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शख्सियत

भिखारी ठाकुर जी की पुण्यतिथि

 

गवना कराइ सैंया घर बइठवले से,
अपने लोभइले परदेस रे बिदेसिया।।
चढ़ली जवानियां बैरन भइली हमरी रे,
के मोरा हरिहें कलेस रे बिदेसिया।।

भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर की आज पुण्यतिथि है  उनका जन्म 18 दिसम्बर 1887 में बिहार के छपरा जिले के कुतुबपुर गाँव के एक नाई (हजाम) परिवार में हुआ था उनके व्यक्तित्व में कई आश्चर्यजनक खासियते थी अक्षर भर ज्ञान के बावजूद उन्हें पूरा राम चरित्र मानस कंठस्थ रूप में याद था। शुरुआती जीवन में रोजी रोटी के लिए वह अपना गाँव घर छोड़कर खड़कपुर चले गए वहाँ पर भी उन्होंने अपने पारम्परिक पेशा को नहीं छोड़ा 30 वर्ष बाद जब वो अपने गाँव लौट कर लोककलाकारों की एक नृत्य मण्डली बनाई और रामलीला की शुरुआत। बहुआयामी प्रतिभा के धनी भिखारी ठाकुर एक लोक कलाकार के साथ साथ कवि, गीतकार, नाटककार, नाट्य निर्देशक, अभिनेता, लोक संगीतकार थे।

उन्होंने भोजपुरी को ही अपने नाटक और काव्य की भाषा बनायावो अपने कला, नाच, तमाशे के माध्यम से महापण्डित राहुल सांकृत्यायन जैसे उद्भट विद्वान एवं जननेता को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने 1947 में गोपालगंज के भोजपुरी सम्मेलन के अध्यक्षयी भाषण में कहा कि भिखारी ठाकुर भोजपुरी के अनगढ़ हीरा हैं, थोड़ा तराश देने पर इसमें निखार और धार आ  जाएगी, तो जगदीश चन्द्र माथुर उन्हें भारत मुनी की परम्परा का संवाहक कहा। उनके निर्देशन में भोजपुरी के नाटक ‘बेटी बचवा’, ‘गबर घिचोर’, का आज भी भोजपुरी अंचल में मंचन होता रहता है इन नाटकों और फिल्मों के माध्यम से भिखारी ठाकुर ने सामाजिक सुधार की दिशा में जबरदस्त योगदान दिया इन तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी उन्होंने भोजपुरी साहित्य की रचना में तकरीबन 29 पुस्तकें लिखी जिसके चलते आगे चलकर वह भोजपुरी साहित्य और संस्कृति के संवाहक बनें।

भिखारी ठाकुर ग्रंथावली भाग – १ ...

अर्थात बनारस से लेकर कोलकाता तक भिखारी ठाकुर की मण्डली ने अपने नाच-गानों से आम जनता का मनोरंजन ही नहीं किया बल्कि जन-जागरण का ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्य भी किया। जिस प्रकार गाँधी राजनीतिक आजादी प्राप्ति के साथ-साथ नशाखोरी, छुआ-छूत आदि की समाप्ति का रचनात्मक कार्य कर रहे थे वैसे ही भिखारी जनभाषा भोजपुरी में मनोरंजन के अतिरिक्त स्त्री-मुक्ति, नशा-मुक्ति, दहेज-मुक्ति आदि सामाजिक कुरूतियों को समूल-समाप्ति की कलात्मक साधना में सन्नध थे। अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ उन्होंने नाटक के माध्यम से आवाज उठाई हालांकि बाद में अंग्रेजों ने उन्हें रायबहादुर की उपाधि से नवाजा। वर्ष 2012 में ‘द लगेसी ऑफ़ भिखारी ठाकुर’ लोकगीत अलबम जिसे कल्पना पटवारी ने गया है भिखारी ठाकुर के साथ काम कर चुके उनके सहकर्मी रामज्ञा राम ने भी उनके नाटक तथा गीतों को कल्पना के साथ मिलकर संग्रहित और प्रसारित करने का कार्य किये।

‘हंसि हंसि पनवा खीऔले बेईमनवा कि अपना बसे रे परदेस।
कोरी रे चुनरिया में दगिया लगाई गइले, मारी रे करेजवा में ठेस’!

विदेशिया ने भिखारी ठाकुर को खासा पहचान दिलवाया। 83 साल की उम्र में 10 जुलाई 1971 को भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले मृत्यु हो गयी। मार्च 2018 में “भिखारी ठाकुर रचनावली” का प्रथम प्रामाणिक संस्करण बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से डॉक्टर वीरेंद्र नारायण यादव (MLC) के निर्देशन में प्रकाशित हुआ। जिसमे भिखारी ठाकुर के तमाशा,नाच गीतों, एवम् उनकी रचनाओं को पुनः प्रकाशित करने का कार्य करेगा। जहाँ एक ओर हमारी मातृभाषा भोजपुरी को भोजपुरी फिल्मी कलाकार ने अश्लीलता का वांग्मय बना दिया है वहीं दूसरी ओर हम कवि गोरखनाथ, कबीर दास, हीरा डोम, गुरु गोविंद सिंह, राहुल सांकृत्यायन भिखारी ठाकुर आदि के कार्यों को भूलते जा रहे हैं जो हमारे लिए तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए पहचान का प्रश्न बन जाएगा

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