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सामयिक

बाल सवाल .. आफ्टरकेयर के मोर्चे पर कहाँ खड़ा है भारत?

 

  • डॉ अजय खेमरिया

 

“जुबेनाइल जस्टिस एक्ट 2015” भारत मे करीब 20 साल पुराना है। मौजूदा एक्ट सन 2000 औऱ 2006 का अधतन विस्तार है। इसका उद्देश्य भारत के हर बालक को उसकी जन्मजात प्रतिभा और अवसरों का सरंक्षण उपलब्ध कराना है। भारत सरकार ने इसके लिये देशव्यापी एकीकृत बाल सरंक्षण योजना(आईसीपीएस)लागू की है। यह योजना शत प्रतिशत केंद्र प्रवर्तित है। सयुंक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2019 को  चाइल्ड प्रोटेक्शन और केयर बर्ष घोषित किया था। दुनिया के 19 फीसदी बच्चे इस समय हमारे देश में है। इसलिये जुबेनाइल जस्टिस एक्ट के अनुभवों पर चर्चाएं होना स्वाभाविक ही है। हाल ही में जस्टिस दीपक गुप्ता ने अपनी रोमानिया की यात्रा के जो अनुभव साझा किए है वह भारत में बाल सरंक्षण और पुनर्वास के लिहाज से इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रायः हर रोज स्थानीय अखबार बाल दुराचार और अन्य उत्पीड़ित प्रकरणों से भरे रहते है। खासकर नाबालिग बेटियों के साथ दुराचार, यौन हिंसा,बलात्कार  की घटनाओं ने हमारी समाज और राज व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए है। 2012 में बना पॉक्सो एक्ट भी  अपराधियों में भय का माहौल नही बना पाया है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी, ट्रैफिकिंग, और घरेलु  उत्पीड़न, की चुनोतियाँ भी कम खतरनाक नही है। जस्टिस दीपक गुप्ता के अनुसार भारत में देखरेख और सरंक्षण की आवश्यकता वाले बालकों के लिये आफ्टरकेयर यानी पश्चावर्ती पुनर्वास की कोई बुनियादी और परिणामोन्मुखी व्यवस्था हम अभी तक ईजाद नही कर पाएं है।

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केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्रालय द्वारा कुछ समय पहले  बनाई गई  रत्ना जैना कमेटी की एक सयुंक्त रिपोर्ट बताती है हमारे देश मे करीब 23.6मिलियन बालकों (एक्ट में बालक शब्द सम्मिलित रूप से  18 बर्ष तक के बालक बालिका दोनों के लिये है) को विशेष देखरेख और सरंक्षण की आवश्यकता है। मौजूदा आईसीपीएस योजना का क्रियान्वयन राज्यों की सरकारो द्वारा किया जा रहा है। इस योजना को लेकर राज्य सरकारों की प्रतिबद्धता में कमी साफ देखी जा सकती है जैना कमेटी की रपट भी इसकी पुष्टि करती है। असल में राज्य सरकारें पूरी तरह से इस कानून के क्रियान्वयन पर आर्थिक रूप से केंद्र पर ही निर्भर रहना चाहती है अपने संसाधनों के जरिये बाल सरंक्षण के मामले में किसी भी राज्य सरकार ने उदारता दिखाने का प्रयास नही किया है। देश के119 जिले ऐसे है जहां एक भी सीसीआई यानी चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट नही है। यह आंकड़ा रिपोर्ट आने के बाद लगातार बढ रहा है क्योंकि बिहार के मुजफ्फरपुर, मध्यप्रदेश के रतलाम, ग्वालियर, शिवपुरी, जिलों में हुईं बाल ग्रहों की घटनाओं के बाद लगातार ऐसे सीसीआई बन्द हो रहे है। खासकर एनजीओ द्वारा संचालित बाल सरंक्षण गृह इस अवधि में तेजी से बन्द हुए है। महिला बाल विकास की अधिकृत रिपोर्ट के अनुसार बिहार, मध्यप्रदेश की घटनाओं के बाद 539 सीसीआई गंभीर अनियमितताओं और यौन शोषण की शिकायत के चलते बन्द किये जा चुके है। इनमें सर्वाधिक 377 गृह महाराष्ट्र में बन्द हुए है।

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जैना कमेटी की रिपोर्ट ने देश भर के  36 राज्यों और केंद्र प्रशासित राज्यों के सीसीआई का अध्ययन कर बताया कि 2018 की स्थिति में  9589 सीसीआई (बाल गृह 6368) (आश्रय गृह373) ( 278 ऑब्जर्वेशन होम्स) (52 स्पेशल होम्स) (08 सुरक्षा स्थल) (185 स्वाधार गृह) (110 उज्ज्वला गृह) (336 दत्तक ग्रहण निकाय) (10 कॉम्बिनेशन होम्स) (1869 अन्य गृह) में 377649 बालक निवासरत है।
इनमें से सिर्फ 3071 गृह ही जेजे एक्ट  के तहत रजिस्टर्ड है और 3215 तो पूरी तरह से अवैध रूप से संचालित है। वहीं 2072 अन्य कानूनों के तहत पंजीकृत होकर चल रहे है। जाहिर है देश में 68 फीसदी बाल सरंक्षण संस्थान जेजे एक्ट के तहत रजिस्टर्ड नही है। बिहार, मध्यप्रदेश, बंगाल और राजस्थान में हुई घटनाएं इसीलिए संभव हो सकी क्योंकि इन 68 फीसदी संस्थाओं पर सरकारों की कोई सीधी पकड़ नही है। हालांकि केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्रालय ने बिहार की घटना के बाद देश भर के ऐसे सीसीआई को तत्काल जेजे एक्ट के तहत रजिस्टर करने के निर्देश जारी किए थे। लेकिन इस आदेश पर अभी भी अमल नही हो पाया है। ग्वालियर के जिस स्नेहालय में मूक बधिर बच्चीयों के यौन शोषण का मामला प्रकाश में आया है वह संस्थान सीधे विदेशी मदद से संचालित था औऱ किसी भी भारतीय एक्ट के तहत पंजीकृत नही पाया गया। जेजे एक्ट के मौजूदा प्रावधान बेहद कठिन है उसके अधीन पंजीकृत बाल संस्थाओं के नियमित निरीक्षण के अधिकार स्थानीय प्रशासन के पास है। एकीकृत बाल सरंक्षण योजना (आईसीपीएस) में विधिवत रोस्टर और प्रारूप निर्धारित है जिनके आधार पर न केवल प्रशासनिक बल्कि सामाजिक पर्यवेक्षण और ऑडिट तक की व्यवस्था की गई है। इन संस्थानों के लिये आधारभूत सुविधाओं, मानव संसाधन,एवं अन्य आवश्यक आदर्श प्रावधानों के पालन को अनिवार्य किया गया है।

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चूंकि यह काम आईसीपीएस योजना के अधीन है औऱ इसके लिये स्वीकृत स्टाफ की भर्ती, वेतन  केंद्र सरकार के नियमों और वित्त पोषण पर निर्भर है इसलिए राज्य की सरकारों ने इस अमले के परिचालन को पूरी तरह से केंद्र सरकार के भरोसे छोड़ रखा है। इनका वेतन भी केंद्रीय आबंटन के बाद जारी होता है जो अक्सर तीन महीनों में ही आता है। हर राज्य में इस योजना का नोडल विभाग भी अलग है मसलन बिहार में यह समाज कल्याण विभाग के तहत है तो मध्यप्रदेश में महिला बाल विकास। स्थानीय स्तर पर इन कर्मचारियों को नोडल विभाग ने अपने अन्य कामों में भी लगा रखा है इस कारण जेजे एक्ट का काम द्वितीयक होकर रह गया है। सभी जिलों में जिला बाल कल्याण अधिकारी का चार्ज जिला महिला बाल विकास या जिला समाज कल्याण अधिकारियों को सुपुर्द किया हुआ है जिनके पास पहले से ही अपने मूल विभागीय कार्यों का अंबार लगा रहता है। यही वजह है कि देश के 40 फीसदी बच्चों का हेल्थ चेकअप इन संस्थानों में नही हो रहा है न ही 50 फीसदी का कोई  हेल्थ रिकॉर्ड संधारित्र है। 80 फीसदी का टीकाकरण नही होना भी बताता है कि राज्य सरकारों ने किस स्तर पर इन सीसीआई को संचालकों के हवाले छोड रखा है। खासबात यह है कि देश के 91 फीसदी गृह एनजीओ द्वारा चलाये जा रहे है। देश के कर्नाटक, तेलंगाना और छतीसगढ़ ऐसे राज्य है जहां सर्वाधिक बच्चे चाइल्ड पोर्नोग्राफी से पीड़ित है। मध्यप्रदेश में बाल विवाह के मामले सर्वाधिक है और अगर इसमें कुपोषण का आंकड़ा जोड़ दिया जाए तो  देश भर में सरंक्षण और सुरक्षा योग्य करीब दो करोड़  बालकों का इजाफा हो जाएगा।

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सवाल यह है कि जिन संस्थाओं में यह बच्चे रहते है वह 98 फीसदी जिला मुख्यालय पर है और यहां इनका प्रवेश विधि विरुद्ध कृत्यों, माता पिता द्वारा त्यागे जाने, खो जाने, समर्पित करने औऱ अन्य परिस्थितियों के चलते होता है जबकि जेजे एक्ट का कवरेज प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित, एड्स संक्रमण, कुपोषण पीड़ित बालकों को भी दायरे में लाता है लेकिन किसी भी राज्य में सही मायनों में सुरक्षा और सरंक्षण के पात्र बच्चों की मैपिंग की कोई नियमित व्यवस्था नही है। बाल मजदूरी, कचरा पन्नी बीनने वाले, ड्रग एडिक्ट श्रेणी के बालकों के पुनर्वास की व्यवस्था भी जेजे एक्ट करता है लेकिन सवाल यह है कि इन संस्थानों में पहले से निवासरत बच्चों को बालिग होने के बाद मुख्यधारा में समेकित करने की क्या व्यवस्था हमारे पास उपलब्ध है? खासकर 18 साल पूर्ण कर चुकी बेटियों के लिये यह सवाल एक त्रासदी से कम नही है। 63 फीसदी से अधिक बालिकाओं को 18 साल की आयु पूरी करने के बाद कोई रोजगार नही मिला है क्योंकि उनके पास कोई कौशल ही नही है। 81 फीसदी बालक 18 साल बाद इन गृहों से बगैर कौशल/हुनर के  निकलकर समाज में कैसे समेकित हो रहे होंगे इसे आसानी से समझा जा सकता है। हमें नीतिगत स्तर पर इसे समझना होगा कि जेजे एक्ट का दायरा सिर्फ 18 साल तक सीमित नही है भारत में अगर इन परित्यक्त, शोषित, समर्पित, अभ्यर्पित, बच्चों को राष्ट्रीय उत्पादकता के साथ जोड़ना है तो हमें आफ्टरकेयर पर भी ठोस काम करने की जरूरत है। इसके लिये श्रीलंका और बांग्लादेश के मॉडल को अपनाया जा सकता है जहां स्थानीय  और खासकर कपड़ा एवं जूट उधोग से ऐसे बालको को जोड़ा गया है।
जाहिर है भारत में एक ऐसी बाल सरंक्षण योजना की आवश्यकता है जो स्थानीय सामाजिक परिवेश के अनुकूल हो। क्योंकि बाल गृह किसी बुनियादी दिशा में लक्ष्यों के अनुरूप काम करने में फिलहाल नाकाम साबित ही हो रहे है। संस्थानीकरण की जगह सामुदायिक सरंक्षण से ही भारत के बचपन को सँवारा जा सकता है।

लेखक जेजे एक्ट के अधीन गठित चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के चेयरपर्सन हैं|
सम्पर्क-  +919109089500, ajaikhemariya@gmail.com

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