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सिनेमा

“सोनचिड़िया : रेत पर नाव खेने की कहानी”

 

आज के दौर में अगर डकैती पर केन्द्रित कोई फिल्म बनती है, तो यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वह पुरानी लकीर को पीटने वाली कोई चलताऊ टाइप की बी-ग्रेड फिल्म होगी | लेकिन “सोनचिड़िया” में डकैती केवल बाहरी कलेवर है, केन्द्र बिन्दु नहीं | इस फिल्म की धुरी है – पश्चाताप, सघन और अनवरत पश्चाताप |

वह पश्चाताप जो महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को हुआ था और वो हिमालय चले गए थे, वह पश्चाताप जो कलिंग युद्ध के बाद चण्ड अशोक को हुआ था और वह बुद्धम् शरणम् गच्छामि का घोष कर महान अशोक बनने की ओर अग्रसर हुआ था | वही पश्चाताप चंबल घाटी के डकैतों को तब होता है जब वे एक मासूम सी भूल के बदले भयंकर पाप कर बैठते हैं |

अनजाने में की गई इस गलती के बाद इन डकैतों का वही रूप नहीं रह जाता जो हम इस विषय पर बनी अन्य-अनेक फिल्मों में देखते या अख़बारों-किताबों में पढ़ते अथवा गँवई बैठकी के कथा-किस्सों में सुनते आये हैं | इस घटना के बाद बंदूकों का शोर, हिंसा के जघन्यतम रूप, गाली-गलौज और बहशीपना के तमाम अतिरेकपूर्ण दृश्य बस कहानी को आगे बढ़ाने के जरिया-मात्र रह जाते हैं | असली कहानी भीतर ही भीतर खौलती रहती है,जो फूलनदेवी की प्रतीक बनी खूंखार “फुलिया” के ह्रदय को भी बेंध जाती है और वह जाति-पाति जैसे अपने अडिग स्टैंड से ऊपर उठकर इन डकैतों के पश्चाताप की लड़ाई में अपने जान को भी दाव पर लगाने से खुद को नहीं रोक पाती |

निर्देशक अभिषेक चौबे ने बॉलीवुड की बेहतरीन प्रतिभाओं से जितनी अधिकतम अभिनेयता निकाली जा सकती है, उस स्तर तक के कला को बड़े कौशल से निचोड़ा है | हर कलाकार अपने चरित्र में पूरी तरह से समा गया है | यहाँ हमें मनोज वाजपेयी, भूमि पेड्नेकर, आशुतोष राणा, सुशांत सिंह और रणवीर शौरी नहीं दिखते बल्कि इनका चरित्र मानसिंह, इंदुमती, गुज्जर, लखना और वकील सिंह दिखते हैं, जो बिल्कुल यथार्थ परिवेश में हद स्तर तक यथार्थ होकर उभरे हैं |

भाषा-शैली भी यथार्थ वाली ही है, और कहीं न कहीं इसी कारण से यह “ए” सर्टिफिकेट वाली फिल्म बन जाती है | अन्यथा अन्य डकैती फिल्मों की तरह कोई भी ऐसा दृश्य नहीं है जो इसे “केवल वयस्कों के लिए” श्रेणी की फिल्म में शामिल करने का कारण बनती हो | डकैतों की बात-बात में गाली-गलौज वाली भाषा-शैली की कहीं न कहीं अति-सी हो गई है | अगर इससे थोड़ा परहेज किया गया होता तो बच्चों के देखने के लिए भी यह एक जरुरी फिल्म बन जाती | क्योंकि इसकी कहानी के केन्द्र में बच्चों की एक छोटी-सी भूल ही है, जिसपर कहानी का पूरा वितान रचा गया है | “सोनचिड़िया” का किरदार भी एक मासूम-सी बच्ची ही है, जिसकी अटकती साँसों पर सभी डकैतों सहित दर्शकों की भी सांसें अंत तक अटकी रहती हैं | वह अब मरी – तब मरी की स्थिति में है | उसकी इस दुर्दशा के वजह भी डकैत हैं और उन साँसों की डोर को बचाने का जरिया भी वही डकैत बनते हैं | उसी के लिए उनका गिरोह भी टूटता है, आपसी खूंरेजी होती है और अंततः सब मारे भी जाते हैं, लेकिन उनकी कोशिश बस इतनी है कि हम रहें या ना रहें “सोनचिड़िया” के रूप में एक मासूम और बेकसूर ज़िंदगी बचनी चाहिए |

“सोनचिड़िया” को देखकर यह लगता है कि हिन्दुस्तानी सिनेमा निश्चित रूप से अब काफी परिपक्व हुआ है | जहाँ पहले की ऐसी फिल्मों में केवल प्रतिशोध की धधकती आग होती थी, वहीँ उसी परिवेश के इस फिल्म में प्रायश्चित की रोशनी दिखती है | यह रोशनी हर इंसान के भीतर की इंसानियत ही है जो खूंखार से खूंखार डकैत को भी एक घटना के बाद इस कदर कुतरना शुरू करती है कि वह कारतूस वाले डकैत से लेमनचूस वाले डकैत में बदल जाता है |

इस फिल्म में सभी डकैतों के बीच एक यक्षप्रश्न हमेशा खदबदाता रहता है कि “डकैत का धर्म” क्या है? जिसका इस बारीक़ बुनावट वाली फिल्म में कोई सीधा-सपाट जवाब नहीं बन पाता लेकिन अंत तक आते-आते कहीं न कहीं इसका जवाब दर्शकों को मिल ही जाता है कि उनका भी धर्म वही है जो बाकी सभी इंसानों का है – इंसानियत !

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