पर्यावरण

शहरी परिवहन में उपेक्षित पैदल यात्री और बढ़ता प्रदूषण – महेन्द्र यादव

 

  • महेन्द्र यादव

 

बढ़ते शहरीकरण के दौर की यह सभ्यता पीछे गाँव की तरफ लौटेगी यह कहना असम्भव जैसा प्रतीत होता है| शहरीकरण की गति हर सरकार के दौर में तेज हुई है| शहरीकरण की होड़ में छोटे शहर भी बड़े शहरों की नकल करते या विदेश के शहरों जैसा बनने का सपना देखते हैं| वैसे तो सभी शहर का अपना इतिहास, भूगोल, उसके बनने की परिस्थितियाँ रहती ही हैं, पर कुछ गिने-चुने शहरों को छोड़ दिया जाय तो अपने यहाँ एक समानता कमोबेश सभी शहरों में दिखती है; वह यह है कि पहले लोग बसना शुरू करते हैं फिर शहरीकरण की योजनाएँ बनती हैं| पहले गाँव बसता है फिर यही कस्बा बनता हुआ शहर बनने लगता है| शहर को मेहनत से चलाने वाले लोग हासिए की तरफ चले जाते हैं| मलिन बस्तियाँ (स्लम) भी साथ-साथ ही निर्मित होती हैं| इस शहरीकरण में सड़क, बिजली, पानी, सीवरेज, जलनिकासी इत्यादि बुनियादी समस्यायों के साथ  आजकल दो प्रमुख समस्याएँ लगभग सभी शहरों में कॉमन होती जा रही हैं; एक प्रदूषण का तेजी से बढ़ता स्तर, दूसरा सड़क जाम की विकराल समस्या|  लोगों की दिनचर्या में बदलाव से मोटापा, मधुमेह जैसी बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं| विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के 14 शहर हैं| दुनिया में होने वाली 4 मौतों में 1 का कारण प्रदूषण होता है, वहीं अपने देश में सालाना लगभग 2 मिलियन लोगों की मृत्यु के कारणों में प्रदूषण होता है| भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित शहरों का देश बन गया है| शहरों में आये दिन बनने वाले फ्लाईओवर के बाद भी जाम बढ़ रहा है| निजी गाड़ियों में बेतहासा बृद्धि से बनने वाली नई चौड़ी सड़क भी कुछ समय बाद ही जाम से त्रस्त दिखने लगती है| प्रत्येक माह 2 लाख कारें और उसकी दस गुणा 20 लाख दोपहिया वाहन सडकों पर आ रहे हैं| दुर्घटनाओं में बेतहाशा बृद्धि दर्ज हो रही है| राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश में वर्ष 2015 में सड़क दुर्घटनाओं में 1.5 लाख लोगों ने जान गँवायी| अकेले बिहार में ही लगभग 7 हजार लोगों ने जान गँवायी है| इन दुर्घटनाओं में प्रत्येक वर्ष लगभग 4% इजाफा हो रहा है, जबकि यह भी सच्चाई है कि दुर्घटनाओं के सभी आंकडे दर्ज नही हो पाते हैं| दुर्घटनाओं में जान गँवाने वाले लोगों में अधिकतर पैदल और दोपहिए से चलने वाले लोग होते हैं| इसके सम्बन्ध में आईआईटी दिल्ली के द्वारा किए गये एक अध्ययन के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं में 30 से 40 प्रतिशत लोग पैदल या दोपहिया वाहन से चलने वाले होते हैं| वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश की कामगार आबादी का एक तिहाई, जिसमें महिला कामगारों का 50%, पैदल ही काम पर जाते हैं| उसी प्रकार साईकिल से जाने वालों की संख्या 20% है| इसलिए शहरी परिवहन की गहराई से पड़ताल किया जाना आज की जरुरत है|

तब यह सवाल उठता है कि यहाँ की सड़कें किसके लिए हैं? बिना समय गँवाए सभी का यही उत्तर होगा कि सड़कें सभी चलने वालों के लिए हैं| पर सभी को क्या सड़क पर अधिकार मिल पाता है? उत्तर होगा नहीं| गाड़ियों को ज्यादा स्थान दिया जाता है और कुछ लोग, अफसर, नेता कहते मिल भी जायेंगे कि इसमें बुरा क्या है| लोग इतना पैसा खर्च कर गाड़ियाँ लाते हैं तो उसके लिए स्पेस और आने-जाने वालों में प्राथमिकता तो मिलनी ही चाहिए| यही हमारी सोच और मानसिकता है| अधिकतर ट्रैफिक पुलिस भी गाड़ियों को जल्दी से निकलवाना ही अपना कर्तव्य समझती है| अक्सर जब गाड़ी वालों से पैदल चलने वालों या साईकिल रिक्शावालों की  दुर्घटना होती है तो कुछ लोग कहते हैं कि गाड़ी वालों के सामने ये लोग आ जाते हैं| अक्सर यह भी देखा गया है कि गाड़ी पर चलने वाले पैदल चलने वालों को हीन दृष्टि से देखते हैं या उनको निम्न कोटि का इन्सान समझते हैं| गाडियों पर चलना, खासकर महंगी से महंगी गाड़ियाँ हों तो, लोग अपने को प्रतिष्ठित समझते हैं| कुछ लोग कहते मिल जाते हैं कि लोगों में सिविक सेन्स ही नही है, इधर-उधर चलने लगते हैं| इसका उत्तर ढूंढने के पहले यह समझना जरूरी है कि सड़क पर पहला अधिकार किसका है; देश-दुनिया के नियमों के अनुसार पैदल चलने वालों का| हाँ, सड़क पर पहला अधिकार पैदल चलने वालों का है| पैदल चलना तो मानव के इतिहास के साथ ही जुड़ा है, सबसे प्राचीनतम और सबसे आधुनिकतम में भी| बच्चा हो या बूढ़ा, महिला हो या पुरुष सभी तो पैदल चलते हैं| गाड़ी वाले भी पैदल चलकर ही अपने घर में या कार्यालय के अंदर जाते हैं या मार्केट में गाड़ी पार्क कर पैदल ही सामान लेते हैं| आधुनिक जीवनशैली में बढ़ते मधुमेह इत्यादि बीमारियों में तो डाक्टर भी पैदल चलने को कहते हैं| सबसे अहम बात यह है कि पैदल चलने से प्रदूषण नही फैलता है| फिर इसे सबसे निम्न कोटि क्यों? जब सेहत पैदल चलने से बेहतर होती है तो यह तो सबसे उच्च कोटि का कार्य है| उसी प्रकार साईकिल या साईकिल रिक्शा भी हमारे शहरों को प्रदूषित होने से बचाता है उसके साथ भी भेदभाव का नजरिया बदलने की जरूरत है| यह सबसे उपयोगी और श्रेष्ठ है|

सड़क गाडियों के लिए है या आदमी के लिए? यदि आदमी के लिए है तो फिर सभी का फोकस गाड़ियों पर केन्द्रित क्यों है? बढ़ती संरचनाओं में पैदल यात्रियों, साईकिल यात्रियों सहित गैर-मोटर वाहन से चलने वाले लोगों की सुविधाएँ कहाँ दिखती हैं? यह सड़क के लोकतन्त्र के खिलाफ है|

शहरों की सडकों के निर्माण के लिए साफ-सुथरा, बाधा व अवरोधमुक्त, मूलभूत बुनियादी सुविधाओं जैसे छाया, रोशनी, पीने का पानी, शौचालयों, रेलिंग व ग्रेड सेपरेट क्रासिंग युक्त फूटपाथ/ साइड वाक के निर्माण का दिशानिर्देश इन्डियन रोड कांग्रेस (IRC) की 1989 की गाइड लाइन में है| इन्डियन रोड कांग्रेस की 2012 की गाइड में तो स्पष्ट रूप से सड़क के डिजाइन में वेंडर जोन, पार्किंग जोन का दिशानिर्देश देते हुए कहा गया है कि फुटपाथ की चौड़ाई 1.8 मीटर से कम नहीं हो और पैदल यात्रियों की संख्या व उपयोगिता के आधार पर उसकी चौड़ाई बढ़ाई जाय| विकलांग यात्रियों की सुविधाओं का विशेष ख्याल रखा जाय| सड़क पार करने की व्यवस्था हो| नेशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी में भी नन- मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट को प्राथमिकता के साथ बढाने के बातें की गयी हैं |

इस दृष्टि से पड़ताल करें तो हकीकत चौंकाने वाली है| बिहार की राजधानी पटना में किए गये एक अध्ययन के मुताबिक सडकों पर पैदल चलना मौत से खेलने के समान है| अधिकांश सडकों पर फुटपाथ है ही नहीं, जहाँ है वहाँ भी दुकानदार, फुटपाथी दुकानदार, कहीं पुलिस बूथ, कहीं धार्मिक पूजास्थल, व अन्य संरचनाओं द्वारा अतिक्रमण मिलेगा| कचरा रखने का स्थान, बिजली के खंभे भी फुटपाथों पर ही होते हैं| इस पर अवैध पार्किंग, विज्ञापन लगाने के होर्डिंग भी अवरोध पैदा करते हैं| रेलिंग या सेपरेट नही होने के कारण लोग उसी पर मोटर साइकिल चलाते हैं| आवारा पशुओं के कारण अवरोध सामान्य बात है| ऐसे में दिब्यांग लोगों की सुविधा की बात तो कल्पना से परे है| सड़क पार करने की स्थिति तो और भयावह है| छायादार स्थान नहीं होने, पेयजल, सफाई, सार्वजनिक शौचालयों की कमी, हर समय असुरक्षा ऐसे में सड़क पर पैदल चलना बहुत कठिन हो जाता है| उसी प्रकार अलग से लेन की व्यवस्था नहीं होने से अनियंत्रित गाड़ियों के बीच चलना साईकिल यात्रियों के लिए भी बेहद खतरनाक होता है| जो पैदल और साईकिल की यात्रा वातावरण को दूषित होने से बचाती है, उसके साथ भेदभाव का आलम यह है कि बड़े-बड़े मॉल या सिनेमाघरों और अन्य कई सार्वजनिक स्थलों पर उसे पार्किंग करने ही नहीं दिया जाता है| पटना शहर को स्मार्ट बनाने की योजना शुरू है| स्मार्ट यदि सुविधाजनक, सुरक्षित, सभी के लिए, भागीदारीपूर्ण  नहीं होगा तो कैसा स्मार्ट शहर होगा? वह कैसा स्मार्ट शहर होगा जहाँ साँस लेने के लिए साफ हवा नहीं हो| पटना तो एक उदाहरण है, देश के अन्य शहरों में भी स्थिति कमोबेश इसी से मिलती जुलती है|

जरूरी है, कि पैदल यात्रियों के प्रति नजरिये में बदलाव हो| मानकों के अनुरूप संरचनाओं को विकसित करने के साथ उनके लिए सुविधाओं की गारंटी हो| इसलिए नागरिक सुविधाओं के बगैर नागरिक बोध की बातें नहीं की जा सकतीं| इसके लिए नागरिक संगठन भी सक्रिय हैं| सस्टनेबल अर्बन मोबिलिटी नेटवर्क (समनेट) जैसे नेटवर्क ने पुणे, दिल्ली, बेंगलोर, रांची, पटना, गया, शिमला, नागपुर इत्यादि शहरों में इन सुविधाओं के लिए प्रयास शुरू किए हैं। पैदल, साईकिल से चलने वालों की युनियनें भी बन रही हैं| पुणे जैसे शहर में इन प्रयासों का असर भी दिखता है|

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और जनान्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े हुए हैं|

सम्पर्क- +919973936658, napmbihar@gmail.com

 

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सबलोग

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
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