Tag: ‘प्रेम के चमत्कार और मनुष्यता की विरल यात्रा…’

लाल सिंह चड्ढा
सिनेमा

बहिष्कार और लालसिंह चड्ढा के आमिर खान

 

‘प्रेम के चमत्कार और मनुष्यता की विरल यात्रा…’

बनाम

‘बहिष्कार और लालसिंह चड्ढा के आमिर खान’

मेरे कई दोस्तों ने ‘लाल सिंह चड्ढा’ देख ली थी और सबकी टिप्पणियाँ आने लगी थीं। आमिर की फ़िल्म की अच्छाई की चरम ख्याति तो है ही। मैं मुरीद भी हूँ – इस हद तक कि मेरे घर में लतीफ़ा बना है – ‘मैं टीवी का रिमोट लेकर सारे चैनल पे ‘थ्री ईडियटस’ ढूँढते रहता हूँ और मिलते ही बैठ जाता हूँ…’। सो, देखना तो था ही ‘लाल सिंह चड्ढा’ भी – कभी फुर्सत से, पर चल पड़ा। हमेशा की तरह फ़िल्म की अच्छाई के साथ इस बार यह भी जाँचना था कि बहिष्कार का असर भी है या महज़ अफ़वाह है – सोशल मीडिया की स्वच्छंदता का क्या भरोसा!! फिर बहिष्कार जैसा कुछ फ़िल्म में है भी या बहुसंख्यकों के लिए ‘आमिर’ (अमीर का ही दूसरा रूप) नाम ही काफ़ी है?

फ़ोन किया, तो 15 अगस्त को भी टिकिट सुलभ था। खिड़की पर अपने अनुकूल सीट के लिए नक़्शा दिखाने की गुज़ारिश की, तो सुन पड़ा – ‘जाओ साहब, सब ख़ाली है। चाहे जहां बैठ जाओ’। झटका लगा…लोकप्रिय नायक की बड़े बजट की लगभग डेढ़ दशक से संकल्पित फ़िल्म है, पूरी तैयारी से आयी है…और सांताक्रूज़ (मुम्बई) के 500 की क्षमता वाले थिएटर ‘गोल्ड’ मॉल में बमुश्किल 70-80 लो!! लौटते हुए पूछा, तो मालूम हुआ – रोज़ का यही हाल…। अब सोशल मीडियाकी रपट तो सही… बजाहिर उसकी ताक़त। सबके हाथ में कामदेव के पुष्प-धनुष की तरह सदा विद्यमान मोबाइल काम कर गया…। काश, ऐसी मुहिम भ्रष्ट मंत्रियों-अफ़सरों व गुंडों-माफ़िया-भूमाफ़ियाओं…आदि के लिए चलती, तो यह माध्यम सचमुच क्रांतिदूत बन जाता…और देश सुधर जाता…। हमारे बचपन में कुछ भी ऐसा-वैसा करने वाले को ‘बिरादरी बाहर’ कर दिया जाता था। और उस बहिष्कार से डरकर तब हमारा समाज काफ़ी अनुशासित था – यूँ अंतर्विरोध व कारणभूत असर (साइड अफ़ेक्ट) तो हर नियम व व्यवस्था के होते हैं…। बस, यहीं से एक छठीं इंद्रिय भी सक्रिय हुई कि बहिष्कार की कोई वजह, कोई चेतना कबीर के ‘चकमक में आग’ और ‘तिल में तेल’ की तरह कहीं छिपी तो नहीं है फ़िल्म में…!!

और फ़िल्म शुरू होते ही अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) ने जहिरा दिया कि बहिष्कार की खुली घोषणा फ़िल्म आने के पहले से हो जाने के कारण यह सितारा नायक व बड़े बजट से अरबों की वसूली वाला (तत्कालीन पत्नी किरन राव नाम्ना) निर्माता घबराया हुआ तो है। इसीलिए इससे बचने-बचाने का फ़ार्मूला बनाकर अस्वीकरण लाया गया है, वरना यह तो एक रूटीन हो गया है – 10 सेकेंड में गुजर जाता है। यहाँ तो 4 मिनट तक दिखाया-सुनाया। ये वही आमिर खान हैं, जिन्होंने कभी गुजरात में ‘फ़ना’ के बहिष्कार पर बड़ी लापरवाही से कहा था कि 5-7 करोड़ (गोया 5-7 हज़ार हों) से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता…। लेकिन अब कुछ शताधिक करोड़ है, तो साँस ऊपर-नीचे हो गयी है…तो उसी बहिष्कार से बचने के उपाय कर रहे हैं…। यह पूरी फ़िल्म में दिखता रहा, जिसे फिर आगे देखते रहेंगे…।

अभी तो फ़िल्म के दौरान पाया कि ‘लाल सिंह चड्ढा’ में आमिर खान अपने फ़िल्मकार के चाक-चौबंद (परफ़ेक्शनिस्ट) काम वाले नाम को पुन: सार्थक करते हुए सामने आये हैं। हर कला का प्राथमिक और अंतिम लक्ष्य होता है बेहतर आदमी की तलाश और निर्माण। यह आमिर खान की फ़िल्मों में अलग-अलग तरीक़े से बहुत शिद्दत से साफ़-साफ़ होता है। इस वक्त ठीक से याद आ रही दो फ़िल्मों की जानिब से संक्षेप में कहूँ, तो ‘थ्री इडियटस’ का रणछोड़ दास चाँचड बहुत प्रतिभाशाली और कुशल होकर यही करता है कि प्रिया से प्रेम हुआ, तो न मिलने की स्थिति के बावजूद उसके लिए अनंत इंतज़ार में पड़ा रहता है, तो वह मिलती भी है – ‘जा पर जाकर सत्य सनेहू, सो तेहिं मिलइ न कछु संदेहू’। फिर दूसरा याद आता है – इस धरती के अलावा सृष्टि (यूनिवर्स) के दूसरे गोले (द्वीप) से आया ‘पीके’, जो इस दुनिया से अनजान और इस दुनिया के लिए ग़ैर दुनियादार होकर भी यही करता है। अब इस बार आया है लाल सिंह चड्ढा, जो जन्म से ही थोड़ा भोहर (सीधा-सादा, छल-प्रपंच विहीन) होकर यही कर रहा है। चाँचड़ का मुक़ाबला भौतिकता की होड़ में जड़-अमानवीय होकर अमीर होने में लगे शिक्षा-जगत से होता है, तो पीके का मुक़ाबला धर्म की आड़ में पाखण्ड से दुनिया को ठगकर नाम-गाम व भौतिक समृद्धि की साधना करती दुनिया से होता है। इस बार लाल सिंह चड्ढा का साबका अपने देश के आधी शताब्दी के इतिहास से हुआ है।

‘थ्री ईडियटस’ में कोई चमत्कार नहीं होता, वह सीधे-सीधे प्रतिभा का विस्फोट और लगन की दीवानगी से सफल ही नहीं, सिद्ध होता है। लेकिन ‘पीके’ में हाथ पकड़कर उसका सब कुछ जान लेना चमत्कार ही तो था – दूसरे गोले के प्राणी के माध्यम से, जो धीरे-धीरे प्रेम में तब्दील हुआ, तो सच्चे प्रेम में त्याग का एक विरल सूत्र दे गया, जिसके लिए ‘उसने कहा था’ की जानिब से शुक्लजी के शब्दों में ‘प्रेम का कोमल स्वरूप झांक रहा है, निर्ममता से कराह नहीं रहा है’। और अब यहाँ चलने तक में असमर्थ लंगड़े लाल सिंह को बालपन की मित्र ललकार देती है, तो वह जो दौड़ना शुरू करता है कि एक दिन दौड़ में चैम्पियन बनने को तो फ़िल्म खुद ही चमत्कार कहती है। लेकिन ऐसे मंद बुद्धि को फ़ौज में भर्ती करा देने को तो चमत्कार की जद और देश के प्राथमिक नियम-क़ानून के दायरे से भी बाहर निर्देशक की मनमानी कहा जा सकता है। और निर्देशक का नाम भले अद्वैत चंदन जा रहा हो, सबको पता है कि अपनी फ़िल्मों के वास्तविक, पर अघोषित निर्देशक तो आमिर खान ही होते हैं। चौखटे (फ़्रेम) पर अद्वैत, भीतर आमिर (अध्यात्म-भौतिकता का अद्भुत मेल)। यही सतत सिलसिला है…। 

लाल सिंह चड्ढा में भी सारा चमत्कार प्रेम का ही है, जो रूपा डिसूज़ा नाम्ना बालमित्र की निश्छ्ल-वासनामुक्त लरिकइंयवा की प्रीति की दृश्य प्रेरणा के बल हुआ है, लेकिन रूपा बनी करीना कपूर खान को कुछ ख़ास करना नहीं है, बस फ़िल्म या नायक लाल सिंह पर अपने अकूत प्रताप से सबको मुतासिर करना है, लेकिन करीना खुद इससे चमत्कृत होकर अभिनय की हानि करती रहीं…। और इसी चक्कर में माँ की मरणांतक पीड़ा से उपजा वह दंश भी दिखा न सकीं, जो उनके किरदार का मूल था। ख़ैर, जिस तरह पीके का मन बच्चों जैसा ही है – सादा काग़ज़, यहाँ लाल सिंह भी वही करता है। ‘शैशव ही है एक स्नेह की वस्तु सहज कमनीय’ की काव्यात्मकता को जीवन में उतारते हुए रूपा के साथ लरिकइंवा का जो गहन प्यार होता है, वह ढेरों झंझावाती घटना चक्रों के बीच भी डिगता नहीं। एक नया व अत्याधुनिक आयाम यह भी जोड़ता है कि उसे ग़ैर मर्द, के साथ रहते पाकर भी मरता नहीं, बल्कि ज़्यादती करते देख उस मर्द को मारता ज़रूर है। इस मर्द को बड़े थोड़े में इतिहास के अबू सलेम रूप में पेश कर दिया जाना भी कमाल का गुर है। पूरी फ़िल्म में यही बस एक बार लाल सिंह आक्रामक होता है – ‘मैं लगा दूँ आग उस संसार को, है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर’। इस तरह यह प्यार जीता है पीके की तरह, लेकिन उपराम पाता है – ‘थ्री ईडियटस’ की तरह अंत में मिलकर – बल्कि रणछोड़ की मंज़िल से और आगे की यात्रा भी करता है – रूपा के मर जाने पर बच्चे के पालन व उसकी यादों के स्मारकों में जीता है…। उसका ही बच्चा है, का संकेत भी बड़ा प्रतीकात्मक है और रूपा का रखैल रूप भी बड़ा शाकाहारी चित्रित करने के कला-संयम की भी बलिहारी। ऐसा निराबानी प्रेम ही मनुष्य को ख़ुदा बनाता है – ‘बंदे को ख़ुदा करता है इश्क़’।

तो प्रेम के ऐसे ईश्वरीय रूप की हामी वाली इस फ़िल्म का बहिष्कार क्यों? इस पर सोचते ही निर्माता किरन राव के ख़्याल ने सहसा पीछे मोड़ (यू टर्न दे) दिया…, क्योंकि इसी ‘लाल सिंह चड्ढा’ के निर्माण के दौरान किरन-आमिर अलग हुए हैं। कमाल है न…कि जब दुनिया को एकनिष्ठ प्रेम का फ़लसफ़ा पढ़ाने में डूबा जा रहा था, उसी समय खुद उसी भाव की बलि चढ़ाई जा रही थी…। उसी एकनिष्ठता की दूसरी बार हत्या की जा रही थी!! तब विमर्श उभरा कि पर्दे पर प्रेम का इतना बड़ा रूप खड़ा करने वाला शख़्स जीवन में हर आठ-दस साल के बाद प्रेम बदल देता है और इसके लिए एक आधुनिक सिद्धांत गढ़ता है – पर्दे पे ही आके घोषणाएँ करता है – ‘दोनो अपनी मर्ज़ी से अलग हो रहे है – अपनी जिन्दगी जीने का हक़ सबको है’। फ़िल्म में इतने एकनिष्ठ मूल्यों वाला व्यक्ति जीवन में कुछ और है। तो इस व्यक्ति-स्वातंत्र्य की चेतना के उसूल पर फ़िल्म क्यों नहीं बनाता? अपनी जैसी सही जिन्दगी सब तक क्यों नहीं पहुँचाता? लेकिन इस सितारे को पता है कि ऐसी फ़िल्म को दर्शक ख़ारिज कर देंगे और वह कोई समाज में वैचारिक क्रांति लाने वाला आर्किमिडीज थोड़े ही है कि बिना आगा-पीछा सोचे नंगे दौड़ पड़ेगा ‘यूरेका-यूरेका’ करते हुए – अपने विचारों की मशाल लिये हुए…!!

तो क्या दर्शक इस कमाऊ पाखण्ड को जान गये हैं कि वस्तुतः यह ‘पीके’ भी वास्तविक जीवन व कार्य में चोर-धूर्त्त-पाखंडी बाबा (सौरभ शुक्ला का किरदार) है। और इस बार जनता जान गयी है, तो जाग गयी है – ‘पब्लिक है, यह सब जानती है – पब्लिक है’। इस देश में ‘सम्यक् ज्ञान’ को ‘सम्यक् आचरण’ में उतारने वाले को बुद्ध माना जाता है। सत्य-अहिंसा को जान की क़ीमत पर जीने वाला ‘महात्मा’ बनता है। सो, बहिष्कार उस सितारे आमिर का हो रहा – ‘लाल सिंह चड्ढा’ का नहीं। चड्ढा तो उसकी कमाई का फ़ंडा है। मुखौटा है – पर्दे का चेहरा है…और कभी पर्दे ने ही बताया था – ‘दिल को देखो, चेहरा न देखो। चहरे ने लाखों को लूटा, दिल सच्चा है, चेहरा झूठा’…तो इस बार दिल व चहरे के फ़र्क़ को जनता ने ताड़ लिया है कि बंदे को ख़ुदा बनाने की मिसाल देके यह बंदा करोड़ों लूट रहा है…ऐश कर रहा है…।

प्रेम के साथ ‘लालसिंह चड्ढा’ में इंसानियत भी कूट-कूटकर भरी है। इसका सबसे बड़ा रूप कारगिल युद्ध में चूतड़ पर गोली लगने के बावजूद पाँच लोगों की जान बचाने में उभरता है और इस सोने में सुहागा यह कि उनमे से एक है मुहम्मद, जो पाकिस्तानी है, जिसने कई हिंदुस्तानियों की जानें ली हैं तथा इनकी भी जान लेने वाला था। और लाल सिंह को इस सब कुछ का पता है। याने उस पहले प्रसंग में तो लाल सिंह को ख़ुदा बनाता है प्रेम, लेकिन यहाँ तो ख़ुदा इसकी अंतश्चेतना को खुद संचालित करता है। ऐसी प्रयुक्तियाँ कला की ऐसी निधियाँ हैं, जो उसे देवोचित मनुष्यता के शिखर पर पहुँचाती है। इस कला-चेतना में स्वदेश-परदेस, सिक्ख-मुसलमान, दोस्त-दुश्मन…आदि के सारे भेद मिट जाते हैं। मनुष्य ‘अयं निज: परो वेति’ से परे चला जाता है। उसमें एक अदद इंसान का रूप साफ़ नज़र आने लगता है, पर यह सब ‘फ़ॉरेस्ट गम्प’ जितना निर्मल बन नहीं पाता, क्योंकि आख़िर है तो यह प्रतिलिपि ही – चाहे जितनी ज़हनियत व संजीदगी से पटकथा में उतारा हो अतुल कुलकर्णी ने। फिर उसके हिंदी-प्रस्तोता भी विंस्टन ग्रूम जितने न स्पष्ट हो पाये हैं, न तटस्थ रह पाये हैं, तो उतने गहरे उतर पाते कैसे, गह्वर से मोती चुन पाते कैसे, जब बिस्मिल्ला ही दूषित था…।

इसीलिए पाकिस्तानी व सहज दुश्मन मुहम्मद को अपना बनाते हुए लाल सिंह बने आमिर खान दर्शक को उतने विश्वसनीय इसलिए भी नहीं लगते कि उसे उनमें वह आमिर भी बरबस दिखने लगता है, जो संवेदनशील मौक़ों पर जीवन में कलाकर तो क्या, आम मुसलमान से भी ज्यादा मुसलमान हो जाता है। चाहे इरादतन हो या आदतन उसे उस हिंदुस्तान में डर लगने लगता है, जिसने उसे सारी नेमतें बख्शीं। वह तुर्की चला जाता है। वहाँ की उस रानी से मिलता है, जो इरादतन व अनायास ही धुर विरोधी है भारत की। वह नर्मदा बांध को ऊँचा करने के ख़िलाफ़ आन्दोलन को समर्थन देने निकल पड़ता है…और आज जब उस बांध से गुजरात ही नहीं, सीमा से लगे दूसरे प्रांतों के हिस्सों को मिलाकर वह समूचा सूखा प्रांतर लहलहा रहा है, तब भी अपनी भूल व ग़लत पहल को क़ुबूल तक नहीं करता, खेद व पछतावा व्यक्त करने की तो बात ही क्या!! असल में यह सब करके मिस्टर आमिर अपनी औक़ात जताना चाहते थे, धमकी देना चाहते थे। और इसी की एक पुरज़ोर कड़ी होनी थी यह फ़िल्म भी।

‘फ़ॉरेस्ट गम्प’ में आये इतिहास और उस पर अपने निहित तब्सिरों की सम्भावना देखकर बहुत कुछ कहने का इरादा बना कर चले थे। लेकिन यह देश तो वही है – 1857 वाला। तो मंगल पांडे की तरह जनता ने समय से पहले ही अपने प्रतिकार का बिगुल बजा दिया। फ़िल्म के सिनेमाघरों में आने तक संतोष न हुआ, क्योंकि फिर वही कि यह बहिष्कार आन्दोलन भी सुनियोजित न था। षड्यंत्री न था। स्फोट की तरह आया। यह न हुआ होता, तो फ़िल्म में इतिहास की ‘बाबरी मस्जिद-विध्वन्स’, ‘अडवाणी की रथ-यात्रा’…जैसी घटनाओं पर बने दृश्य ऐसे ही सादा न छोड़ दिये जाते, अवश्य ठीक से छेड़े जाते…!! ‘अबकी बार, मोदी सरकार’ का उल्लेख एक पोस्टर तक ही न होता…इस बावत और भी बहुत कुछ होता…। तो ये सब परहेज़ फ़िल्म के भावी रोग के लिए कर लिये गये…। मुझे तो लगता है कि बाद में सम्पादित भी कर लिए गये हों, तो ताज्जुब नहीं। लेकिन रोग जड़ पकड़ चुका था…। सो, कहावत सही हो रही – अपने कर्मों का फल इसी जन्म में भोगना होता है। और एक अपेक्षाकृत अच्छी फ़िल्म को आमिर के इरादतन किये गये कुछ बुरे कर्मों के फल भुगतने पड़ रहे हैं…। गेहूँ के साथ बिचारा घुन भी पीसा जा रहा है…।

यह भी स्पष्ट हो रहा है कि कोई आन-बान-शान नहीं है इस आदमी की – सितारा सिर्फ़ फ़िल्मी ही है, वरना 5-7 हो या सौ-पचास करोड़, यह खुद्दार अरबपति डटे रहता – घबराता क्यों? गिड़गिड़ाता क्यों? इधर अब लिखने में दो-चार दिन लेट हो गया, तो यह खबर भी आ गयी कि वितरकों को पैसा लौटाएँगे मिस्टर आमिर। लेकिन इसे भी इनकी नेकनीयती व फ़राखदिली न समझा जाये, इस उदारता के पीछे भी ‘अगली फ़िल्मों के लिए वितरक फिर मिलें’, की धंधेबाज़ी ही है, वरना पैसे कमाने-बनाने के अलावा इन फ़िल्म वालों का कोई ईमान-धरम नहीं है। ये लोग के॰ आसिफ़…आदि जैसे कला-दीवाने नहीं हैं, मूलतः बनिए हैं। दो बनिए और उतरे हैं मैदान में – अनुराग कश्यप और अर्जुन कपूर। अर्जुन को लग रहा कि फ़िल्म वालों का चुप रहना ग़लत हो गया। तो अब बोलने का आवाहन कर रहे हैं…, तो देख लें बोलकर भी – जब आमिर जैसे अमीर की बोलती बैंड हो गयी, तो अर्जुन किस खेत की मूली हुए हैं? अनुराग ज्यादा शातिर कश्यप हैं। वे जनता को बचाकर सत्ता पर ठीकरा फोड़ रहे हैं – ‘जीएसटी ने कमर तोड़ दी है। लोगों के पास पैसे नहीं हैं’। इस सावन के अंधे को दिख नहीं रहा कि इतने उत्पाद आ रहे हैं – एक से एक महँगे, बिक जा रहे हैं। कारों की क़ीमतें आसमान छू रही हैं, फिर भी कम्पनियाँ मुहय्या नहीं कर पा रही हैं – प्रतीक्षा सूचियाँ लम्बी होती जा रहे हैं। पैसे नहीं हैं, तो तो यह सब कहाँ से हो रहा है? हाँ, ऐसे द्रोहियों की फ़िल्मों के लिए नहीं हैं पैसे…!! देखने की इच्छा मार ली है लोगों ने – तुम लोगों की कारस्तानियों से। बहरहाल,   

इस तरह हिंदुस्तान में रहते हुए आमिर का वह डर जितना बनावटी व षड्यंत्री था, तुर्की जाने, नर्मदा बांध वाले कारनामे जितने विद्वेषी व बदले की भावना से हुए थे, उतना ही लाल सिंह बने आमिर में नज़र आने लगते हैं। दर्शक के मन में आमिर का लाल सिंह में संतरण (ट्रांस फ़ॉर्मेशन) नही हो पाता। वे आमिर ही रह जाते हैं। यूँ हिंदुस्तान में रहने का यह झूठा डर अभी तक दो ही सितारों (मुसलमानों भी कह सकते हैं) को लगा है – आमिर खान और नसीरुद्दीन शाह, जिन्हें अन्यों के मुक़ाबले ज्यादा समझदार समझा जाता था। दोनो को जनता बख्श नहीं रही है। ये लोग जो कहते हैं, उसका असर इसीलिए पड़ता है – वे कहते भी इसी बिना पर हैं कि वे जनता के बीच एक हैसियत रखते (पब्लिक फीगर) हैं। यह हैसियत भी इसी जनता ने दी है। और वह इनके सोच के लिए नहीं, इनके पर्दे पे किये-देखे काम के लिए मिली है। ये दोनो उस छबि का अपनी निजी जाति व मज़हब के लिए बेजा इस्तेमाल करके देश व बहुसंख्यक अवाम के साथ पक्षपात कर रहे हैं। ये भस्मासुर हैं। भूल जाते हैं कि शंकर के वरदान की तरह जनता द्वारा बनायी गयी उस छबि के बिना उनकी औकात क्या है। तो जिसने वह छबि बनाकर औक़ात दी है, ले भी सकता है – शायद बहिष्कार करके वह यही कर रही है – जैसे को तैसा। तो फिर कह दूँ ‘बहिष्कार फ़िल्म का नहीं, मिस्टर आमिर का है’।

तो अब ‘अस्वीकरण’ में तटस्थता का राग अलाप के या बहिष्कार की घोषणा के बाद इतिहास की घटनाओं में तटस्थता का पोज बनाकर उस कारनामे को झुठला नहीं सकते, जिसे सरेआम अंजाम दिया है। असल में यह फ़िल्म तो बहाना है, फुटकर है। इसे न इस इतिहास का अँचार-मुरब्बा बनना है, न वर्तमान से कुछ लेना-देना है। बस, देश के भविष्य को बिगाड़ना था, जो दांव उल्टा पड़ गया – मियाँ की जूती मियाँ के सिर पड़ गयी। अब इसके प्रति तटस्थता दिखाकर भी कुछ न होगा। चोर की दाढ़ी का तिनका पकड़ में आ गया है, उसे उड़ा भी दिया गया है…। बाबरी आदि दृश्यों में टिप्पणी करता, तो बहिष्कार की आग को और संङहा/संगहा (ईंधन) व हवा मिलती…। सो, ‘बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब, कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है’…।

किंतु उक्त सब कुछ के बावजूद ‘लालसिंह चड्ढा’ में ऐसी कई-कई सिनेमाई खूबियाँ हैं, जिनमें अच्छे सिनेमा के प्राण बसते हैं। ढेरों प्रतीक,संकेत, युतियाँ-युक्तियाँ-संगतियाँ इसमें संजोयी हैं, जिन्हें निबेरने-जानने के बड़े काव्यात्मक मज़े हैं, पर उनके लिए एक और इतने लम्बे आलेख की दरकार होगी। यहाँ अभी एक से शुरू करके बानगी भर दे रहा हूँ। फ़िल्म शुरू होती है और रेल के डिब्बे में लाल सिंह आके एक पैकेट खोलता है, जिसमें सूखी फुल्कियाँ (मुम्बई में पानी-पुरी) रखी हैं। एक एक करके दो खाता है और उसमें डाला जाने वाला मसाला पानी एक बोतल में अलग रखा है, निकाल के पी लेता है। फ़िल्म का अंत भी इसी से होता है, यह तो हुई युति-संगति। अब संवेदन देखें…बीच में पता लगा कि अलग से मसाला-पानी लाना उसी प्रेमिका रूपा डिसूज़ा का कहा है, जब कभी उसके लिए लाने पर सारा पानी बह गया था। अब आगे चलें…

रेलगाड़ी के डिब्बे में बैठा लाल सिंह सामने बैठी मुसाफ़िर से जब बार-बार बोलौनी करता है, तो वह महिला ऊबती-सी दिखती है। उसका ऐसा करना आधुनिक संस्कृति को अजीब लगता है – पकाऊ, पर धीरे-धीरे यही फ़िल्म-प्रस्तुति की प्रमुख शैली बन जाता है। फिर कथा इतनी रोचक बनती जाती है और बड़े निठुरे मने निछद्दम भाव से सुनाने का आमिर का ढंग इतना आकर्षक बनता जाता है कि पूरा थिएटर ही गाड़ी का डिब्बा हो जाता है व हर दर्शक मुसाफ़िर बन जाता है। करीना बिलकुल किरदार में न ढली, तो आमिर उस पात्र की शैली में पूरा का पूरा ढल गया। इसका फ़ायदा भी फ़िल्म को और जो कुछ लोग देखने पहुँचे, उन्हें मिला है। लेकिन वह माँ का बेटा है और बेटे को बनाने में ही माँ बनी मोना सिंह की अभिनेत्री बहुत गहरे उतर जाती है – माँएं ऐसे ही बनती है। मुहम्मद बने मानव विज को कम कुछ करने को मिलने के बावजूद खूब जमे हैं और हिंदुस्तान से मिली-सीखी इंसानियत की पैरोकारी करने के लिए उन्हें पाकिस्तान भेजना भारतीयता की बड़ी समृद्धि बनता है। सबसे सहज-संतुलित ढंग से बिना फ़िल्म या भूमिका पर सवार हुए नागा चैतन्य ने अपने करने से बाला का जो असर छोड़ा है, उसे फैला कर भूमिका की सुगंध से पूरी फ़िल्म को महका दिया गया है।

फ़िल्म की प्रस्तुति को हमारी एक रचनाकर मित्र ने किस्सागोई कहा है, जो एक विधा है, लेकिन उसमें क़िस्से ही होते हैं, दृश्य नहीं बनते। ‘भारत : एक खोज’ में नेहरू बने रोशन सेठ से ऐसा कराया, लेकिन वे सूत्रधार हो जाते थे, तो श्याम बेनेगल ने उसे ‘डॉक्यू ड्रामा’ कहा था। लाल सिंह का यह प्रयोग सबसे अलग है। यहाँ तो वही भोक्ता-कर्त्ता-वक्ता सब कुछ है, तो ‘अपने ही में हूँ मैं साक़ी, पीने वाला, मधुशाला’ हो गया है। और प्रस्तुति का यह गुर ‘लालसिंह चड्ढा’ के लोगों की ईजाद नहीं है, फ़िल्म के कथादि की तरह ही यह भी उस अंग्रेज़ी फ़िल्म की ही देन है। अनुकृति है। लेकिन यह विधान ही है कि लाल सिंह की जिन्दगी में 50 सालों का इतिहास गुँथ उठता है, वरना सम्भव न होता – वैसे पूरे को वहन करने में यह विधान भी हाँफ तो जाता है – बस, दम नहीं तोड़ता। उसी तरह लंगड़े बच्चे से दौड़ चैम्पियन, कारगिल का योद्धा, हर मौक़े पर शक्तिमान की तरह पहुँचकर प्रेमिका को सम्भालने वाला, माँ का सर्वोत्तम बेटा उसके बाद उसकी खेती करने वाला, दोस्त की इच्छा को कार्य रूप देते हुए चड्ढी-बानियान का इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित करने व उसके परिवार को लाभांश देने वाला, पाकिस्तानी को बचाकर उसे भी बेहतर आदमी बना देने वाला और अंत में प्रेयसी-पत्नी की निशानी को भी सम्भालने वाला…आदि-आदि सब कुछ करते हुए स्वतः लाल सिंह और उसे निभाता कलाकार भी इतना तन-बिन कर बिखर तो जाता है – बस, टूटकर गिर भले नहीं जाता…। मूल प्रकृति में पीके का ही सजातीय रहा यह लाल सिंह का किरदार भी – बस, थोड़ा अलग, जिसे आमिर ने पीके के अनुभव व क़्रिया को लागू करते हुए यथोचित संवार कर अंजाम दे दिया है और फ़िल्म उठ जाती है।

अंत में नायक का भागना-भागना और भागना…चाहे जिस राष्ट्रीयता या एकता का संकेत बने, फ़िल्म के तेज़ी से भागने का प्रतीक अवश्य बनता है। और इसीलिए सारी अच्छाई के बावजूद यह फ़िल्म ‘थ्री ईडियट’ की तरह पूरी और ‘पीके’ की तरह दृश्य-टुकड़ों में ही बारम्बार दर्शनीय हो पायेगी, इसमें पूरा संदेह है। इस संदेह में सहायक है ‘फ़ॉरेस्ट गम्प’ का अनुकृति होना भी। यही इसकी खासियत है और बड़ी सीमा भी है, क्योंकि अनुकृति कभी असल नहीं हो सकती…

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