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	Comments on: क्या ‘आज हिन्दी कविता खतरे में है’?	</title>
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	<description>सच के साथ, सब के साथ</description>
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		<title>
		By: Kumar Bijay Gupt		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Kumar Bijay Gupt]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Nov 2025 05:32:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महत्वपूर्ण आलेख. किन्तु फेसबुक ने नए रचनाकारों को प्लेटफार्म दिया है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता. रही बात हिंदुत्व व हिन्दू की, कविता अपने रचनाकारों की मनःस्थितिन का प्रकटीकरण है. साथ ही, जो प्रगतिशीलता का नारा नहीं लगा रहे तो क्या वे प्रगतिशील नहीं हैं. आज, हर कोई स्वयं को प्रतिरोध का कवि धोषित कर रहा है, इस बात को पाठक खूबसूरत समझ रहे हैं.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>महत्वपूर्ण आलेख. किन्तु फेसबुक ने नए रचनाकारों को प्लेटफार्म दिया है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता. रही बात हिंदुत्व व हिन्दू की, कविता अपने रचनाकारों की मनःस्थितिन का प्रकटीकरण है. साथ ही, जो प्रगतिशीलता का नारा नहीं लगा रहे तो क्या वे प्रगतिशील नहीं हैं. आज, हर कोई स्वयं को प्रतिरोध का कवि धोषित कर रहा है, इस बात को पाठक खूबसूरत समझ रहे हैं.</p>
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		<title>
		By: गिरीश पंकज		</title>
		<link>https://sablog.in/is-hindi-poetry-in-danger-today/20186/#comment-6259</link>

		<dc:creator><![CDATA[गिरीश पंकज]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Nov 2025 03:26:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पूरे लेख को बहुत ध्यान से पढ़ा। पहली बात तो यह है की कविता कभी मर नहीं सकती। साहित्य में ऐसे जुमले कुछ माफिया किस्म के लोग उछालते रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनकी आत्मा में साहित्य नहीं है, जुबान पर है। ये वही लोग हैं जो मदिरापान करते हुए,  पूरी अय्याशी करते हुए आम आदमी की बात करते हैं।  रही बात निराला की तथाकथित आलोचना करने वाले मुट्ठी भर लोगों की तो कहना चाहता हूँ कि ये सारे लोग एक दिन गुमनाम होकर मर जाएँगे, लेकिन निराला कालजई बने रहेंगे। सदियों तक। उनकी रचनाओं में सांप्रदायिकता देखना भयंकर कुंठा का परिणाम है। निराला में एक प्रगतिशील दृष्टि तो है।भले ही वे प्रगतिशील लेखक संघ में न गए हों। और मैं यह बात भी समझ नहीं पाता कि अगर सनातन मूल्य पर कहीं कुछ लिखा जाए, तो कुछ लोगों को मिर्ची क्यों लगती है। क्या भारत देश 1947 में बना? यह पुरातन राष्ट्र है।उसकी अपनी कुछ परंपराएँ हैं, कुछ मूल्य हैं। उन पर विमर्श क्यों नहीं हो सकता?]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पूरे लेख को बहुत ध्यान से पढ़ा। पहली बात तो यह है की कविता कभी मर नहीं सकती। साहित्य में ऐसे जुमले कुछ माफिया किस्म के लोग उछालते रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनकी आत्मा में साहित्य नहीं है, जुबान पर है। ये वही लोग हैं जो मदिरापान करते हुए,  पूरी अय्याशी करते हुए आम आदमी की बात करते हैं।  रही बात निराला की तथाकथित आलोचना करने वाले मुट्ठी भर लोगों की तो कहना चाहता हूँ कि ये सारे लोग एक दिन गुमनाम होकर मर जाएँगे, लेकिन निराला कालजई बने रहेंगे। सदियों तक। उनकी रचनाओं में सांप्रदायिकता देखना भयंकर कुंठा का परिणाम है। निराला में एक प्रगतिशील दृष्टि तो है।भले ही वे प्रगतिशील लेखक संघ में न गए हों। और मैं यह बात भी समझ नहीं पाता कि अगर सनातन मूल्य पर कहीं कुछ लिखा जाए, तो कुछ लोगों को मिर्ची क्यों लगती है। क्या भारत देश 1947 में बना? यह पुरातन राष्ट्र है।उसकी अपनी कुछ परंपराएँ हैं, कुछ मूल्य हैं। उन पर विमर्श क्यों नहीं हो सकता?</p>
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		<title>
		By: माधवेन्द्र		</title>
		<link>https://sablog.in/is-hindi-poetry-in-danger-today/20186/#comment-6257</link>

		<dc:creator><![CDATA[माधवेन्द्र]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Nov 2025 15:39:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बहुत समझदारी का लेख है… समझ को बढ़ाने, साफ़ करने वाला…]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत समझदारी का लेख है… समझ को बढ़ाने, साफ़ करने वाला…</p>
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		<title>
		By: अच्युतानंद मिश्र		</title>
		<link>https://sablog.in/is-hindi-poetry-in-danger-today/20186/#comment-6256</link>

		<dc:creator><![CDATA[अच्युतानंद मिश्र]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Nov 2025 15:22:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महत्वपूर्ण और जरूरी लेख।रविभूषण जी ने बहुत स्पष्टता और बेबाकी से अपनी बात कही है जो बहुत से स्वीपिंग रिमार्क और अमूर्तन को प्रश्नांकित करता है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>महत्वपूर्ण और जरूरी लेख।रविभूषण जी ने बहुत स्पष्टता और बेबाकी से अपनी बात कही है जो बहुत से स्वीपिंग रिमार्क और अमूर्तन को प्रश्नांकित करता है।</p>
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