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एतिहासिक

स्वामी सहजानन्द सरस्वती : सन्यास से समाजवादी तक का सफर

 

 पटना से 30 कि.मी पश्चिम बिहटा आजकल इन्डस्ट्रियल हब के रूप में परिणत होता जा रहा है। बिहटा के दक्षिण सड़क किनारे ही स्वामी सहजानन्द सरस्वती का ‘सीताराम आश्रम’ स्थित है। यहीं से उन्होंने देश भर के किसान आन्दोलन का संचालन किया। 1936 से लेकर 1944 तक यह ‘सीताराम आश्रम’ ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ का प्रधान कार्यालय भी था।

अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त इतिहासकार रामशरण शर्मा  एक बार अपनी सोवियत संघ की यात्रा का जिक्र करते हुए बताते हैं कि वहाँ महात्मा गाँधी के बाद सबसे अधिक सम्मान से जिस नेता का नाम लिया जाता था, वे थे स्वामी सहजानन्द सरस्वती। सोवियत संघ के विद्वानों का मानना था कि महात्मा गाँधी के पश्चात किसानों को जमीनी स्तर पर संगठित करने वाले  सबसे लोकप्रिय नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती ही थे। गाँधी जी के ‘साबरमती आश्रम’  की तरह स्वामी जी के  पटना के नजदीक बिहटा स्थित ‘सीताराम आश्रम’ की महत्वूपर्ण भूमिका थी। लेकिन ये दोनों आश्रम दो स्वाधीनता आन्दोलन के दो रास्तों के भी प्रतीक हैं। एक ‘मास’ तो दूसरा ‘क्लास’ आधारित राजनीति के पक्षधर थे।

स्वामी सहजानन्द सरस्वती की मृत्यु 61 वर्ष की अवस्था में 26 जून 1950 को हुई थी। उनका जन्म गाजीपुर में हुआ था तथा बचपन का नाम नवरंग राय था। बेहद कम उम्र में ही नवरंग राय ने सन्यास ग्रहण कर लिया। सन्यास के पश्चात उनका नाम पड़ा स्वामी सहजानन्द सरस्वती। उन्होंने देश के कई हिस्सों की यात्रा की, हिन्दू धर्मग्रंथों का विषद अध्ययन किया।

अपने प्रारम्भिक दिनों में स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने, जैसा कि उस समय प्रचलन था, जातीय संगठन भूमिहार ब्राह्मण सभा, में काम करना शुरू किया। लेकिन बहुत जल्द ही उनका इन सभाओं से मोहभंग हो गया। इन सभाओं की उपयोगिता जमींदार अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए किया करते थे। उन्हें खुद इसका अनुभव हुआ ‘‘जातीय सभाएँ पहले तो सरकारी अफसरों को अभिनन्दन पत्र देने और राजभक्ति का प्रस्ताव पास करने के लिए बनी थी। इस प्रकार कुछ चलते-पुर्जे तथा अमीर, जातियों के नाम पर सरकार से अपना काम निकालते थे।’’

जातीय सभाओं की सीमाओं को समझ उन्होंने अपने अनुभव से किसानों के दुःख को पहचाना। इस दुःख-तकलीफ की असली जड़ जमींदारी प्रथा थीं। जमींदारी के विरूद्ध संघर्ष ज्यों-ज्यों आगे बढ़ने लगा जातीय सभाएँ समाप्त होती गयी। बिहटा स्थित सीताराम आश्रम के प्रति जमींदारों में संषय पैदा होने लगा।

   1929 में उन्होंने भूमिहार ब्राह्मण सभा भंग कर दी और ‘किसानों को फंसाने की तैयारियां’ शीर्षक पुस्तिका में जाति व धर्म के नाम पर चलने वाले ढ़कोसलों और संगठनों को राष्ट्रीयता में बाधक बताया। स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा ‘भूमिहार ब्राह्मण सभा’ पर यह ऐसा घातक प्रहार था जिससे वो सभा फिर कभी दुबारा अपने सर न उठा सकी।

जैसे-जैसे वे स्वाधीनता संग्राम और किसान आन्दोलन में खिंचते गए उनके विचारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आता गया एवं जमींदारी प्रथा के विरूद्ध भी भावना बलवती व वेगवान होती चली गयी।

लेकिन स्वतंत्रता आन्दोलन की नुमाइंदगी करने वाली कांग्रेस पार्टी जमींदारों के प्रति संघर्ष को लेकर अनिच्छुक थी। स्वामी सहजानन्द सरस्वती को ये अहसास हुआ ‘‘ बिहार के कांग्रेसी लीडर जमींदार और जमींदारों के पक्के आदमी हैं। एक-एक के बारे में गिन-गिन के कहा जा सकता है। जमींदारी प्रथा के चलते जमींदारों ने इतने पाप और अत्याचार किसानों पर किए हैं और अभी भी करते हैं कि इंसान का कलेजा थर्रा जाता है और मनुष्यता पनाह माँगती है। ’’

स्वामी सहजानन्द सरस्वती अपने प्रारम्भिक दिनों में महात्मा गाँधी से बेहद प्रभावित थे। पटना में में उनकी मुलाकात भी उनसे हुई । उन्हीं से प्रभावित होकर वे सन्यास का जीवन छोड़ कांग्रेस और स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल हुए लेकिन किसानों के मसले जमींदारों के खिलाफ  स्पष्ट स्टैंड न लेने की वजह से वे धीरे-धीरे उनसे दूर होते चले गए। 1934 मे भूकंप से तबाह किसानों से दरभंगा महाराज द्वारा लगान वसूलने के सवाल पर गाँधी जी से निर्णायक विच्छेद हो गया।

महात्मा गाँधी चाहते थे कि अँग्रेजों के खिलाफ सभी तबकों का एक संयुक्त मोर्चा बने। स्वामी सहजानन्द सरस्वती का मानना था कि अँग्रेजों का औपनिवेशिक शासन जमींदारों पर टिका है। अँग्रेजी साम्राज्यवाद का देशी आधार यही जमींदार है अतः इन्हें यदि उखाड़ फेंका जाए तो देश को औपनिवेशिक शासन से मुक्ति मिल जाएगी। कथा सम्राट मुंषी प्रेमचंद भी अपने अंतिम दिनों में लगभग ऐसे ही निष्कर्ष पर पहुँच रहे थे। उनकी कहानी ‘आहूति’ इसका परिचायक है जिसमें वे साम्राज्यवाद के देशी आधार यानी जमींदारी का प्रश्न उठा रहे थे।

1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का जब गठन हुआ स्वामी सहजानन्द सरस्वती उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गये। 1937 में प्रांतीय सरकारों का गठन होता है। किसान आन्दोलन में तेजी आती है। जमींदारों के विरूद्ध संघर्ष तेज होने लगता है। बिहार में महापंडित राहुल सांकृत्यायन, जनकवि नागार्जुन, जयप्रकाश नारायण, लोकाख्यान बन चुके नक्षत्र मालाकार, कार्यानन्द शर्मा , यदुनन्दन शर्मा सभी स्वामी सहजानन्द सरस्वती के साथ चले आते हैं। बड़हिया टाल आन्दोलन, नवादा का रेवड़ा सत्याग्रह, देवकी धाम की लड़ाई, अमवारी  सत्याग्रह ये सब किसान आन्दोलन के प्ररेणादायी अध्याय हैं। गुजरात से इंदूलाला याग्निक, आंध्र प्रदेश से एन.जी रंगा, केरल से ई.एम.एस नंबूदिरीपाद, बंगाल से बंकिम मुखर्जी ये सभी स्वामी सहजानन्द सरस्वती की अगुआई स्वीकारते हैं।

किसान सभा में स्वामी सहजानन्द सरस्वती समाजवादी व वामपंथी दोनों एक साथ शामिल थे। देश भर में किसान आन्दोलन खड़े होने लगे। इन आन्दोलनों से पैदा हुए भय का परिणाम था  कि बिहार व उत्तरप्रदेश के मुस्लिम जमींदारों ने, जिन्ना के नेतृत्व में, 1940 के लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान की माँग उठायी। पाकिस्तान आज यदि फिरकापरस्त ताकतों का गढ़ बना हुआ है उसका कारण है बड़े-बड़े जमींदारियों का आज तक बरकरार रहना।

एक शास्वत विद्रोही संन्यासी- दंडी ...स्वामी सहजानन्द सरस्वती का मानना था कि मुस्लिम लीग के सामाजिक आधार जमींदारों को ही कमजोर कर दिया जाय तो पाकिस्तान की माँग करने वालों की  जमीन ही खिसक जाएगी। लेकिन तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व इतना रैडिकल कदम उठाने के लिए तैयार न था। इसका खामियाजा देश के विभाजन व उससे उपजी  बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा के रूप में हुई। जमींदारों के खिलाफ आन्दोलन को निर्णायक कदम तक न उठाने का नतीजा हुआ कि अधिक हिंसा हुई। महात्मा गाँधी की अहिंसा के रास्ते की वकालत ने बड़े पैमाने पर हिंसा को जन्म दिया। जमींदारी के विरूद्ध संघर्ष न चलाने की कीमत महात्मा गाँधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। यहाँ तक की जिस बंदूक से उनकी हत्या हुई वो बंदूक भी उनके प्रपौत्र तुषार गाँधी के अनुसार ‘‘एक बड़े रियासत वाले जमींदार ने ही मुहैया करयी थी।’’

  राष्ट्रीय नेताओं में स्वामी सहजानन्द, सुभाषचंद्र बोस के करीब आए। सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने में स्वामी जी ने उनका साथ दिया था। कांग्रेस से हटने के बाद जब सुभाषचंद्र बोस द्वारा बनायी गयी ‘फारवर्ड ब्लॉक’ के साथ मिलकर 1940 के कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन के समानान्तर किए गए ऐतिहासिक ‘समझौता विरोधी सम्मेलन’  आयोजित किये जिसमें महात्मा गाँधी की की सभा से अधिक भीड़ थी।

 स्वामी सहजानन्द सरस्वती का झुकाव धीरे-धीरे मार्क्सवाद की ओर होता जा रहा था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1941 में जब हिटलर ने सोवियत रूस पर हमला किया तो युद्ध का चरित्र बदल सा गया।  कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘पीपुल्स वार’ का नारा दिया।  फासिज्म के खतरे से सोवियत रूस को बचाने के लिए स्वामी सहजानन्द सरस्वती भी ‘पीपुल्स वार’ के नारे के साथ हो गए। जवाहर लाल नेहरू सरीखे अन्तर्राष्ट्रीयतावादी  समझे जाने वाले नेता तक इस निर्णायक मौके पर पीछे हट गए थे।

इस नारे का सबसे अधिक दुष्परिणाम स्वामी सहजानन्द सरस्वती को झेलना पड़ा। रूस को बचाने के लिए अॅंग्रेजों के सहयोग की तात्कालिक रणनीति काफी महंगी पड़ी। अॅंग्रेजों को सहयोग का मतलब था जमींदार विरोधी संघर्ष का स्थगित होना। लेकिन फिर जल्द ही संभल गया। 1945-46 आते-आते किसान सभा के मजबूत आधार वाले राज्यों में ताकतवर किसान आन्दोलन खड़े हो गए। आंध्र प्रदेश से ऐतिहासिक तेलंगाना आन्दोलन, बंगाल का तेभागा, केरल का पुनप्प्रा वायलर, बिहार का बकाष्त संघर्ष, आसाम का सुरमा-वैली का आन्दोलन। पूरे देश में किसान उठ खड़े होने लगे।  जमींदार विरोधी यह धारा यदि अपनी तार्किक परिणति तक पहुँचती तो भारत का चेहरा ही कुछ और होता। 

स्वामी सहजानन्द सरस्वती किसानों पर जमींदारों का जो वैचारिक प्रभाव या ग्राम्शी के शब्दों में कहें ‘कल्चरल एँड आईडियोलाजिकल हेजेमनी’ था उससे मुक्त करना चाहते थे। स्वामी सहजानन्द की चिंता को कुछ इन शब्दों से समझा जा सकता है ‘‘ हमने अनुभव किया है कि धनिकों और सत्ताधारियों की तड़क, भड़क और साज सामान को देख कर ही उनका रोब किसानों पर जमाया जाता है। लोग कहते हैं कि वह बड़े जर्बदस्त हैं। देखिए न उनका प्रभाव, उनका चेहरा, उनकी सकल सूरत, उनके महल, उनकी मोटरें और दूसरे सामान?  इससे गरीब और चिथड़े में लिपटा किसान सचमुच धोखे में पड़के डरने लगता है। वह उन्हें अच्छा, बड़ा और आदरणीय समझ बैठता है। गुरू, पंडित, पीर और मौलवी भी अमीरों की ही वकालत करते हैं और कहते हैं कि उनसे दबना चाहिए, डरना चाहिए। उन्हें भगवान ने बड़ा और तुम्हें छोटा बनाया है। ’’

धर्म के नाम पर किए जा रहे पाखण्ड के विरूद्ध स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने निर्ममतापूर्वक संघर्ष चलाया ‘‘जिस देश के परलोक और स्वर्ग-बैकुंठ का ठेका निरक्षर एवं भ्रष्टाचारी पंडे-पुजारियों के हाथ में हो, कठमुल्ले तथा पापी पीर-गुरूओं के जिम्मे हो उसका तो ‘ खुदा ही हाफिज’ है।’’ वे धर्म को निहायत व्यक्तिगत वस्तु मानते थे ‘‘ धर्म तो मेरे विचार से सोलहो आना व्यक्तिगत चीज वस्तु है जैसे अक्ल, दिल, आँख, नाक आदि। दो आदमियों की एक ही बुद्धि या आँख नही हो सकती तो फिर धर्म कैसे दो आदमियों का एक होगा?’’

भारत के धर्म व जाति के सम्बन्ध में पश्चिम की एक खास तरह की समझ रही है। स्वामी सहजानन्द सरस्वती उस समझ के लिए चुनौती की तरह थे। वाल्टर हाउजर के छात्र एवं स्कॉलर विलियम पिंच की यह टिप्पणी द्रष्टव्य है ‘‘ एडवर्ड सईद की परिपे्रक्ष्य में बदलाव लाने वाली प्रख्याति पुस्तक ‘ओरियेंटलिज्म’ ने  ‘जाति’ व ‘धर्म’ को अपरिर्वतनीय श्रेणियों के बतौर देखने की ओर इशारा किया। यानी हिन्दूइज्म भारत को, यदि हेगलीय या र्माक्सवादी अर्थ में कहें तो, इतिहास की मुख्य धारा में प्रवेश करने से रोक रही है। 1980 के मध्य से मुझे ऐसा लगने लगा कि स्वामी सहजानन्द सरस्वती (उनके सन्यासी जीवन की गतिशीलता ने) के व्यक्तित्व ने ऐसी पुरानी धारणाओं पर हमेशा क लिए चुनौती पेश कर दी है।’’

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