Tag: यादवेन्द्र पाण्डेय

चर्चा में

सीखा किसी से भी जा सकता है



केरल और तमिलनाडु की सीमा पर जंगल में पार करते एक हाथी (मुझे लगता है माँ हथिनी होगी) और उसके दो बच्चों का वीडियो अभी कुछ दिन पहले काफी वायरल हुआ। सुबह-सुबह शहर के लिए साइकिल से जाते एक युवक ने ठहर कर वह वीडियो बनाया। ऐसा नहीं है कि हाथी और उसके बच्चों ने पहली बार कोई सड़क पार की हो लेकिन इस वीडियो की विशेष चर्चा इसलिए हुई क्योंकि इसमें हाथी के साथ के दो बच्चों में से एक बच्चा बहुत छोटा था और सड़क और जंगल के बीच में बने डिवाइडर को पार करना उसके लिए सम्भव नहीं था – जितनी उस बच्चे की ऊँचाई थी लगभग वही ऊँचाई डिवाइडर की थी।

बड़े दोनों डिवाइडर आसानी से पार कर गए लेकिन बच्चा इधर ही रह गया। ऐसा नहीं कि डिवाइडर पार करके वे अपने रास्ते जंगल में चले गए यह मानकर कि पीछे-पीछे बच्चा आ ही रहा है बल्कि शायद उन्हें इस बात का अंदेशा था कि बच्चे से वह दीवार पार नहीं होगी इसलिए वे सड़क की तरफ मुंह करके उसे देखने लगे। जब माँ ने देख लिया कि बच्चे से डिवाइडर पार नहीं हो पा रहा है तो वह वापस लौटी और डिवाइडर के पास पहुँच कर उसने बच्चे को अपने सूंड से सहारा दिया – पीछे से लगभग धकेलते हुई उसको दीवार पर चढ़ाया। इस तरह वह बच्चे को सुरक्षित अपने साथ ले गयी। पन्द्रह बीस मिनट लगे इस पूरे काम के सम्पन्न होने में और तब तक सड़क के दोनों ओर गाड़ियाँ रोके लोग खड़े रहे और धैर्य पूर्वक अपने बच्चे के लिए माँ का प्यार और अनूठा उपक्रम निहारते रहे।

कोई छः सात साल पुरानी घटना होगी जब हम राजाजी फॉरेस्ट रिजर्व के चीला रेंज से होते हुए ऋषिकेश से हरिद्वार की तरफ लौट रहे थे। शाम का समय था। एक जगह पतली सी पहाड़ी नदी सड़क को पार करती थी, वहाँ नदी के दोनों ओर लिखा हुआ है कि यह हाथियों के सड़क पार करने का स्थान है इसलिए यदि आपको हाथी दिखाई दें तो आप रुक जाएँ। उनको सड़क पार करने दें। यह लिखा देखना हमेशा रोमाँचित करता था लेकिन हाथी कभी आते जाते देखे नहीं थे वहाँ…. और दूसरी जगह पर देखे थे, वहाँ नहीं देखे थे। इस बार शाम को जब हम हरिद्वार लौट रहे थे तो वहाँ पहुँचते ही हमने देखा कि नदी से पहले गाड़ियाँ खड़ी हैं और नदी पार करके उस तरफ भी खड़ी हैं। हम भी खड़े हो गए। अंधेरा होने लगा था इसलिए कुछ लोगों ने अपनी हेडलाइट जला ली थी हालांकि उसकी जरूरत नहीं थी। मेरी नजर सामने एक बड़े हाथी पर पड़ी, मैंने इतना बड़ा हाथी पहले कभी नहीं देखा था ….और उसके पीछे साठ सत्तर मीटर पीछे लगभग बीस छोटे बड़े हाथियों का एक झुण्ड गोल बाँध कर खड़ा था।
हाथियों ने झुण्ड इस तरह से बनाया था कि बच्चे बीच में रहें, उन्हें चारों ओर से घेर कर रखने वाले बड़े हाथी बाहरी घेरे में। लेकिन बच्चे तो बच्चे होते हैं, चाहे इंसान के हों या हाथी के हों – वे भला कहाँ बंदिश मानने वाले… तो हर दूसरे मिनट पर कोई न कोई बच्चा घेरा तोड़कर बाहर निकल जाता था और बड़े हाथी उसे फिर पकड़ कर अन्दर ले आते थे। यह सिलसिला बड़ा मज़ेदार था। लेकिन सबसे ज्यादा गौरतलब था सरदार (बड़े हाथी) का कुनबे के नेतृत्व का ढ़ंग।
हाथियों का झुण्ड पहुंचा नक्सलबाड़ी ...
हाथियों का झुण्ड जहाँ का तहाँ खड़ा रहा और सरदार सधे कदमों से धीरे धीरे तीनों तरफ देखता हुआ आगे बढ़ता बढ़ता सड़क तक आया। सड़क पर पहुँचकर उसने चौथी तरफ भी देखा, यानी पीछे मुड़ कर पीठ पीछे का हाल-चाल भी लिया। उसे देखकर यह बिल्कुल साफ समझ आ रहा था कि वह बहुत चौकन्ना होकर अपने और अपने कुनबे की सुरक्षा के प्रति खुद को आश्वस्त कर रहा था – कहीं कोई ऐसी हरकत न दिखाई दे न सुनाई पड़े जो सबके लिए घातक हो। बीच सड़क पर वह दो-तीन मिनट खड़ा रहा और चारों तरफ उसने लगभग एक गोल चक्कर लगाते हुए तसल्ली की। उसके बाद धीरे-धीरे सड़क पार करके गंगा नदी की तरफ वाले जंगल में उसी तरह से धीर गम्भीर एक एक कदम आगे बढ़ाता हुआ और हर आहट हर हलचल को दिमाग में रिकॉर्ड करता हुआ आगे बढ़ा।

करीब 50 मीटर आगे जाकर वह खड़ा हुआ, उसने फिर से पीछे मुड़ कर देखा… चारों तरफ देखकर जब उसे सुरक्षा की तसल्ली हो गयी तब उसी तरह के सधे कदमों से वापस मुड़कर अपने कुनबे की तरफ चला। सड़क पर ठहर कर फिर उसने चारों तरफ देखा और उसके बाद चलता हुआ अपने कुनबे के पास आया जो उसके निर्देशों का बड़े धैर्य पूर्वक इन्तजार करता हुआ जहाँ था वहीं खड़ा था।
अपने कुनबे के पास पहुँचकर उसके व उनके बीच जिस भाषा में भी जिस संकेत में भी बात हुई वह हमें नहीं सुनाई पड़ी लेकिन हमने देखा यह कि सरदार हाथी आगे आगे और उसका कुनबा पीछे पीछे गंगा की तरफ बढ़ा। सड़क पर जाकर सरदार हाथी एक बार फिर खड़ा हुआ, उसने चारों तरफ देखा और गंगा की तरफ कदम बढ़ा दिए और छोटे-बड़े हाथियों का वह पूरा कुनबा उसके नेतृत्व में पानी पीने के लिए जंगल में आगे बढ़ गया।

नेतृत्व के दायित्व बोध का ऐसा उदाहरण मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा था और तब समझ में आया कि खानदानी तौर पर या चापलूसी के बल पर प्राप्त किया हुआ नेतृत्व कुछ दिन आगे भले ही बढ़ जाए पर चुनौतियों के सामने कभी टिकता नहीं। उस दिन इस पूरी घटना को अपनी आंखों से देख कर मुझे बहुत गहराई से महसूस हुआ कि हम मनुष्य अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बनने में लगे रहते हैं, अपने विवेक और अपने ज्ञान की दुहाई देते रहते हैं और धरती पर अपने को सर्वश्रेष्ठ बिरादरी मानते हैं। लेकिन हाथियों के बर्ताव को उस दिन देखकर मैंने माना कि अन्य जीव जंतु भी अपने भावनात्मक बर्ताव में हमसे उन्नीस नहीं…बल्कि कई बार इक्कीस ही ठहरते हैं। बार-बार मैं यह सोचता रहा कि अपने कुनबे को गंतव्य तक सुरक्षित ले जाने का जो मह ती दायित्व सरदार के ऊपर है वह कितना बड़ा और मूल्यवान दायित्व है और उसमें चूक होने पर कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

ये बातें एकदम से तब और गहराई से दिमाग में उमड़ने घुमदने लगीं जब अभी हाल में एक घटना मैंने अखबार में पढ़ी। एक अट्ठारह बीस साल का नौजवान फोन पर लगा हुआ था और देर से लम्बी बातें किए जा रहा था। रात का समय था, उसकी माँ बार-बार उसे खाने को बुला रही थी…. समय बढ़ता गया और बढ़ता गया, उसने माँ की पुकार पर ध्यान ही नहीं दिया। जब 10:30 बज गए और वह लड़का न खाने अन्दर आया, न ही माँ की बात का उसने जवाब दिया तो माँ रसोई से बाहर निकल कर दालान पर लड़के के पास जाकर उसे खुद बुला लाने के लिए गयी तो लड़के को उसकी बातचीत में व्यवधान इतना नागवार गुजरा कि उसने अपनी जेब से देसी पिस्तौल निकाली और माँ को सामने से गोली मार दी। लॉक डाउन का समय और देर रात पटना से सौ डेढ़ सौ किमी दूर इलाके में पड़ोसियों ने उसके इलाज की जैसी तैसी व्यवस्था रात भर की। सुबह उसे पटना बड़े अस्पताल में लाया गया जहाँ शाम होते-होते उस माँ ने दम तोड़ दिया। बस छोटी सी प्रेम और जिम्मेवारी की बात कि बेटे खाना खा लो, देर हो गयी है – उसकी जान लेने का कारण बन गयी।

मैं यह नहीं कहता कि सभी घरों में ऐसा ही होता है पर यह धीरे धीरे हमारे रिश्तो की बनावट का स्थाई भाव बनता जा रहा है। क्या हम बगैर डिग्रीधारी हाथियों से कुछ नहीं सीख सकते?

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15Mar
शख्सियत

धीमे भूकंप की तरह है सुबकना – यादवेन्द्र

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