े पर्दे पर दिखाई गई है सीरीज वैसी ही ओटीटी पर देखने को मिलेगी तकनीकी रूप से?

जवाब में स्टेज के सी ई ओ बोले – बिल्कुल उसी तरह कोशिश रहेगी। लेकिन इसी में आगे जोड़ते हुए यशपाल शर्मा ने कहा – ‘हम किसी की लकीर को छोटा करने में नहीं लगे हैं हम अपनी खुद की लकीर खींच रहे हैं हमें उसे ही बड़ा बनाना है। तो कितनी बड़ी बनी है ये लकीर आइये देखते हैं –

हरियाणा के एक कॉलेज केडीयू के कैम्पस में हुई पेपरों की चोरी साथ ही एक बड़ा घोटाला। इसके चलते मारा गया बेचारा नया-नया आया प्रिंसिपल। एक कांड के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा कांड। मतलब एक कांड को छुपाने के लिए दूसरा कांड होता गया। इधर पेपरों की चोरी की तीन कॉलेज के स्टूडेंट्स ने और उधर घोटाला किया एकाउंटेंट ने। अब मारा गए प्रिंसिपल और एक और आदमी की मौत की छानबीन करने आया एक दमदार पुलिस इंस्पेक्टर जिसके घर में खुद कांड हो रहा है। कांड भी घरेलू विवाद वाला और अपने खुद के बच्चे की मौत का। क्या ये इंस्पेक्टर इस मामले को सुलझा पाया? या कहानी और पेचीदा हुई? इसका पता तो स्टेज के एप्प पर आपको चलेगा।

सीरीज मुख्य रूप से भाई-भतीजावाद की बातें, घोटालों की बातें, छोरियों की बातें, ड्रग्स, चोरी, मर्डर की बातें, पुलिस की बातें, घर-परिवार, इज्ज़त, इलैक्शन की बातें आदि हर मामले को लेकर चलती हुई इतनी पेचीदा और कसी हुई नजर आती है कि इसके खत्म होने पर इसके दूसरे सीजन का बेसब्री से दर्शक इंतजार करने लगेंगे।

स्टेज एप्प इसी तरह का अच्छा कंटेंट बनाता रहे तो वह दिन दूर नहीं जब दूसरी भाषाओं के फिल्मकारों से भी इनके पास ऑफर आने लगेंगे। और एक समय बाद ये लोग राजस्थानी में जैसे शुरुआत कर चुके हैं वैसे ही पंजाबी, भोजपुरी, तमिल, तेलुगु आदि तक की फिल्में व सीरीज अपने यहाँ लाने लगें।

लेकिन… लेकिन… स्टेज वालों को अपने एप्प पर भी ध्यान देना चाहिए इसकी क्वालिटी को जब तक ये विश्वस्तरीय नहीं बना देते तब तक ये सब हवाई सपने रहेंगे। और फिर स्क्रीन पर हिंदी लिखते समय आपके हाथों में रखी गई एडिटिंग रूपी कलम की नोक टूट गई थी क्या? ‘भारद्वाज’ को ‘भारव्दाज’, ‘पूनियां’ को ‘पुनिया’, ‘सॉन्ग’ को ‘सोंग’ लिखकर आप क्षेत्रीयता का कौन धर्म निभा रहे थे भाई? बड़ी बात ये की ‘शर्मा’ जिस तरह लिखा गया है बेचारी शर्मा कौम उससे ‘शरमा’ जाए। बेहतर हो आप अच्छे एडिटर के साथ-साथ अच्छे हिंदी के जानकार भी अपने यहाँ हायर कर लें। हालांकि इतना ही नहीं कुछ दो-एक जगहों पर तकनीकी रूप से फिसलती इस सीरीज को देखा अवश्य जाना चाहिए इसकी पेचीदा कहानी के लिए।

देखा तो इस सीरीज को इसलिए भी जाना चाहिए कि कैसे अपराधियों तक पुलिस पहुंचती है? जब देश में असल में सारे पुलिस विभाग वाले इस तरह ईमानदारी से काम करने लगें तो क्या मजाल अपराधी छुट्टे सांड की तरह बाहर घूमते रहेंगे और निरपराधी जेल में सड़ते रहेंगे। इस सीरीज को इसलिए भी देखा जाना चाहिए कि जिनका न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ गया है उस पर पुनः कैसे विश्वास आ सकेगा।

‘कॉलेज कांड’ कहानी और स्क्रिप्ट के रूप में उम्दा होने के साथ ही एक्टिंग के मामले में भी कहीं कमजोर नजर नहीं आती। दो-एक अंश छोड़ सीरीज आपका समय-समां सब बांधने में कामयाबी पाती है। ‘यशपाल शर्मा’, ‘मुकेश मुसाफिर, ‘योगेश भारद्वाज’, ‘अल्पना सुहासिनी’, ‘सतीश जॉर्ज कश्यप’, ‘जे.डी बल्लू’, ‘संदीप शर्मा’, ‘कुलदीप शर्मा’, ‘शिवम कबीर’, ‘पुष्पांजलि शर्मा’ सभी अपना काम भरपूर करते नजर आते हैं।

सबसे ज्यादा प्रभावित यशपाल शर्मा के साथ-साथ अल्पना सुहासिनी ने किया। एक आम महिला के से किरदार को जिस तरह उन्होंने पर्दे पर जिया उसमें उनका साथ उनके सादगी भरे कॉस्ट्यूम ने भी निभाया। सीरीज के कॉस्ट्यूम डिजाइनर की इस मामले में विशेष तारीफ की जानी चाहिए। साथ ही मुकेश मुसाफिर, योगेश भारद्वाज दोनों जमे धुआंधार तरीके से। इन सबके साथ बराबरी में खड़े नजर आते हैं ‘कुलदीप सिंह’ यू पी के ठेठ भाषाई अंदाज को जीते हुए वे आपको हंसा जाते हैं।

निर्देशन के मामले में ‘राजेश अमरलाल बब्बर’ का काम हमेशा से सराहनीय रहा है। वैसा ही वे इसमें करते नजर आए। ‘प्रवेश राजपूत’ की लिखी कहानी और स्क्रीनप्ले अच्छे लगते हैं। डायलॉग्स के मामले में कोई ऊंची तासीर का डायलॉग न होते हुए भी यह सीरीज बाकी सब मामलों में वो काम कर जाती है जो एक अच्छी सीरीज में होना चाहिए।

गानों के मामले में ‘शिवम कबीर’ का टाइटल सॉन्ग और फिर इसमें एक जगह जिस तरह ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ दिखाया गया है वह शरीर में झुरझुरी फैलाता है। बस यह संकटमोचन हनुमान चालीसा ही इस बार स्टेज एप्प की संकटहर्ता बनी है। साथ ही ‘कॉलेज कांड’ भी इस ओटीटी के लिए संकटमोचन बना है। इस तरह के संकटमोचन कांड स्टेज एप्प वाले करते रहें तो वह दिन दूर नहीं जब स्टार्टअप के नाम से शुरू किए गए इस ओटीटी के मालिक को मेक इन इंडिया व स्टार्टअप के नाम पर पदम् श्री तक से नवाज दिया जाएगा।

अपनी रेटिंग – 4 स्टार

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