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गुजरात में कांग्रेस की नैतिक जीत नहीं हुई है

सैद्धांतिक तौर पर, लोकतंत्र में चुनाव नागरिक को सरकार को चुनने और मार्गदर्शन करने में मदद करता है. ऐसा ही एक चुनाव, अभी-अभी भारत के एक राज्य गुजरात में हुआ है और यह चुनाव हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण चुनाव रहा है. दो मुख्य पार्टियाँ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी आमने-सामने थी. भारतीय जनता पार्टी गुजरात में पिछले 22 साल से शासन में चुनी जाती रही है. एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को सरकार चलाने का जनादेश दिया है. इस जनादेश में इस बार भाजपा को 22 साल में सबसे कम 99 सीट मिली हैं और कांग्रेस को 22 साल में सबसे अधिक 81 सीटें. चुनाव के परिणाम के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण चीज देखने को मिली है वो यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही जश्न मना रहे हैं. भाजपा जहाँ जीत का जश्न मना रही है, वही कांग्रेस इसे नैतिक जीत तथा भाजपा को 100 सीटों के अन्दर रखते हुए, खुद अधिक सीट पाने का जश्न मना रही है.

बहरहाल, इसे कई तरीके से देखा जा रहा है. लेकिन इस बात को इस तरह देखना भी जरूरी है कि यह चुनाव कांग्रेस हार चुकी है जहाँ हारने की कोई ख़ास वजह दिखती नहीं थी. पिछले 22 साल की सरकार की विरोधी-लहर(anti-incumbe), तीन महत्वपूर्ण सामाजिक आन्दोलन (हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर के नेतृत्व में), मोदी सरकार की आर्थिक नीतियाँ (जीएसटी, विमुद्रीकरण), किसान का कर्ज, उत्पादन के सही दाम न मिलना, ऐसे तमाम फैक्टर भाजपा के खिलाफ थे. लेकिन फिर भी भाजपा गुजरात में चुनाव जीत गयी. कांग्रेस की हार की वजहों में, उसके गुजरात में कमजोर संगठन को भी माना जा रहा है. यह कुछ हद तक सही भी है लेकिन इन सब कारणों के परे, कांग्रेस के नेताओं का जनता से संपर्क टूटना सबसे महत्वपूर्ण है.

कांग्रेस की तरफ से चुनाव जीतने के लिए कर्मण्यता का भी अभाव था. जहाँ भाजपा की तरफ से हर छोटे-बड़े नेता गुजरात की गलियों में धूल फांक रहे थे वहीं कांग्रेस के अधिकतर नेता दिल्ली के ऐशो-आराम से निकलने को तैयार भी नहीं थे. वह इसलिए भी की कांग्रेस में ज्यादातर नेता, वकीलों की जमात से हैं जिनका जनता से कोई सम्पर्क नहीं, हाँ सरकार बनने पर ये लोग मंत्री पद की होड़ में सबसे आगे होते हैं. प्रधानमंत्री मोदी तमाम व्यस्तताओं के वावजूद गुजरात में अकेले 34 बड़ी रैली करते हैं वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी महज 30 रैली ही कर पाते हैं. मोदी हिमाचल के चुनाव में भी खूब सारी रैली करते हैं लेकिन राहुल गाँधी हिमाचल में चुनाव से पहले ही हार शायद स्वीकार कर लेते हैं. ऐसे कई इलाके गुजरात में रहे हैं जहाँ लोगों ने कांग्रेस को ढूंढ़ा पर कांग्रेस के नेता वहां तक पहुँच नहीं पाए.

भाजपा एक तरफ अपनी सरकार बचाने के लिए सर्वस्व दे रही थी तो दूसरी तरफ कांग्रेस सरकार बनाने के लिए उतनी मेहनत करती दीख नहीं रही थी. राहुल गाँधी को अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने से पहले की मेहनत को देखना चाहिए था. अखिलेश यादव ने साइकिल से लगभग हर गाँव-कसबे में जाकर लोगों से सीधा संपर्क बनाया, लोगों में विश्वास पैदा किया. बिहार में तेजस्वी यादव ने भी जन-संपर्क से अपनी साख बनाने में कामयाबी हासिल की है.

राहुल गाँधी को अपने बड़े नेता की छवि से निकलकर जननेता बनने की कवायद शुरू करनी चाहिए. शायद वो भूल गए हैं कि उनकी दादी इंदिरा गाँधी आपातकाल के बाद हाथी पर बैठकर बिहार के बाढ़ प्रभावित बेलछी गाँव पहुँच गयी थी और उस घटना ने इंदिरा को फिर से इंदिरा बना दिया था. राहुल गाँधी की कांग्रेस को दिल्ली से निकलना होगा, लोक-जीवन में रमना होगा, जनता के साथ जुड़ना होगा, मेहनत करनी होगी, बार-बार पहुँचने से जनता में विश्वास पैदा होगा और जनता राहुल गाँधी और कांग्रेस को अपने आस-पास महसूस करने लगेगी. राज्यों के, कस्बों के, गांवों के स्थानीय मुद्दे समझने होंगे. अभी उनके भाषणों में राष्ट्रीय मुद्दे ज्यादा झलकते हैं. दूसरी महत्वपूर्ण बात, कांग्रेस की राजनीति है. भाजपा की राजनीति के उलट कांग्रेस की राजनीति गुजरात में अलग नहीं हो पायी. हिंदुत्व के मुद्दे पर कांग्रेस डिफेंसिव दीख रही थी. चाहे कुछ भी हो कांग्रेस को समग्र, सहिष्णु, धर्म-निरपेक्ष राजनीति के साथ ही आगे बढ़ना चाहिए. गुजरात में मंदिर जाकर आशीर्वाद पाना सही भी था तो राहुल गाँधी को मस्जिद या मजारों पर भी जाना चाहिए था. सांप्रदायिक राजनीति का तोड़ सांप्रदायिक राजनीति के द्वारा कतई संभव नहीं है. भ्रम को भ्रम से तोड़ा ही नहीं जा सकता.

                         भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लिए हिन्दुत्व की राजनीति करना सबसे आसान था वो भी तब, जब यह देश हिन्दू-मुसलमान के आधार पर बाँट चुका था. लेकिन नेहरू ने उस राजनीति के बदले भारत को संवैधानिक गणतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया. राहुल गाँधी को कांग्रेस की मूल विचारधारा के साथ खड़े रहना चाहिए. इस देश को इस राजनीति ने खड़ा किया है. गुजरात चुनाव राहुल गाँधी और कांग्रेस के लिए एक सबक है. उन्हें जनता के बीच चुनाव में नहीं बल्कि हर हमेशा उपलब्ध रहना होगा, संपर्क साधना होगा यह काम वकीलों से नहीं बल्कि जननेता से ही हो सकता है. बहरहाल, कांग्रेस चुनाव हार चुकी है, नैतिक जीत तब होती जब कांग्रेस अपने मूल विचार के साथ समझौता नहीं करती.

डॉ. दीपक भास्कर

लेखक दौलतराम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के सहायक प्रोफ़ेसर हैं.

deepakbhaskar85@gmail.com

 

ये लेखक के निजी विचार हैं.

 

 

चर्चा मेंदेशशख्सियत

स्मृतिशेष : जीवन का अर्थ: अर्थमय जीवन

प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र की आज पुण्यतिथि है। अनुपम मिश्र स्वयं संस्थावादी नहीं थे, यह कहना बेहतर होगा कि वे एनजीओ संस्कृति के खिलाफ थे। लेकिन उनके व्यक्तित्व का ही यह जादू था कि उनसे प्रभावित और दीक्षित होकर कई लोग अपने आप में संस्था बन गए। संस्था बनाने से ज्यादा विश्वास उन्हें लोग बनाने में था। उनके पत्रों और उनके विचारों ने बहुत लोगों को पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता बनाया। आश्चर्य तो यह कि डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और वकील भी उनके विचारों से प्रभावित रहे हैं।

अपने विचारों को जीने वाले अनुपम खुद तो सादगी पसन्द थे ही, सीधे सादे लोगों को वे ज्यादा पसन्द करते थे। वैभव और रसूख वाले ऐसे लोग ही अनुपम की दुनिया में जगह बना पाए जो अपने अनावश्यक अभिमान और गरूर को बाहर ही रखकर उनके पास आये। उनकी सादगी उनके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा सौन्दर्य था।

सैडेड ने अनुपम जी का एक व्याख्यान कराया था। वह व्याख्यान सिर्फ इसलिये महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वह उनके जीवन का अन्तिम व्याख्यान था बल्कि इसलिए भी कि इसमें जीवन जीने के गुर निहित हैं। सच्चे अर्थों में जीने के लिये यह व्याख्यान सचमुच एक जीवन कुंजी है।

(संपादक किशन कालजयी की कलम से)

 

जीवन का अर्थ: अर्थमय जीवन

-अनुपम मिश्र

आजकल अक्सर ऐसी बैठकों में, सभा सम्मेलनों के प्रारंभ में एक दीपक जलाया जाता है। यह शायद प्रतीक है, अंधेरा दूर करने का। दीया जला कर प्रकाश करने का। इसका एक अर्थ यह भी है कि अंधेरा कुछ ज्यादा ही होगा, हम सबके आसपास। यह अंधेरा बाकी समय उतना नहीं दिखता, जितना वह तब दिखता है जब हम अपने मित्रों के साथ ऐसी सभाओं में बैठते हैं। तो दीये से कुछ अंधेरा दूर होता होगा और शायद आपस में इस तरह से बैठने से, कुछ अच्छी बातचीत से, विचार-विमर्श से भी अंधेरा कुछ छंटता ही होगा। शायद साथ चाय, कॉफी पीने से भी। ऐसा कहना थोड़ा हल्का लगे तो इसमें संस्कृत का वजन भी डाला जा सकता है: ओम सहना ववतु, सहनौ भुनक्तु आदि। दीया जलाने का यह चलन कब शुरू हुआ होगा, ठीक कहा नहीं जा सकता। इससे मिलती-जुलती प्रथा ऐसी थी कि जब ऐसी कोई सभा-गोष्ठी होती, अतिथियों के स्वागत में मंच के सामने पहले से ही एक दीया जला कर रख दिया जाता था।

विनोबा किसी जगह गए थे। वहां उन्हें कुछ बोलना भी था। उनके स्वागत में मंच पर एक दीया जला कर रखा गया था। हवा भी चल रही थी। आयोजक बाती की लौ को टिकाए रखने की खूब कोशिश कर रहे थे। आसपास खड़े रह कर अपनी हथेलियों की आड़ से दीये को जलाए रखने की कोशिश में लगे रहे। सबका ध्यान उसी तरफ। अंधेरा जो भगाना था। पर दीया टिक नहीं पाया। वह बुझ ही गया।

विनोबा ने अपनी बातचीत इसी से शुरू की थी। उन्होंने कहा कि आसपास की हवा जब शांत हो, तभी दीया जलता है। अगर हवा प्रतिकूल रही, हवा जोरों से बहती रहे तो दीपक टिकता नहीं। फिर वे हवा से दीपक पर आए। उन्होंने कहा कि हवा शांत हो पर यदि दीपक में तेल कम पड़ा है तो भी वह टिक नहीं पाता। हवा से दीपक और फिर विनोबा दीपक से मनुष्य पर आते हैं। तेल यानी चिकनाई। स्नेह भी इसी अर्थ में बना शब्द है। वे आगे कहते हैं कि जैसे दीपक में तेल की, स्नेह की जरूरत है, वैसे ही मनुष्य में भी, हम सबके भीतर भी स्नेह की जरूरत है। दीपक जलते रहने के लिए बाहर की हवा भी शांत होनी चाहिए और तेल भी होना चाहिए। उसी तरह समाज की रचना भी शांतिमय होनी चाहिए और हम सब में भी स्नेह की मात्रा भरपूर होनी चाहिए। तब जलता रह पाता है हमारा यह दीया। जीवन का दीया भी।

आज हम जीवन का अर्थ जानने मिल बैठे हैं। जीवन तो हम सबका है ही। और इस जीवन का अर्थ बताने की जिम्मेदारी विजयजी ने मुझ अकेले पर छोड़ दी है ! इसलिए सबसे पहले तो मुझे खुद अपनी पोल आप सबके सामने खोल देनी चाहिए: मुझे खुद जीवन का अर्थ नहीं मालूम। सैडिड संस्था में दास साहब, हमारे दफ्तर में, गांधी शांति प्रतिष्ठान में अमृता बहन जैसे दो-चार गवाह भी हैं जो आपको बताएंगे कि मैं इसके लिए लगातार मना करता रहा हूं। पर यह विजय जी की एक तरह की तानाशाही है कि वे कोई एक बात ठान लें तो उसे पूरा करवा कर ही छोड़ते हैं। तो उनकी इच्छा, उनका हुक्म पूरा करना ही पड़ेगा। इसलिए सबसे पहले यह डिस्क्लेमर !

सामने बैठे हैं कुछ मुझसे कम उमर के साथी। कुछ मुझसे ज्यादा उमर के साथी। पर आज के विषय में, जीवन का अर्थ जानने की कोशिश में हमारी यह उमर कोई काम नहीं आती। वह शायद अनुभव है जो ऐसी बातें सोचने में काम आता होगा। जो जीवन मैंने जी लिया है, मेरे हिसाब से ऐसा अनुभव मेरे पास है नहीं। पिछले हफ्ते मैं पूरे अड़सठ वर्ष का हुआ हूं। कितना बचा होगा शेष जीवन, वह तो पता नहीं। पर आप में से कई लोगों को अभी एक लंबी पारी खेलनी है। इसलिए आज की यह बातचीत आपके किसी काम आ सके- ऐसी विजय जी की इच्छा है। हरि इच्छा, भगवान की इच्छा क्या है, पता नहीं। तो चलिए जिसे खुद तैरना नहीं आता, उससे तैरना सीखते हैं ! मेरा जीवन, मेरा अनुभव कोई गहरा तो है नहीं, इसलिए इतने उथले पानी में तैरना सीखने-सिखाने में यों भी कोई खास डर की बात नहीं होगी !
जहां से हमने बात शुरू की थी, एक बार वापस वहीं लौटें। पिछले कोई 200-300 बरसों से पूरी दुनिया में तेज हवा चल रही है। पहले भी हवा चलती रही होगी पर तब पूरी दुनिया एक दूसरे से बहुत दूर थी और कटी हुई भी थी। उस दुनिया में हवाएं भी टुकड़ों में बंटी रही होंगी। जीवन तब भी कोई आसान न रहा होगा – एक बड़ी आबादी के लिए। फिर भी उतना कठिन और निरुद्देश्य भी नहीं रहा होगा, जितना कि वह आज बना दिखता है। इस दुनिया में हम कितने भी बड़े उद्देश्य को लेकर, लक्ष्य को लेकर दीया जलाते हैं, तेज हवा उसे टिकने नहीं देती। हम तरह-तरह से कोशिश करते हैं उसे अपनी हथेलियों से बचाने की, पर यह हवा है कि हमारी सारी कोशिशों पर पानी फेरती है। शायद हमारे जीवन के दीए में पानी ही ज्यादा होता है, तेल नहीं। स्नेह की कमी होगी इसलिए जीवन बाती चिड़चिड़-तिड़तिड़ ज्यादा करती है, एक-सी संयत होकर जल नहीं पाती। न हम अपना अंधेरा दूर कर पाते हैं, न दूसरे का।
हम पढ़-लिख गए कुछ लोगों को ही जीवन का अर्थ जानने की इच्छा है। हम ही कुछ हैं जो मानते हैं कि अर्थमय जीवन कैसे जीएं। लेकिन हम थोड़ा अपने भीतर झांकें तो हममें से ज्यादातर का जीवन एक तरह से कोल्हू के बैल जैसा ही बना दिया गया है। इसमें कितना हमारा हाथ है, कितना हाथ परिस्थितियों का है, मालूम नहीं। पर हम गोल-गोल घूमते रहते हैं। आंखों पर पट्टी बांधे। कोल्हू के बैल की पट्टी तो कोई और बांधता है, यहां तो हम खुद अपनी पट्टी बांधते हैं। फिर एक-सा जीवन जीते-जीते थकने लगते हैं। दिल्ली की गाड़ियों को तो सम-विषम, आॅड-ईवन नंबर के ताजे नियम से कुछ आराम भी मिलने लगा है। पर हमारे जीवन की गाड़ी का कोई नंबर नहीं होता। आधार कार्ड बन गया होगा, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र होगा।  तब भी हमारे जीवन का कोई नंबर नहीं होता है। इसलिए इसे रोज कोल्हू में, एक न दिखने वाले कोल्हू में, अदृश्य कोल्हू में जुतना ही है।
तो एक-सा जीवन जीते जाने की थकान से ही हमें नई-नई बातें सूझती हैं। कोल्हू का बैल अपनी तरक्की, अपने लिए नए अवसर, अपने लिए नए सार्थक अवसर की खोज करता है। नया पैकेज खोजता है। विजयजी चाबुक मार दें तो बैल कोल्हू में घूमते-घूमते अपने जीवन का अर्थ भी खोजने लगता है ! कोल्हू का बैल। वह इस विषय पर भाषण भी देने लगे तो आप अचरज न करें।
कोल्हू कई तरह के हैं, महंगे हैं, कम घेरे के हैं, बड़े-बड़े घेरों के हैं। कई तरह के विचारों के हैं तो कई तरह के धर्मों के हैं। इनमें से हरेक अपने को बाकी बचों से श्रेष्ठ मानता है। सर्वोत्तम। और उसी में अपना जीवन सफल सार्थक हो सकता- ऐसा दावा करता है।
समाज का तना कमजोर होता जाता है पर शाखाओं की संख्या बढ़ती जाती है। पेड़ वाली शाखाएं नहीं। संगठन वाली, संघ वाली शाखाएं। हर विचार, हर धर्म अपना झंडा लहराता है और दूसरे झंडों से ऊपर उठना चाहता है। हम कुछ विचारों को अच्छा मानते हैं, कुछ को घटिया। तो हमें लगता है हमारा विचार कैसे फैले। जीवन की सारी सार्थकता हमें अपने ही विचार को फैलाने में दिखने लगती। हिंसा को परिवर्तन का साधन बनाने वाले भी अपनी शाखाएं बढ़ाते चलते हैं और यही प्रवृत्ति अहिंसा को मानने वालों में भी मिलती है। सबको अपना संगठन बढ़ाना है, बड़ा करना है। बजट बढ़ाना है, कार्यकर्ता बढ़ाना है। कार्यक्रम, गतिविधियां बढ़ानी है। दिन दूनी, रात चैगुनी उन्नति करनी है- इसी में हमें जीवन सफल होता दिखने लगता है।
हमें अपने विचार की कमियां नहीं दिखती। आंख में पट्टी बंधी रहती है। पर दूसरे विचारों की कमियां हमें एक्सरे की तरह बेहद साफ दिखने लगती हैं। सारा जहान देखा हो या न देखा हो हम कविता लिख जाते हैं, गीत गाते जाते हैं कि सारे जहां से अच्छा…

विनोबा इस गीत में थोड़ा कुछ और जोड़ कर एक बड़ी बात की तरफ इशारा कर देते हैं : सारे जहां से अच्छा ‘क्योंकि’ हिंदोस्ता हमारा। इस क्योंकि को अपने जीवन से अलग करना बहुत ही कठिन काम है। क्योंकि मेरा विचार, मेरा धर्म, मेरी संस्था, मेरा संगठन, मेरा समाज, मेरा देश, मेरा बेटा-बेटी। कहीं दामाद भी। न जाने कितने सौ बरस पहले लिखे गए संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में एक ऐसा ही रिश्ता राजा के साले का भी सामने आ गया था। संक्षेप में कहें तो क्योंकि मेरा कोल्हू। गोल-गोल घूमते रहने से कुछ परिणाम तो आते ही हैं। कुछ तेल निकल आता है। थोड़ी-बहुत खली भी मिलती है। बैल को अगले दिन घूमते रहने के लिए प्रायः ठीक-ठाक चारा मिल जाता है। ठीक न हो तो फिर असंतोष भी।

मैं खोज तो नहीं पाया हूं, पर कहीं विनोबा ने कहा है कि वेदों में युद्ध का एक नाम ‘मम सत्य’ भी है। मेरा सच, बस मेरा सत्य। इसमें युद्ध के न सही, विवादों के बीज तो छिपे रहते ही हैं। पिछले वर्ष इन्हीं दिनों में अफ्रीका के एक भाग में एक भयानक वायरस फैला था- ई बोला। न जाने कितनी जानें गई थीं।  तब हमारे मित्र दिलीप चिंचालकर ने ई बोला वायरस के साथ आई बोला वायरस भी कहा था, यानी मैं बोला वायरस।

फिर और न जाने कब हमें हमारा यह इतना प्रिय सत्य अचानक अर्धसत्य लगने लग जाता है। तब उसे छोड़ हम एकदम उससे उल्टे किसी सत्य से जुड़ जाते हैं। अपने आसपास टटोल कर देखें। छोटे से लेकर कई बड़े नाम विचारों की अदला-बदली में यहां से वहां घूमते मिल जाएंगे। यों यह कोई गलत बात भी नहीं है। जीवन यात्रा में एक विचार यात्रा भी चलती है। इसे अच्छे अर्थों में देखें तो यह मन का, दिमाग का खुलापन भी लगेगा। कल तक हम एक विचार को मानते थे, आज हमें उसकी कुछ सीमाएं दिख गईं तो हमने उसे बिना मोह के छोड़ दिया। यह तो गुण ही कहलाएगा। कुछ बड़े अच्छे लोगों का जीवन बम बनाने से शुरू होता है पर बाद में उन्हें अध्यात्मिक ऊर्जा भी दिखाई देती है। लेकिन यदि यह गुण है तो दूसरे को भी ऐसी छूट, ऐसा अवसर देना होगा। वह तो हम देना नहीं चाहते। पहले किसी एक विचार से मित्रता और फिर उससे भिन्नता, उससे अलग होना हमें बस षड्यंत्र ही दिखता है।

इसलिए जीवन का अर्थ जानने के लिए यदि हम किसी एक विचार, एक धर्म, एक समाज, एक परंपरा में रहस्य खोजते रहे तो हम खुद तो कुछ संतोष शायद पा बैठें, पर इससे सबको अर्थमय जीवन जीने का रास्ता नहीं मिलने वाला। अच्छा जीवन, अगर अपने आप में साध्य या मंजिल बन जाए तो शायद हम उस तक पहुंच भी न पाएं। इसमें भटकाव की बहुत गुंजाइश बनी रहेगी।

पिछले दौर में एक खास तरह की नई पढ़ाई से पढ़ कर दो पीढ़ियां तो निकल ही चुकी हैं। इस पीढ़ी के ज्यादातर सदस्य बैंगलोर, हैदराबाद, पुणे और बाहर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका आदि में जा बसे हैं। यदि सार्थक जीवन का अर्थ बस केवल अर्थ, यानी रुपया-पैसा है तो समाज के इस हिस्से के पास उसकी कोई कमी नहीं है। लेकिन जीवन का अर्थ उनके हाथ भी आसानी से नहीं लग पाता। उनके पैसे का एक भाग जीवन जीने की कला सीखने पर भी खर्च हो चला है। इस कला को सिखाने वाले भी कोई एक नहीं अनेक लोग हैं। इनके कपड़ों के रंग भी शुद्ध सफेद से लेकर गेरुआ, भगवा सब हैं। हजारों नहीं लाखों लोग कहीं योग या योगा करते हैं, ध्यान लगाते हैं, जाप या चांटिंग करते हैं। यह धर्म की नई दुनिया भी है, धर्म का नया बाजार भी और धर्म का नया मॉल भी। इसमें दोसा, परांठा कब से नहीं खाया- पूछने वाले गुरु भी हैं। समाज के काम से जुड़े लोगों को ‘चेंज’, बदलाव, परिवर्तन जैसे शब्दों में विशेष आकर्षण मिलता है। धर्म के इस बाजार में भी चेंज शब्द आ गया है- ‘यस आई कैन चेंज’ भी यहां चला है और अब ‘न्यू’ भी लग गया है इसमें।

और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि इन सब कामों से हजारों लोगों को कुछ न कुछ लाभ भी हुआ ही है। उनका भटकता हुआ मन कुछ शांत हुआ होगा। तो कलियुग में धर्मयुग का यह अवतरण अच्छा ही मान लेते हैं। लेकिन धर्मयुग से  मिलता-जुलता एक और शब्द है- युगधर्म। इस युग का मुख्य धर्म है, इस समय का मुख्य विचार है- विकास। हर चीज का विकास। संगठन का, देश का, शहरों का विकास, गांवों का विकास, बाल विकास, महिला विकास। सब तरह के विचारों के झंडे इस विकास के झंडे में आकर समा जाते हैं। इस युगधर्म ने जीवन के अर्थ को भी प्रभावित किया है। हम सब चाहे जो भी काम करते हों, हम सब पर जाने-अनजाने इस विकास की छाया पड़ती ही है। यह अनायास, अकारण नहीं है कि एक बाबा हरिद्वार में ‘फूड पार्क’ बनाते हैं और दूसरे बाबा अमेठी में इसी नाम से, मिलते-जुलते नाम से नहीं, इसी नाम से फूड पार्क बनाते हैं। एक बाबा का फूड पार्क बन जाता है पर अमेठी का फूड पार्क राजनैतिक पचड़ेबाजी में फंस जाता है। पर दोनों का मन एक ही है। विकास की इस दौड़ में हम सबको दौड़ना ही पड़ता है। इस चूहा-दौड़ में दौड़ना ही है। पीछे रहें या आगे, यह विचित्र दौड़ हमें चूहा तो बनाती ही है।

अर्थमय जीवन की चर्चा तो काफी गंभीर होनी चाहिए। हमारी यह चर्चा कोल्हू, बैल और चूहे जैसी घटिया हो गई है तो आप सबसे क्षमा मांगते हुए मैं थोड़ा-सा लिफ्ट कर देता हूं। इसे थोड़ा ऊपर उठाता हूं। अभी तीन दिन पहले ही ‘लिफ्ट करा दे के’ गायक को भारत की नागरिकता मिली है। उन्होंने बयान में कहा है कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। अदनान सामी का जीवन सफल हो गया है, अर्थमय बन गया है उनका जीवन।

क्या सचमुच ऐसा है ? अर्थमय जीवन की ये हमारी अपनी छोटी-छोटी परिभाषाएं हैं। भारत की इस मिली-मिलाई नागरिकता को तो कई लोग छोड़ यूरोप, अमेरिका, कैनेडा की नागरिकता पाने आतुर हैं। फिर आज दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या भी सबसे ज्यादा हो गई है, जिनकी कोई नागरिकता ही नहीं बच पाई है। युद्ध, गृह युद्ध और बहुत दूर के दादा देशों की दखलंदाजी से कुछ लाख लोग शरणार्थी बने इधर से उधर भटक रहे हैं। उन पर आज क्या बीत रही होगी, हम सोच भी नहीं सकते। ऐसी दुनिया में सिर पर छत तो दूर की बात है, सिर पर एक आड़ और भरपेट नहीं, मुट्ठी भर अगला भोजन मिल जाए उतना ही अर्थ रह जाता है उनके जीवन का। गांधीजी ने तो आजादी की लड़ाई के बीच में भी भूखे के भगवान की कल्पना कर दिखाई थी। उसके सामने भगवान भी रोटी के रूप में आने के अलावा कोई और रूप धारण कर ही नहीं सकता। हिम्मत भी नहीं कर सकता।

अर्थमय जीवन के इस रोटी-रूप को लेकर भी दुनिया भर में अनेक विचारकों, चिंतकों, क्रांतिकारियों ने कई तरह के शास्त्र रचे हैं, उन्हें अमल में उतारने के संगठन भी बनाए हैं। पर उन समाजों में भी जीवन का अर्थ एकदम साफ समझ में आ गया हो- इसका कोई पक्का रूप दिखता नहीं।

आज से कोई 25-30 बरस पहले हम लोग पानी, तालाब आदि पर कुछ काम कर रहे थे। उस विषय को समझने के लिए इधर-उधर जिज्ञासा में भटकते थे। हमारे कारण कुछ और साथी भी इसमें चीजें जुटाने में हमारे साथ हो लिए। राकेश दीवान तालाबों को समझने मध्यप्रदेष, महाराष्ट्र की सीमा पर बैतूल इलाके में घूम रहे थे। वहां उन्होंने एक राजा का किस्सा सुना। तालाब तो इस किस्से में आएगा ही, पर इसमें पहले तो जीवन के अर्थ की खोज ही थी।

राजाओं का, प्रायः शासन करने वालों का स्वभाव जरा अलग ही रहता है। सांसारिक राजा को न जाने क्या हुआ कि उन्हें अपने जीवन का अर्थ जानने की इच्छा हो गई। किसी सलाहकार ने उन्हें बता दिया कि बस ब्रह्म जान लो, सब अर्थ पता चल जाएगा। “तो तुम बता दो ब्रह्म के बारे में,“ राजा ने उससे कहा था। यह तो बड़ा काम है राजा, हमें तो पता नहीं ब्रह्म का। पर इतना तो पक्का है कि ब्रह्म जान लो तो सब पता चल जाएगा।” कौन बताएगा फिर ब्रह्म नाम की बला ? सलाह मिली कि राज्य के सारे ज्ञानियों को, संतों को, साधुओं को जमा करो। सम्मेलन करो उस समय के किसी विज्ञान भवन में। उनमें से कोई न कोई तो ज्ञान दे ही देगा, ब्रह्म बता ही देगा !

ब्रह्म जानने, जीवन का अर्थ जानने, राजा का जीवन अर्थमय बनाने के लिए विराट आयोजन की तैयारियां षुरू हुईं। राज्य के ही नहीं राज्य से बाहर के भी ज्ञानियों का न्यौता भेजा गया। अब ये शासन करने वालों की भी तो कुछ सनक होती है। ब्रह्म ज्ञान बताने का नहीं, ब्रह्म ज्ञान सुनने का तरीका क्या होगा- यह तय किया राजा ने। गोलमेज, राउंडटेबल कांफ्रेंस नहीं। राजा ने कहा कि सम्मेलन स्थल पर मैं अपने भव्य सफेद घोड़े के साथ खड़ा रहूंगा। एक-एक कर ज्ञानी आएंगे। मैं रकाब पर एक पैर रखूंगा और घोड़े पर चढ़ूंगा। दूसरा पैर दूसरी तरफ की रकाब में जाएगा ही बस इतनी ही देर में ज्ञानी को ब्रह्म के बारे में बताना होगा। नहीं बता पाया तो मैं अपनी एड़ी से घोड़े को इशारा करूंगा। घोड़ा फुर्र से उड़ जाएगा। जो इतने क्षणों में , इतने सेकिंड में ब्रह्म ज्ञान दे दे- उसे भारी इनाम। जो न बता पाए इतनी-सी देर में, उसे कुछ सजा भी देने की बात थी। पर उस विस्तार में जाना जरूरी नहीं। रकाब में पांव, ब्रह्म दिखांव- यह था नारा राजा का।

लंबा किस्सा थोड़े में समेटना हो तो यही बताया जा सकता है कि राजा का पांव रकाब में जाता और घोड़ा फुर्र से उड़ जाता। राजा का जीवन अर्थमय कैसे बने, इस चक्कर में कई लोगों को कोड़े खाने पड़े। लेकिन फिर एक ज्ञानी आया। राजा ने पैर उठाया ही था कि उसने जोर से कहा, “अकाल पड़ा है, तुझे ब्रह्म की पड़ी।” बस। राजा घोड़ा नहीं दौड़ा पाया। उतर गया नीचे। क्या पता उसे ब्रह्म दिख गया होगा। फिर उस इलाके में राजा-प्रजा ने, इन ज्ञानियों ने, कोड़े खाने वालों ने भी मिल कर इतने सारे तालाब बनाए कि फिर वहां कभी ऐसा अकाल पड़ा नहीं।

इस तरह के किस्से जीवन का अर्थ जानने की अलग-अलग खिड़कियां खोलते हैं। इससे यह भी प्रश्न उठता है कि खुद अकेले ही जीवन का अर्थ जान लेना है या और भी कई को साथ लेकर इसे पाना है। अकेले किसी गुफा में अर्थमय जीवन का लड्डू खा लेना है यानी एकवचन या बहुवचन में, सबके साथ दावत देकर। अकेला ऊपर उठ जाना है या बहुतों के साथ थोड़ा-सा ऊपर उठना है। फिर इस किस्से में एक परत समय की, काल की भी है। इस मीठे रहस्य को कुछ समय के लिए पाना है या बड़े लंबे समय के लिए।

अर्थ की खोज आप लगभग हर समाज में कुछ हजार साल पुराने शास्त्र के तरीके से करते हैं। शास्त्री के तरीके से करते हैं या एक मिस्त्री के तरीके से- यह भी सोचना पड़ेगा। फिर एक तरीका है सोचने का। सोचना शब्द सरल लगे तो इसे कठिन बना लें- चिंतन करने का भी एक तरीका है। चिंतन से बात जीवन पर आती है।

यह जीवन अपने आप में क्या बला है। हमें कब पता चलता है कि हम जीवन जी रहे हैं ? सांस तो हम जन्म से पहले ही लेने लगते हैं। हमारा प्राण, हमारा हृदय तो न जाने कब बन जाता है। जीव विज्ञान या शरीर विज्ञान की भी समझ जरूरी नहीं। जन्म के बाद एक दौर तो अबोध बने रहने का ही होता है। पर अबोध का ‘अ’ तो हट जाता है, बचपन में ही, बोध तो हाथ नहीं आता। लगता है तीन अक्षर के इस शब्द अबोध का ‘अ’ हटते ही पूरे तीनों अक्षर हमारे हाथ से छूट जाते हैं।

न हम अबोध रहते हैं न हमें बोध हो पाता है कि हम कौन हैं, कहां से आए हैं, कहां जाएंगे। हम भटकते रह जाते हैं। मंजिल का तो पता नहीं रहता पर हम उस मंजिल तक की यात्रा का भी मजा नहीं ले पाते, आनंद नहीं ले पाते। शिकायत करते रह जाते हैं, खुद अपने से, अपने दुश्मनों से तो छोड़िए, अपने मित्रों से, अपने समाज से और जिसे जालिम जमाना कहते हैं उससे तो न जाने कितनी शिकायतें करते ही चले जाते हैं। हमारी पूरी जीवन यात्रा, लगता है शिकायतों के ईंधन से चल पाती है। और फिर हमारी जीवन की यह गाड़ी इतना काला धुंआ छोड़ती है कि दूसरों के फेफड़े तो खराब होते ही हैं, खुद हमारे फेफड़े भी उससे बच नहीं पाते। जो पहले कहा है वैसे कोल्हू के बैल हम बन जाते हैं। वही किस्सा पुराना है। फिर भी सजन झूठ बोलते रहते हैं, लड़कपन खेल में खोते रहते हैं, जवानी नींद भर सोते रहते हैं और बुढ़ापा देख रोते रहते हैं। कवि शैलेन्द्र के ये बोल निकले तो बंबईया फिल्म से हैं। पर इनमें आपको दर्शन की एक लंबी परंपरा का निचोड़ दिखेगा।

पता नहीं कितने हजार बरस पहले एक ऋषि ने एक खास तरह की चटनी बनाई थी। उन दिनों ब्रांडनेम का जमाना नहीं था, फिर भी इस चटनी को, प्राश को उस ऋषि का ब्रांडनेम, ठप्पा मिल गया। आज उसे भले ही कोई भी बनाए, नाम तो उसे यही देना पड़ता है- च्यवनप्राश। पर हम यहां इस चटनी की चर्चा स्वास्थ्य वाले प्रसंग में नहीं कर रहे हैं। आयुर्वेद बताता है कि इस चटनी में पूरी 45 तरह की चीजें, जड़ी-बूटियां, अत्ते-पत्ते, गुड़, आंवला, फल-फूल आदि डाले जाते हैं।

मामूली किस्म की सर्दी-खांसी आदि से बचने, षरीर की थोड़ी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली इस चटनी में 45 चीजें पड़ती हैं तो जरा सोचिए, हिसाब तो लगाइए कि एक भरा-पूरा जीवन अर्थमय बनाने में कितनी सारी चीजों की जरूरत पड़ती होगी। इसमें भी हम शरीर षास्त्र की तरफ नहीं जाएं, वह हमारा काम नहीं, योग्यता तो बिलकुल नहीं। पर एक जीवन कैसे सार्थक बनता है, इसमें कितनी बातें जुड़ती हैं, घटती हैं, गुणा होती हैं, भाग होती हैं- सब जरा सोचें तो। सिर्फ अच्छी परिस्थितियां, अच्छी राय, संगतियां, अच्छा परिवेश, अच्छे अवसर ही नहीं, एक भरे-पूरे जीवन में विरोधी परिस्थितियां, विसंगतियां, जय-पराजय, मन की षांति और आसपास का कोलाहल, हल्ला-गुल्ला यानी नई भाषा में कहें तो जिंदाबाद-मुर्दाबाद सबका मिला-जुला रूप, आकार लेकर बनता है- हमारा जीवन।

कुछ हजार साल का इतिहास उठा कर देखें। महाभारत में एक पक्ष जीत जाता है। पर उस जय का परिणाम क्या है ? युधिष्ठिर को उस जय से क्या मिलता है ? वे कहते हैं, यह जय तो उस पराजय से भी बुरी है। जय-पराजय तो छोड़िए, मृत्यु तक से जीवन बनता है। अपना जीवन भी और आने वाले दौर का जीवन भी। ऐसे कई उदाहरण हैं, यहां उन्हें दोहराने की जरूरत नहीं। पर आज से 67 बरस पहले यानी सन् 1948 को इसी महीने की तीस तारीख को एक जीवन अपनी मृत्यु से कितना अर्थमय बन गया था।

तो 45 चीजों से बनी एक साधारण चटनी, प्राश और यह हमारा जीवन। उस तराजू पर हम जीवन तोलें तो एक अंदाज लगेगा कि अपने जीवन को पौष्टिक, स्वादिष्ट या कहें सार्थक, अर्थमय बनाने में लाखों, करोड़ों चीजों को छानना, भूनना, कूटना, उबालना, घोंटना पड़ेगा। और कुछ नहीं तो पंचमहाभूतों की जरूरत पड़ेगी ही। पर यह प्रकृति बड़ी ही मजेदार चीज है। उसने जीवन को बड़ा सरल बनाया है। जीवन तक जाने से पहले प्रकृति की बनाई एक और चीज देखें। बरगद का पेड़। और उसका बीज ? राई के दाने से भी छोटा। इतने से बीज से ऐसा विषाल बरगद। वह भी और पेड़ों की तरह एक तने वाला नहीं। यहां तो तने भी अनगिनत हैं। उमर भी ऐसी सार्थक, इतनी अर्थमय कि 5-10 पीढ़ियां उस बरगद के नीचे छाया पा लें। उसकी षाखाओं में पक्षियों की अनगिनत जातियां घोंसला बना लें और लाखों चिड़ियां खाना खा लें। कपड़ा उन्हें चाहिए नहीं, रोटी और मकान का इंतजाम पक्का। हमारा तो एक नेता इतना करने- रोटी, कपड़ा और मकान जुटाने के नाम पर क्या-क्या नहीं करता। फिर भी कुछ नहीं कर पाता।

वापस लौटें अर्थमय जीवन जीने के लिए। ऐसा जीवन बनाने के लिए कितनी चीजें चाहिए। च्यवनप्राश में तो 45 चीजें लगेंगी ही। तो उस गुणा-भाग से यहां तो लाखों करोड़ों चीजें चाहिए। कहां मिलेंगी, कैसे मिलेंगी, कितने दाम में मिलेंगी सबको। जीवन जी रहे सारे जीवों को यह सब एक दाम पर मिल पाएगी ? यह सब मिल गया तो सार्थक जीवन यात्रा की प्रामाणिकता क्या होगी। मामूली रेल-यात्रा, हवाई जहाज की यात्रा भी आज तो बिना आई.डी.प्रूफ, आधार कार्ड के आप कर नहीं सकते तो फिर एक सार्थक लंबी जीवन यात्रा क्या बिना आई.डी. के हो पाएगी ?

तो क्या-क्या चाहिए की लंबी सूची बनाने के पहले एक और बाजारू उत्पादन पर लौटें। च्यवनप्राश से यह जरा अलग चीज है। फ्रांस में सुगंध का बड़ा कारोबार करने वाली एक कंपनी है शनेल। बनाने को तो ये न जाने कितनी चीजें बनाती है, शायद एकाध करोड़ में बिकने वाली हाथ घड़ियां भी। पर इसकी सबसे ज्यादा प्रसिद्धि ‘शनेल-5’ नाम की एक सुगंध से हुई है। कोई तीन अंगुल की छोटी-सी खुबसूरत शीशी का दाम होता होगा पांच हजार रुपया।

दुनिया भर में शौकीन लोगों के बीच नाम कमाने वाली इस महंगी सुगंध में च्यवनप्राश की तरह ही एक निश्चित मात्रा में निश्चित चीजें शामिल हैं। जैसे गुलाब की पंखुड़ियां कितने टन-मन आदि। यह सब सामग्री फ्रांस के खेतों से लेकर दुनिया भर के वर्षा वनों, घने जंगलों से ली जाती है। लेकिन यदि किसी एक वर्ष इस सूची में से एक भी चीज उस मात्रा में न मिल पाए, उस गुणवत्ता की न हो तो उस बार शनैल-5 का उत्पादन रोक दिया जाता है। इतनी महंगी सुगंध की सार्थकता उस कंपनी को दिखती नहीं। पर जीवन की सुगंध? प्रकृति जीवन की सार्थक सुगंध के साथ शनैल-5 जैसा काम करे तो शायद जीवन चले ही नहीं। किसी का भी जीवन ठप्प हो जाए।

जीवन को सार्थक बनाने में तो क्या-क्या चाहिए के बदले क्या-क्या नहीं चाहिए वाली सूची भी काम दे जाती है। आंखें नहीं, कान नहीं, मुंह नहीं- यानी अंधी, बहरी और गूंगी होने के बाद भी अमेरिका की हेलेन केलर ने न सिर्फ अपने जीवन को भरपूर अर्थ दिया, उन्होंने आने वाले ऐसे लाखों लोगों को रास्ता भी दिखाया। उनकी जीवनी दुनिया भर में पढ़ी जाती है, उनकी सूक्तियां न जाने कितनों को कठिन दौर में, घोर निराशा में संबल और सहारा देती हैं। इसी तरह का एक और उदाहरण। लुई ब्रेल ने अपने बचपन में इस दुनिया को, उसके सब तरह के रंगों को, पूरे इंद्रधनुष को  अच्छी तरह से देखा था। पर फिर आंखों की रोशनी चली गई। घुप्प अंधेरा छा गया। उजाला देख लेने के बाद तो अंधेरा और भी ज्यादा काला हो जाता है।

लुई ब्रेल ने अपने अंधेरे में खुद उजाला बनाया। एक ऐसी लिपि, स्क्रिप्ट खोजी, जिसमें लिखी गई भाषा नेत्रहीन भी पढ़ सकें। इतने बड़े काम के बाद भी उन्हें अपने जीते जी कोई बहुत वाहवाही नहीं, कहीं कोई प्यार नहीं मिला। लेकिन उनके सार्थक जीवन का महत्त्व उनकी मृत्यु के बाद फ्रांस को भी दिखा और फिर पूरी दुनिया को भी। आज न जाने कितनी भाषाएं लुई ब्रेल की बनाई लिपि में लिखी जाती हैं, नेत्रहीनों द्वारा पढ़ी जाती हैं। हिंदी भी।

हेलन केलर, लुई ब्रेल और ऐसी न जाने कितनी विभूतियां हमें बताती हैं कि हमारे जीवन में चाहे जितनी चीजें कम हों- पैसा, प्यार, मान-सम्मान, अवसर, तरक्की- कोई भी चीज कम हो, न हो तो भी जीवन नहीं रुकता, जीवन रुकना नहीं चाहिए। आपद यानी संकट। तो ऐसा कोई जीवन नहीं, जिसमें कल या आज आपद, आफत न आई हो, या कल न आए। आपातकाल लगाने की हैसियत तक पहुंची इंदिरा गांधी का जीवन भी बिना आपद का था नहीं।

मेरे पिताजी कवि थे। उनकी एक बहुत छोटी-सी कविता है जिसमें वे बताते हैं कि निरापद कोई नहीं है। न तुम, न वे, न मैं। किसी की भी जिंदगी दूध की धोई नहीं है। फिर अंत में वे लिखते हैं: दूध किसी का धोबी नहीं है ! हम को खुद अपना धोबी बनना पड़ेगा, खुद अपनी जिंदगी खुद धोनी पड़ेगी-अगर हमें उस पर लगे दाग दिखने लगें। दूसरों के दाग तो हमें बराबर दिखेंगे ही। खैर, इस नई कविता से एक पुरानी कविता भजन तक चलें।

कबीर का एक सुंदर भजन है- ‘वा घर सबसे न्यारा।’ कुमार गंधर्वजी ने इसे और भी सुंदर बना दिया है अपने स्वर से। इस घर से उस घर का परिचय है भजन में। बहुत-सी ऐसी बातें जो यहां इस जीवन में भरी पड़ी हैं, उस न्यारे घर में वे हैं नहीं। कबीर अपनी विशिष्ट शैली में बताते जाते हैं कि उस न्यारे घर में वेद भी नहीं है। इस जीवन में इस घर में तो वेद, गीता, गुरुग्रंथ, कुरान, बाइबिल सब कुछ है। और इसी सब को लेकर तरह-तरह के झगड़े भी हैं जो होने नहीं चाहिए, फिर भी होते ही रहते हैं। बंद ही नहीं हो पाते। उस न्यारे घर में न मूल है, न फूल, न बेल है न बीज। धर नहीं, अधर नहीं। न बाहर भीतर जैसा कुछ है। न ज्ञान है न ध्यान है। वहां पाप भी नहीं है और सबसे बड़ी बात तो कबीर यह कह जाते हैं कि वहां पुण्य का पसारा भी नहीं है।   हमारे जीवन में पुण्य का सचमुच बड़ा पसारा हो जाता है। यह दिखता तो बड़ा सार्थक है पर प्रायः इसका पसारा इतना हो जाता है कि फिर हमें अपने पुण्य के आगे बाकी सब लोग पापी ही दिखते हैं। अपने जीवन की सार्थकता और शेष सारे जीवन की निरर्थकता। इस वृत्ति से मंत्रियों के मुखिया और देश के प्रधान भी नहीं बच पाते।

तो उस न्यारे घर में यह सब नहीं है। वहां हम कब जाएंगे, जाएंगे भी कि नहीं, पता नहीं। पर इस घर में तो हम सब रह ही रहे हैं। थोड़ी-थोड़ी कोशिश करें तो कबीर के इस न्यारे घर के छप्पर से दो-चार तिनके तो हम अपने इस जीवन में ला ही सकते हैं। इसी भजन की एक पंक्ति में कबीर बताते हैं कि उस न्यारे घर में बिन ज्योति उजियारा है।

प्रारंभ में हमने ऐसी सभाओं में एक दीया जलाने की कुछ बातें की थीं। जहां जलाया जा सके,  वहां लोग दीया जलाएं ही। पर न जल पाए आज की तरह तो कबीर के उस न्यारे घर की याद करें। मुझे पूरा भरोसा है कि अर्थमय जीवन में, जीवन के अर्थ को समझने की इस छोटी-सी कोशिश में आप सबकी उपस्थिति बिन ज्योति उजियारा कर देगी।

स्व. अनुपम मिश्र प्रसिद्ध पर्यावरणविद और गांधी मार्ग के संपादक थे.  सेडिड आयोजित व्याख्यान माला में 4 जनवरी, 2016 को उन्होंने यह व्याख्यान दिया था. ‘सबलोग’ के मार्च 2016 के अंक में प्रकाशित।

mango tree
साहित्य

कहानी : खामोशी के मायने और आम का बगीचा

 

  • अभिषेक मिश्रा

 

सरसों के फूलों से पटे खेतों के बीच बनी पगडंडी से गुजरते कहार डोली लेकर दूसरे गांव जा रहे थे। कल उसकी शादी हुई और आज विदाई। डोली के परदे को पीछे हटाकर तिरछी नजरों से पीछे छूटते बाबुल का आंगन और खेतों की दूर तक फैले छोर को देखकर वो भावुक भी थी। साथ के लोग कुछ आगे जा रहे थे, अब नई बहुरिया के साथ जाना अच्छा भी नहीं। लेकिन निगरानी भी जरुरी तो कदम दर कदम पीछे भी बराबर नजर। खेतों में मवेशियों के लिए चारा काट रहीं महिलाएं डोली देखकर चौकस हो जाती हैं और दुल्हनिया को देखने की जुगत लगाती हैं। वो लजाई और झट से पर्दा बंदा कर देती है। महिलाएं हारकर काम में जुट जाती हैं और गीत गाने लगती हैं :

“सखी री प्रेम नगर छूटा जाए री,

मोरा जियरा बड़ा धड़काए री

चलले चार गो कहार,

डोली साजन के द्वार

सखी री मुंहवा में जियरा आए री”….

गीत का बोल दूरी के साथ धीमे हो रहे हैं। इसी बीच वो पुरानी यादों को फिर से जीने लगती है। वहीं पिया के बारे में सोचकर वो खुश होती है,

धत्… अभी तो वहां गई भी नहीं और…

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मारे शर्म के उसने अपना चेहरा लाल जोड़े में छिपा लिया। फिर पीछे छूटते बाबुल को भरी नजर से देखने की कोशिश। बाबुल जिसकी गलियों में वो चहकती थी, मां, बाबूजी, भाई, पड़ोसी सब कितना लाड-प्यार करते थे। अब जाने पिया के घर में कैसे लोग मिलें, इनको भी तो नहीं जानती वो। नाम-वाम भी उनका क्या है, हे भगवान उनका नाम कैसे लूं, छि… छि… छि…

हे बूढ़े बरगद बाबा! | Shagun News India

श्राप लगेगा बूढ़े बरगद बाबा का मुझे। उसे याद आता है कि आम के बगीचे में टिकोले तोडऩे जाते तो चाचा का सख्त पहरा भी रहता। वो नहीं चाहते थे कि लाडो को चोट लगे। जब मैट्रिक पास की तो वो भी तो उसी बगीचे में पहली बार मिला। पेड़ के पीछे से चोरी-चोरी मुझे निहारने में लगा रहता। शुरू में तो हम लड़कियां डांट कर उसे भगाती, बाद में उसकी हरकत अच्छी लगने लगी। आम तोडऩा बहाना बन गया था, बस उसे देखना चाहते थे। शायद सहेलियां समझने लगी थी कि मेरे दिल में क्या है, पर वो भी खुश होती कि चलो कोई तो सीमा से पार जा रहा है।

मैट्रिक के बाद वो शहर गया, इधर उसका स्कूल छूट गया। घर, द्वार, चूल्हा, चौका में जिंदगी सिमट गई। वो पर्व में शहर से गांव आता तो कुछ न कुछ जरूर लाता और वो भी गांव के सीमा पर लगे बगीचे में जाती और घंटों बात करती। दोनों ने आने वाले कल के सपने भी बना लिए। मिट्टी के घरौंदे और न जाने क्या-क्या।

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हे भगवान… ये सब मैं क्यों सोच रही, डोली में बैठी वो खुद को कोसने लगी, लेकिन फिर सीमा पर बने बगीचे के नजदीक आते ही यादों में खोने लगी। उधर इंटर की परीक्षा टॉप करके वो भी विदाई के दिन गांव आया और सीधे मिलने की जगह पहुंच गया। इस बार कोई नहीं था, थोड़ी कोशिश की तो सहेलियां मिली जो डोली को देखकर सुबक रही थीं। पूछने पर पता चला कि वो डोली में दूसरे गांव जा रही है। डोली बगीचे के करीब आती हैं और सहेलियां दौड़ती हैं।

वो कुछ पल के लिए बुत बनकर खड़ा रहता है। दूसरी तरफ वो परदा हटाकर एक बार सबको देखती है, उसे कुछ पल ज्यादा देखकर परदा लगाती है। आंसू के सैलाब में खुद में सिमटती जा रही वो अब बाबुल की तरफ देखना नहीं चाहती। जो बात उसने उनसे छिपा कर रखी आज आंखें उसकी गवाही दे रही थी। डोली आगे बढ़ जाती है, सहेलियां घर लौटने लगती हैं…

और वो साइकिल लेकर पैदल ही निकल पड़ता है बिना मंजिल के… आज उसका घर लौटने का मन नहीं। कुर्ते की जेब में रखे बूंदों को छूता है जो कबके पत्थर बन गए थे। गीत की आवाज भी कम होने लगती है। महिलाएं घास की गठरी बनाकर घर जाने की तैयारी में हैं। अचानक चारों तरफ अजीब खामोशी छा जाती है और वो पहली बार समझता है कि खामोशी के असली मायने क्या होते हैं।

abhishek mishra

लेखक पत्रकार हैं।

सम्पर्क-  +9193344 44050

चर्चा मेंहरियाणा

हरियाणा : तीन दिन चले ढाई कोस

अफसरों के साथ चिंतन के बहाने दिशा तलाश रही हरियाणा सरकार के लंच पर एक दर्जन से ज्यादा विधायक नहीं पहुंचे.

तीन दिन के फाइव स्टार चिंतन शिविर के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि फिलहाल सरकार को तीन साल हुए हैं और चूंकि प्रदेश में भाजपा की पहली बार सरकार बनी और वे पहली बार मुख्यमंत्री बने हैं, इसलिए असली काम तो अब शुरू होगा। खट्टर के अनुसार अब तक तो वे खुद, पार्टी और सरकार, प्रदेश को समझ ही रहे थे।
ऐसी ही बात हरियाणा के भाजपाईयो ने पहले साल में, पहला साल पूरा होने पर और दूसरा साल पूरा होने पर भी कही थी। चिंताजनक बात ये है कि कार्यकाल के उत्तरार्द्ध में पहुंच चुकी भाजपा को अब तक ना अपनी दिशा मिला है, ना सरकार और प्रशासन पर पकड़।
प्रशासनिक अधिकारियों से तालमेल बढ़ाने की कोशिश में खट्टर सरकार हिमाचल की पहाड़ियों पर जा बैठी और खामखा की आलोचनाओं को निमंत्रण दे दिया। शांत माहौल, एकांत आदि का तर्क बेमायने रहा और इस सवाल का भी स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाया कि इस शिविर से मिला क्या।
राज्य सरकार के आलीशान, खूबसूरत और सुरक्षित पर्यटन स्थल मोरनी, पिंजौर और सूरजकुंड को छोड़कर हिमाचल के फाइव स्टार होटल में ऐसा शिविर आयोजित करना सरकार की सजगता पर सवाल खड़े करवा रहा है। ऐसे वक्त में जब हिसार जिले के उकलाना में एक 5-वर्षीय बच्ची हैवानियत का शिकार हुई, तब सरकार की संगीतमय शामों के सुर प्रदेशवासियों को बिल्कुल नहीं सुहाए। सरकार का नजरिया नीतिगत और प्रशासनिक दक्षता वाले सुधारों का बताया गया लेकिन ज़मीनी मुद्दों से भाजपा सरकार लगातार दूर होती जा रही है।
एक सवाल यह भी है कि अधिकारियों से तालमेल सुधारने में जुटी सरकार का अंदरूनी तालमेल कितना है। क्या जातिगत आधार पर बंटा मंत्रिमंडल अब मिलजुल कर काम करेगा ? शिविर के आखिरी दिन लंच पर बुलाए गए मंत्रिमंडल से बाहर के पार्टी विधायकों में से करीब आधे पहुंचे ही नहीं। इस असंतोष से खट्टर सरकार कब तक आंख चुराएगी ?
बड़ी बड़ी बातें करने, जुमलों से दिल जीतने वाले और लच्छेदार भाषणों के माहिर भाजपा वालों की बातें हजम करने से पहले अब लोग सवाल पूछने लगे हैं। वो दौर बहुत जल्दी बीत गया जब मोदी के नाम पर हर सवाल दम तोड़ देता था, हर आशंका आत्मविश्वास खो देती थी। खैर, आखिरी कुछ महीनों में ही सही, हरियाणा सरकार तेज़ी से और परिणाम आधारित कामों पर ध्यान दे देगी तो राज्य का भी भला होगा और पार्टी के लिए भी 2019 में राहत रहेगी।

दीपकमल सहारण

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

98555 44211

deepkamal.saharan@gmail.com

मध्यप्रदेशसाहित्यस्तम्भ

पुस्तक समीक्षा : ‘अनथक कलमयोद्धा’ओं के बारे में

हम सब जानते हैं कि विश्व संवाद केंद्र, भोपाल पत्रकारिता के क्षेत्र में भारतीय मूल्यों को लेकर सक्रिय है। विश्व संवाद केंद्र का प्रयास है कि पत्रकारिता में मूल्य बचे रहें। प्रबुद्ध वर्ग में चलने वाले विमर्शों को आधार माने तब पत्रकारों के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता प्रतीत होती है। व्यावसायिक प्रतिस्पद्र्धा ने उनके मन में कुछ बातें बैठा दी हैं। आज विशेष जोर देकर पत्रकारों को यह सिखाया जा रहा है कि ‘समाचार सबसे पहले’ और ‘समाचार किसी भी कीमत पर’ ही किसी पत्रकार का धर्म है। परंतु,क्या प्रत्येक परिस्थिति में पत्रकार के लिए इस धर्म का निर्वहन आवश्यक है? एक प्रश्न यह भी कि क्या वास्तव में यही पत्रकार का धर्म है? इन दोनों प्रश्नों का विचार करते समय जरा हमें पत्रकारिता के पुरोधाओं के जीवन को देखना चाहिए। उनकी कलम से बहकर निकलने वाली पत्रकारिता की दिशा को समझना चाहिए।

यदि हम पूरी निष्ठा के साथ कलमयोद्धाओं के पत्रकारीय जीवन का अध्ययन करेंगे तो हम पाएंगे कि एक पत्रकार के लिए उसका धर्म ‘समाचार सबसे पहले’नहीं, अपितु ‘राष्ट्र सबसे पहले’ होना चाहिए। क्योंकि, हम सबने अनुभव किया है कि समाचार सबसे पहले के चक्कर में हम कई बार अपने समाज और राष्ट्र को हानि पहुंचा बैठते हैं। मुंबई के प्रसिद्ध ताज होटल पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान सबसे पहले और सबसे तेज की होड़ में हमने अपने दुश्मनों की सहायता की। हमारे मीडिया कवरेज को देखकर पाकिस्तान में बैठे आतंकियों के आकाओं ने उन्हें निर्देशित किया, जिसके कारण हमें बहुत अधिक जनहानि उठानी पड़ी। कारगिल युद्ध के समय सीधे प्रसारण पर भी आज प्रश्न उठते हैं। विश्लेषक मानते हैं कि उस समय भी हमारी दिग्भ्रमित पत्रकारिता का लाभ दुश्मनों ने उठाया।

अमेरिका में 9/11 का आतंकी हमला हम सबके ध्यान में आज भी है। आतंकियों ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की गगनचुंबी इमारत में यात्री विमान घुसेड़कर दुनिया को दहला दिया था। अमेरिका पर यह सबसे बड़ा हमला था। इस हमले की घटना के साथ हमें यह भी ध्यान आता है कि हमले के बाद अमेरिका में अफरा-तफरी और बर्बादी के समाचार किसी पत्रकार ने नहीं लिखे। वीभत्स चित्रों को किसी मीडिया ने नहीं दिखाया। अमेरिकी मीडिया के जरिए सारी दुनिया ने दो ही दृश्य देखे, पहला हवाई हमले का और दूसरा मृतकों को श्रद्धांजलि देने का। किंतु, वहीं सारी दुनिया ने उसी अमेरिकी मीडिया के जरिए मई-2011 के उस ऑपरेशन को जरूर देखा, जिसमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के जिम्मेदार ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतारा गया। स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस ऑपरेशन को संचालित किया, यह बात भी अमेरिकी मीडिया ने पूरे गर्व से बताई। यह अंतर हमें समझना होगा।

पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यहाँ यह कहने का अभिप्राय कदापि नहीं है कि भारत का मीडिया अमेरिका के मीडिया से कम राष्ट्रभक्त है। स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। इतिहास के पृष्ठों पर उसका योगदान स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। किंतु, हमें अपने दिल को टटोलना होगा कि उन स्वर्णिम पृष्ठों को कब से हमने नहीं पलटा है? उनको पढ़ कर सीखने का अभ्यास कब से हमने छोड़ दिया है? इसके अलावा अनेक अवसर पर पत्रकारबंधु सबसे तेज के चक्कर में समाचार की प्रामाणिकता का परीक्षण भी नहीं करते हैं। इसका परिणाम कई बार निर्दोष व्यक्तियों, संस्थाओं और समाज को भुगतना पड़ता है। अनेक अवसरों पर मीडिया की रिपोर्टिंग से समाज का सौहार्द भी गड़बड़ाया है। एकतरफा और पक्षधर रिपोर्टिंग के कारण समाज को सच से दूर रखने का भी प्रयास आज कई पत्रकार बंधु करते हैं।

बहरहाल, इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही विश्व संवाद केंद्र, भोपाल ने अपने वार्षिक विशेषांक का विषय ‘अनथक कलमयोद्धा’ तय किया। इस विषय के चयन के पीछे हम सबके मार्गदर्शक एवं क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख श्री नरेन्द्र जी जैन की प्रेरणा थी। विश्व संवाद केन्द्र के न्यासी मंडल एवं हमसे संबद्ध प्रबुद्ध वर्ग ने ‘अनथक कलमयोद्धाओं’ के नाम सुझाए। उनके सुझाव के आधार पर इस विशेषांक में मध्यप्रदेश के ऐसे पत्रकारों पर आलेख शामिल किए गए हैं, जिन्होंने 1920 से 2000 तक के कालखण्ड में समाजहितैषी पत्रकारिता की। इनमें मामा माणिक चंद वाजपेयी, रामशंकर अग्निहोत्री, माखनलाल चतुर्वेदी, लाला बलदेव सिंह, माधवराव सप्रे, सिद्धनाथ माधव आगरकर, कन्हैया लाल वैद्य, भाई अब्दुल गनी, मिस्टर ताजुद्दीन, मास्टर बल्देव प्रसाद, ओमप्रकाश कुंद्रा, पंडित भगवतीधर वाजपेयी, बबन प्रसाद मिश्र, डॉ. ओम नागपाल,बनवारी लाल बजाज एवं काशीनाथ चतुर्वेदी जैसे नाम शामिल हैं। निश्चित ही इस विशेषांक के माध्यम से आज के पत्रकार पत्रकारिता के उक्त पुरोधाओं के जीवन दर्शन एवं उनकी कलम की दिशा से परिचित हो सकेंगे। पत्रकारिता से सम्बंधित अनेक प्रकार के प्रश्नों के उत्तर और पत्रकार के वास्तविक धर्म, इन कलमयोद्धाओं की पत्रकारिता से प्राप्त होगा। इस महत्वपूर्ण विशेषांक का संपादन करने की महती जिम्मेदारी का निर्वहन ऊर्जावान पत्रकार एवं बहुभाषी हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख डॉ. मंयक चतुर्वेदी ने किया है।

लोकेन्द्र सिंह 

लेखक विश्व संवाद केंद्र के कार्यकारी निदेशक हैं।

lokendra777@gmail.com

चर्चा मेंदेश

कांग्रेस में अब राहुल की नई पारी

देश के दो राज्यों के चुनाव बाद सर्वेक्षण में भले ही कांग्रेस को हार की संभावना के समीप रखा गया है, लेकिन कांग्रेस मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं का जो जोश दिखाई दिया, उससे यह तो कहा जा सकता है कि कांग्रेस कार्यकर्ता चुनाव बाद के सर्वेक्षणों से मायूस नहीं हैं। कांग्रेस के केन्द्रीय मुख्यालय में कार्यकर्ताओं का जोश देखने लायक था। ऐसे ही वातावरण में कांग्रेस के राहुल गांधी की ताजपोशी हो गई। खास बात यह थी कि इस दौरान राहुल गांधी के परिवार के सभी सदस्य मौजूद रहे। सभी नेताओं ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर मुहर लगाई और शुभकामनाएं भी दीं।
कांग्रेस में पूर्व निर्धारित संभावनाओं पर अब मुहर लग गई है। जिसके अनुसार एकाएक राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पित हुए विरासती नेता राहुल गांधी को कांग्रेस का नया मुखिया चुन लिया गया है। हालांकि इस बात की संभावना पहले से ही थी कि आगामी दिनों में राहुल गांधी ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे। इसलिए इसे कांग्रेस के लिए नवीन अध्याय कहना तर्कसंगत नहीं होगा, क्योंकि जबसे राहुल गांधी कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने थे, तभी से कांग्रेस में केवल राहुल की ही चल रही थी। सारे निर्णय राहुल गांधी के संकेत पर ही होते थे। अभी हाल ही में मणिशंकर अय्यर को नीच शब्द के प्रयोग करने पर राहुल गांधी ने ही पार्टी ने निकाला था। इसलिए यह आसानी से कहा जा सकता है कि राहुल भले ही पहले कांग्रेस प्रमुख के पद पर नहीं थे, लेकिन वह प्रमुख जैसे ही थे।

शनिवार से कांग्रेस के भीतर राहुल राज का प्रारंभ हो गया है, इसलिए कांग्रेस में ऐसी संभावनाओं को काफी बल मिलने लगा है कि राहुल राज में कांग्रेस का विकास हो सकेगा। राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी के खराब स्वास्थ्य के चलते कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की मांग धीमे स्वर में उठने लगी थी। इन स्वरों के बाद राहुल गांधी को अध्यक्ष पद के लिए तैयार किया गया। देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल में आज एक नए युग की शुरूआत हो गई है सोनिया गांधी के बाद अब कांग्रेस राहुल राज में आगे बढ़ेगी। राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष का पद भले ही आसानी से मिल गया हो, लेकिन भविष्य की राह आसान नहीं कही जा सकती। क्योंकि कांग्रेस की वर्तमान स्थिति का अध्ययन किया जाए तो यह दिखाई देता है कि आज कांग्रेस लोकसभा में तो कमजोर है ही साथ ही कई राज्यों में सत्ता विहीन है। ऐसे में कहा जा सकता है कि आगामी समय में राहुल के समक्ष बहुत बड़ी चुनौतियां खड़ी होने को बेताब हैं। राहुल इन राजनीतिक चुनौतियों का सामना कैसे और किस प्रकार से करेंगे?

राहुल गांधी के पिछले राजनीतिक प्रदर्शन का विश्लेषण करेंगे तो यही परिलक्षित होता है कि पिछला समय राहुल गांधी के लिए किसी भी प्रकार से सकारात्मक नहीं रहा। उनके नेतृत्व में कांग्रेस सिमटती ही गई, जिसके फिलहाल उबरने के संकेत भी नहीं दिख रहे। हां, यह जरुर कहा जा सकता है कि राहुल गांधी के सामने आने से पार्टी के निराश कार्यकर्ताओं में एक नई आशा का संचार होगा, जिसकी कांग्रेस को लम्बे समय से आवश्यकता भी थी। राहुल के लिए शनिवार का दिन जितना बड़ा है उसे और विशाल बनाने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं ने भरपूर तैयारियां की हैं। 47 साल के राहुल 132 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के 49वें अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभालने को तैयार हो गए हैं। कांग्रेस कार्यालय नई दिल्ली में राहुल गांधी की ताजपोशी की जा रही थी, उस समय कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल और चेहरे की भवभंगिमा ऐसा प्रदर्शित कर रही थीं कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं, बल्कि देश की सत्ता संभालने जा रहे हों। कार्यकर्ताओं का यह जोश आगामी लोकसभा चुनाव के समय तक जारी रहा तो कांग्रेस के लिए उत्थान की राह का निर्माण कर सकते हैं। राहुल गांधी ने देश के तमाम चुनावों में प्रमुख प्रचारक की भूमिका का निर्वाह भी किया है, इसलिए अब राहुल गांधी को अपरिपक्व कहा जाए, यह ठीक नहीं है। उन्हें अब राजनीति का लम्बा अनुभव भी है। पिछले चुनावों की तुलना में गुजरात विधानसभा के प्रचार में भी राहुल गांधी एक नई भूमिका में दिखाई दिए। चुनाव प्रचार के दौरान ही कांग्रेस कांटे की लड़ाई की भूमिका में आती हुई दिखाई दी।

विरासती पृष्ठभूमि के आधार पर राजनेता बने राहुल गांधी के बारे में अब यह कहना ठीक नहीं माना जा सकता कि कांग्रेस अब वंशवाद को बढ़ावा दे रही है। क्योंकि वास्तविकता यही है कि राहुल के पास एक लम्बा राजनीतिक अनुभव है। उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में कई महत्वपूर्ण पदों पर भूमिका निभाई है। हां, यह जरुर कहा जा सकता हे कि राहुल गांधी से पूर्व इस परिवार के जो सदस्य राष्ट्रीय राजनीति में आए, उनमें से सभी ने एकाएक राजनीतिक प्रवेश किया। उनके पास पहले से कोई राजनीतिक अनुभव नहीं था। इन्हें वास्तव में वंशवाद का उदाहरण कहा जा सकता है, लेकिन राहुल गांधी को नहीं। राहुल गांधी जनप्रतिनिधि भी रहे तो संगठन में भी रहे। आज राहुल गांधी एक परिपक्व राजनेता की भूमिका में कांग्रेस के मुखिया बने हैं। इसलिए यह भी संभवनाएं बनती हुई दिखाई दे रही हैं कि अब राहुल गांधी का परिपक्व चेहरा देश को दिखाई देगा। राहुल के बारे में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह ने कहा कि मैंने गांधी परिवार की पांच पीढ़ियां देखी है वंशवाद में कुछ भी गलत नहीं है। मैं खुद एक परिवार का प्रतिनिधित्व करता हूं राहुल के पास एक नेता के सभी गुण विद्यमान हैं।

राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया। उनकी ताजपोशी के लिए पार्टी मुख्यालय में भव्य समारोह का आयोजन किया गया। स्वागत समारोह की तस्वीरों में दिखाया गया कि कांग्रेस दफ्तर के बाहर भारी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता एकजुट थे। वहां तरह-तरह का नाच-गाना और नारेबाजी हो रही थी। ताजपोशी के बाद जब सोनिया का भाषण शुरू हुआ तो आतिशबाजी होने लगी। आवाज इतनी तेज थी कि सोनिया को अपना भाषण बीच में रोककर पटाखों को शांत करने के लिए कहना पड़ा था।

सुरेश हिन्दुस्थानी

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं

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पैड-मैन कोई बैड-मैन नहीं, गुड मैन है जनाब! 

अक्षय कुमार की फ़िल्म पैड मैन का शानदार ट्रेलर ट्विटर पर देखा। इस फ़िल्म का निर्देशन मशहूर ऐड फ़िल्म मेकर आर. बाल्की ने किया है, जिन्होंने अमिताभ बच्चन को लेकर पा जैसी संवेदनशील फ़िल्म बनाई थी।

क्या है पैडमैन की कहानी?

ये फिल्म अरणांचलम मुरगननाथम के जीवन पर आधारित है। वे कोयमंबटूर के निवासी हैं।उन्होंने पहली बार देश में किफायती कीमत वाले सेनेटरी नैपकीन इजाद की थी। ट्विंकल खन्ना ने ‘द लीजेंड ऑफ लक्ष्मी प्रसाद’ नाम की एक किताब लिखी है, जिसमें अरणांचलम मुरगननाथम की कहानी बताई गई है। यह फिल्म बतौर प्रोड्यूसर ट्विंकल की पहली फ़िल्म है।

ट्विंकल ने दिया था पैडमैन का आइडिया- अक्षय

फिल्म के बारे में बात करते हुए अक्षय ने कहा था- फिल्म का आइडिया ट्विंकल ने दिया था। मेरे अंदर इस फिल्म के लिए मोटिवेशन मेरे घर की महिलाओं से आया। ट्विंकल महिलाओं से जुड़ी हर समस्या के बारे में मुझसे बात करती हैं। भारत में आज भी 91% महिलाएं पैड की इस्तेमाल नहीं करती हैं, क्योंकि उनके पास इसके लिए पैसे नहीं हैं. इसकी समस्या टॉयलेट से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है।

हरियाणा से क्या है आज पैडमैन का रिश्ता ?

सवाल ये है कि ढाई करोड़ की आबादी वाले हरियाणा प्रदेश के संदर्भ में आज मैं पैड मैन की चर्चा क्यों कर रहा हूँ? क्योंकि हरियाणा सरकार ने हाल ही में स्कूली छात्राओं और बीपीएल महिलाओं के लिए फ्री नैपकिन्स बांटने का ऐलान किया है। ये क्रांतिकारी साबित होगा, शुक्रिया मनोहर लाल।
पैड मैन अरुणाचलम मुरुगनाथन जिस तमिलनाडु से बिलॉन्ग करते है, उसकी राजधानी चेन्नई से निकलने वाले प्रतिष्ठित अखबार दी हिन्दू ने हरियाणा की इस ऐतिहासिक इबारत को प्रमुखता दी है। हरियाणा एडीशन के तमाम बड़े अखबार जब टिम्बर ट्रेल के कमरों का किराया जोड़ने में व्यस्त हैं, तब दी हिन्दू को इस खबर की प्रमुखता समझना सुकून देता है।
पैड मैन के हीरो के बारे में ये टैगलाइन है कि वाकई सुपर स्टार है ये पगला! वाकई सुपर हीरो वाला ही काम है जनाब। हर महीने 5 दिनों में जितना रक्त एक महिला का बह जाता है, उतना आधे घंटे एक पुरुष का बह जाए तो मौत हो जाएगी।

हरियाणा की महिलाओं के लिए वाकई ये एक क्रांतिकारी बदलाव है। सैनिटरी नैपकिन की योजना उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी है पर फ्री नहीं है, 6 रुपये वसूले जाते हैं।हरियाणा में बिल्कुल फ्री है, जो लाखों महिलाओं को अब इंफेक्शन और कई घातक बीमारियों से बचाएगा।

हरियाणा की बेटी मानुषी छिल्लर ने हाल ही में मिस वर्ल्ड का खिताब जीता है, जिसपर हम सब को नाज़ है। मानुषी शक्ति नाम से एक अभियान चलाती हैं, जिसका उद्देश्य सभी महिलाओं को सस्ता नैपकिन उपलब्ध कराना है। मानुषी के इसी अभियान को शक्ति देने के लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कुरुक्षेत्र में उनकी मौजूदगी में ही फ्री नैपकिन योजना का ऐलान किया। मानुषी की उपलब्धि को इससे बड़ा सम्मान और सहयोग हो नहीं सकता था, 500 गज का प्लॉट इस सम्मान के सामने कितना ओछा है!

महिलाओं के सम्मान के साथ साथ इस योजना में रोजगार और बिजनेस ओपॉर्चुनिटी भी मैं देखता हूं। सैनिटरी नैपकिन जिस कॉटन यानी नरमा कपास से बनता है, उसकी खेती हमारे 4 जिलों में , सिरसा से लेकर चरखी दादरी तक खूब होती है। लेकिन आज इसका रकबा तेजी से घट रहा है। जीनिंग उद्योग दम तोड़ रहा है। इसे पुनर्जीवन मिल सकता है, बशर्ते कि सरकार इस उद्योग को संरक्षण दे।

मार्किट फीस की विसंगतियों ने इस उद्योग का बुरा हाल कर रखा है। हमारी कॉटन बेल्स और रॉ कॉटन भी सस्ते में दूसरे प्रदेशों में बेचा जा रहा है।सरकार ये नीति बनाए की ये नैपकिन्स हरियाणा में ही बनें और यहीं से खरीदकर सरकार बांटे, आखिर कहीं न कहीं से तो टेंडर निकालकर खरीदेगी ही! कई स्टार्ट अप हरियाणा में ही शुरू किए जा सकते हैं। प्रदेश के खजाने का पैसा प्रदेश के ही व्यापार को जाएगा और किसान को भी बेहतर मूल्य मिलेगा।

खैर बात पैड मैन से शुरू हुई थी। मनोहर सरकार अगर इस योजना को सफलता पूर्वक लागू कर लेती है,तो ये हरियाणा प्रदेश के लिए साइलेंट रेवोल्यूशन साबित होगी। प्रदेश की आधी आबादी का जीवन बदल जायेगा, ऐसा होगा हमारे सपनों का हरियाणा।

ऋषि- पांडेय

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

+919996466634

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बोलने का बदलता सामाजिक-दायरा और भाषा

राजनीति राष्ट्रीय आत्मसम्मान की रीढ़ है। इस रीढ़ की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए जनप्रतिनिधियों का चुनाव होता है। देश अपने राजनेता पर गर्व करता है जब उसका नेता सार्वजनिक रूप से बोल रहा होता है; कहीं किसी को सम्बोधित कर रहा होता है। भारतीय राजनीति के वे दिन देखें, जो ब्रिटिश राज की हुकूमत के थे; हमारे राजनीतिज्ञ जिस साहस, आत्मबल, दृढ़-संकल्प से अपनी बात लोगों के बीच रखते थे; अपनी सोच और इरादे को उनसे साझा करते थे; वह ‘कम्यूनिकेशन’ की आधुनिक शब्दावली में भी सर्वोत्तम तरीका कहा जाएगा। दरअसल, सार्वजनिक जीवन में बोलना एक शऊर का काम है। तब तो और जब हम किसी खास ओहदे पर हों। राजनीति का विस्तार और प्रभाव चौतरफा होने के नाते राजनीतिक व्यक्तित्व से शालीन और मर्यादित आचरण की अपेक्षा अधिक की जाती है। हाल के दिनों में राजनीति की जन-माध्यमों पर निर्भरता बढ़ी है। प्रचार-संस्कृति के बाजारू-संस्करण ने नई चिंताओं को सिरजा है। आजकल राजनेता बिना किसी पूर्व तैयारी और समीक्षा के बोल रहे हैं। (हाँ, वे जनता के मुद्दों का ‘गेटकीपरिंग’ खूब कर रहे हैं) यह जानते हुए भी कि उनका बोला अब राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर तक अपनी पहुँच और दख़ल रख रहा है। फिर वह क्यों अनर्गल प्रलाप अथवा बिलावज़ह आरोप-प्रत्यारोप करते दिखते हैं; समझ से बाहर है। जबकि उनके द्वारा कही जाने वाली इन सब बातों से देश की गरिमा को ठेस पहुँचता है, अपनी छवि जो धुमिल होती है सो अलग। भारत में पहले बोलना दिल से होता था, अब दिमाग से। अब बोलने का मिज़ाज और लहजा बदला है, तो बोलने वाले की नियत और नेक-ईमान भी बदल चुकी है। मौजूदा राजनीति में आत्मबल से हीन व्यक्ति भी राजनेता बन सकते हैं। वे धनबल-बाहुबल, वंशवाद या फिर भाई-भतीजावाद के बूते जन-प्रतिनिधि होने का गौरव हथिया सकते हैं। सो वे क्यों राजनीति में ज़मीनी अनुभव और अनुभवी ज्ञान को तरज़ीह दें। किसी तजु़र्बे या तज़रबे के आगे शीश नवाए। आखिर उन्हें जरूरत ही क्या है कि वे सही बोलने का जिम्मा उठाए जबकि उनके कुछ भी बोल देने का रत्ती भर नुकसान उनको या उनकी पार्टी को न होता हो।

लेकिन यह बात भाषा का व्यक्ति नहीं कह सकता है। विचारों में जीने का आदी इंसान इसको सही नहीं ठहरा सकता है।  क्योंकि भाषा का आदमी यह बखूबी जानता है कि भाषा में कही जा रही बातें लिखे में आने के बाद स्थायी हो लेती हैं। महानता के सारे शास्त्र और ऐतिहासिक उद्बोधन कहे-सुने को लिखित स्वरूप प्रदान कर ही कालजयी हुई हैं। वैसे भारत में लेखन का काम बहुत बाद में हुआ। पहलेपहल तो लोगों में कहने-सुनने की रवायत ही आम थी। इसे बहुविध नामों से जाना जाता है-श्रुत, श्रवण, वाचिक, मौखिक, शाब्दिक इत्यादि। आज की साहित्यिक शब्दावली में कहें, तो देखे के बारे में लिखित बयान संस्मरण कहे गए। देखे का लिखित वर्णन भाषा की विधा में रिपोर्ताज और यात्रा-वृत्तांत कहलाए। लोक-केन्द्रित कथा-कहानी एवं उपन्यास की निर्मिति के पीछे भी कोई न कोई घटित सचाई हुआ करती है जिसका प्रत्यक्ष या परोक्ष उद्घाटन साहित्य अपने तरीके से करता है। प्राचीन काल में बीते अथवा घटित अनुभव को स्मृति में संजोये रखने का चलन खूब था। नई पीढ़ी के लिए ये अनुभव बड़े काम के थे। आगत भविष्य के बारे में ठीक-ठीक अनुमान लगा लेने के ये वे औजार थे जिसके बलबूते मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पा ली थी। विभिन्न ख़तरनाक परिस्थितियों से जूझने का तरीका जान लिया था। चूँकि लोक अपने ज्ञान को सब में बाँटने का कार्य करता है। इसलिए पहले लोगों की आपस में बैठकी होती थी, चौपाल या मज़मा लगता था। बड़े-बुजुर्ग को सभी लोग बड़े चाव से सुनते थे। उनके अनुभव को सुनने और गुनने का काम साथ-साथ चलता रहता था। अक्सर इस प्रकार की बातचीत अथवा परिचर्चा में ज़िरह-बहस, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद, सहमति-असहमति इत्यादि ज़ाहिर होते थे; जिनके निवारण की औषधि भी इन्हीं लोगों के पास हुआ करती थी। अनुभव के कच्चे होने पर तैश खाना स्वाभाविक है। नासमझ होने की स्थिति में हर बात पर क्रोध करना हमारी आदत है। जल्दबाज होने पर हड़बड़ी में कोई बड़ी गड़बड़ी कर बैठना हम सबकी फितरत है। इसी कारण बोलने-चालने की यह रवायत सबके लिए सामाजिकता की प्रयोगशाला थी। लोकवृत्त की यह हिन्दुस्तानी परिपाटी थी जिसे जुर्गन हैबरमास ने ‘पब्लिक स्फियर’ कहा है। हैबरमास थोड़ा ‘इंटेलेक्चुअल्टी’ पर बल अधिक देते हैं।

अब तो हुआ यह है कि लेखन के आधुनिक तौर-तरीकों ने सम्पर्क-संवाद की पुरानी विधाओं तथा विधियों को हथिया लिया है। इस कारण बोलने-चालने का ढर्रा काफी कुछ बदल चुका है। हम भाषा की जगह अक्षरों में बतिया रहे हैं। हम इस बात को लेकर कतई बेचैन नहीं है कि हमारा पढ़ा-लिखा कितना अनुभवसाध्य, सुविचारित और मूलतः हमारे हृदय के तंतुओं को छूने वाला है। उसमें ज्ञान के साथ विज्ञान और सबसे जरूरी तत्त्व संवेदना कैसी है। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तथा सोशल मीडिया के ठिकानों में कही जा रही अधिसंख्य बातें दुहराव और दोहरेपन का शिकार हैं। हर कोई दूसरे के स्क्रीन में हाज़िर होने को लालायित है। अब संभव नहीं रहा कि बिना किसी गैर-जरूरी विवाद और मनगढंत सनसनी ख़बर से उलझे-गुजरे दिन निकल जाए। इन सबके बीच एक प्रवृत्ति जो खासतौर पर लोगों के भीतर पनपी है वह है-आत्ममुग्धता। बदलाव के इस घटाटोप के कारण वितण्डावाद से लेकर विसंगतियों तक में इज़ाफा हो गया है। हम अपने ही मोबाइल-सेट या सोशल-मीडिया के प्लेटफाॅर्म पर गैर-जरूरी चीजों की बढ़ती आमद से परेशान हैं। कई बार हम हैरान होते हैं कि क्यों लोगों को सुबह-शाम खलबली मची होती है कि वह अपने को अधिक से अधिक लोगों के मोबाइल-स्क्रीन पर प्रकट कर ले। उनकी हसरत में है कि हाय-हैलो से लेकर कथा-चुटकुला चाहे जिस भी रूप में हो; बस मैसेजिंग हो जानी चाहिए। इसी तरह स्मृति-इतिहास, संस्कृति-परम्परा, कला-साहित्य, मूल्य-विश्वास, प्रतीक-संकेत सबकुछ अक्षरों अथवा अजीबोगरीब ‘इमोजियों’ या मीम्स’ के हवाले हो चुके हैं।

इस बदलाव की चपेट में समाज और उसका बदलता सामाजिक दायरा सबसे पहले है। इसका चिंताजनक पहलू यह है कि इससे आपसी लगाव का सामूहिक-बंध टूटा है। अनावश्यक दोस्ती-यारी से अटी पड़ी आभासी दुनिया ने एक सामूहिक मिथ रच दिया है। जबकि हमारी वास्तविक दुनिया खुश होने की जगह गुमसुम है। संचार की शब्दावली में राजनीति इस ‘स्पाइरल आॅफ साइलेंस’ का जनक है। कारण कि वर्तमान राजनीति से हमारे मनोव्यवहार और उसकी मनोगतिकी तक निर्धारित होने लगे हैं। सरकार और शासकीय-तंत्र को हमने अपना ‘लाइफ लाइन’ घोषित कर दिया है। राजनीति को प्राप्त इस केन्द्रीयता ने हाल के दिनों में व्यक्ति और समाज की चूलें इस कदर कस दी है कि राजनीतिक कार्यकलाप, गतिविधियाँ, घटनाक्रम आदि हमारे लिए जरूरी खुराक-सा हो गए हैं। बच्चों की कार्टून में दिलचस्पी जिस बेशुमार तरीके से बढ़ी है; सयाने लोगों की ख़ातिर बहुचर्चित राजनीतिज्ञ बिल्कुल कार्टून-चरित्रों की भाँति जनता के मनोरंजन का उम्दा साधन हो चले हैं। अधिसंख्य जनता उनके बहुरुपिएपन को पसंद करती है; उनके नकलचीपन पर उछलती है। कई बार तो वह उनकी गाली-गलौच की भाषा पर योग से लेकर समाधि तक की यात्रा तय कर लेती है। प्रश्न उठता है, ऐसा क्यों हो रहा है तो जवाब है-‘मूल्यहीन राजनीति’। ध्यान दिया जाए तो राजनीति अपने अधिकार और कर्तव्य पर सबसे अधिक परदा डालने में जुटी है। सांविधानिक नीति निर्देशक तत्त्वों तथा दिशा-निर्देशों का उल्लंघन और उसका माखौल बनाने का काम राजनीतिज्ञों द्वारा ही सर्वाधिक किया जा रहा है।

इन दिनों राजनीतिक-व्यवहार चूँकि दर्शनीय तथा सर्वसुलभ है इस कारण इनका अतिक्रमण हमारे ऊपर ही नहीं हमारे अन्दर भी सबसे ज्यादा हो रहा है। अप्रत्याशित एवं अनपेक्षित तरीके से समाज में राजनीति की बढ़ती केन्द्रीयता ने हमारे सामाजिक व्यक्तित्व और सामूहिक सम्बन्धों का सत्यानाश कर डाला है। हम बाहरी और फ़ालतू के मुद्दों पर जिरह-बहस करने लग जाते हैं। जबकि राजनीतिक ‘एजेण्डा-सेटिंग’ से उलट हमारी दुनियादारी और निजी घरेलूपन संकरा और नितांत स्वार्थी होता चला जाता है। हमारी अपनी खू़बी-विशेषता, संस्कार-तहज़ीब या तो नष्ट हो जाते हैं या कि फिर छिन्न-भिन्न। नतीजतन, हम राजनेताओं के बयान में अपनी प्रसन्नता ढूँढते हैं। उनके द्वारा रैलियों के दौरान कही गई बातों से अपना भविष्य सुरक्षित पाते हैं। यही नहीं वह चाहे जिस किसी प्रेस-वार्ता में जो आँकड़े परोस देते हैं; हम उसी पर लटटू हो जाते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? इसके लिए संचार के बदलते सामाजिक दायरे की पड़ताल जरूरी है। क्योंकि आवश्यक पर अनावश्यक चीजें इस कदर आच्छादित हो चली हैं मानों अपनी जिंदगी भी विज्ञापन के ट्रैक पर हो जिनका हमारे प्रति सम्बोधन तो होता है; लेकिन जिंदा जुड़ाव या सजीव प्रेम नहीं झलकता है। हमें यह बात जे़हन में रखनी चाहिए कि संचार के साथ भाषा सम्बन्ध कायम रखती है। अपनी मजबूत पकड़ बनाती है। संचार-साधनों में प्रयुक्त भाषा का सामाजिक दायरा विस्तुत और बहुआयामी होता है। इसीलिए हम मानते हैं कि समाज के साथ भाषा की भूमिका सहोदरी है। अंतःक्रिया के स्तर पर साझेदारी की है। यह देखें कि संचार की बुनियादी समझ सूचना, शिक्षा एवं मनारंजन को  समाज के जिन अंतःआधारों से जोड़ते हैं; भाषा उन सबके केन्द्र में है। हाल के दिनों में भाषा के मुहाने बदले हैं। उनमें प्रत्याशित-अप्रत्याशित बदलाव बहुतेरे हुए हैं। इन सबका कारण बदलता हुआ समाज-शास्त्र है, तो उसका मुख्य कारक कहीं न कहीं आधुनिक संचार-संस्कृति और भाषिक-राजनीति भी है।

संचार-संस्कृति के बदले किंतु सकारात्मक ‘फाॅर्मेट’ की बात करें, तो तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी आधारित वैज्ञानिकता ने नई संवृत्तियों (फिनोमिना) को जन्म दिया है। यह अन्तर सिर्फ ‘सरफेस’ तक नहीं सीमित है, अपितु ‘कोर स्ट्रक्चर’ तक इसका असर गहरा है। आधुनिक समय में तर्क एवं विवेक आधारित चिन्तन-दृष्टि का बाहुल्य है जिसने अधिरचना और मनोरचना दोनों को प्रभावित किया है। यानी जो कुछ घट रहा है उसका सीधा प्रभाव बाहर से लेकर भीतर तक जबर्दस्त है। इसकी सबसे अच्छी परिणति है-लोकतंत्र यानी ‘डेमोक्रेसी’। लोकतंत्र की आधारभूमि है-समानता, स्वतन्त्रता एवं विश्वबंधुत्व। आधुनिक लोकतंत्र की संकल्पना ने भारतीय जनसमाज का नक़्शा बदलकर रख दिया है। इस सहस्त्राब्दी में ‘आईसीटी’, ‘डीएससी’, ‘कन्वर्जेंस’, ‘मार्केट’, ‘कम्युनिकेशन’ एवं ‘लैंग्वेज हेजमनी’ की बदलती स्थितियाँ निर्णायक हैं। सूचना-समाज की बदली हुई स्थितियों ने साबित किया है कि आधुनिक समय कुशल दक्षता एवं प्रवीणता का है; सूचनाओं के अपरिमित प्रयोग, प्रभाव और प्रविधि का है। जातिवाद, क्षेत्रवाद, सत्तावाद, सामंतवाद आदि धारणाएँ अब विलुप्त हो रही हैं। जातिसूचक नामों का आतंक, दबदबा तथा रौब-दाब ख़त्म हो रहे हैं और जो लोग इसे अब भी छाती से चिपकाए बैठे हैं; उनकी स्थिति अंधविश्वासी से इतर कुछ नहीं है। इन अर्थों में भाषा की चालाकियों और उसकी बेशुमार राजनीति को समझना जरूरी हो चला है। ऊपरी तौर पर संचार आधारित भाषा ने अपना शब्दार्थ बदल डाला है; सामाजिक विधि-विधानों में जरूरी फेरफार किया है। हम समझते हैं कि अभिव्यक्ति आधारित अभिव्यंजना का पुरातन समीकरण बदल चुका है। अब शब्द सबके हैं इसलिए अर्थ पर सबका समान अधिकार कायम है।  यह सचाई का एक पक्ष मात्र है जिसके अपने प्रभाव और परिणाम है। परन्तु कुल सकारात्मक रूख के बावजूद बदलाव के मूलभूत कारकों और सूचकांकों को पढ़ा जाना आवयक है; इनकी यथोचित एवं गंभीर पड़ताल जरूरी है।

यह इसलिए भी जरूरी है कि हमारी समझ और सूचना आधारित बोध पश्चिम की ओर मुख कर चकित एवं किंकर्तव्यविमूढ़ भाव से खड़ी दिखाई देती है। इतिहास-बोध और सामाजिक-संस्कृति से सहजात लगाववृत्ति नहीं होने के कारण हम तात्कालिक परिणाम और निष्कर्ष को ही सबकुछ मानते हैं। हम तकनीकी-प्रौद्योगिकी आधारित विकास को महत्त्व देते हैं जबकि विज्ञान और वैज्ञानिक प्रवृत्तियाँ आज भी आम भारतीयों में सबसे कम है। जबकि हमें पता होना चाहिए कि हमने अपने श्रम, शिल्प, शैली और सौन्दर्यात्मक काव्य-रूपों का पूरे विश्व में लोहा मनवाया है। भारतीय जनसमाज में लोकवृत्त जैसी खदबदाहट और परिपाटी काफी पहले ही शुरू हो गई थी। लोकायत से लेकर साहित्य का भक्तिकाल आधुनिकता की पूर्वपीठिका इन्हीं अर्थों में है। प्रचलित पांडित्य को चुनौती देने का काम संत-साहित्य ने किया। उसने संस्कृत की ‘दैवीय सत्ता’ को नकारा और देशज भाषा-बोली में साहित्य-रचना कर लोकप्रियता के नए संस्करण आरंभ किए। लोकमानस को न सिर्फ गहरे प्रभावित किया, अपितु चिन्तन-दृष्टि को आस्था के बरअक्स ज्ञान, विवेक और तर्क से चुनौती देने की हरसंभव चेष्टा की। दरअसल, भक्ति-युग ने आरंभ से ही भारतीयता को नए अर्थ-सन्दर्भ, रूप-आकार, स्थापत्य-संस्कृति, कला-साहित्य आदि दृष्टियों से संवाद-विमर्श हेतु आमंत्रित किया है। उसने संचार की नई वैचारिकी खोजे जिसमें रसास्वदन का एकरेखीय प्रारूप नहीं दिखाई देता है। उसमें जो गौरतलब पहलू है वह है-मानवीय सत्ता एवं भूगोल की वास्तविकता में खोज। संत-परम्परा से जुड़े संतों के यहाँ उपदेशक-शैली नहीं है, अपितु उनके कहन में जनचेतना का हुंकार है। समसामयिक गतिरोध के प्रति सीधा और आक्रामक प्रतिरोध है। वहाँ कहा गया सबकुछ प्रत्यक्ष, प्रामाणिक और सत्तावान है; आँखन की देखी है। नवजागरण का स्थूल-सूक्ष्म सन्दर्भ लें, तो विद्वानों के मुताबिक-अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप (मुख्यतः फ्रांस) में चले वैचारिक आन्दोलन को ज्ञानोदय (एनलाइटमेंट) के नाम से जाना जाता है। इस आन्दोलन ने जिन प्रवृत्तियों को जन्म दिया उन्हें हम आधुनिकता या आधुनिकतावाद के नाम से जानते हैं। समता और न्याय की धारणाओं के प्रचलन का श्रेय भी इसी आन्दोलन को दिया जाता है। मोटे तौर पर इसे अंधविश्वास पर विज्ञान की और आस्था पर विवेक की विजय के नाम से जाना जाता है। ज्ञानोदय के विचारक मानते थे कि तर्कबुद्धि के जरिए सामाजिक, बौद्धिक और वैज्ञानिक समस्याओं का हल किया जा सकता है। वे परम्परा और संस्थागत धर्म के ‘प्रतिगामी’ प्रभाव की कठोर आलोचना करते थे।…उन्नीसवीं सदी के राजनीतिक-सामाजिक प्रयोगों ने ज्ञानोदय के वैचारिक वर्चस्व को मजबूत किया और धीरे-धीरे ज्ञान का एक नया सिद्धान्त प्रकाश में आया। इतिहास का महत्त्व, प्रगति और विकास की अपरिहार्यता, सेकुलरवाद और राष्ट्रवाद का विचार भी इसी ज्ञानमीमांसा की देन है। आधुनिक राजनीति की समस्त वैचारिक और व्यावहारिक गोलबंदी इन्हीं धारणाओं के आस-पास हुई है। विचार के क्षेत्र में फ्रेंकफुर्त स्कूल के चिंतकों ने ज्ञानोदय के अंतर्निहित द्वंद्व को सामने ला कर आधुनिकता की आलोचना के द्वार खोले।

भारत में इससे पहले ही गाँधी ने हिंद स्वराज लिख कर एशिया की तरफ से आधुनिकता की आलोचना की शुरुआत कर दी थी। पिछले तीन दशकों से ‘छोटी पहचानों की बगावत’, ‘समुदाय की वापसी’ और ‘बहुसंस्कृतिवाद’ की परिघटनाओं ने ज्ञानोदय के वर्चस्व को कड़ी चुनौती दी है। जैसे-स्त्रीयता से सम्बन्धित विमर्श, अश्वेत, दलित, पर्यावरणवादी और अन्य विद्रोही विमर्श।‘ ध्यातव्य है कि इन सबके केन्द्र में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष ढंग से संचार और भाषा के अंतःसम्बन्ध शामिल हैं जिन्होंने पिछले समय-काल में जरूरी विमर्श खड़े किए है, जनमूल्य आधारित जनान्दोलन को जन्म दिया है; लोक-संवृत्ति के दायरे में एक समांतर किन्तु अधिक प्रभावशाली वैचारिक-संस्कृति को खड़ा किया है। प्रतिरोध के स्वर इस 21वीं सदी में बुलंद हो चले हैं, तो इसमें नवीन संचार साधन एवं माध्यम आधारित भाषा का योगदान प्रमुख है। परिणामस्वरूप हाशिए पर ढकेली गई प्रतिभाएँ विशेषकर स्त्रियाँ अब केन्द्र की चूलें कस रही हैं, लोकतंत्र की बाँह पकड़ उन्हें जाग्रत कर रही हैं। विवेकी जन जाति-विशेष की पाँव पूजने जैसे पाखंड को खारिज़ कर रहे हैं। ज़मीन-जायदाद अथवा इफ़रात दौलत होने मात्र की वजह से किसी को अपना नेता मान लेने को अब अधिसंख्य भारतीय तैयार नहीं हैं। इसी तरह विदेशी सरज़मी पर शिक्षा ग्रहण कर स्वदेश लौटे राजनीतिक बेटे-बेटियों को वह आँख मूँदकर चुनाव जिताने के पक्षधर नहीं हैं।

लोकतंत्र आधारित संसदीय राजनीति में अब तक निर्बाध जारी रहे कुप्रथाओं, कुरीतियों, कुप्रचारों, कुविचारों, कुतर्कों आदि को विशेषकर ‘युवा भारत (यंग इंडिया) ने नकार दिया है। देश की युवा-आबादी अपने हक़-हकूक पर दूसरे की दखल और पाबंदी को परे धकेल स्वयं इस दिशा में आगे बढ़ रही है। लिहाजतन, कुल, घराना, वंश, खानदान आदि चोचलों और रिवाजों को इस उत्तर शती में भारी चुनौती मिल रही है। समानता, स्वतन्त्रता और न्याय की पाठ पढ़ी यह नई पीढ़ी है जो गरीबी, लाचारी, बेबसी,अभाव आदि में घुट-घुटकर जीने और कुछ न कहने की पुरानवादियों के संस्कार को तोड़ रही है। नई पीढ़ी अधीर और जल्दबाज नहीं है। वह अमीरी में पले-बढ़े लाडलों की तरह अति-महत्त्वाकांक्षी भी नहीं है। वह सच के लिए सचमुच लड़ने-भिड़ने का मादा रखने वाली पीढ़ी है। वह योग्य और काबिल है, इसलिए वह हाशिए पर रहने को तैयार नहीं है। वस्तुतः यह युवा पीढ़ी विवेकसम्मत तरीके से अपनी मानसिकता, जागरूकता, हस्तक्षेप, विरोध, एकजुटता आदि को प्रदर्शित करना चाहती है। वह यह बात भली-भाँति जान चुकी है कि राष्ट्र के समक्ष असली समस्या राजनीतिक-वृत्ति में आया गिरावट और उनके नैतिक-बोध में हुआ विघटन है। राजनीतिक दलों में छाया ‘वीआईपीवाद’ भी एक प्रमुख कारण है जिसने उनको धनलोलुप और भ्रष्ट-व्यक्ति बनाया है। ज़मीनी सहयोग-समर्थन नहीं होने के कारण वर्तमान राजनीति मिट्टी का वह लोंदा है जिसकी उर्वरा-शक्ति गायब है। ऐसी राजनीति का निहितार्थ जन-कल्याण और राष्ट्रहित का न होकर स्वयं का स्वार्थपूर्ति करना मात्र है। यह बात काफी पहले से उठती रही है कि राजनीतिक दलों में ‘वन मैन शो’ का चलन किसी व्यक्ति-विशेष के पहल, प्रभाव और परिचय को मान्यता देना है न कि सत्ता का विकेन्द्रीकरण या कि अधिकारों का जनतांत्रिकरण करना है।

स्पष्टतया संचार और भाषा से जुड़ी नव-आर्थिक अंतःसम्बन्ध इन सबके मूल में है। यह और बात है, अब समय पलटा है। अयोग्यता को वे काबिल लोग सीधी चुनौती देने लगे हैं, जो केन्द्र से बाहर थे, हाशिए पर थे या कि बाहैसियत अनुपस्थित थे। परिवर्तन के इस ज्वार से ऐसी हड़कम्प मची है कि आरक्षण को भला-बुरा कहने वालों की फौज बढ़ती जा रही है। आजकल सरकारी नौकरियों विशेषकर ‘क्लास वन’ की नौकरियों में नियुक्तियाँ धांधलीपूर्वक की जाती है। इस क्षेत्र में महारती और घोर जातिवादी लोग आरक्षण पर अपना बल कूटने के लिए अधिकतम योग्य को बाहर का रास्ता दिखाते हैं, वहीं न्यूनतम योग्य उम्मीदवार को नौकरी देने की प्रस्तावना रखते हैं। उसे अपना आजीवन कृपापात्र बने रहने के लिए मजबूर करते हैं। यह सांकेतिक षड़यंत्र है जिसके प्रतीकों, संकेतार्थों, अभिव्यंजनाओं को पढ़ने-जानने के लिए भाषा और संचार के नए विधान खोजने होंगे; मनोभाषिकी में घुसे बहु-तमाशी अभिनयों बहु-व्यापी ठिकानों को जाँचना-परखना होगा। टीवी शो की रियलिटी को हक़ीकत मानने की बजाय अपने चेहरे को पढ़ना जरूरी हो चला है। फेसबुक-व्हाट्स-अप आदि की दुनिया से युवा विरत भले न हो लेकिन इसे अपने लिए विद्रोह-मंच मान बैठना भयंकर भूल होगी। बीसवीं सदी के आखिरी दशक तक का भारत कुछ और था, लेकिन आज कुछ और है। अपने गैजेट्स में नधाये तथाकथित उत्तर-आधुनिक युवा की बात छोड़ दें, तो आधुनिक ज्ञान-मीमांसा आधारित संकल्पनाएँ ज्ञानोदय का सर्वसमावेशी तथा सार्वभौमिक मंच तैयार करने में जुटी हैं। लोकवृत (पब्लिक स्फियर) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। समाजविज्ञानियों के अनुसार, समाजशास्त्र में नागरिक समाज के एक ऐसे दायरे की चर्चा भी है जिसमें संस्कृति और समुदाय की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ अन्योन्यक्रिया करती हैं। साथ ही, सार्वजनिक दायरे की गतिविधियाँ किसी मुद्दे पर आम राय बनाने और उसके जरिए राज्य-तंत्र को प्रभावित करने की भूमिका निभाती हैं। सार्वजनिक दायरा सबके लिए खुला रहता है जिसमें अपने विमर्श के जरिए कोई भी हस्तक्षेप कर सकता है। फ्रैंकफुर्त स्कूल के विख्यात विचारक युरगन हैबरमास ने इस धारणा का प्रतिपादन किया था; जिसका भारत की हिन्दीपट्टी तक दृढ़ विस्तार हुआ है। इस बाबत फ्रांचिस्का आॅरसेनी लिखित पुस्तक ‘हिन्दी का लोकवृत्त’ द्रष्टव्य है।

अतएव, संचार के बदलते सामाजिक-दायरे और उसमें प्रचलित भाषा के बोल-बच्चन को सावधानीपूर्वक समझने की जरूरत है। राजनीति ही नहीं अपनी पीढ़ी को भी इस बात का यथोचित ख़्याल रखना होगा। युवाओं को आज न कल यह समझना ही होगा कि नई पीढ़ी जिसके बारे में कहे-सुने अधिक जाते हैं पर किया-धरा सबसे कम जाता है; को एकजुट होने की आवश्यकता आन पड़ी है। उसके पास एक ही विकल्प है, वह अपने लिए लड़े किन्तु सबको साथ लेकर लड़े। वह दुनिया बदल जाने की कामना ही न करे अपितु दुनिया को बदलने के लिए औजार (टुल्स) भी खोजे। अपना नेता और नेतृत्व की तलाश करने वाले ऐसे युवाओं को चे-ग्वेरा के पोस्टर और भगत सिंह के साफ़े की जरूरत नहीं है। बस उसे यह याद रहे कि वह चाहे जिनसे भी बोले, जब भी बोले; जिस माध्यम से भी बोले, जो भी बोले, जिस भी भाषा में बोले, उसे उस भाषा के शब्दार्थ और संचार-शक्ति से वाक़िफ रहकर ही बोलना होगा। अन्यथा हमारे कहन और प्रस्तुति का मजाक बन जाना तय है। दरअसल, संचार-माध्यमों की अतिशय गति और तीव्रता ने भाषा के समक्ष सम्प्रेषण के जबर्दस्त संकट पैदा कर दिए हैं। प्रतिरोध को पैदा करने वाली शक्तियाँ भी भाषा में प्रकट हैं, तो उन्हें मटियामेट करने वाली ताकतें भी उसी भाषा में लड़ने-भिड़ने को तैयार बैठी हैं। ‘अप्प दीपो भवः’ की इस धरती पर युवा होने के नाते यह महती जिम्मेदारी हमारी है, हम सबकी है।

-राजीव रंजन प्रसाद

सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग

राजीव गाँधी विश्वविद्यालय

अरुणाचल प्रदेश-791 112

rrprgu@gmail.com

9436848281

 

मुनादी

कठिन समय में गाँधी

     

     सभ्यता के विकास-क्रम में आज मनुष्य जिस चौतरफा संकट से घिरा हुआ है, ऐसा इसके पहले कभी नहीं था। बाजारोन्मुख उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य की मानसिकता को भोग-विलास की भावना से जिस कदर भर दिया है कि सादगी और सहजता मनुष्य के दुर्लभ गुण हो गये हैं। कानून सम्मत एक सचेत नागरिक लोकतन्त्र की मजबूत नींव और जीवन्त इकाई है। बाजार की बर्बरता ने सबसे पहले इसी जीवन्त इकाई को निष्प्राण कर दिया है। उसने अपने मायाजाल में मनुष्य को इस तरह से फांस लिया है कि मनुष्य को मुक्ति का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।

चमक-दमक और शोर-शराबे वाले विज्ञापनों ने झूठ को सच की तरह पेश किया है और सच की जगह हाशिये पर भी सुरक्षित नहीं रह गयी है, बल्कि सच को परिदृश्य से ही बाहर कर देने की कार्रवाई जारी है। यह सर्वनाशी संस्कृति मौजूदा समय को ग्रसे हुए है। कला, साहित्य, संस्कृतिकर्म और राजनीति इस अवैध और अन्यायपूर्ण सांस्कृतिक आक्रमण के सामने लगभग बेवश है। कहने के लिए हम एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं लेकिन लोकतन्त्र के चारों खम्भे (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया) खास्ताहाल हो चुके हैं। लोकतन्त्र से लोक विलोपित हो गया है और तन्त्र का उसपर वर्चस्व है। ऐसे में लोकतन्त्र का भविष्य अन्धकारमय लगता है।

          इस अँधेरे के खिलाफ जब भी हम कोई रचनात्मक पहल करेंगे गाँधी ही हमारे साथ होंगे। क्योंकि जीवन और जनतन्त्र को देखने का गाँधी का नजरिया इस अर्थ में औरों से अलग है कि उन्होंने अपने विचारों को जारी करने से पहले उसको जिया है। सत्य, अहिंसा, समता और सादगी के बारे में गाँधी ने कोई नयी बात नहीं की है, मोहनदास करमचन्द गाँधी के जन्म के पहले सदियों से हर युग में सत्य और अहिंसा की प्रतिष्ठा रही है। सत्य के नाम पर तो एक युग का ही नाम रखा गया ‘सतयुग’।

गाँधी ने नया और नायाब काम यह किया कि सत्य और अहिंसा के साथ उन्होंने निजी और सार्वजनिक जीवन में अद्भुत और अभूतपूर्व प्रयोग किया। सत्याग्रह, उपवास, असहयोग आन्दोलन और सिविल नाफरमानी के माध्यम से ही गाँधी ने अँग्रेजों से भारत की आजादी को सम्भव बनाया। इसलिए गाँधी महात्मा और राष्ट्रपिता बने। जीवन और जगत से जुड़ा शायद ही ऐसा कोई मुद्दा होगा जिस पर गाँधी ने विचार नहीं किया हो। ग्रामस्वराज, पंचायती राज, पर्यावरण, उद्योग, ऊर्जा, साम्प्रदायिक सदभाव, शासन और सरकार पर उनकी दृष्टि बिल्कुल स्पष्ट है। अहिंसा, सत्याग्रह और स्वराज गाँधी के तीन ऐसे सांस्कृतिक उपकरण थे जिसनेे न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर के लोगों को अपने अधिकार और अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

        गाँधी का जन्म किसी गरीब, किसान या मजदूर परिवार में नहीं हुआ था, वे गुजरात के काठियावाड़ की एक रियासत के दीवान करमचन्द के बेटे थे। इसलिये बैरिस्टर बनने के लिए उनका ब्रिटेन जाना सम्भव हो सका। सम्पन्न और समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद वे शोषितों-पीडि़तों के पैरोकार बने यह उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी। दक्षिण अफ्रीका जाकर ही गाँधी ने अच्छी तरह से यह समझा कि गुलामी का दंश क्या होता है? नस्लीय भेद भाव की अपमानजनक स्थिति ने भी उन्हें संघर्ष के लिए मजबूर कर दिया। रंगभेद के खिलाफ उन्होंने जो संघर्ष शुरू किया उसका विश्वव्यापी असर हुआ। गाँधी ने अपने राजनीतिक जीवन का शुरुआती प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में ही कर लिया था, और वहाँ की सफलता ने उन्हें अहिंसा, सत्याग्रह और स्वराज के प्रयोग को भारत में कारगर तरीके से दोहराने के लिए बड़ा आत्मबल दिया।

        गाँधी चाहते थे कि भारत की आजादी के बाद काँग्रेस पार्टी अपने को संसदीय राजनीति से अलग कर ले और रचनात्मक सामाजिक कार्यों में ही लीन रहे। लेकिन सत्ता के भूखे नेताओं को गाँधी की यह बात रास नहीं आई। गाँधी की हत्या (1948) के बाद तो गाँधी के विचारों की भी खुले आम उपेक्षा होने लगी। आजादी के 70 वर्षों बाद कृषि प्रधान देश में यदि खेती की ऐसी दुर्दशा है कि किसान आत्महत्या के लिए मजबूर है तो यह विश्वास किसी को कैसे हो सकता है कि देश गाँधी के बताए रास्तों पर चल रहा है। इन दिनों खेल के मैदान में लड़कियों (चीयर्स गर्ल्स) के उत्तेजक नृत्य का नया चलन प्रारम्भ हुआ है। बहुत दिन नहीं हुए जब चीयर्स गर्ल्स के एक समूह से कुछ लड़कियों को सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया कि वे गोरी नहीं थीं। एक तो अपसंस्कृति का अत्यन्त ही अश्लील नमूना और उस पर गोरे और काले का अमानवीय भेदभाव यह निश्चित रूप से एक निम्न कोटि की सांस्कृतिक निर्ममता को ही दर्शाता है।

अभी भी रूप-सौन्दर्य के निर्धारण में गोरे रंग को महत्त्व देने की मानसिकता से समाज मुक्त नहीं हुआ है। इन सांस्कृतिक विसंगतियों पर गाँधी क्या सोच रहे होंगे? यही न कि रंगभेद के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने जो लड़ाई शुरू की थी वह उनके ही देश भारत में अभी तक अधूरी पड़ी हुई है। इतना ही नहीं देश की शिक्षा, संस्कृति, चिकित्सा, कृषि, पर्यावरण, उद्योग और ऊर्जा नीति से भी वे निराश और हताश ही हो रहे होंगे। आवारा पूंजी ने विकास का ऐसा अराजक ढाँचा तैयार किया है जिसमें सिर्फ मनुष्य नहीं, तमाम जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, जड़ी-बूटी, जल, जमीन, जंगल, पहाड़ सभी नाश के कगार पर हैं। यदि सभ्यता को पूरी तरह नष्ट होने से हमें बचाना है तो गाँधी के तस्वीरों को सिर्फ सिक्कों और दफ्तरों में टाँगने से काम नहीं चलेगा, उनके विचारों का सिक्का भी हमें चलाना होगा।

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मुनादी

व्यापक सांस्कृतिक आन्दोलन की जरूरत

 

आज के समय में साहित्य के सामने जो संकट है वह इस रूप में इसके पहले कभी नहीं था। दुर्भाग्यवश हिन्दी समाज और हिन्दी साहित्य का संकट बाकी भारतीय भाषाओं की तुलना में थोड़ा ज्यादा है। मौजूदा समय की यह दुःखद सच्चाई है कि हिन्दी समाज का हिन्दी साहित्य से रिश्ता जीवन्त नहीं रह गया है। हिन्दी के अधिकांश पाठक वही हैं जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर लेखन से वास्ता रहा है। व्यापक हिन्दी समाज का हिन्दी के लेखकों और रचनाकारों से यह विराग हिन्दी जगत में एक तरह की सांस्कृतिक शून्यता रच रहा है। अपसंस्कृति के शोर ने रचनात्मक और विचार सम्पन्न संस्कृतिकर्म को हाशिये पर धकेल दिया है।

सच्चे संस्कृतिकर्मी सहमे हुए हैं और पूरे क्षेत्र में एक उदास चुप्पी छाई हुई है। यही वजह है कि हिन्दी समाज, साहित्य और संस्कृतिकर्म के सकारात्मक प्रभाव से प्रायः वंचित है। सांस्कृतिक तौर पर अकाल पीड़ित लगभग सम्पूर्ण हिन्दी इलाका धार्मिक पाखण्ड, साम्प्रदायिक हिंसा, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों का अड्डा बना हुआ है। इसलिए यह अकारण नहीं कि बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने की दुर्घटना हो या आरक्षण आन्दोलन की हिंसा, बर्बर बलात्कार के बाद निर्भया की हत्या हो या बलात्कारी बाबा के अनुयायियों का घनघोर ताण्डव- ये परिघटनाएँ ही हिन्दी इलाके के चेहरे बन गए हैं।

जिस हिन्दी पट्टी में 1857 का सिपाही विद्रोह, महात्मा गाँधी का चम्पारण आन्दोलन, स्वामी सहजानन्द सरस्वती का किसान आन्दोलन और 1974 का बिहार आन्दोलन हुआ हो वहाँ संस्कृति का सूखा हो यह बात हजम नहीं होती। यहाँ तो सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक रूप से वह सक्रियता होनी चाहिए थी जो पूरे देश को आन्दोलित करे।

यह सच है कि हिन्दी में नवजागरण अपेक्षाकृत थोड़ी देर से आया, इसलिए यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारे यहाँ थोड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक पिछड़ापन है। 19वीं सदी की शुरुआत में राजा राम मोहन रॉय विधवा विवाह का समर्थन और बाल विवाह एवं सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध कर रहे थे और 21वीं सदी के मुहाने पर हिन्दी के प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी सती प्रथा का समर्थन कर रहे थे तो इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि सामाजिक सोच में हिन्दी का यह पिछड़ापन है या हिन्दुत्व की कट्टरता का हिन्दी पर प्रभाव?

जिस हिन्दी समाज से मलिक मुहम्मद जायसी, कबीर, रहीम, सूरदास और तुलसीदास जैसे रचनाकार हुए वह हिन्दी यदि आज लोक की भाषा नहीं बन पाई है तो कसूर किनका है? मराठी, बांग्ला या दक्षिण की भाषाओं के साहित्यकारों का उनके पाठकों के साथ सहोदराना और जीवन्त सम्बन्ध है, इसलिए समाज में उनका जो सम्मान है वह हिन्दी के साहित्यकारों का नहीं है। पश्चिम बंगाल के नेता और नौकरशाह वहाँ के सांस्कृतिक आयोजनों में आम आदमी की तरह सरीक होते हैं। बिहार-उत्तर प्रदेश के सांसदों और विधायकों की तो छोडि़ए मुखिया भी कारों के काफिले के बगैर नहीं चलता। अपने अनुयायियों और अनुचरों के बीच वह प्रायः महाराजा की तरह ऐंठा और अकड़ा (इतिहास में कुछ राजा कभी विनम्र भी हुए होंगे) रहता है।

वैभव का अश्लील प्रदर्शन हिन्दी इलाके में समारोह पूर्वक जिस बेशरमी से होता है, वैसा अन्यत्र कम होता है। दिखावे की भूख रोटी की भूख से ज्यादा खतरनाक होती है। इसलिए इस दिखावे की भूख को मिटाने के लिए अनाप-शनाप तरीके से पैसे जुटाने होते हैं। भ्रष्टाचार और काले धन की कमाई की शुरूआत यहीं से होती है। हिन्दी पट्टी के साहित्यकारों (गिनती के कुछ अपवादों को छोड़कर) में प्रदर्शनप्रियता और पुरस्कार प्राप्ति की आतुर आकांक्षा ने भी उन्हें पाठकोन्मुख नहीं रहने दिया है। उनकी कथनी (लेखनी) और करनी का फर्क लगातार बढ़ता रहा है और उनके विचार एवं व्यक्तित्व के बीच का अन्तर्द्वन्द्व पाठकों के बीच उजागर होते रहे हैं। ऐसे में पाठक उनको ‘इंटरटेनर’ मानता है अपना सांस्कृतिक नायक नहीं। इसलिए दक्षिण और पूरब के राज्यों में या पश्चिम बंगाल में कई प्रतिष्ठित साहित्यकार राजनीति में सक्रिय मिल जाएँगे, मुख्यमन्त्री का पद भी वे वे बखूबी सम्हालते मिलेंगे_ लेकिन हिन्दी पट्टी के साहित्यकारों की राजनीति ज्यादा से ज्यादा लेखक संगठनों तक ही सीमित रहती है।

एक समय था जब जवाहर लाल नेहरू और राम मनोहर लोहिया जैसे लोग राजनीति में सक्रिय थे, तब के साहित्य पर उनकी राजनीति का प्रभाव स्पष्ट दिख जाता था। उनके विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है लेकिन उनके महत्त्व को खारिज करना मुश्किल है। साहित्य के कई अध्येता और शोधार्थी मिल जाएँगे जिन्होंने इन विषयों पर शोध किया होगा, क्या आज की हिन्दी पट्टी की राजनीति में कोई ऐसा व्यक्ति मिल सकता है जिसके आचरण और विचार का प्रभाव साहित्य पर हो? निःसंदेह नहीं।

यदि राजनीति अपनी जिम्मेवारी से विमुख हो गयी है तो क्या साहित्य को भी चुप रहना चाहिए? हिन्दी पट्टी में व्याप्त सांस्कृतिक संकट के खिलाफ क्या साहित्य का एक संयुक्त मोर्चा नहीं बन सकता? सभी लेखक संगठन मिलकर एक कार्यक्रम तय करे और हिन्दी पट्टी के दसों राज्यों के सांसदों और विधायकों से संवाद करे कि हिन्दी पट्टी में जातिवाद को समाप्त करने के लिए सांस्कृतिक आन्दोलन की रूपरेखा क्या हो सकती है और इस आन्दोलन में आपकी भूमिका क्या होगी? बाद में सांसद और विधायक इस संवाद को पंचायत और जिला स्तर के जन प्रतिनिधियों तक भी फैलाकर एक व्यापक विमर्श की परियोजना बना सकते हैं जिसमें संस्कृतिकर्म और पढ़ने की संस्कृति और लेखक-पाठक सम्बन्ध पर भी विचार हो सकता है। पढ़ने में यह सुझाव मासूम कल्पना की तरह लग सकता है लेकिन क्या ठिकाना किसी को एक सांस्कृतिक आन्दोलन का बीज इसमें दिखाई पड़ जाए।

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