Tag: राजीव कार्तिकेय

mk gandhi thrown out from train
एतिहासिक

7 जून, 1893 का वो दिन

 

  • राजीव कार्तिकेय

 

7 जून, 1893 का वो दिन जिसने तय किया कि दुनिया का इतिहास और भूगोल कोई भी बदल सकता है!

बगावती एहसास का वह ठंडा क्रांतिकारी मुसाफिर जो अपनी जिन्दगी की खामोशियों को ज्यादा से ज्यादा खुशनुमा बनाने के लिए एक जगह से दूसरे जगह निकल पड़ा। कौन जानता है, कब कोई एक घटना उसकी पूरी की पूरी जिन्दगी बदल दे। पर, कभी-कभी हर किसी की जिन्दगी में एक घटना तो जरूर आती है। जब उसे यह तय करना होता है कि उसे क्या करना है; क्या नहीं, क्या बनना है; क्या नहीं। उसका भविष्य क्या होगा और क्यों?

ये कुछ सवाल जब किसी को सोने नहीं देते तभी उसके अंदर एक अलग इंसान पैदा होता। ऐसा इंसान जो अब तक उकेड़े गये उस जिन्दगी से अलग साबित होगा। इसमें मुश्किलें भी उतनी ही आती है क्योंकि वह आदमी इसके जरिये खुद को ही चुनौती दे रहा होता है। चुनौती भी ऐसा कि ढ़र्रे पर जाती जिन्दगी पूरी की पूरी बदल जाय। वह वही नहीं रह जाता, जिसके लिए उसने अब तक मेहनत किया था। वह आने वाली सच्चाई में तपकर एक नया रूप ले लेता है। वही तपन उसे जिन्दा रखती है।

यह भी पढ़ें- संकटग्रस्त दुनिया को गांधीजी की जरूरत

आज बात एक ऐसे ही आदमी की जो चला था, अपने सिंपल, सॉफिस्टिकेटेड जिन्दगी के रास्ते पर। जिसमें एक गृहस्थ आदमी के अपने ख्वाब थे पर ट्रेन के सुपरिटेंडेंट के एक धक्के ने उसे कोई और ही बना दिया। वह आम आदमी रात भर खुद को टटोलता रहा। अपने अस्तित्व को पहचानने की सच्चाई से खुद को रोक न पाया। वह जान पाया कि जो भी वह कर ले, वो रहेगा एक गुलाम देश का आदमी ही। जिन्दगी की सच्चाई यही थी कि कौन कौन कहाँ पैदा हुआ है, किस जाति, धर्म, जेंडर में पैदा हुआ है; वही उसकी पहचान है। और इसे बदलना उस समय तो पूरी तरह मुश्किल था। उसे अब तक कमाई जिन्दगी बस एक भौतिक परिघटना लगी। उसे लगा कोई भी किसी वक्त आकर उसे धक्का दे सकता है। उसका अस्तित्व वह जहाँ भी जाय, कोई और ही तय करेगा।

माना यह घटना किसी न किसी रूप में हर किसी की जिन्दगी में आता है। पर कोई-कोई इस पर सोचता, समझता और खुद के लिए कुछ ऐसा करता है कि एक नया व्यक्तित्व निकल कर सामने आए। एक ऐसा व्यक्तित्व जो नये साँचे में ढल जाता हो। वही हुआ; गुलामी का जो एहसास उसने खुद के लिए उस रात जाना; उसने अपने जैसे दुनिया के तमाम लोगों के ऊपर थोपे गये उस गुलामी के एहसास को ही जड़ से ख़त्म करने का बीड़ा उठा लिया। इसके लिए कभी उसे कोई हथियार, कोई सेना की जरूरत नहीं पड़ी। उसके बाद वह जहाँ गया, जहाँ रहा अस्तित्व की लड़ाई के लिए लड़ता रहा।

यह भी पढ़ें- गांधीवादी आंदोलन

एक आम इंसान की लड़ाई; जिसमें आम इंसान ही सेना बनी और वही आम इंसान ही उसका हथियार भी बनी। यह आत्मिक हथियार का अद्भुत प्रयोग- ‘अहिंसक सत्याग्रह’ कहलाया। जिसमें खुद को तपा सच्चाई के बदौलत लोगों को ने खुद को तैयार किया। इस तरह इस व्यक्ति ने एक इंसान की व्यक्तिगत शक्ति का एहसास कराया।

यहाँ लोग परनिर्भरता के कारण गुलाम बनाये जा रहे थे। उस मानसिक गुलामी पर इस व्यक्ति ने अपने जीवन के प्रयागों के माध्यम से बदलाव का जन-सैलाब तैयार किया। लोग खुद को अपने अस्तित्व बचाने के लिए तैयार कर सकें। यह लड़ाई किसी के खिलाफ नहीं; बल्कि विरोधी के अंदर खुद के लिए प्यार का सैलाब बहाने के लिए था। विरोधी को झकझोरने के लिए था।

इससे क्या हो सकता है या क्या हुआ? परिणाम आपके सामने है, चाहे तो आप दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह और चम्पारण के सत्याग्रह से लेकर भारत की आजादी, बंटवारे की हिंसा से लोगों को समझाने की बावत तक देख सकते हो।

गाँधीजी ने कहा था- “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।” मैंने उन्हें और इस दुनियादारी को जितना अब तक समझा। मुझे लगता है- “गाँधी की मौत, गाँधी के द्वारा दी गई सबसे बड़ा संदेश है; जो केवल जीने के लिए नहीं बल्कि जीने के विश्वास को पूरा करने के लिए ज्यादा जरूरी हो जाता है।”

rajeev kartikey

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधार्थी हैं।

सम्पर्क- +918287128663, rajeevkartikeya@gmail.com

.