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किसानों
सामयिक

लड़ेंगे हम थके नहीं, मरे हैं हम मिटे नहीं

 

लाशों से निकली उम्मीद,सरकार की टूटी नींद… कुम्भकरण से भी दुगना सो कर जब मोदी सरकार 12 महीने बाद जागी तब तक आशा, भरोसा,उम्मीद, जान सब माटी में मिल चुका था। जिंदगी समेट श्मशान की राह पर हर दिन चला एक किसान… चिता की लपटों से निकली यह बेबस राह सैकड़ों जान कुर्बान कर हजारों जान की बाजी लगाकर मिली है। एक साल लंबे इस आंदोलन में मौसम बदला भाषा बदली वादे, इरादे, बोली, भाषण सब कुछ बदला अगर कुछ नहीं बदला तो बस हर दिन सुलगती चिता के बगल सजती, जलती, धधकती दूसरे किसान की एक नई चिता। एक एक साँस सत्ता से संघर्ष में वार जो सदा सदा के लिए शांत हो गए यह दुनिया की सबसे बड़ी जीत उन सात सौ शहीद किसानों के नाम पर युगों युगों तक पूजन वंदन अभिनंदन की जाती रहेगी, दुनिया में कहीं भी शांत आंदोलन की मशाल जब जब जलेगी तब तब दुनिया भारत के इस किसान आंदोलन को आदर्श मान आगे बढ़ेगी।

12 महीने 365 दिन 700 आस का लाश बन जाना, खेत को बचाने के लिए सड़क पर मर जाना, घर न लौटने की शपथ ले आए किसानों का आख़िरी घर को ठिकाना बनाना। खालिस्तानी, पाकिस्तानी, दलाल, मुफ्तखोर, आंदोलनजीवी सत्ता के शीर्ष से लेकर कमल दल के छुटभैया तक मुँह में जो आया वह शांत सुनना सहना बर्दाश्त करना। सर्दी में जम कर, गर्मी में झुलस कर, बरसात में भीग कर पुलिस के डंडो से पिटकर जीप तले कुचल कर मरते रहना, चलते रहना, चिता पर जलते रहना। यह वह खामोश ललकार थी जिससे 56 इंच का पाषाण पिघल कर चूर हो गया, इस अहंकार के टूटने का क्या फायदा तब जब सात सौ बेकसूर बेवक्त अपने प्राणों की आहुति दे फरियाद करते अपने ही देश में अपने ही नेता से लड़ते इस लोक से परलोक सिधार गए।

देश से माफी मांग आंदोलनजीवियों से आंदोलन खत्म करने की प्रधानमंत्री की अपील कर यह भरोसा देना कि तीनों कृषि कानून वापस लेंगे। इस राष्ट्रव्यापी माफी के बाद किसान माफ करने के मूड में नहीं है खुद को किसान का हितैषी बता जो भरोसा दिया उस पर भरोसा ना होना ही अनावरण धरने का धरा पर बना रहना सजग, सफल, सबल प्रमाण है। गाँधी के देश में गाँधी की ही राह से गाँधी के ही प्रदेश के एक जिद्दी के जिद्द को चूर-चूर कर भारत देश ने दुनिया को फिर बता दिखा समझा दिया गाँधीयत ज़िंदा है, गाँधीयत अमर है और सदियों तक अहिंसा के पुजारी की सीख बेरहम, बेदर्द, ज़ालिम, ज़िद्दी, अहंकारी सत्ता को ललकार घुटने टेकने पर मजबूर करती रहेगी।

गुजरात के संत, राष्ट्रपिता, दुनिया के लिए बापू, हर दिल के महात्मा के रूप में जाने जाने वाले अहिंसा के परम साधक की सीख सत्ता से लड़ने की अहिंसा के रूप में दिए गए हथियार से गुजरात के ही एक नेता की हार यह बताने के लिए काफी है कि बापू के प्रयोग को उनके ही जमीन पर जन्मा कोई व्यक्ति चुनौती दे रहा है, जिस अभिमान अहंकार के कारण किसानों की लाशों की कतार लगी हर दिन खेत खलिहान छोड़ किसान श्मशान पहुँचा 365 दिन के इस महान किसान यज्ञ में किसानों ने अनावरत प्राणों की आहुति जारी रखी। जबसे किसान आंदोलन का दिया दिल्ली को घेर सरहद पर खड़े किसानों ने सड़क पर जलाया तबसे किसान की चिताओं की लपटों ने इसे बुझने नहीं दिया। सत्ता के अहंकार से श्मशान गुलज़ार रहा आखिर इस अकारण ज़िद्द की वजह क्या थी?

एक नेता की हठधर्मिता के कारण सात सौ घरों के लाल काल के गाल में समा गए। सात सौ किसानों की असमय हुई मौत या हत्या क्या कभी फूल दल और हलधर के दिलों को जोड़ पाएगी? किसान चाह कर भी क्या अपने वोटों से इस फूल छाप पार्टी को सींच पाएगा? किसान क्या फिर कतार में खड़ा हो फूल की जय जयकार विजय का तिलक किसी कमलपति नेता के माथे पर लगा पाएगा? सत्ता तो आएगी जाएगी दल भी बनते बदलते ही रहेंगे पर इन सात सौ किसानों की मौत का कारण, जिम्मेदार कौन था? इतिहास को उलट पलट लोग ये सवाल पूछते ही रहेंगे क्या यह जवाब देना भविष्य के फूलबाजों के बस में होगा क्या?

पंडित संदीप

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
सम्पर्क +919911688689

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