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सिनेमा

नई सी, ताजी सी, खिली सी ‘मिमी’ सी

 

30 जुलाई को नेटफ्लिक्स और जियो सिनेमा पर रिलीज़ होने वाली ‘मिमी’ 3 दिन पहले ही आ गई। एक कारण इसमें लीड रोल करने वाली कीर्ति सेनन के जन्मदिन को बताया जा रहा है तो दूसरा बड़ा कारण इसका लीक होना बताया जा रहा है। खैर वजह जो भी हो पिछले कुछ समय से हाई बज बना चुकी इस फ़िल्म का कुछ दिन पहले रिलीज होना इसके लिए इंतजार करने वालों के लिए सुखद अनुभव है। खैर आईये देखते हैं कैसी है ये ‘मिमी’

गरीब लोग लोन लेते हैं। बच्चों को स्कूल,  कॉलेज में पढ़ाने के लिए लेकिन बच्चा पैदा करने के लिए लोन कौन लेता है भला। बस ऐसा ही कुछ इसके साथ भी है। यह भी लोन लेती है मराठी भाषा में साल 2011 में आई  फ़िल्म ‘माला आई व्हहेची’ से और बन जाती है उसका हिन्दी रीमेक। फ़िल्म में एक लड़की है कलाकार खानदान से जो बॉलीवुड में जाना चाहती है।  नाचकर चंद रुपए कमाने वाली मिमी को एक ड्राइवर के सहारे अंग्रेज परिवार मिलता है। जो भारत रहा है काफी समय लेकिन साल भर से अब वह एक ऐसी लड़की खोज रहा है जो उन्हें बच्चा पैदा करके दे। एक दिन मिमी के सहारे उनकी तलाश पूरी होती है। मिमी जिसे मुंबई जाकर  माँ न बनना पड़े फिल्मों में इसलिए वह असल जिन्दगी में माँ बनने का फैसला करती है। उसे इस काम के लिए 20 लाख रुपए ऑफर होते हैं। मिमी सेरोगेट माँ बनने के लिए तैयार हो जाती है। फिर अचानक वह विदेशी दम्पति गायब हो जाते हैं और चार साल बाद लौटते हैं। जब मिमी का लड़का दौड़ने, खेलने,  बोलने लगता है। अब क्या मिमी बच्चा उन्हें देगी या फ़िल्म कोई और राह,  कोई और कहानी पकड़ेगी वह आपको फ़िल्म के अंत में पता चलेगा।

कहानी में नया कुछ नहीं है। आज के समय में यह विज्ञान की मदद से सम्भव होने लगा है कि खेत किसी और का,  बीज किसी और का लेकिन जो बीज लगाएगा मालिक वह बन जायेगा। बावजूद इसके इसमें नया है तो इसका निर्देशन। जो इसे नई सी,  ताजी सी और खिली सी मिमी सी बनाता है। फ़िल्म में कई सारे ट्विस्ट एंड टर्न्स हैं जो इसे ऐसा सा बनाते हैं। यह फ़िल्म कायदे से सेरोगेसी का मतलब बताती है लेकिन साथ ही एक बारगी यह भी लगता है कि अंग्रेजों की धूर्तता को भी दिखाएगी। वैसे भी अंग्रेजों को लगता है कि भारत के लोग पैसों के लिए कुछ भी करेंगे। तो उसी राह पर चलते हुए यह चंद सैकेंड के लिए भटकती भी है लेकिन चुटकियों में ही पटरी पर लौट आती है। जैसा कि फ़िल्म बताती है कि बच्चा पैदा करते समय जितना दर्द होता है उससे कहीं ज्यादा उसके भटक जाने पर होता है। तो यह मामूली सा भटकाव आपको हल्का सा परेशान जरूर करता है। और इसके निर्देशन से फ़िल्म में घटने वाली दुर्घटना के संकेत भी पहले ही नजर आ जाते हैं।

फ़िल्म मनोरंजक होने के साथ ही एक संदेश यह भी देकर जाती है कि बच्चा कैसा भी हो उसे अपनाना चाहिए। मानसिक विकलांग, शारीरिक विकलांग जो भी हो। कायदे से हम जो सोचते हैं वो जिन्दगी नहीं होती है हमारे साथ जो होता है वो जिन्दगी होती है। ऐसी फिल्मों को देखने का मजा थियेटर में ज्यादा आता है। लेकिन कोरोनाकाल में बन्द,  खस्ता हाल तथा बीमार से पड़े थियेटरों में यह फ़िल्म अगर दिखाई जाए तो भी लोग इसे देखने जरूर जायेंगें। ऐसी फिल्मों की माउथ पब्लिसिटी इन्हें और ज्यादा देखने लायक बनाती है।

फ़िल्म के दो गाने ‘छोटी सी चिरैया’,  ‘परम सुंदरी’ देखने,  सुनने में प्यारे,  लोक लुभावन,  कर्णप्रिय लगते हैं। एक्टिंग के मामले में पंकज त्रिपाठी बेहतर रहे लेकिन कीर्ति सेनन बाजी मारती हैं। मिमी की माँ के रूप में सुप्रिया पाठक तथा पिता के रूप में मनोज पाहवा ने भी खूब रंग जमाया। विदेशी दम्पति के किरदार में एवलीन,  ऐडन व्हैटॉक ठीक ठाक लगे। निर्देशक लक्ष्मण उतेकर का काम सराहनीय है। कहानी सटीक तथा हिन्दी सिनेमा में नई सी है। सम्रोद्धि पोरे के लिखे का अडेप्टेशन तथा  रोहन शंकर के साथ मिलकर निर्देशक द्वारा इसके लिखे डायलॉग्स,  स्क्रीनप्ले उम्दा रहे

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

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