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परसूपुर
संस्कृतिसंस्मरण

परसूपुर: मेरी स्मृतियों में मेरा गाँव

 

गाँव के बली चाचा की जेठ की दुपहरी में पों-पों करती भोपू की आवाज और फिर हम बच्चों का उनके पीछे जा के बरफ का गोला लेना। सबसे मजेदार बात थी कि आम के बदले बरफ जिसे अर्थशास्त्री बार्टर या अदला-बदली कहते हैं और फिर हम सब बच्चे हकड़ू चाचा के बगीचे के ही आम तोड़ के बरफ लेते। आम के नाम पे याद आया हम बच्चे आम तोड़ के जमीन में गड्ढा बना कर जामुन की पत्तियों में आम को रख के गड्ढे में दबा देते थे और दो दिन में वह पक जाता था। आज बिना कार्बाइड के आम पकता ही नहीं और बिना अक्सिटोसिन के भैंसें दूध ही नही देती। अब भुल्लर चाचा का वो बाइसकोप भी नहीं दिखता क्योंकि अब केबल टीवी जो आ गया है।

गाँवों की वो नाँच, नाटक-नौटंकी, आल्हा-बिरहा-कजरी की परम्परा भी गुम हो गई है। वर्तमान में लोक संगीत और लोक परम्परा, लोक कथा सब समाज विज्ञानियों या साहित्य के विद्वानों के अध्ययन की विषयवस्तु बन के रह गई हैं। हम बच्चे कुल्हड़ की पेन्दी में छेद करके धागे से आपस में बाँध के एक दूसरे से हेल्लो-हेल्लो करते खेलते थे और अब फेसबुक, वाट्सएप, मोबाइल सब गाँवों में पहुँच गया है। अब हम बगल के कमरे में रहते हुए माँ से वाट्सएप पे पूछते हैं खाना क्या बना रहे हो? नानी माँ की कहानियाँ खो गई। नातेदारी व्यवस्था कमजोर हो गई जो भारतीय गाँवों की कभी पहचान हुआ करती थी। सबकुछ टूटा-टूटा उखड़ा-उखड़ा सा है। इस बदलाव में गाँव की आत्मा शायद मर गई है।

आज तीस वर्ष बाद इलाहाबाद से लखनऊ जाते समय मार्ग मे पड़ने वाले गाँवों को देख कर अपना गाँव याद आ गया। वो सोन्धी खुश्बू वाले पुरेड़ से लीपे हुए घर विकास की आँधी में जैसे विलुप्त से हो गये हों। पुराने हल-बैल की खेती की जगह शोर करते ट्रैक्टर ने ले ली है। गाँव के दुध्हड़ की जगह पराग के मिल्कबूथ ने ले ली है और देसी गायों की जगह जर्सी ने। दिल में आया काश दादी माँ की उन उँगलियों को एक बार फिर से चूमने को मिल जाता जो मथनी के चलने के साथ मुँह में ताजा मक्खन डाल देती थीं। दादी मेरे चेहरे और हाथ पर मक्खन मल देती थीं। मैं मुँह बिचकाता तो वो मुस्कुरा के कहतीं, ‘बेटवा ऐसे चमड़ी मुलायम बनी रहत है’। यह ग्रामीण समाज की अपनी देशज ज्ञान व्यवस्था है।

खैर, मैं अब मुद्दे पर आता हूँ। मेरे गाँव का नाम परसूपुर है जो जौनपुर जिले के मुख्यालय से तीस किलोमीटर दूर है। आम की बात की थी तो बताते चलें कि अब वहाँ आम के बगीचे नहीं रह गये। बाइस-तेइस साल चले ईंट के भठ्ठों ने इन वृक्षों, बगीचे को निगल लिया। फलदार वृक्षों की जगह यूकेलिप्टस ने ले ली। गाँव में शिक्षा का स्तर अभी भी ज्यादा नहीं है। तीस साल पहले गाँव का परिषद स्कूल आज भी वैसा ही है बस उसके किनारे का तालाब पट गया है। याद आता है जब हम बचपन में उस स्कूल में जाते थे तो भागीरथी नरकुल की कलम बेचते थे। मै अपने दोस्तों के साथ अपनी तख्ती उसी तालाब के पानी में चमकाता था और सोचता था खूब मेहनत करूँगा और भागीरथी से कलम खरीद के लिखूँगा। पारकर की कलम खरीद ली लेकिन भागीरथी की कलम नहीं खरीद पाया क्योंकि भागीरथी बीमारी से चल बसे और गाँव या आसपास में आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं बन पाया है।

जब तक हम भाई गाँव में संयुक्त परिवार में रहते हमारे बीच खेल-कूद और मनोरंजन का एक और तरीका था एकदम यूनीक! शायद ही लोग खेलते हों। संयुक्त परिवार में पलने-बढने के अपने मजे हैं। आज भी हम भाई उस परम्परा को निभाना चाहते हैं। जब भी हम भाई अपने घर के आँगन में बैठ के खाना खाते थे तो हमारे आस-पास बहुत सी गौरैया अन्न के दानों के लिये आ के बैठ जातीं थीं। हम भाई गौरैयों को रिझाने और परचाने के लिये अपनी थाली से भात निकाल के चुपके से उनकी तरफ फेक देते।

कई बार बडी माँ की नजरें हम लोगों को ऐसा करते देख लेतीं। कई बार हम भाइयों के बीच झगडा इस बात पे होता की मेरी गौरैया को क्यों भगाया। बडी माँ ने इस झगडे को खत्म करने का आसान सा रास्ता बताया। हम लोग कैलाश चाचा की परचून की दुकान से नीली, लाल और हरी स्याही ले आये और अपनी अपनी गौरैयों पे अपनी पहचान का रंग पिचकारी की मदद से डालना शुरू कर दिया। अब गाँव में गौरैया भी कम या न के बराबर दिखती हैं। यह भी अन्य अनगिनत जीव-जन्तुओं की तरह लगभग विलुप्त ही हो चुकी है। आज हम भाई देश के अलग-अलग कोनों में नौकरी करते हैं लेकिन सोचते हैं बालपन के वो दिन कितने अच्छे थे। कहावत भी है कि हम बाहर निकलते ही इसलिए हैं कि अपने गाँव-घर लौट सकें। गाँव हम सब के ह्रदय में हमेशा रहता है, चाहे हम दुनिया के किसी कोने में रहें। आज सामजिक संस्थाओं का भी विघटन हो रहा है और आपसी संवाद भी भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में कम हो रहा है। उस समय गौरैया ही सही माध्यम तो था आपस में संवाद का। हालांकि आज भी संवाद का साधन एक गौरैया ही है। अरे! मैं आजकल के ट्विटर का जिक्र कर रहा। संयुक्त परिवार अब गाँव में गिने-चुने ही हैं, लगभग उतनी संख्या में हीए जितनी कि गाँव में गौरैया बची होंगी।

जब विलियम वाइजर ने 1936 में जजमानी व्यवस्था की बात की थी तो शायद ही उसने सोचा होगा कि भारतीय गाँव इतने बदल जायेंगे कि ये व्यवस्था मृतप्राय या समाप्त हो जायेगी। नई पीढ़ी का बादे नाऊ ठाकुर बंबई कमाने चला गया। उनके पिता जी ने हमारे दादा से ले कर हम लोग के भी बाल बनाये थे। वो इस दुख और कोफ्त में गुजर गये कि बादे ने वो क्यों नहीं किया जो जजमानी का नियम कहता था। जजमानी का प्रकार्यात्मक महत्त्व था। घुरहू मुसहर ढोल बजाते थे, उनका बेटा लीला ईंट भट्ठे में पथेला बन गया। अजिमुल्ला दर्जी की तो बात ही निराली थी। मैं जब भी उनके पास जाता उनको पैर से चलने वाली सिलाइ मशीन पर कपड़े सिलते पाता। मैं उनके पैर के पास अपने पैर ले जाकर उस लोहे के पाट पर रख देता और मशीन को रोकने की कोशिश करता और वो निर्मल हँसी हँसते हुए कहते, ‘बेटवा बदमाशी जिन करा’। मैं अपनी दादी के साथ जब भी उनके घर जाता उनकी पत्नी मठ्ठा ले कर आती थीं। उस मठ्ठे जैसा स्वाद आज के ब्रांडेड मठ्ठे में कहाँ। उसमें प्यार और वात्सल्य होता था, आज की तरह हिन्दू-मुसलमान का द्वेष और वैमनस्य नहीं। जजमानी व्यवस्था का यही फायदा था कि जाति-धर्म की जगह लोग प्रेम-भाव में विश्वास रखते थे। जजमानी व्यवस्था मौद्रिक तंत्र के अभाव में उपजा एक शानदार तंत्र था, अलग बात है कि कालांतर में इसमें विकृतियाँ आ गई। ऐसा नहीं कि यह प्रेम और सौहाद्र केवल गाँव के लोगों तक ही सीमित था बल्कि यह दूसरे गाँव तक विस्तृत था क्योंकि जजमानी के स्वरूप में जरूरी नहीं कि हरेक किरदार प्रत्येक गाँव में उपलब्ध हो।

मुझे लगता था गाँव में शिक्षा का स्तर बढ़ेगा लेकिन आज भी स्थिति वैसी ही है। गाँव की लड़कियाँ आज भी स्कूल जाने से बचतीं हैं। और डरें भी क्यों ना? स्कूल-कॉलेज दूर हैं, आवागमन के साधन कम हैं, और उसपर विवाह की उम्र कम। ऊपर से ताने कि शादी के बाद घर में चूल्हा-चौंका ही करना है, खेती में हाँथ बटाना है। गाँव के युवा लड़के आज भी ताश की गड्डी फेंटने में ज्यादा भरोसा रखते हैं। ऐसा नहीं है कि गाँव में कोई पढ़ा-लिखा ही नहीं। गाँव से पीएच.डी., प्रोफेसर, आइ.पी.एस., आई. ए. एस, यू.जी.सी. जे.आर.एफ., एमबीबीएस, आइआइटियन, एडवोकेट भी निकले हैं लेकिन कुछ ही परिवार ये कर पाये हैं। अधिकांश आज भी आजीविका की तलाश में बंबई भागने की फिराक में रहते हैं। गाँव में स्किल डेवलपमेन्ट का कोई केंद्र नहीं है। 1289 की जनसंख्या वाले इस गाँव को जब अम्बेडकर गाँव घोषित किया गया तो लगा था स्थिति बद्लेगी लेकिन दलित परिवारों की सूरत आज भी बी.पी.एल. की ही है। अलबत्ता स्टेट हाइवे बनने के कारण ऐसे कई परिवारों ने अपनी जमीन बेच के अपने ऊपर भूमिहीन का ठप्पा जरूर लगा लिया है। भूमि हस्तान्तरण तो हो गया लेकिन सामाजिक-आर्थिक उन्न्यन की दरकार आज भी है।

गाँव के कुएँ के पानी की बात ही और थी, एक्वा गार्ड के पानी में वो दम कहाँ। याद आता है जब गाँव में पुर-मोट और रहट से पानी मिल जाता था, अब तो पंप से भी पानी नहीं मिल पाता। जल श्रोतों का दोहन इतना अधिक हो गया है सिंचाई के नाम पर कि सूखे और अल्प वर्षा के कारण गाँव के फसल चक्र में भी बहुत परिवर्तन हो गया है। जब मैं छोटा था तो यहाँ गेहूँ-धान के साथ साथ खरबूजा/खिरमिन्नी, ककड़ी, मक्का, मूँग-उड़द, आलू-प्याज-लहसुन और अनेक प्रकार की मौसमी सब्जियाँ खूब होती थीं, चैलाई-बथुआ-नारी के साग की तो भरमार रहती थी। इतना की लोग उनको घर लाने के लिए बैलगाड़ी का उपयोग करते थे। कीटनाशकों के अत्यधिक मात्रा में उपयोग के कारण इनका ओर्गेनिक स्वरुप तो समाप्त हुआ ही है उत्पादन भी न के बराबर हो गया है। फलस्वरूप इनको भी नजदीकी बाज़ार से खरीद कर लाना पड़ता है। बैलों से चलने वाली चरखी से गन्ना हरेक घर में पेरा जाता था। हम सब दोस्त ताजा गुड़ खाने के लिये किसी के भी घर इकठ्ठा हो लेते। गाँव में पनुआ पीना लोग पसंद करते थे। पनुआ कड़ाह से गुड़ निकालने के बाद बचा-खुचा अंश होता था जिसे पानी के साथ उबाल कर, उसमें जराकुश और तुलसी मिला कर लोगों को चाय की जगह पेश करते थे। आज उसी को पतंजलि उत्पाद या जोशन्दा के रूप में खरीद के पीते हैं। गाँव की परम्परायें इंडीजीनस नालेज यानी कि देशज ज्ञान तंत्र के तानेबाने से बखूबी जुड़ी होती थीं या यूँ कहें कि एक दूसरे की पूरक होतीं थीं। यह ताना-बाना भी आधुनिकता की बयार में छिन्न-भिन्न होता जा रहा क्योंकि नई पीढ़ी इसका झंडा बरदार बनने को तैयार नहीं।

‘परसूपुर’ ग्राम के अध्ययन के माध्यम से यह आलेख भारतीय गाँवों के बदलते स्वरुप और उनकी वर्षों पुरानी परम्पराओं के क्षरण के प्रति विमर्श एवं चेतना विकसित करने का एक प्रयास है। भारत में ग्राम्य अध्ययन का यही महत्व है कि यह हमें दो तरह के मौके उपलब्ध कराता है, पहला, एथ्नोग्रफिक अध्ययन को अनुप्रयुक्त करने के असीम अवसर और दूसरा, भारतीय गाँवों में आये सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझने और ग्रामीण पुनर्निर्माण हेतु नियोजित विकास योजनाओं को लागू करने में सहायता।

ग्राम्य अध्ययनों और भारतीय ग्रामों में गहन क्षेत्रकार्य ने आंग्ल शासन के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा भारतीय संस्कृति और ग्रामों के सन्दर्भ में निर्मित और स्थापित रूढ़िबद्ध धारणाओं को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है जिसके परिणामस्वरुप विकास योजनाओं को गति मिली और अलग-थलग पड़े ग्रामों को विकास की मुख्य धारा में समाहित करने में आसानी हुई।

प्रस्तुत आलेख में ऑटोएथनोग्राफी विधि का उपयोग करते हुए लेखक अपने गाँव ‘परसूपुर’ के माध्यम से भारत के ग्रामों में आने वाले परिवर्तनों की तरफ इशारा करता है। उसके विमर्श के मूल में यही है कि कैसे ग्रामों को विकसित करते हुए भारत की देशज परम्पराओं को भी संजोये रखा जा सके। यानी हमारे गाँव अपने मूल वास्तविक स्वरुप में बचे रहें और साथ ही साथ विकास की मुख्यधारा का भी हिस्सा बन सकें।

गाँधी जी ने कहा था ‘असली भारत गाँवों में बसता है और हम तब तक भारत का उत्थान नहीं कर सकते जब तक हम गाँवों के उत्थान में असमर्थ हैं’। उन्होंने गाँवों की आर्थिक स्वतंत्रता और ‘ग्राम स्वराज’ को स्थापित करने की पुरजोर वकालत की थी।

एम एन श्रीनिवास का मानना था कि पुस्तकों में लिखित ज्ञान सन्दर्भ का अच्छा साधन हो सकता है लेकिन क्षेत्रकार्य से प्राप्त ज्ञान का कोई विकल्प नहीं होता है। उनके द्वारा किये गए ग्राम अध्ययन एक तरफ तो भारतीय ग्रामों में कृत क्षेत्रकार्य का नृजातिवृत्तान्त वर्णन प्रस्तुत करते हैं तो दूसरी ओर भारतीय ग्रामों के ‘सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई’ के रूप में उपयोग को इंगित करते हैं।

परसूपुर

ब्रिटिश शासन के काल में ही आरम्भ हुए ग्राम अध्ययनों के हेतु भिन्न थे लेकिन चाल्र्स मेटकाफ़ का दिल्ली के ग्रामों पर 1830 में किया गया अध्ययन, एच एस मैने का 1871 का अध्ययन, बेडेन-पावेल की 1892 की तीन वॉल्यूम में रिपोर्ट देखी जा सकती हैं। आज़ादी के उपरान्त एम एन श्रीनिवास का ‘रामपुर’ (मैसूर/कर्नाटक), एस सी दुबे का ‘शामिरपेट’(आंध्रप्रदेश), आंद्रे बैतिले का ‘श्रीपुरम’(तमिलनाडु), एफ जी बेली का ‘बिसिपारा’(ओडिशा), डी एन मजुमदार का ‘मोहना’(उत्तर प्रदेश) गामों का अध्ययन इसी परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं। हालांकि दुबे ग्राम अध्ययन परंपरा पर प्रश्न भी खड़े करते हैं कि ग्राम्य अध्ययन अपनी प्रकृति से समग्र का प्रतिनिधत्व नहीं करते हैं। कई बार ये अध्ययन पश्चिमी मॉडल से प्रभावित होते हैं। दुबे यहाँ तक मानते हैं कि इन अध्ययनों में ग्रामों की वास्तविक रियलिटी को न प्रस्तुत कर उनकी एकत्मकता/एकता, एकजुटता तथा आत्मनिर्भरता को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है।

जो भी हो मानवविज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि गाँवों को जैव विविधता संरक्षण की तर्ज पर तरजीह दिए जाने की आवश्यकता है अन्यथा जैविक प्रजातियों की भांति ये विलुप्त होते जायेंगे और यदि यह हुआ तो हम अपनी जड़ों से, अपनी परम्पराओं से, अपनी पहचान से च्युत हो जायेंगे इसमें कोई दो राय नहीं।

ग्राम अध्ययन भारतीय मानवविज्ञान एवं समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण विषयवस्तु रहे हैं। श्रीनिवास, मजूमदार, विद्यार्थी, दुबे, मेंडेलबौम, बेली, बेतिले आदि अनेक नाम हैं जिन्होंने इस परम्परा को उप्लब्धि प्रदान की। लेकिन क्या इतने से कर्तव्यों की इतिश्री हो जाती है। क्या हम मानववैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों तथा सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वालों की ये भी जिम्मेदारी नहीं कि अपनी अमूल्य धरोहर और भारतीय परम्पराओं के वाहक इन गाँवों को जिन्दा रखने के प्रयास करें। पता नहीं आप सब मेरी बातों से कितना इत्तेफाक रखते हैं लेकिन मुझे उम्र के इस पड़ाव पे मशीन की तरह उप्भोक्तावादी संस्कृति में भागमभाग की जिंदगी से उलझन होती है और मेरा मन कहता है, गाँव में जा के अजिमुल्ला चाचा को खोजूँ और अगर वो ना दिखें तो जोर जोर से उनको पुकारूँ…फिलहाल मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि “आई मिस यू अजिमुल्ला चाचा”

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