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पवित्र खाकी के धब्बे : यूपी पुलिस ऐसा क्यूं है?

 

केस नंबर 1 – जौनपुर में बर्खास्त सिपाही को अपने ही दोस्त की बेटी, हाईस्कूल छात्रा के यौन शोषण अपराध में अपर सत्र न्यायाधीश ने बारह साल की जेल और इक्क्यावन हजार अर्थदंड की सजा सुनाई।

केस नंबर 2- पीलीभीत में पुलिस ने भांग को चरस बताकर कथित बेकसूर को जेल भेजा। मामला सार्वजनिक होने पर छीछालेदार। कोर्ट ने सीओ समेत पूरे थाना स्टाफ को तलब किया। कोर्ट ने कहा, अंधेरगर्दी की पराकाष्ठा।

केस नंबर 3- बाराबंकी में ईंट भट्ठा व्यवसाई के अपहरण मामले में फरार चार सिपाहियों समेत पांच लोगों पर ईनाम घोषित। कोर्ट ने सभी आरोपियों के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया।

केस नंबर 4- सिकंदराबाद में फर्जी एनकाउंटर मामले में कोर्ट ने रिटायर्ड डिप्टी एसपी रणधीर सिंह की प्रापर्टी जब्त करने का आदेश दिया। सात अन्य पुलिसकर्मियों को पहले ही कोर्ट में पेश होना पड़ा।

केस नंबर 5- प्रयागराज में महिला सिपाही से छेड़छाड़ के मामले में उसी थाने के दरोगा महेश चंद्र निषाद गिरफ्तार कर जेल भेजे गए। खुद पीड़िता सिपाही की तहरीर पर जार्जटाउन थाने में मुकदमा दर्ज।

यह तो महज कुछ बानगी है। विस्तार से देखें तो एक से बढ़कर एक मामले, कि सामान्यजन दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाएं। गौर से देखा जाए तो यह साफ तौर पर दिखता है कि ज्यादातर मामले में कोर्ट को ही कड़ा रुख अपनाना पड़ा। उधर, सूबे के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ को सख्त टिप्पणी के साथ प्रदेश पुलिस के मुखिया मुकुल गोयल को हटाना पड़ा है। फिजां में सवाल हैं कि क्या यूपी की पुलिस वाकई अपना भरोसा खोती जा रही है? आखिर क्यों उसे कोर्ट में उसे बार बार कठघरे में खड़ा होना पड़ रहा है। समाज शास्त्री विवेक आर्य कहते हैं कि कई बार कार्य करने की हड़बड़ी में भी ऐसा हो जाता है। प्रख्यात पत्रकार शिवचरण सिंह चौहान और गुफ्तगू साहित्यिक संस्था प्रमुख पत्रकार इम्तियाज अहमद गाजी इसके पीछे वर्कलोड ज्यादा होने का तर्क देते हैं। उधर, शिवसागर सिंह और राकेश मिश्र बाबूजी तर्क देते हैं, वे कहते हैं – वर्कलोड और हड़बड़ी का ये मतलब तो नहीं कि जांच पड़ताल के नाम पर आंख में धूल झोंक दिया जाए।

आम जनता से जुड़ा है पुलिस महकमा, इसलिए जिम्मेदारी और जवाबदेही भी बड़ी है। पवित्र ‘खाकी’ को दागदार बनाने वाले इन ‘बदनुमा धब्बों’ की करतूतों ने न सिर्फ महकमे का बल्कि कर्तव्यनिष्ठ विभागीय अफसरों का भी सिर कई बार शर्म से झुका दिया। कई बार बड़े अफसरों की किरकिरी हो जाती है। उधर, मौका खोजता विपक्षी दल बार बार सरकार की घेरेबन्दी करने में जुट जाता है सो अलग। फिलहाल, इधर पुलिस की कई करतूतें सुर्खियों में रही हैं। बाराबंकी के सुबेहा कस्बा निवासी ईट भट्ठा व्यवसाई आफाक का अपहरण 30 नवम्बर को हो गया। अपहरणकर्ताओं को पांच लाख फिरौती का आश्वासन देकर आफाक सुरक्षित घर वापस आ गए। अगवा और फिरौती के इस मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी अमेठी जिला, जगदीशपुर थाना क्षेत्र के मोहब्बतपुर निवासी राजू को गिरफ्तार किया। पुलिस की जांच पड़ताल में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। पता चला कि अपहरण, फिरौती के मामले में जगदीशपुर में तैनात सिपाही राकेश सिंह, रतन कुमार, शिव दयाल राठौर और अरुण यादव भी शामिल रहे। पुलिस ने कड़ी कार्रवाई करते हुए इन सिपाहियों को भी नामजद किया पर तब तक चारों सिपाही फरार हो चुके थे।

ऐसे में फरार चारों सिपाहियों को इनामियां घोषित करना पड़ा। फरार बदमाशों को खोजने वाले सिपाही खुद अपराधी की तरह फरारी काटें, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा? उधर, कानपुर के प्रॉपर्टी डीलर मनीष गुप्ता बिजनेस टूर पर गोरखपुर गए थे। गोरखपुर के जिस होटल में मनीष रुके थे, वहाँ पुलिस रात साढ़े बारह बजे रूटीन चेकिंग करने गई थी। आरोप है कि आधी रात होटल के कमरे में जाकर डिस्टर्ब करने पर बिजनेसमैन मनीष गुप्ता ने पुलिस टीम पर आपत्ति जताई। गुस्साई पुलिस ने मनीष को इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। बाद में इस घटना को लेकर जमकर हंगामा हुआ। पुलिस पर हत्या का आरोप लगा। एक बार फिर पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई।

इसी प्रकार सिकंदराबाद में फर्जी एनकाउंटर के मामले में कोर्ट ने रिटायर्ड डिप्टी एसपी रणधीर सिंह की प्रॉपर्टी जप्त करने का आदेश दिया। इस मामले में सात अन्य पुलिसकर्मी पहले ही कोर्ट में पेश हो चुके थे। तीन अगस्त 2002 को सिकंदराबाद बुलंदशहर रोड पर बिलुसरी के पास रोडवेज बस लूट की वारदात हुई। इस दौरान लुटेरों ने बस कंडक्टर को गोली मारकर घायल कर दिया। बताया जा रहा है कि पुलिस ने घेराबन्दी कर प्रदीप नाम के एक बदमाश को एनकाउंटर में मार गिराया। परिजनों ने पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर करने का आरोप लगाया। परिजनों का कहना था कि बीटेक का छात्र प्रदीप कॉलेज में फीस जमा कर घर लौट रहा था कि तभी पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ दिखाकर उसकी हत्या कर दी। इस मामले में भी हफ्तों पुलिस की किरकिरी होती रही। प्रयागराज के बिगहिया कांड में भी कतिपय पुलिसकर्मियों की करतूत उजागर हुई।

बिगहिया में सात सितम्बर 2018 की रात एक ही परिवार में चार लोगों की सामूहिक हत्या हो गई थी। कमलेश, बेटी, दामाद और नाती की सामूहिक हत्या के मामले में छह आरोपी जेल में बंद थे। कोर्ट के आदेश पर गांधीनगर गुजरात की प्रयोगशाला में नार्को टेस्ट हुआ। नार्को टेस्ट की रिपोर्ट में एक तथ्य उभरकर सामने आया कि किस तरह स्थानीय थाने की पुलिस ने आरोपियों में एक वृद्ध का नाम हटाने के नाम पर दो लाख रुपए झटक दिए। गोरखपुर जिले में दो कारनामे प्रकाश में आए। एफ आई आर दर्ज करने में आनाकानी और मुकदमे से नाम हटाने के एवज में पैसा मांगने के आरोप में गोला थाने में तैनात दरोगा विवेक चतुर्वेदी के खिलाफ भ्रष्टाचार की धाराओं में केस दर्ज कराया गया। मुकदमे में आरोप सही पाए जाने पर एसएसपी जोगेंद्र कुमार ने सख्ती अपनाते हुए दरोगा विवेक चतुर्वेदी को सस्पेंड कर दिया। इसी प्रकार गोवंश तस्करी के मामले में देवरिया सलेमपुर थाने में तैनात सिपाही रामानंद यादव को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। इसके पहले भी गोरखपुर रेंज में कई मामले सुर्खियों में रहे हैं।

मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ जी के हस्तक्षेप पर अफसरों ने कड़ा रुख अपनाया था। 18 दिसम्बर 2017 को उरुवा थाने में तैनात रहे दो ट्रेनिंग दरोगा को अपहरण के मामले में मुकदमा और गिरफ्तारी दोनो करनी पड़ी। प्रदेश के एक सीनियर पुलिस अफसर बताते हैं कि बिहार प्रांत के गोपालगंज के छात्र एहसान आलम को धोखे से उसका दोस्त अफजल गोरखपुर लाया फिर परिचित दोनों ट्रेनी दरोगा के मदद से तीन लाख की फिरौती मांगी। मामला खुलने पर तत्कालीन एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज ने दोनों ट्रेनी दरोगा पर एफ आई आर के साथ गिरफ्तारी भी कराई। इसी प्रकार वर्ष 2006 में कुशीनगर जिले के कारखाने में एक युवक की सिर काटकर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि एक दरोगा ने सरकारी जीप का इस्तेमाल कर युवक की लाश को गंडक नदी में बहा दिया था मामला सुर्खियों में आने के बाद तत्कालीन आईजी ने दरोगा के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कराते हुए उसकी गिरफ्तारी भी कराई थी। बहरहाल, कतिपय पुलिसकर्मियों की मनमानी करतूतों ने ईमानदार और कर्मठशील सीनियर अफसरों को कड़ाई के लिए मजबूर किया है। दूसरी तरफ सरकार की मंशा को भी बाधित किया है

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