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आदिवासियों की बेचैनी को समझ सत्ता में इमानदारी से मौका दें

 

  • संजय रोकड़े

 

देश में आजादी के बाद से ही ज्यादातर सत्तारूढ़ सरकारों ने आदिवासियों के साथ कथनी और करनी में भेद किया है। ये भोला-भाला समाज हमेशा से ही केन्द्र व राज्य सरकारों की उपेक्षा का शिकार बना रहा है। सरकारी उपेक्षा के चलते ये समाज न केवल शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से महरूम रहा बल्कि सरकारों की तमाम कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी इन तक नही पहुंच पाया। इसने जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में शासन-प्रशासन के जिम्मेदारों ने भी रूचि नही दिखाई और अपना पल्ला ही झाड़ा। लेकिन जैसे-जैसे इस तबके के लोग पढ़ लिख कर सोचने समझने लगे वैसे वैसे इनने अपनी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रणनीतियां बदलने का काम शुरू कर दिया। इसका प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रमाण हाल ही में झारखण्ड प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा को सत्ता से बेदखल कर देना है। इसके साथ ही दूसरे राज्यों के चुनावी नतीजे भी इस बात के गवाह हैं कि आदिवासी समाज अपनी प्राथमिकताओं को लेकर बदनले लगा है। और शायद इसके चलते ही भाजपा से उसका तेजी से मोहभंग होने लगा है।

काबिलेगौर हो कि आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में आदिवासियों का झुकाव स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस की तरफ रहा। कुछ आदिवासियों का सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों के वर्चस्व वाले इलाकों में भी रहा है। लेकिन ज्यादातर आदिवासी कांग्रेस से जुड़े रहे। जिस वफादारी के साथ कांग्रेस से आदिवासी जुड़ा रहा उसके उल्टे कांग्रेस ने उनके साथ दोगली नीति को अपनाया। हालाकि कांग्रेस को आदिवासी समाज का एक बड़ा पढ़ा लिखा तबका दोहरा चरित्र अपनाने वाली पार्टी के रूप में मानते रहा है लेकिन विकल्प के अभाव में लंबे समय तक उससे मजबूरीवश जुड़ा रहा। हालाकि वक्त बदलते ही इस पढ़े लिखे तबके ने कांग्रेस को आईना दिखाने के लिए भाजपा की ओर रूख किया। इनके सकारात्मक रूझान के चलते ही पिछले डेढ़ दशक में भाजपा को कई राज्यों में सत्ता मिली। लेकिन देखने में आया कि भाजपा तो आदिवासियों के लिए कांग्रेस से भी ज्यादा खतरनाक साबित हुई।

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यह रुझान अब फिर बदलते दिख रहा है। इस वर्ग के प्रबुद्वजीवियों ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक सुझ-बुझ का परिचय देते हुए खुद की राजनीतिक ताकत को मजबूत करने का प्रण लिया है। और बतौर परिणाम झारखण्ड में पुन: आदिवासी मुख्यमंत्री को कुर्सी पर बिठाया। झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के नतीजे बताते हैं कि अब फिर से आदिवासी भाजपा से मुंह फेरने लगे हैं। हालाकि, भाजपा ने भी सत्ता में आते ही आदिवासियों को उनके मौलिक हक अधिकारों से महरूम करने के लिए एक तरफा नीतियां अपनाई। आदिवासियों को उनके अपने जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने की चाल चल कर उनके ही संसाधनों पर धन्ना सेठों और उद्योगतियों को स्थापित करने का काम किया। न केवल उनको स्थापित किया बल्कि पुलिस प्रशासन के सहारे शारीरिक प्रताडऩाएं भी दिलवाई। इसका सटिक उदाहरण छत्तीसगढ़ की युवा आदिवासी समाजसेवी सोरी सोनी है। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में आदिवासियों को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए भाजपा ने उनकी बहुलता के बावजूद गैर आदिवासी नेताओं को प्राथमिकता दी और आदिवासियों को सत्ता से दूर किया। मसलन झारखण्ड में किसी आदिवासी नेता को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय रघुवर दास को सीएम बनाया। इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी लंबे समय तक गैर आदिवासी नेता को ही तरजीह देकर सीएम बनाए रखा।

 

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अब हम थोड़ा विस्तार से आदिवासियों के साथ भाजपा द्वारा देश भर और आदिवासी बाहुल्य राज्यों में बरती जाने वाली अमानवीय नीतियों पर नजरें इनायत करते है। आदिवासी हितों की कैसी अनदेखी हुई, उसकी सबसे बड़ी मिसाल तो झारखण्ड ही है। करीब ढाई साल पहले झारखण्ड में तत्कालीन रघुवर दास सरकार छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) में संशोधन की तरफ कदम बढ़ा चुकी थी। विधानसभा से विधेयक पारित भी हो चुका था और राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा जा चुका था। उसी समय झारखण्ड के करीब चार दर्जन प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने एक गोपनीय बैठक कर सरकार के कदम का विरोध किया था। इन आदिवासी अधिकारियों ने सरकार को साफ-साफ बता दिया था कि इन दोनों कानूनों में बदलाव किया गया, तो राज्य में कानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या पैदा हो जाएगी। लगभग उसी समय सत्ताधारी भाजपा के डेढ़ दर्जन विधायकों ने भी एक बैठक कर सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के प्रयास का विरोध किया और मुख्यमंत्री रघुवर दास को ऐसा करने से मना किया। इन दोनों घटनाओं से भाजपा आलाकमानों के कान तो खड़े हुए लेकिन सकारात्मक पहल नही की। जब पूरे प्रदेश से इसके विरोध में आवाजें उठने लगी तब तक बहुत देर हो चुकी थी और फिर मुख्यमंत्री रघुवर दास से आदिवासी समाज तेजी से नाराज होने लगा और इसके साथ ही भाजपा की रघुवर सरकार से छिटकने लगा। हालांकि लोकसभा चुनाव में इसका कोई असर नहीं दिखा और भाजपा ने आजसू के साथ मिलकर राज्य की 14 में से 12 सीटों पर जीत हासिल की। इससे रघुवर दास और भाजपा को लगा कि आदिवासी क्षेत्रों में राज्य सरकार के किए काम का सकारात्मक असर हुआ है। लेकिन यह भ्रम था। महज छह महीने बाद ही हुए विधानसभा चुनाव में राज्य की 28 आदिवासी सीटों में से 26 पर भाजपा हार गई। इतना ही नहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री रघुवर दास को हार का सामना करना पड़ा और कोल्हान से भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया।

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इधर जनजातीय राजनीति और आदिवासी समाज की भावनाओं पर गहरी नजर रखने वाले समाजसेवियों का मानना है कि भाजपा ने झारखण्ड में आदिवासी समाज की अस्मिता पर ही सीधे प्रहार किया था। यहां भाजपा के गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री के प्रयोग का शुरू से ही आदिवासियों में विरोध रहा लेकिन उसने स्वर्णवाद को बढ़ावा देने के लिए आदिवासियों को दरकिनार कर दिया। इसके बाद रघुवर सरकार ने पत्थलगड़ी आंदोलन को बेरहमी से कुचलने का काम किया। इस आंदोलन को कुचलने के लिए रघुवर ने बतौर सीएम बेगुनाहों को भी निशाना बनाया। रघुवर सरकार की इस दोगली कार्रवाई से आदिवासी समाज बेहद नाराज हुआ। इस नाराजगी भरी आग में घी का काम सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के प्रस्ताव ने किया। भाजपा के इन तीनों कदमों ने आदिवासी समाज को उससे न केवल राज्य में दूर कर दिया बल्कि देश भर में आदिवासी विरोधी होने का संदेश दिया। इसके अलावा रघुवर सरकार के ईसाई मिशनरियों के खिलाफ चलाए गए अभियान और धर्मांतरण निषेध कानून बनाए जाने से भी आदिवासी नाराज हुआ।

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    अब हम छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के साथ भाजपा सरकार के कार्यकाल में किए गए सौतेले व्यवहार पर दृष्टि ड़ालते है। इस राज्य में भाजपा ने अपनी सरकार के दौरान उद्योगपतियों व व्यावसायिक समूहों को सब कुछ सौंपने की अपनी जिद के चलते आदिवासियों को न केवल उजडऩे को मजबूर किया बल्कि उनके विरुद्ध झूठे प्रकरण कायम करवा कर सलाखों के पीछे भी धकेला। मार्च 2011 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुर में आदिवासियों के 252 घर जला दिए गए थे। सीबीआइ की जांच रिपोर्ट में इसका खुलासा भी हुआ। फर्जी मुठभेड़ों में आदिवासियों की हत्या कर नक्सली करार दिए जाने की घटनाएं भी रमन सरकार के काल में आम रही हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा के राज में समय-समय पर आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग होती रही लेकिन भाजपा ने कोई ध्यान नही दिया। नंदकुमार साय, रामविचार नेताम और ननकीराम कंवर जैसे आदिवासी नेता परोक्ष तौर पर राज्य में आदिवासी नेतृत्व के लिए आवाज बुलंद करते रहे। एक बार ननकीराम कंवर ने आदिवासी नेतृत्व के लिए लॉबिंग कर आलाकमान तक संदेश पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हुए। आदिवासी नेतृत्व के काट के लिए भाजपा ने जरूर राज्य इकाई का अध्यक्ष आदिवासी वर्ग को दे दिया लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल रखने में ही विश्वास किया। छत्तीसगढ़, त्रिपुरा और झारखण्ड जैसे आदिवासी राज्यों में भी भाजपा ने गैर-आदिवासियों को ही मुख्यमंत्री बनाया। इसका तत्काल असर तो नहीं दिखा, लेकिन बाद में परिणाम सामने आने लगे और वह हम सबके सामने है। गर भाजपा आदिवासी नेतृत्व को तवज्जो देती तो झारखण्ड, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में परिणाम कुछ और होते। भाजपा के इस दोगले व्यवहार पर पार्टी के आदिवासी नेता भी अब अपनी आवाज मुखर करने लगे है। भाजपा के एक बड़े आदिवासी नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि पार्टी नेतृत्व को आदिवासी वर्ग को जिस तरह से महत्व देना चाहिए था वह नहीं दिया। झारखण्ड के परिणाम के बाद भाजपा को आदिवासी समाज को अपने से जोडऩे के लिए नए सिरे से काम करने की जरूरत है। अब सवाल है कि क्या भाजपा को यह एहसास है कि झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में लगातार गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री पर दांव लगाकर आदिवासी अधिकारों की उपेक्षा से क्या चूक हो गई।

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हालाकि छत्तीसगढ़ में वादे के मुताबिक वर्तमान में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार भी काम नही कर रही है। सत्ता में आने के एक साल बाद भी कांग्रेस की भूपेश सरकार ने अब तक आदिवासियों के लिए ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया जिसके चलते उनके सर्वांगिण विकास की राह खुल सके। आज भी राज्य में आदिवासियों पर विस्थापन का सबसे बड़ा खतरा मंडऱा रहा है। इधर छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के उलट झारखण्ड की हेमंत सोरेन सरकार ने सत्ता संभालते ही आदिवासियों के हित में अनेक फैसले लेकर साबित कर दिया कि आदिवासी का सच्चा हितैषी आदिवासी ही हो सकता है। झारखण्ड में अपने पिता दिशोम गुरु शिबू सोरेन की विरासत संभालने वाले नए मुख्यमंत्री हेमंत ने साफ कर दिया है कि राज्य में अब कोई भी फैसला यहां के लोगों के हितों के अनुरूप ही लिया जाएगा। कोई भी ऐसा फैसला नहीं होगा, जिससे आम लोगों को तकलीफ हो। हेमंत ने अपने कामकाज की शुरुआत ही तीन ऐतिहासिक फैसलों से की। उनकी कैबिनेट की पहली बैठक में ही पत्थलगड़ी से जुड़े मुकदमे वापस लेने, सीएनटी-एसपीटी एक्ट से जुड़े मामलों को खत्म करने और राज्य के छह लाख अनुबंधकर्मियों का बकाया भुगतान करने का फैसला किया गया। इन फैसलों से पत्थलगड़ी से जुड़े मुकदमों में फंसे करीब 10 हजार लोगों को राहत मिली है। ये लोग अपना घर-बार छोड़ कर भटकने के लिए मजबूर थे। इसके साथ ही हेमंत ने खरसावां गोलीकांड समेत झारखण्ड के तमाम शहीद परिवारों के एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा कर साबित कर दिया कि उनका शासन काल कैसा चलने वाला है।

बहरहाल झारखण्ड में एक आदिवासी नेता के पुन: मुख्यमंत्री बनने से पूरे देश के आदिवासी समाज में एक नई उर्जा का संचार हुआ है। इस प्रदेश में अपना मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही देश भर में अपने राजनीतिक वजूद को पुर्नस्थापित करने के लिए आदिवासी एकजुट होने लगे है। वैसे भी देश में आदिवासियों की अपनी एक अलग अहम राजनीतिक भूमिका है। 2011 की जनगणना के अनुसार पूरे देश में 12 करोड़ आदिवासी हैं। पांचवीं अनुसूची वाले राज्य आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान में कुल आबादी का 20 से 22 फीसदी आदिवासी हैं। देश की आबादी का लगभग सवा आठ प्रतिशत आदिवासी हैं। वे 20 प्रतिशत भूभाग पर काबिज हैं जो प्राकृतिक संपदा और खनिजों से भरा है।

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     राजनीतिक दलों को सत्ता में बिठाने और बेदखल करने में भी देश के आदिवासियों की अहम भूमिका है। आदिवासी बहुल राज्यों में सुरक्षित सीटों के अलावा दूसरे कई विधानसभा क्षेत्रों में आदिवासी वोटर निर्णायक हैं। इस समय देश में जो मोदी सरकार राज कर रही है उसे बनने में भी आदिवासियों का खासा योगदान है। लोकसभा की 47 आदिवासी सीटों में से 31 पर भाजपा के सांसद हैं। 2014 में भाजपा के 27 आदिवासी सांसद थे। देश की सत्ता को बनाने बिगाडने के साथ ही राज्यों की सरकारें बनाने बिगाडने में भी आदिवासियों का खासा योगदान होता है। सन 2003 के चुनाव में भाजपा आदिवासी सीटों के भरोसे ही मध्यप्रदेश में सरकार बना पाई थी। प्रदेश की 47 आदिवासी सीटों में से वर्तमान में 31 पर कांग्रेस का कब्जा है। हाल ही में झाबुआ के उप-चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को पटखनी देकर कमलनाथ की अपनी सरकार को ओर मजबूती दी है। इधर ओडिशा की 33 आदिवासी सीटों में से 18 पर बीजद और 10 पर भाजपा के विधायक हैं। गुजरात में आदिवासी वोटरों की संख्या करीब 12 फीसदी है। यहां 182 में से 27 ट्राइबल सीटें हैं, हालाकि मजेदार तो यह है कि 40 सीटों पर उनकी निर्णायक भूमिका रहती है। मध्य प्रदेश में 53 सामान्य सीटों पर आदिवासी वोटर निर्णायक होते हैं। छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज के दो सदस्य सामान्य सीटों से चुनकर विधानसभा में पहुंचे हैं। राजस्थान की 200 में से 25 आदिवासी सीटें हैं। 2018 के चुनाव में भाजपा की नजर आदिवासी वोटरों पर ही थी, लेकिन कांग्रेस के पक्ष में 12 सीटें आ गईं। भाजपा को नौ सीटें ही मिलीं। हिमाचल प्रदेश में भी तीन सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। महाराष्ट्र में विधानसभा की कुल 288 सीटों में आदिवासियों के लिए 25 सीटें आरक्षित है। यहां भी भाजपा की आदिवासियों की उपेक्षा की नीति के चलते उसके खाते में ज्यादा सीटें नही आई।

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खैर। आदिवासियों की राजनीतिक शक्ति पहचानने का काम पुराने नेता बड़ी शिद्दत से करते रहे है। इवन भाजपा भी एक समय तक उनकी इस राजनीतिक शक्ति को तवज्जों देती रही है, लेकिन जब से मोदी और शाह के हाथों बागड़ोर आई है तब से उनकी राजनीतिक शक्ति का लोहा मानने की बजाय उनका शोषण करना ज्यादा उचित समझा। बता दे कि पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत इंदिरा गाँधी और कांग्रेस के नेताओं ने आदिवासियों को जोडऩे के लिए समय-मय पर अनेक अभियान चलाए लेकिन कांग्रेस ने भी पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों में आदिवासी नेतृत्व को कमान सौंपना उचित नही समझा। हालाकि कांग्रेस ने ओडिशा में 1999 में गिरिधर गमांग को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उनका कार्यकाल ज्यादा नहीं रहा। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की रेस में अर्जुन सिंह से आदिवासी नेता दिवंगत शिवभानु सिंह सोलंकी पिछड़ गए। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने सन 2000 में आदिवासी नेता के तौर पर राज्य का पहला मुख्यमंत्री अजीत जोगी को बनाया।

बहरहाल जब से कांग्रेस ने आदिवासियों को बेवकूफ बनाना शुरू किया तब से वे भाजपा और दूसरे दलों से जुडने लग गए। मगर जब से भाजपा भी कांग्रेस की राह पर चलने लगी तब से आदिवासियों ने अपना राजनीतिक रूख बदल कर भाजपा को आईना दिखाना शुरू कर दिया है। हाल ही में झारखण्ड व महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम यह साबित कर रहे है कि अब आदिवासी भाजपा से भी तेजी से छिडक़ने लगे है। क्या यह बदलाव किसी बड़े राजनीति परिवर्तन का संकेत है। क्या हिंसा से ग्रस्त आदिवासी अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश कर रहे है। ये सवाल आज कई वजहों से मौजूं हैं।

दरअसल ये समाज अभी भी ऊहापोह की ही स्थिति में है। अब भी इसके मुद्दे-मसले राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं से अनछुए ही है। गर इसे ऐसा कहे कि मुख्यधारा के दलों से वह अब भी ठगा सा ही महसूस करता रहता है तो अश्यिोक्ति नही होगा। इसी वजह से यहां लगातार उथल-पुथल दिखती रहती है। राजनीतिक रुझान भी बदलते रहते है। इसलिए अब यह वक्त बहुत ही मुफीद है कि आदिवासी समाज की बेचैनी को समझा जाए और सत्ता की राजनीति में उसको इमानदारी से मौका दिया जाए।

लेखक पत्रकारिता जगत से सरोकार रखने वाली पत्रिका मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करते है और सम-सामयिक मुद्दों पर कलम भी चलाते है।

सम्पर्क- +919827277518, mediarelation1@gmail.com

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