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सिनेमा

शतरंज के खिलाड़ी : सत्यजीत राय

 

अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह (शासन1847-1856) इतिहास के उन पात्रों में हैं जिनकी ‘प्रचलित’ छवि उनके व्यक्तित्व के कई आयामों को छुपा देती है। शाह की ‘छवि’ सामान्यतः नवाबी रंग में डूबे, लोक कल्याण से विमुख, अय्याश और लापरवाह शासक की है।बताया जाता है उनकी दो सौ से अधिक स्थायी -अस्थायी पत्नियां थीं। इनमें कुछ सच्चाई भी है, मगर उसके व्यक्तित्व के अन्य पहलू भी हैं। मसलन वे संगीत-नृत्य के अच्छे जानकार और संरक्षक थे,रचनाकार थे। चर्चित ठुमरी “बाबुल मोरा नैहर छूटा जाय” उन्ही के द्वारा रचित है।

दरअसल वाजिद अली शाह पतनशील सामन्तशाही के अंतिम कड़ियों में थे, इसलिए सामंती जीवन की भोगवृत्ति उनके जीवन में सहज थी। मगर सहज का अर्थ यह नही कि वह सही थी।उसके समय तक पूरा अवध एक तरह से अप्रत्यक्ष रूप से कम्पनी के अधीन आ ही गया था। दरबार मे ब्रिटिश रेजिडेंट था, सैन्यव्यवस्था कंपनी देखती थी, जिसका खर्च रियासत उठाती थी। अवध का रियासत अंग्रेजों के लिए खुला खजाना बन गया था, जब चाहो, जितना चाहो निकाल लो।

अवध को कंपनी द्वारा हड़पना ही था, बहाना बनाया गया कुशासन का, कहा गया रियाया बादशाह से नाखुश है।जबकि यह दुष्प्रचार अधिक था। श्री सुंदरलाल के ‘भारत मे अंग्रेजी राज'(द्वतीय खण्ड) के हवाले से देखे तो स्पष्ट पता चलता है कि अंग्रेजों के आरोप षड्यंत्र के हिस्से थे, वे रियासत को अधिग्रहित करने के बहाने थे। वैसे तब तक कंपनी इतनी शक्तिशाली हो गई थी और रियासते इतनी कमजोर हो गई थीं कि बहाना बनाने की जरूरत भी न थी, लेकिन कंपनी को यह प्रचार करना था कि यह कार्य वह ‘जनहित’ में कर रही है।

वैसे उनके इस ‘जनहित’ की पोल साल भर बाद ही सन सत्तावन की क्रांति में खुल जाती है, जिसमे सबसे तगड़ा विरोध उन्हें अवध में ही मिलता है।

‘फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी’ की पृष्ठभूमि प्रेमचंद की इसी नाम से लिखी कहानी है, मगर फ़िल्मकार ने इसमे कुछ परिवर्तन किए हैं,फिर कला के अलग माध्यम का अपना कुछ अलग प्रभाव भी होता है। कहानी में जहां पाठक के अन्तस् में चित्र कथाकार द्वारा ‘प्रस्तुत’ चित्र से भिन्न होने की संभावना अधिक होती है, जो मुख्यतः पाठक के ‘संस्कार’ जनित होता है वहीं फ़िल्म में दर्शक को स्पष्ट: एक ‘दृश्य’ प्राप्त होता है इसलिए इसमे ‘पाठ भिन्नता’ की संभावना अपेक्षाकृत कम होता है। मगर फिर भी दर्शक की विश्व-दृष्टि और इतिहासबोध की सीमा फ़िल्म अथवा किसी भी कृति के ‘पाठ’ ग्रहण को प्रभावित करती है।

कहानी में प्रेमचंद की दृष्टि मुख्यतः पतनशील नवाबी की अव्यवस्था और भोगलिप्सा पर अधिक केंद्रित दिखाई पड़ती है। वाजिद अली शाह के प्रति सहानुभूति के संकेत कहानी में नहीं है, इसलिए कहानी में वे केवल पृष्टभूमि में हैं। इसके विपरीत फ़िल्म में वाजिद अली शाह के प्रति सहानुभूति दिखाई पड़ती है और वे फ़िल्म में पार्श्व में न होकर उसका हिस्सा हैं। कहना न होगा इससे फ़िल्म की प्रभाविकता बढ़ गई है और शतरंज के वास्तविक खिलाड़ी जो कि मिर्जा सज्जाद अली और मीर रौशन अली न होकर ब्रिटिश प्रशासन है, के संकेत को समझने में दर्शक को मदद मिलती है।

मिर्जा सज्जाद अली और मीर रौशन अली उस दौर के रईस हैं।ये दिन दुनिया से बेखबर नही हैं बल्कि अकर्मण्य हैं। इन्हें कम्पनी की नीयत और कार्यवाही की जानकारी है मगर कायरता की हद तक की अकर्मण्यता के कारण इनका स्वार्थ केवल अपनी स्थिति को बनाये रखने तक है। नवाब के प्रति इनकी सहानुभूति महज जुबानी है। शतरंज का खेल बौद्धिक खेल है मगर जिनकी बुद्धि केवल अवसरवाद और स्वार्थ के लिए क्रियाशील हो वहां यह भी महज बुद्धि विलास हो जाता है। इनका चारित्रिक और बौद्धिक पतन दरअसल तत्कालीन ‘उच्च आर्थिक वर्ग’ के पतन का प्रतीक है, जिसके कारण कम्पनी को अपनी ‘चाल’ में सफलता मिलती गई।

इस तरह फ़िल्म(और कहानी) में देखा जा सकता है कि शतरंज के असली खिलाड़ी ब्रिटिश अधिकारी थे, जो बड़ी चालाकी से अपनी चाल चल रहे थे, और अंततः जीत गए।फ़िल्म में इस विडम्बना को रेखांकित किया गया है कि भारत मे जन्मे शतरंज के इस खेल के ‘वज़ीर’को अंततः ‘क्वीन’ ने स्थानापन्न कर ही दिया

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