समाजस्त्रीकाल

सेक्स और जेंडर

 

  • सलिल सरोज

 

अमूमन सेक्स और जेंडर को हमारे समाज में एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखा जाता है, कित्नु यह अवधारणा सत्य से उतनी ही दूर है जितना कि धरती से चन्द्रमा। समस्या हमारे समाज की सोच की भी है कि इन विषयों पर परिचर्चा करना आज भी दुष्कर्म ही माना जाता है। विद्यालयों में भी जहाँ यौन शिक्षा अनिवार्य कर दी गई है वहाँ भी इन विषयों पर आधा-अधूरा ज्ञान ही परोसा जा रहा है। सेक्स का मतलब संकोच के वातारण में पढ़ाया जा रहा कोई पाठ नहीं है बल्कि समाज के बेहतर परिकल्पना की दिशा तय करना भी होता है। सेक्स और जेंडर हमारे विद्यालयों के जीवविज्ञान के चैप्टर से बाहर भी बहुत कुछ है जिसे जानने और समझने की नितांत आवश्कयता है, केवल स्त्री या पुरुष को नहीं बल्कि समाज के हर वर्ग के हर इकाई को।

सेक्स जहाँ एक जैव वैज्ञानिक संरचना है वहीं जेंडर एक सामाजिक परिकल्पना है। सेक्स, महिला और पुरुष के शारीरिक ढाँचे के अंतर के साथ उससे जुडी हुई क्षमताओं और अक्षमातों को दर्शाता है तो जेंडर, समाज के द्वारा स्त्री और पुरुष के लिए गढ़ी हुई टकसाली अवयव है। सेक्स कीअसमझता जितना समाज का नुकसान करती है, उससे कहीं ज्यादा जेंडर की गलत परिभाषा से समाज को नुकसान पहुँचता है। सेक्स की गलत समझ से समाज में कई विद्रूप उत्पन्न होते हैं लेकिन जेंडर की दकियानूसी विचारों से कई पीढ़ियों का विनाश होना तय हो जाता है।

 

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फ़्रांसिसी विद्वान् सिमोन डी विभोर लिखती हैं ” महिलाएँ पैदा नहीं होती बल्कि महिलाएँ समाज के द्वारा बनाई जाती हैं। ” यह विचार जब से सिमोन के द्वारा प्रतिपादित किए गए तब से लेकर आज तक यह अपने आप में एक अकाट्य सत्य की तरह अपनी जगह पर पूरी तरह से टिकी हुई नज़र आती है। जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो उसके लिंग या सेक्स का पता तभी चल जाता है लेकिन समाज में हर लिंग के लिए कितने अलग क़ानून बने हुए हैं यह समय के साथ उन्हें पता चलता है। यह समाज एक लिंग को दूसरे लिंग से कितना अधिक पूजता है, यह दोगलापन धीरे-धीरे करके महिलाओं के सामने आगे आना शुरू हो जाता है। महिलाएँ जिन अक्षमताओं के साथ पैदा नहीं हुई होती हैं, यह समाज उन अक्षमाताओं को स्त्रियों पर लादना शुरू कर देता है और कालान्तर में स्त्री की पूरी परिभाषा ही उलट हो जाती है। कुछेक वाक्य तो ऐसे हैं कि हर घर में सुबह-शाम, गर्मी-ठण्ड, घर-बाहर हर जगह दोहराए जाते हैं। “तुम लड़की हो, इस तरह क्यों हँसती हो? तुम लड़की हो, लड़कों के साथ क्यों खेलती हो? तुम लड़की हो, पैर पसार कर क्यों खड़ी हो? तुम महिला हो, पतियों से पहले क्यों खाती हो? तुम लड़की हो, तुम तो मासिक धर्म से अपवित्र हो जाती हो? तुम लड़की हो, तुम्हारे लिए सेक्स की बात करना तो पाप है? तुम लड़की हो, तुम्हें शाम से पहले घर पर होना चाहिए और ऐसे अनेक स्त्री विरोधी संरचनाएँ जेंडर अलगाव के तत्वाधीन पैमाने हैं। और यह जेंडर विकसित करने का क्रम सिर्फ महिलाओं पर ही नहीं रूकता बल्कि लड़कों के लिए भी कुछ दोहे लागू किए गए हैं। “अरे, तुम लड़के हो और रो रहे हो? अरे लड़कों से ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं। मर्द को दर्द नहीं होता। ब्लू फिल्में नहीं देखी तो मर्द नहीं बने, तुम बेटे हो, मुखाग्नि तुम्हें ही देनी पड़ेगी और भी तमाम ऐसी सोच ने समाज में स्त्री और पुरुष के बीच में एक गहरी दीवार खड़ी कर रखी है। “Related image

इस गहरी खाई का परिणाम यह है कि समाज में स्त्रियों को “सेकण्ड सेक्स ” का दर्जा प्राप्त है और उन्हें दूसरे दर्जे के ही अधिकार प्राप्त हैं। घर सम्भलना, बच्चे भी पति और ससुराल वालों की इच्छा से पैदा करना, जब और जैसे पति चाहे तब सम्भोग करना, घर के आर्थिक और पारीवारिक निर्णय में शून्य भागीदारी, अर्थ के लिए पति तो कभी बेटों पर निर्भर रहना, परिवार के सुख के लिए लगातार समर्पण करना और तिल-तिल करके मरते रहना, स्त्रियों की नियति मान ली जाती है। अपनी पसंद का कपडा नहीं पहनना, माहवारी में ये नहीं खाना तो वो नहीं खाना, 8 बजे के बाद यहाँ नहीं जाना तो वहाँ नहीं जाना, ये नौकरी नहीं करना वो खेल नहीं खेलना और कितने ही ऊल -जुलूल धारणाओं का शिकार है यह समाज और उस में पल रही लडकियां, जबकि लड़के और पुरुष ऐसे किसी भी बंधन से उन्मुक्त विचरण करते हुए नज़र आते हैं। इसका परिणाम है -महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध जैसे कि यौन हिंसा, डेट रेप, स्टाकिंग, घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, दहेज़ के लिए जलाना और घर से निकाल देना। यदि जेंडर न्यूट्रल समाज की कलपना कभी भी की गई होती तो देश के कई राज्यों में स्त्री-परुष का लिंगानुपात इतना खतरनाक नहीं होता। बेटियों को बोझ नहीं समझा जाता। भ्रूण हत्या, बालिका वध जैसी कुरीतियाँ पैदा नहीं होती और हर घर से कोई कल्पान चावला तो कोई लक्ष्मी बाई निकलती लेकिन समाज कब तक तैयार होगा इस क्रांतिकारी बदलाव को, यह एक सोचनीय प्रश्न है।

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राजेन्द्र यादव

राजेंद्र यादव की किताब ” स्त्रियों के हक़ में ” या तस्लीमा नसरीन की आत्मकथाएं या फिर कमला दास की कविताएँ इस समाज को झकझोड़ने के लिए कतिपय काफी हैं लेकिन उसके लिए इनको पढ़ना और समझना भी जरूरी है। भारत के कई प्रांतों में स्त्रियाँ या तो देवी हैं या तो कुलटा, बस स्त्री ही नहीं है। स्त्री स्वयं में एक परिपूर्ण रचना है, इसके आगे या पीछे जोड़ने की कोई ख़ास आवश्यकता नहीं है। प्रकृति ने उसे जिस रूप में रचा हैं, उसे उसी रूप में स्वीकार करने की हिम्मत इस समाज को दर्शानी होगी।

” ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी “” मतलब ढोल (एक साज), गंवार(मूर्ख), शूद्र (कर्मचारी), पशु (चाहे जंगली हो या पालतू) और नारी (स्त्री/पत्नी), इन सब को साधना अथवा सिखाना पड़ता है.. और निर्देशित करना पड़ता है…. तथा विशेष ध्यान रखना पड़ता है ॥ लेकिन क्यों और इसका अधिकार किसी ख़ास वर्ग को ही क्यों प्राप्त है? हालाँकि इसके कई अर्थ हो सकते हैं लेकिन यथास्थिति सच में सच से बहुत दूर है।

एरिका जोंग कहती हैं कि कोई भी समस्या सिर्फ महिलाओं की ही नहीं होती हैं। पूरे समाज को इसे सामाजिक समस्या के रूप में देखना होगा। वर्ना समाज का आधा हिस्सा हमेशा के लिए उपेक्षित और वंचित ही रह जाएगा। वो कहती हैं कि समाज में स्त्रियों को एक क्रांति की आवश्यकता है जहाँ उन्हें बिना वेतन का नौकर न माना जाए या उन्हें समाज में दूसरे दर्जे का नागरिक न समझ लिया जाए।

लेखक संसद भवन, नई दिल्ली में लोक सभा सचिवालय में कार्यकारी अधिकारी हैं|

सम्पर्क- +919968638267, salilmumtaz@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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