सिनेमा

अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा – अमिता

 

  • डॉ. अमिता 

 

वर्तमान समय में शिक्षक और छात्र दोनों के लिए शिक्षण व्यवस्था एक चुनौती बनकर रह गयी है। समय-समय पर फिल्मों के माध्यम से इस व्यवस्था पर सवाल उठाया जाता रहा है। हाल ही में प्रदर्शित फिल्म सुपर 30 में देश, खासतौर पर बिहार में चरमरायी शिक्षा व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुये प्रतीत होता है। आनंद कुमार के किरदार में एक बेहतर विद्यार्थी और शिक्षक को प्रस्तुत किया गया है। आनंद कुमार बिहार के एक ऐसे परिवार से सम्बन्ध रखते हैं, जहाँ बड़े से बड़ा अवसर उन्हें इसलिए खोना पड़ जाता है क्योंकि उनको गरीबी ने घेर रखा था। बिहार के अधिकांश लोग देश-दुनिया के कोने-कोने में फैले हुये हैं, जिसका मुख्य कारण उनका विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने-आप को स्थापित कर लेना है।

आनंद कुमार जैसा व्यक्तित्व जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे बीमारू राज्य की श्रेणी में आता है, जिसका नाम पिछड़ेपन के खाते में दर्ज है। उन्होंने अपने जीवन में जो संघर्ष किया वह बिहार के युवा संघर्ष के यथार्थ चित्रण के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अक्सर देश के अखबारों में सुर्खियाँ बनी होती है। हम समाचार पत्रों में ऐसी खबरें पढ़ते हैं कि अमूक परीक्षा में बिहार के विद्यार्थी ट्रेन के अंदर जगह नहीं होने के कारण ट्रेन के ऊपर बैठकर परीक्षा देने गये और कई बार तो ऐसी स्थिति में परीक्षा देने के कारण वे मौत तक का शिकार हो जाते हैं। लेकिन उनके जज्बे में कोई कमी नहीं आती है। आनंद कुमार को भी ऐसे ही जज्बे से ओत-प्रोत दिखाया गया है, जो ज्ञान की ललक में पटना से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पत्रिका पढ़ने और अपने सवालों को हल करने ट्रेन के ऊपर बैठकर जाया करते थें। एक दिन इसी विश्वविद्यालय के बाबू (क्लर्क) द्वारा आनंद कुमार को पुस्तकालय में बैठकर किताब पढ़ते देख लिया जाता है और बाहरी विद्यार्थी होने के नाते उन्हें वहाँ से निकाल दिया जाता है। बाहर निकाले जाने के दौरान ही उन्हें वहाँ का चपरासी सलाह देता है कि अगर तुम्हें यह विदेशी पत्रिका चाहिए तो इसमें अपने आलेख भेजो और आलेख छपने पर तुम्हे पत्रिका खुद ही मिलने लगेगी। फिर आनंद कुमार वहाँ से इस चुनौती को लेकर निकलते हैं कि अब पत्रिका में आलेख छपवाना है। आलेख तो वे लिख लेते हैं लेकिन उसे विदेश पोस्ट करने के लिए भी पैसे की मशक्कत करनी पड़ती है। पोस्ट ऑफिस में ही उनके पिता जी कार्यरत थें, जहाँ सभी से चंदा इक्ट्ठा करके वे पोस्ट करते हैं। इस प्रयास पर उनके पिता पर सभी स्टाफ व्यंग्य करते हुये कहते हैं कि तुम बेकार में कोशिश कर रहे हो, क्योंकि राजा का बेटा ही राजा बनता है। इसपर आनंद कुमार के पिता कहते हैं कि वे जमाना गया जब राजा का बेटा राजा बनता था, ”अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा।“ और जल्द ही पत्रिका में आलेख छपकर आ जाता है, जिसे उस बाबू (क्लर्क) को दिखाने वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जाते हैं, जहाँ से उन्हें निकाला गया था। इसी आलेख के आधार पर उनका चयन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में होता है, और आनंद कुमार के पिता जी के लाख प्रयासों के बावजूद गरीबी के कारण आनंद कुमार कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय नहीं जा पाते हैं, जिसके गम में उनके पिता की मृत्यु हो जाती है। आनंद कुमार के द्वारा इतने अच्छे अवसर को खो देने का जिम्मेदार गरीबी को तो दिखाया ही गया है, साथ ही साथ देश की व्यवस्था और उन नेताओं को भी बताया गया है, जो हर चीज के पीछे अपनी राजनीति की रोटी सेंकते हैं, और समय आने पर किसी की मदद नहीं करते जबतक की उसमें उनका स्वार्थ न हो।

पिता की मृत्यु के बाद आनंद कुमार बहुत संघर्षों के साथ जीवन में आगे बढ़ रहे होते हैं और उन्हें पापड़ तक बेचते हुये दिखाया जाता है। किंतु एक दिन उसी मंत्री का पीए रास्ते में आनंद कुमार को मिलता है और आनंद कुमार का हाल देखकर उन्हें अपने कोचिंग सेंटर में ले जाता है और उन्हें एक्सीलेंस कोचिंग में शिक्षक बनकर एक बेहतर जिन्दगी जीने को कहता है। आनंद कुमार भी अपनी बदहाल परिस्थितियों से निकलकर एक बेहतर जिन्दगी जीने के लिये कोचिंग में शिक्षक बन जाते हैं। यह कोचिंग सेंटर सिर्फ अमीरों के लिये ही था, गरीबों के लिए यह किसी सपने से कम नहीं था। इस कोचिंग में कदम रखते ही चारों तरफ बाजार में आनंद कुमार के पोस्टर, बैनर लगवा दिये जाते हैं। शिक्षा का किस प्रकार बाजारीकरण और निजीकरण होता है तथा इससे नेताओं को क्या फायदा होता है, इस फिल्म से बखूबी समझा जा सकता है। वर्तमान परिदृश्य में चारों ओर शिक्षा को व्यापार के रूप में देखा जा सकता है, जिसे फिल्म में बेहतरीन तरीके से चित्रित किया गया है।

जिन्दगी पटरी पर आने के बाद आनंद कुमार को दोबारा गरीबी का एहसास तब होता है, जब स्ट्रीट लाइट में बैठकर एक बच्चा पढ़ाई कर रहा होता है और उसके पिता उसे पढ़ाई छोड़कर काम करने के लिए कहते हैं। थोड़ी देर बाद उसी बच्चे के पिता के रिक्शे पर बैठकर आनंद कुमार को घर जाते हुये दिखाया जाता है। घर जाने के दौरान दोनों के बीच संवाद चलता है। इस संवाद में आनंद कुमार कहते हैं कि तुम अपने बेटे को पढ़ने दो अच्छा कर सकता है। तब वे रिक्शा चालक बोलता है कि वे पागल है, अपने आप ही पढ़ता रहता है। आपको नहीं पता कि सिर्फ राजा का बेटा ही राजा बनता है। एकलव्य कितना भी अच्छा क्यों न हो दोणाचार्य तो उसका अंगूठा मांग ही लेंगे गुरू दक्षिणे में ताकि राजा का बेटा अर्जुन हमेशा राजा बना रहे। इस संवाद के माध्यम से इतिहास के दोणाचार्य के साथ-साथ वर्तमान द्रोणाचार्यों पर भी करारा प्रहार किया गया है, जो आपके आसपास बहुत ही आसानी से किसी-न-किसी रूप में दिख जायेंगे। इस संवाद के बाद आनंद कुमार पूरी तरह से हिल जाते हैं और उन्हें अपने पिता की कही वे बात याद आती है, जिसमें वे कहते हैं, ”अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा।“ फिर दूसरे ही दिन वे गरीब बच्चों के लिए अपने ही घर में आवासीय कोचिंग चलाना प्रारंभ करते हैं और गरीबों में से चयनित करते हैं सुपर 30 को।

सुपर 30 कोचिंग में जिस तरीके से शिक्षा के बाजारीकरण और निजीकरण को पछाड़ते हुये गरीबों को शिक्षा की ओर अग्रसर तो किया ही है, साथ ही रटंत विद्या से ऊपर उठाकर व्यावाहरिक शिक्षा पर भी जोर दिया है। उन्होंने सवालों में भी सवाल ढूंढने की बात कही। जबकि वर्तमान शिक्षा पद्धति में सवालों को कुचलने का भरसक प्रयास किया जाता है। उन्होंने चार दीवारी की शिक्षा से बाहर निकलकर गली, चैराहे, रेलगाड़ी, क्रिकेट सभी में ज्ञान को तलाशने की सलाह दी, वहीं वर्तमान शिक्षा पद्धति को चार दीवारी के भीतर समेटने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कबाड़ से भी जुगाड़ बनाकर नये प्रयोग करना सिखाया, ज्ञान को जीवन में समाहित कर उसे जीवंत करना और आगे बढ़ना सिखाया।

इस फिल्म में अंग्रेजी भाषा पर भी जबरदस्त व्यंग्य किया गया है। फिल्म की शुरूआत में ही फुग्गा नाम का एक विद्यार्थी जो विदेश में वैज्ञानिक के रूप में दिखाया जाता है, वे कहते हैं कि मैं अंग्रेजी बोल सकता हूँ लेकिन हिन्दी में ही बात करना पसंद करूंगा और फिर हिन्दी में ही वे आनंद कुमार का गुणगान करते हैं। फिल्म के एक दृश्य में सुपर 30 के विद्यार्थी एक्सीलेंस कोचिंग के विद्यार्थी से स्टेटस और अंग्रेजी को देखकर उनसे प्रतियोगिता में हार जाते हैं। इस प्रतियोगिता में अमीरी और गरीबी के बृहद अंतर पर भी जोरदार कटाक्ष करते हुये कहा गया है कि प्रतियोगिता करनी है तो पहले बराबरी दो। अंग्रेजी और स्टेटस के खौफ को खत्म करने के लिए आनंद कुमार अपने विद्यार्थियों को होली के दिन एक्सीलेंस कोचिंग सेंटर के बाहर नुक्कड़ नाटक अंग्रेजी में करने का आदेश देते हैं। इस खेल में एक्सीलेंस कोचिंग सेंटर के विद्यार्थी और सुपर 30 के विद्यार्थी आपस में मिल-जुलकर नाचते-गाते हैं, जिसके बाद सुपर 30 के विद्यार्थियों का खौफ खत्म हो जाता है और उनका आत्म विश्वास बुलन्द हो उठता है।

इस पूरे नाटक के खत्म होने के बाद एक पत्रकार आनंद कुमार से पूछता है कि क्यों अंग्रेजी को बढ़ावा दे रहे हो? तब आनंद कुमार के द्वारा यह कहा जाता है कि मैं अंग्रेजी को बढ़ावा नहीं दे रहा हूँ, बल्कि अंग्रेजी का डर भगा रहा हूँ, क्योंकि देश के बहुत दरवाजे हैं जो “मे आई कम ईन नहीं बोल पाने के कारण बंद रह जाते हैं।”

इस फिल्म में पत्रकारिता के गिरते नैतिक मूल्यों के प्रतिकूल एक ऐसे पत्रकार की भूमिका को प्रस्तुत किया गया है, जो काबिले तारीफ है। उस पत्रकार की अहम भूमिका के कारण आनंद कुमार सुपर 30 को बंद होने से बचा लेते हैं साथ ही उनपर होने वाले हमलों से भी वह पत्रकार उन्हें बचाता है। इस नैतिक मूल्य को वर्तमान समय में पत्रकारों में ढूंढना मुश्किल होता जा रहा है।

सुपर 30 के बच्चों के आईआईटी के परीक्षा के एक दिन पहले ही आनंद कुमार पर हमला हो जाता है, जिसके कारण सभी विद्यार्थी पूरी तरह टूट जाते हैं, लेकिन हार नहीं मानते। वे आनंद कुमार द्वारा दिये गये व्यावहारिक ज्ञान से सभी असमाजिक तत्वों को परास्त कर देते हैं और अपने गुरू को मौत के मुँह में जाने से बचा लेते हैं। अपने गुरू को सही सलामत देखकर सभी विद्यार्थी सुबह परीक्षा में शामिल होते हैं और सफलता भी प्राप्त करते हैं और समाज का वे भ्रम दूर करते हैं कि “सिर्फ राजा का बेटा ही राजा बनेगा।” उन्होंने ये साबित कर दिया कि गरीब से गरीब इंसान भी राजा बन सकता है अथवा अपनी ईच्छाओं को पूरा कर सकता है। मैं खुद भी बिहार के ऐसे क्षेत्र से आती हूँ जहाँ शिक्षा प्राप्त करना, खासतौर पर लड़कियों को शिक्षित करना मां-बाप और लड़की सभी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था, कमोबेश आज भी है। लेकिन इस भ्रम को तोड़ते हुये मैंने वे मुकाम हासिल किया, जिसके लिये मैं अग्रसर थी।

आनंद कुमार के रूप में प्रस्तुत किरदार और उनका वास्तविक जीवन वर्तमान शिक्षा पद्धति पर पुर्नविचार करने को बाध्य कर देती है, जिसमें सुधार करके हम इस बदहाल शिक्षा व्यवस्था से ऊपर उठ सकते हैं। साथ ही चार दीवारी में कैद करके, विद्यार्थियों के मनस पटल को कैद करके और उन्हें किताबी ज्ञान में उलझा कर रखने वाले शिक्षक के लिए भी यह फिल्म बेहद विचारणीय है। हम कितना भी किताबी ज्ञान दे लें लेकिन वे व्यावहारिक ज्ञान के बिना अपूर्ण ही माना जायेगा और जब भी हम शिक्षक दिवस को मनायेंगे तो इतिहास के पन्नों पर महत्मा फूले और सावित्री बाई फूले नजर आयेंगे तो वर्तमान के पन्नों पर आनंद कुमार जैसे शिक्षक।

लेखिका गुरू घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.) में सहायक प्राध्यापक हैं |

सम्पर्क-   +919406009605

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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