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सामयिक

मासूमियत पर डाका डालने से रोक सकता है संवेदनशील साहित्य

 

इक्कीसवीं सदी ने देश-दुनिया और समाज को बड़ी तेजी से बदला है। रहन-सहन, खान-पान यहाँ तक कि सम्पूर्ण जीवन शैली ही बदल गयी है। आज का बच्चा वह नहीं रहा, जो हम समझ रहे हैं। वस्तुतः समय हमेशा बदलता रहा है और बदलना भी चाहिए, परन्तु पिछले दो-तीन दशकों में समय का बदलाव इतना तेजी से हुआ है कि बहुत सी चीजें हमारी नजरों में आए बिना, अनचाहे ही हमारी जिन्दगी का एक हिस्सा बन गई है और जब तक हम सतर्क हो पाते, उन्होंने जीवन की बहुत सारी चीजें निगल लीं। समय का बदलना बुरा नहीं है, उसका विपथन द्यातक है।

आज के आविष्कारों और नव-तकनीकी युग ने सुख-सुविधाओं के नए आयाम स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसे हम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में देख सकते हैं। कदाचित ही इसने अनजाने में बहुत से जीवन-मूल्यों से हमें अलग-थलक और इतना दूर कर दिया है कि जब हम नजरे उठाते हैं तो अपने को भूत-प्रेत, दादा-दादी और परी आदि की कथाओं से घिरे पाते हैं, और अपने बच्चों को पूर्ण मैच्योर, जो इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक दुनिया के उस अन्तहीन गलियारे में बहुत दूर तक निकल चुके होते हैं। जहाँ मोबाईल फोन, कम्पयूटर, वीडियो गेम व इंटरनेट से भरा पूरा उनका अपना एक अलग ही संसार बस चुका है। जहाँ आपसी संबंध, मेल-मोहब्बत, रहन-सहन, खान पान, जीवन-दर्शन ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण संस्कृति ही बदल गयी है।

आज अन्योन्याश्रयता का दौर भी बिल्कुल खत्म हो गया है। कम से कम वह हमें एक-दूसरे से बाँधता तो था। इकॉनामिक्स का ‘बाटर्र सिस्टम’ टकसानी मुद्रा का चलन आज भले ही हाशिए पर चला गया हो, पर वह था एकदम दुरूस्त। इस नाते हम लोग एक दूसरे से जुड़े तो थे। समय आने पर एक दूसरे के लिए खड़े तो रहते थे। आज वह बात नहीं रही, हर चीज को मुद्रा में आंका जाता है, यहाँ तक की रिश्तों को भी।

इन सब का कारण चाहे जिसे भी हम ठहराये। परन्तु इसके पीछे आज के माता-पिता की भी गलती को नजर अंदाज नही किया जा सकता है। बच्चों में आज इस स्थिति के जिम्मेदार जहाँ एक ओर हाइटेक मोबाईल व इंटरनेट युक्त कम्पयूटर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा उन बच्चों के माता-पिता जिम्मेदार है, जिन्होंने जाने-अनजाने में अपने बच्चों को वो सारी सुविधाए उन्हें घर पर ही उपलब्ध करा दिया है।

माँ-बाप के शौक का नतीजा ही है कि सारी इलेक्ट्रानिक वस्तुएं घर पर उपलब्ध होती हैं। इस सन्दर्भ में यूँ कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज के बच्चे तकनीकी के गुलाम हो गये हैं। आज से 25 वर्ष पूर्व टीवी पर सिर्फ एक चैनल हुआ करता था दूरदर्शन। परन्तु समय के बदलाव ने ऐसी करवट ली कि आज 300 से भी अधिक चैनलों से भी लोगों की मीमांशा शांत नहीं हो रही है। ..और इन चैनलों को बड़ों के साथ बच्चे बे-रोक टोक देख रहे हैं। बच्चे अपनी मर्जी के मालिक बन बैठे हैं। जब इच्छा किया घूमने चल दिये। बड़ों को इसके बारे में बताना आज कल के बच्चे अपनी तौहिन समझते हैं।

आखिर अपने बच्चों में इस भटकाव को देखकर भी आजकल के माता पिता क्यों चुप्पी साधे हुए हैं। बच्चों का प्यारा सा बचपन आज कहीं खो गया है। भूत-प्रेत, दादा-दादी और राजकुमारी की कहानियां गायब हो गयी है और रह गया है मोबाईल फोन कम्प्यूटर, वीडियो गेम एवं कार्टून शो इत्यादि। इन सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि बच्चे समय से पूर्व परिपक्व हो रहे हैं। देखने में यह बच्चे भले ही छोटे लगते हो परन्तु दिमाग और दृष्टि से वे अत्याधिक शार्प, अत्याधिक कूटिल व षडयंत्रकारी बनते जा रहे है। आजकल के बच्चे जो भी

टीवी और सिनेमा में देखते हैं, उसी को अपने वास्तविक जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं। टेक्नोलॉजी ने बच्चों के कोमल मन की संवेदनाओं को समाप्त कर दिया है। टेक्नोलॉजी आज एक ऐसा चोर साबित हो रही है जो बच्चों की मासूमियत पल भर में चुरा ले रही है। इनकी जिन्दगी अब पूर्णरूपेन मशीन बन गयी है। टीन एज में ही बच्चे क्रूरतम से भी क्रूर अपराध को अंजाम देने से नहीं हिचकिचा रहे है। सेक्स की ओर उनकी इच्छाए उम्र से पहले हावी होने लगी है जिसकी पूर्ति आज कई चैनल्स एवं इंटरनेट पर पोनोर्ग्राफी के माध्यम से बच्चों तक अपनी पहुँच बना रही है जो एक खतरनाक संकेत है।

पहले पीढ़ियों का बदलाव 40-50 साल में दिखता था। बाद में वह दौर भी आया जब यह बदलाव 15-20 वर्षों तक सिमट गया। परन्तु आज तो अत्याधुनिक अविष्कारों और तकनीकी ने सम्पूर्न जन मानस को बदल दिया है। स्थिति यह हो गयी है कि आज पीढ़ियों का बदलाव दो पीढियों में नहीं बल्कि एक छत के नीचे रह रहे सदस्यों के बीच देखा जा रहा है। मानसिक समझ और चेतना के बदलावों ने सोच को बदल दिया है। हम यदि अपने ही ईद-गिर्द नजर दौडा़एं तो देखेगें कि बहुत से परिवार ऐसे मिलेगें जिनमें पिता अपने सबसे बड़े पुत्र के लिए आउटडेटेड है और छोटे भाई के लिए बड़ा भाई है। निःसदेह आज समाज बदला है तो बच्चों का साहित्य भी बदला है।

यही वजह है कि आज बदले हुए साहित्य की चकाचौंध है पर पूरी तरह नहीं। आज पुरानी धारा को छोड़कर समाज को सापेक्ष लीक पर चलने की जरूरत है। यदि देश-दुनिया, रहन-सहन खान-पान बदल सकती है तो साहित्य को उसी रफ्तार से बदलते रहना चाहिए था। परन्तु साहित्य के साथ ऐसा पूणर्रूपेण नहीं हुआ। वह न आगे बढ़ सका न ही पीछे। इसका प्रमाण हमें ऐसी अनकों रचनाओं को देखने से मिलती है जो 25-30 साल पूर्व की लिखी हुई है। इन रचनाओं में कोई ताजगी नहीं। आखिर आज का बच्चा वह सब क्यों पढ़ेगा जिसमें उसकी दुनिया नहीं, उसके समय की बात नहीं या उसकी दुनिया को स्पर्श करने की क्षमता तक नहीं। आज के बच्चे पूर्व की भांति बाल साहित्य के द्वारा उपदेश लेना पसन्द नहीं करते। इन्हें आज के संघर्ष का ज्ञान है।

इन्हें अपने जीवन में आई मुसीबतों का लेखा जोखा करना आता है। ऐसी तमाम समस्याओं से वह प्रतिदिन जूझ रहा है। घर परिवार, समाज, विद्यालय उसे बहुत कुछ स्वतः सिखा रहा है। ऐसे में इन्हें ऐसा साहित्य देना चाहिए जो बच्चों के कोमल मन में शीतल बयार की तरह उसे सहानुभूति दे सके साथ ही उसका हमसफर बन सके। उसे कुछ क्षण के लिए विश्राम, प्रेरणा और मनोरंजन दे सके। ऐसी साहित्य रची जानी चाहिए। भले हम समाज को बदल नहीं सकते, परन्तु अपने नजरिये को तो बदल सकते हैं।

आज समाज में जो सबसे बड़ी कमी आयी है वह है संवेदना की। अगर सुन्दर, ज्ञान परक और स्वस्थ बाल साहित्य के माध्यम से इस कमी को दूर किया जा सका तो अनैतिकताएं, भ्रष्टाचार, चारित्रिक पतन, विलगाव एवं भटकाव इत्यादि समस्याओं को बड़ी ही आसानी से दूर किया जा सकता है। स्वस्थ बाल-साहित्य से बच्चों में जो संवेदनशीलता पैदा होगी वह मानवीय जीवन के सुख-दुःख के क्षणों को समझने में अहम भूमिका अदा करेगी। जिस प्रकार की पढ़ाई बच्चों को आज पढ़ाई जा रही है वह अब बंद होनी चाहिए। स्वस्थ साहित्य अर्थात व्यवहारिक बातों से लैस एक अनुशासनात्मक पढ़ाई जिसमें आज कल के जिज्ञासु बच्चों के हर अनसुने एवं अनसुलझे सवालों के जबाब बड़ी ही सुगमता से दी जानी चाहिए जो अब तक किसी ने नहीं दी। अगर ऐसा हो सका तो हम एक अच्छे समाज की परिकल्पना को साकार कर सकते है।

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