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दिल्लीस्त्रीकाल

दिल्ली में बेहतरी के प्रयासों के बीच महिला सुरक्षा

 

दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी में देश के विभिन्न राज्यों से बड़े पैमाने पर महिलाओं की आबादी, रोजगार एवं बेहतर जीवन की तलाश में लगातार आ रही हैं। ऐसे में सीमित संसाधनों पर निरन्तर बढ़ते बोझ के बीच सरकार के लिए शांति, सुरक्षा, संतुलन, स्वास्थ्य, समृद्धि, सु-शासन सुनिश्चित कर पाना एक चुनौती हो जाती है, परन्तु वर्तमान सरकार ने अपने कार्यकाल में इस चुनौती का योजनाबद्ध तरीके से सामना किया है एवं महिलाओं के बीच न सिर्फ सुरक्षा के भाव को सुनिश्चित करने में बहुत हद तक सफलता पाई है बल्कि उनके जीवन को सरल व सुगम बनाने की दिशा में भी अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। जिन प्रमुख योजनाओं ने दिल्ली में महिलाओं के लिए सुगमता व सुरक्षा को बहाल किया उनमें दिल्ली परिवहन निगम (DTC) बसों में पिंक टिकट योजना के तहत महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा तथा जगह-जगह सी.सी. टीवी कैमरे लगाया जाना जैसे अनेकानेक बेहतरीन कदम हैं। यहाँ ये भी उद्दृत करना महत्वपूर्ण हो जाता है कि बसों में मुफ्त यात्रा की तर्ज पर दिल्ली सरकार ने निकट भविष्य में मेट्रो में भी महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा की व्यवस्था किये जाने का सन्देश दिया है ।

हालाँकि दिल्ली में हुई 2012 की जघन्य घटना के पश्चात यहाँ महिलाओं की लचर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठाये जाते रहे हैं। मगर विगत के कुछ वर्षों में महिलाओं की स्थिति को लेकर क्या बदलाव महसूस किये गये उसे ध्यान में रखते हुए पूर्वी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली तथा उत्तरी दिल्ली से लगभग 50 महिलाओं से बातचीत की गयी जिनमें अधिकांश कामकाजी महिलाएँ व छात्राएँ शामिल थीं। उन्होंने वर्तमान दिल्ली सरकार द्वारा उठाये गये मुफ्त बस यात्रा सुविधा को उनके दिनचर्या को आसान, सुरक्षित व सुगम बनाने की दिशा में बेहतरीन कदम बताया। जब विगत कुछ वर्षों में महिलाओं की स्थिति को लेकर उनसे सवाल पूछे गये तो उन्होंने जो जवाब दिए उनमें सरकार द्वारा सुरक्षा के लिए उठाए गये कदम के साथ-साथ, मिश्रित सामाजिक व मनोवैज्ञानिक कारकों को प्रमुख रूप से उत्तरदायी ठहराए गये। हालाँकि निश्चित तौर से सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार व प्रशासन की होती है, परन्तु वर्तमान परिवेश में महिलाओं की समझ काबिले तारीफ है जो इस बात को भी समझती हैं कि महिलाओं के साथ होने वाले हिंसात्मक घटनाओं के लिए समाज का मनोविज्ञान प्रमुख तौर से उत्तरदायी है।गार्गी कॉलेज छेड़छाड़ मामला : छात्राओं का प्रदर्शन, पुलिस ने दर्ज की एफ़आईआर | न्यूज़क्लिक

हम यह नहीं भूल सकते कि वर्तमान में दिल्ली की पुलिस, प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार के दायरे में आती है और यह बात सर्वे के दौरान महिलाओं ने भी कही कि दिल्ली सरकार सिर्फ वही कर सकती है जो उसके अधिकार क्षेत्र में है तथा जो कार्य एवं शक्तियाँ उसके अधीन है। लगभग सभी महिलाओं, ख़ास कर छात्राओं ने अपने जवाब में हाल में हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज, में हुई दिनदहाड़े अश्लील घटना को अंजाम दिए जाने पर प्रशासन की संदेहात्मक रवैय्ये से लेकर, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय आदि में पुलिसिया रवैय्ये को बेहद अफसोसजनक बताया। साथ ही महिला सुरक्षा और हितों के सन्दर्भ में वे केन्द्र सरकार की भूमिका के ढुलमुल होने की तरफ भी इशारा करती नजर आई, हालाँकि कुछ नए सुधारों को भी वे स्वीकारती दिखी। अगर समग्र भारत में महिलाओं की स्थिति की बात करें तो उनकी स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है।

स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय, खेलकूद, विज्ञान, शोध आदि के क्षेत्र में महिलाओं के बढ़ते कदम की आहट साफ़ सुनी जा सकती है। हालाँकि विकास का ये दावा भारतीय समाज के कुछ हिस्सों तक ही नजर आता है। जैसे ही शहरी एवं उच्च वर्ग की पारिवारिक सीमाओं के पार देखें तो ये दावे धूमिल होते भी नजर आने लगते हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी स्थिति ज्यों की त्यों ही नजर आती है, चूँकि समय के साथ तो आमूल-चूल बदलाव होना स्वाभाविक है, मगर जो परिवर्तन महिलाओं की स्थिति में होने चाहिए वह जीवन के अधिकतम क्षेत्रों में निराशा ही परोसती नजर आती है चाहे सुरक्षा का मामला हो, उसकी आर्थिक स्वतन्त्रता का मामला हो, परिवार में निर्णय लेने का मामला हो या फिर राजनैतिक गतिविधियों में उसकी भागीदारी का मामला हों। उदारीकरण व आर्थिक सुधार के बाद के काल ने भारतीय समाज में महिलाओं के लिए ढेर सारे अवसर के द्वार खोले हैं, जहाँ से महिलाएँ स्वायत्तता की दिशा में तीव्र गति से उड़ान भरना प्रारम्भ की।programm programm

विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए निश्चय ही ये कहा जा सकता है किपिछले एक दशक में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के सम्बन्ध में भारत के कई हिस्सों में महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। हालाँकि, महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में वृद्धि के साथ साथ अभी भी समाज द्वारा महिलाओं के रहन सहन को लेकर परिभाषाएं व नियन्त्रण का क्रम चरम पर ही दिखाई देता है।इन तमाम परिस्थितियों के बीच भारत की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, व राजनैतिक समेत अन्य परिधि में स्वयं को सुदृढ़ बनाने व स्थापित करने के अवसर में बेहतरी देखी जा सकती है।

आज महिलाओं के लिए स्वतन्त्रता का मतलब सिर्फ संविधान के तहत दिए जाने वाले स्वतन्त्रता का शाब्दिक आश्वासन ही नहीं है, बल्कि इसका अर्थ आज वृहद् हो चला है जिनमें अधिक नौकरियाँ, उद्यमिता के अवसर, उनकी सुरक्षा, दिन-प्रतिदिन के जीवन-यापन में सुगमता आदि भी है। संक्षेप में ये कहा जा सकता है कि महिला सशक्तिकरण के मार्ग में कई कारक हैं जो उन्हें आधुनिक समाज के धरातल पर पुरुषों के समकक्ष खड़ा होने में सक्षम बनाता है। महिलाओं को सशक्त बनाने तथा उनमें विश्वास जगाने के लिए सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के साथ-साथ समाज और व्यक्ति-व्यक्ति को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की आवश्यकता है। निश्चय ही कार्यबल आबादी में महिलाओं की भागीदारी देश के अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में जरूरी कड़ी सिद्ध हो रही है। केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कई सारे योजनाओं का अनावरण किया गया, मगर परिणाम संतोषजनक नही प्रतीत हो रहे।कितनी स्वतंत्र हुई है नारी - this independence day talk about women empowerment in 21st century

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं योजना (2015), महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए महिला-ए-हाथ योजना (2016), महिलाओं में कौशल विकास, रोजगार, डिजिटल शिक्षा आदि के निमित्त महिला शक्ति केन्द्र योजना (2017), व सुकन्या समृद्धि योजना आदि जैसे कई योजनाएँ चलाई गयी। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अलावे देश के सभी राज्य महिलाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाएँ चला रहे, जो निश्चय ही विभिन्न सरकारों का सराहनीय कदम है, मगर इसी परिप्रेक्ष्य में दिल्ली की बात की जाए तो विगत कुछ वर्षों में किसी भी अन्य राज्य की तुलना में दिल्ली सरकार के प्रयास अपेक्षाकृत संतोषजनक व सराहनीय रहे हैं।

इन सभी दृश्यों के बीच आए दिन महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार, असमान व्यवहार, असंवेदनशीलता आदि भी ऐसे पक्ष हैं जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में अगर महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ उचित न्याय दिलाने के लिए ठोस कदम नहीं उठती है तो हमें स्वयं ही अपनी सुरक्षा का बीड़ा उठाना पड़ेगा। क्या हम एकजुट होकर अनगिनत अमानवीय कृत्य का सामना नहीं कर सकते? क्या हम एकजुट होकर एक निर्भीक वातावरण का सृजन नहीं कर सकते? क्या हम इतने व्यस्त और आधुनिक हो गये हैं की समाज की अन्य महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान पर हम  संवेदनशून्य बन जाएँ? इन तमाम सवालों के उत्तर ढूँढने के दिशा में हम सभी को बराबर प्रयास करने होंगे; सरकार और समाज दोनों के संयुक्त प्रयासों से ही अपेक्षित परिवर्तन लाये जा सकते हैं।

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