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समीक्षा

उसके हिस्से की धूप: नारी चेतना का समीक्षात्मक अध्ययन

 

‘उसके हिस्से की धूप’ उपन्यास मृदुला गर्ग की पहली कृति है जिसे सन 1975 में अक्षर प्रकाशन से राजेंद्र यादव ने छापा था। यह स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर आधारित एक प्रौढ़ सर्वाधिक चर्चित प्रशंसित उपन्यास है। यह शायद पहला उपन्यास था किसी भी भाषा में जिसमें विवाह के इतर प्रेम होने पर स्त्री को कोई अपराध बोध नहीं होता है। यह उपन्यास समय में बंधकर कर नहीं बल्कि आगे के बारे में लिखा गया है। सन 1975 में जब लेखिका विवाहेत्तर सम्बन्धों के बारे में लिख रही थी तो उस समय समाज में ऐसी घटनाएं घटित हो रही थी लेकिन सच कहने का जोखिम कोई उठाना नहीं चाहता था। लेखिका ‘उसके हिस्से की धूप’ उपन्यास के माध्यम से हिन्दी साहित्य में नए मानदण्ड को लेकर उपस्थित होती हैं। जो पुरातन रूढ़िवादी स्त्रियों के प्रति धारणा को ध्वस्त करती हैं। अपने अधिकांश उपन्यासों में आज की नारी को उसके सहज मानवीय रूप में चित्रित करती है तथा उसके अस्तित्व को स्वतन्त्र रूप में दृढ़ता पूर्वक स्वीकार करती हैं।

मृदुला गर्ग ने इस उपन्यास के माध्यम से स्त्री की प्रचलित छवि को तोड़ना चाहा है ‘मैं इस पुरुष के लिए क्या हूँ?’ यह पूछने वाली स्त्री यह प्रश्न पूछने लगती है कि ‘मैं क्या हूँ?’ यह उपन्यास स्त्री को अपने आप से परिचित करवाता है और सिर्फ परिचित ही नहीं कराता बल्कि स्त्री जीवन की सार्थकता का नया मार्ग तलाश करता है। प्रस्तुत उपन्यास में जितेन, मनीषा, मधुकर तीन प्रमुख पात्र हैं। मनीषा अपना आरम्भिक जीवन जितेन से विवाह करके व्यतीत करती है बेशक जितेन भी उसे बहुत प्रेम करता है परन्तु बेंगलुरु में कागज बनाने की फैक्ट्री में दिन-रात काम करने में व्यस्त जितेन उसे वक्त नहीं दे पाता और उसका अकेलापन बढ़ता ही जाता। जितेन खुद भी आजाद मिजाज का था और औरों को भी आजादी देता था। जितेन विचारों से परिपक्व एवं काफी समझदार आदमी था। वह रिश्तों को अपने या दूसरों पर हावी होने नहीं देता था वहीं मनीषा के पास समय ही समय था। उसे ही हमेशा जितेन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती थी इसी अकेलेपन से बचने के लिए वह कॉलेज में अध्यापकी करने लगती है। वहाँ उसका परिचय अर्थशास्त्र के प्राध्यापक मधुकर नागपाल से होता है दोनों में नजदीकियाँ बढ़ती है, एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। मधुकर का बेहद जरूरतमंद सहवास मनीषा को विशेष आकृष्ट करता है। मनीषा जितेन को लेकर सोचती है कि-

“जिस आदमी को उससे बात करने तक की फुर्सत नहीं है उससे कैसा लगाव? जो रिश्ता रात के अंधेरे में जन्म लेता है और चंद घंटे कायम रहकर दिन के उजाले के साथ खत्म हो जाता है उसे तोड़ने से कैसा संकोच?”1

वह जितेन से तलाक लेकर मधुकर से विवाह कर लेती है। विवाह के बाद कुछ दिनों तक मधुकर और मनीषा ने जैसा चाहा वैसा जीवन जिया परन्तु एक दिन वह इस वैवाहिक जीवन से भी उब गई। वास्तव में मनुष्य जिन परिस्थितियों में जी रहा होता है उससे वह असंतुष्ट रहता है। उसे दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। प्रेम जीवन का एक मूल्य जरूर है पर प्रेम ही जीवन का सर्वस्व नहीं है। यह मनीषा ने अपने अनुभव के आधार पर जाना था वास्तव में मनुष्य अनुभवों से गुजर कर बहुत कुछ सीखता है प्रेम स्थायी और निरंतर नहीं, चूक जाता है –

“इतना घनत्व प्रेम में नहीं होता कि वह अंतरिक्ष जैसे फैले जीवन के शून्य को सदैव के लिए भर सके कुछ थोड़े से क्षण ऐसे अवश्य आते हैं जब वह इतना फैल जाता है कि उसका ओर छोर नहीं मिलता पर देखते ही देखते फिर से उलझकर यू सिमट जाता है कि पता ही नहीं चलता कहाँ समा गया।”2

जिस तरह प्रेम से जिन्दगी का खालीपन नहीं भर सकता वैसे ही एक को छोड़कर दूसरे से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने से भी यह खालीपन दूर होने वाला नहीं अंततः वह इस निर्णय पर पहुँचती है कि जीवन का खालीपन भरने के लिए आत्म सार्थकता की तलाश करनी होगी। मृदुला गर्ग ने चित्तकोबरा की भूमिका में मनीषा के आत्म सार्थकता के संदर्भ में कहा भी है कि-

“एक को छोड़कर दूसरे के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर लेने से प्रेम का निर्वाह हो, यह जरूरी नहीं भोग लिप्सा शांत हो भी जाए तो आत्म तुष्टि उससे प्राप्त नहीं हो सकती। यह तथ्य मेरे पहले उपन्यास उसके हिस्से की धूप की नायिका मनीषा ने उपन्यास के अंत तक आते-आते ग्रहण कर लिया था।”3

उपन्यास के संदर्भ में एक वक्तव्य में लेखिका कहती हैं –

“उसको यह महसूस तो हुआ उसने जिस आदमी को छोड़ा, जिस इंसान को छोड़ा वह शायद बेहतर इंसान था जिससे शादी की उसके बनिस्पत।”

एक जगह मनीषा मधुकर से कहती है – वह तुमसे बेहतर आदमी था। मधुकर कहता है बेहतर तो वह तुमसे भी है। तुमसे भी बेहतर आदमी था मगर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमने जो विवाह किया वह इसलिए नहीं किया कि हम बहुत अच्छे लोग हैं। हमने विवाह किया क्योंकि हम प्रेम करते थे। रिश्तों से ऊब चुकी मनीषा अब स्वतन्त्र रूप से अपना जीवन निर्वहन करना चाहती थी इस समस्या पर विचार करते हुए अरविंद जैन लिखते हैं –

“स्त्री परिवार या विवाह संस्था से बाहर स्वतन्त्र रूप से सम्मानजनक जीवन क्यों नहीं जी सकती? विवाह के अलावा क्या और कोई विकल्प हो ही नहीं सकता? क्या औरत को हमेशा सम्बन्धों और संपत्ति के समीकरणों में ही पहचाना जाएगा उसकी ना कोई अपनी पहचान और ना कोई स्वतन्त्र निर्णय इन शर्तों पर मौजूदा परिवार के शर्ते ढांचे को और अधिक लंबे समय तक बचा पाना सर्वथा असंभव ही नहीं, बेहद खतरनाक भी है।”4

मृदुला गर्ग की स्त्री चेतना के मत नैतिकता और परम्परा से हटकर अपनी स्वच्छंद व्यक्तित्व को गढ़ती है। स्त्री चेतना सम्बन्धी विचारों को कठगुलाब, उसके हिस्से की धूप, चित्तकोबरा आदि रचनाओं में देखा जा सकता है। उनके साहित्य में ऐसी स्त्री का बोध होता है जो पति, घर, बच्चों के साथ रहते हुए भी अपना एक अलग व्यक्तित्व रखती है और उसका एहसास भी उसके दिल में है। उनमें अस्तित्व बोध तो है किन्तु अपराध बोध नहीं है। मनीषा अपने सोच विचार चिंतन और प्रतिभा के कारण अपना अलग व्यक्तित्व दर्शाती है। मनीषा की सोच में एक नयापन है जिन्दगी को देखने का नया दृष्टिकोण है। अतः लेखिका ने स्त्री को मुक्त कर उसकी नई छवि को प्रस्तुत किया है। मनीषा आत्म सार्थकता की तलाश में इस निर्णय पर पहुँचती है कि मधुकर उसे महत्तव दे या न दे वह अपना कार्य करेगी –

“तुम मुझे लेखिका मानो न मानो, मधुकर मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता, उसने मन ही मन कहा, मैं लिखूंगी, आवश्य लिखूंगी और वह, जो मुझे परितोष दे सके। उससे और कोई नतीजा न भी निकले कम से कम मुझे तसल्ली होगी कि जो कुछ मैं कर सकती थी मैंने किया।”5

उक्त कथन उपन्यास का निर्णायक कथन है। जो स्त्री को सिखा गया कि वह भी यह कर सकती है। वह भी पुरुषों के पीछे दौड़ने के बजाय दूसरे पुरुषों के पास जाने के ख्याल को छोड़कर अपने भीतर अपने आप को पा सकती हैं। अपनी अस्मिता की तलाश कर सकती है।

उसके हिस्सें की धूप के निर्णायक कथन “कम से कम मुझे तसल्ली होगी जो कुछ मैं कर सकता था मैंने किया”से जुड़ी बेहद रोचक संस्मरण है। यह कथन पटना में जेपी आन्दोलन के दौरान फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा कहा गया था, लेखिका ने इस बात की पुष्टि भी की है कि उक्त कथन रेणु जी से मैंने लिया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि लेखिका ने जेपी आन्दोलन को काफी नजदीकी से देखा समझा था। उसके हिस्सें की धूप उपन्यास को रविंद्र कालिया ने 2010 में जब वो नया ज्ञानोदय के सम्पादक थे तो उन्होंने इसका संक्षिप्तकरण करा के इसको ‘बेवफाई’ अंक में छापा था। इस उपन्यास को मध्य प्रदेश साहित्य परिषद से महाराजा वीरसिंह अखिल भारतीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। वर्ष 2011 में दूरदर्शन पर सीरियल के रूप में ‘उसके हिस्सें की धूप’ को फिल्माया गया था जिसके निर्देशक अरुण चड्डा थे

संदर्भ ग्रंथ

  1. मृदुला गर्ग, उसके हिस्सें की धूप, अक्षर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1977, पृ 26
  2. वही, पृ 105
  3. मृदुला गर्ग, चित्तकोबरा की भूमिका, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, संस्करण 1986, पृ 9
  4. ललित शुक्ल, औरत:अस्तित्व और अस्मिता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013, पृ 53
  5. मृदुला गर्ग, के हिस्से की धूप, अक्षर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1977, पृ 177

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