अंतरराष्ट्रीय

क्‍यूबा में नेतृत्व परिवर्तन

 

क्‍यूबा के बारे में जानने की मेरी उत्सुकता बहुत पुरानी है। जब मैं इंजीनियरिंग का छात्र था और स्टूडेंट फेडरेशन में शामिल हुआ था तब दिल्ली में मावलंकर हॉल में एक एजुकेशनल कांफ्रेंस हुई थी। उस कांफ्रेंस के बाद बहुत से छात्र चे गुयिवारा और फिदेल कास्त्रो के बारे में कुछ उसी क्रान्तिकारी रूमान के साथ बतिया रहे थे जैसे कि हम भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद या रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियों के बारे में बात कर रहे हों। तो चे और फिदेल हमारे आदर्श बने। उनके बारे में और अधिक जानने की उत्सुकता बढ़ी। तो कुछ किताबें छानीं।

लेकिन तब क्‍यूबा जाने की बात सोचना शेखचिल्ली के सपने से ज्यादा कुछ न होता इसलिए सोचा ही नहीं गया। हिन्दुस्तान में ही कश्मीर, शिमला और अंडमान देखना न पूरे होने वाले सपनों की तरह थे। फिर क्‍यूबा का तो इतिहास-भूगोल ही कुछ पता नहीं था। बहरहाल एक लम्बे अंतराल के बाद ही ये सभी जगहें देखने की इच्छा पूरी हो सकी। जनवरी 2019 में क्‍यूबा जाने का सपना भी साकार हुआ। क्‍यूबा पहुँच कर वहाँ का सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना समझने की कोशिश चलती रही तो वहाँ की राजनीति के बारे में जानने-समझने की इच्छा भी प्रबल रही।

लेकिन भाषा की समस्या बहुत आड़े आ रही थी। दुभाषिया महंगा सौदा था अतः गाईड और कैब ड्राईवर से काम चलाया। फिर जो अंग्रेजी बोलता दिख जाता दो चार बातें उससे हो जातीं। हवाना में केपिटल बिल्डिंग के सामने पहुँच कर मैने गाईड से पूछा कि अभी पॉलिटिकल सिचुएशन कैसी है? राऊल के बाद जो नये प्रेसीडेंट मिगेल डायस कानेल आए हैं उनका क्या हाल है? तो गाईड ने जवाब दिया कि बूढ़े लोगों का वही पुराना घिसा पिटा सोच होता है। राऊल कास्त्रो बहुत बूढ़े हो चुके हैं वो कुछ नया नहीं कर सकते। कुछ नया करने के लिए ऊर्जा चाहिए, क्रिएटिव मस्तिष्क चाहिए। कानेल युवा हैं उनमें एक नयी सोच भी है और एनर्जी भी है। तब मैने पूछा कि कम्युनिस्ट पार्टी पर अधिकार तो राऊल का ही है। वही फर्स्ट सेक्रेटरी यानि महासचिव हैं। गाईड बोला वो ठीक है पर चूंकि कानेल उन्हीं की मर्जी से प्रेसीडेंट बने हैं तो वह दखल नहीं देंगे। और उन्होंने 2021 में महासचिव का पद छोड़ने की बात भी कही है। इससे ज्यादा बात नहीं हो सकी।

बाद में मुझे पता चला कि राऊल ही कानेल के मेंटर (मार्गदर्शक) हैं और वे वाईस प्रेसीडेंट से प्रेसीडेंट उनकी मर्जी से ही बने हैं। राऊल ने उनके लिए ही प्रेसीडेंट का पद छोड़ दिया है। अब 19 अप्रैल को कानेल राष्ट्रपति के साथ-साथ क्‍यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया यानि फर्स्ट सेक्रेटरी भी बन गये। जैसाकि विगत में फिदेल कास्त्रो और राऊल कास्त्रो थे। यह क्‍यूबन कम्युनिस्ट पार्टी का शीर्ष स्थान है। कानेल से क्‍यूबा के लोगों की अलग अपेक्षाएं हैं। पहली अपेक्षा बेरोजगारी कम करना, आर्थिक सुधार और सामाजिक सुरक्षा तथा संतुलन बनाए रखने की है।कोरोना वायरस का संक्रमण 195 देशों में फैल चुका है. संक्रमित मामलों की संख्या पौने चार लाख के आस पास पहुंच रही है.

लेकिन पिछले वर्ष में कोरोना के चलते बाकी दुनिया की तरह वहाँ की आर्थिक स्थिति को भी बड़ा झटका लगा है। अर्थव्यवस्था में 11 प्रतिशत की गिरावट हुई है। यह इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि क्‍यूबा एक गरीब देश है। और अमेरिका तथा यूरोपियन यूनियन के प्रतिबंध यथावत हैं। ऐसी स्थिति में क्‍यूबा में स्थिरता और शांति बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। अमेरिका समर्थक असंतुष्ट भी काफी हैं। देखना यह है कि इस चुनौती से कानेल किस तरह निपटते हैं। क्या वह वर्तमान नीतियों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन करेंगे?

अपने पूर्ववर्ती शीर्ष नेताओं की आर्थिक नीतियों और विदेश नीति में आगे सुविचारित सुधारात्मक कदम उठाएंगे, यह सावधानी रखते हुए कि देश का सामाजिक ढ़ाचा भी न गड़बड़ाए। अमेरिका से। बिना दवाब झेले कूटनीतिक सम्बन्ध कैसे बेहतर हों यह भी बहुत कठिन काम है। अब कानेल की भविष्य नीति और दक्षता का पूर्वानुमान दो बातों से लगाया जा सकता है। पहला यह कि विगत वर्षों में कानेल की कार्यप्रणाली क्या रही है। और क्‍यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी तथा सरकार में उनकी भूमिका और प्रशिक्षण कैसा रहा है। कानेल के कैरियर की अगर बात की जाए तो 1982 में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की। उसके बाद तीन वर्षों तक क्‍यूबा की सेना में सेवाएं दीं जो कि हर क्यूबाई युवा के लिए आवश्यक है। कुछ और जिम्मेदारियाँ संभालते हुए 1993 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने।

यह वह समय था जब सोवियत संघ का विघटन हो चुका था। वहाँ साम्यवादी व्यवस्था खत्म हो चुकी थी। सोवियत संघ से मिलने वाली सहायता और सब्सिडी बंद हो गयी थी। पेट्रोल, खाद्यान्न और दवाईयों की भारी कमी थी। यह समय क्यूबा के लिए बहुत परेशानी का समय था। इसे ‘स्पेशल पीरियड इन पीस टाईम’ कहा गया। तब वेनेजुएला ने तेल दिया और बोलीविया ने सहयोग किया। ह्यूगो शावेज फिदेल के बहुत निकट थे। इस समय पर्यटन पर फिर जोर दिया गया। इस कठिन समय में कानेल की कार्यक्षमता के दम पर 2003 में उन्हें पोलित ब्यूरो का सदस्य बनने का अवसर मिला। यहाँ से उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ गयीं, साथ ही चुनौतियाँ और कार्यनिष्पादन की अपेक्षाएं भी।

2006 में फिदेल कास्त्रो गंभीर रूप से बीमार हो गये और सार्वजनिक जीवन से अलग हो गये। तब राऊल कास्त्रो कार्यकारी राष्ट्राध्यक्ष नियुक्त हुए। 2008 में फिदेल कास्त्रो ने त्यागपत्र दे दिया और राऊल कास्त्रो क्‍यूबा के राष्ट्रपति और क्‍यूबन कम्युनिस्ट पार्टी के फर्स्ट सेक्रेटरी बन गये। राऊल कास्त्रो के साथ कानेल की अच्‍छी समझदारी थी। 2008 से ही क्‍यूबा में कृषि सुधार लागू हुए। एक वर्ष बाद ही 2009 में कानेल को उच्च शिक्षा का मंत्री तथा प्रारंभिक उपराष्ट्रपति बना दिया गया। 2010 से कुछ और सुधार शुरू हुए। नागरिकों को छोटे निजी व्यवसाय की छूट दी गयी। 2011 में क्‍यूबा के नागरिकों को व्यक्तिगत तौर पर घर खरीदने-बेचने का संवैधानिक अधिकार दे दिया गया।

अगस्त 2012 में क्यूबन एनर्जी नामक सार्वजनिक कंपनी ने पहला सोलर संयंत्र स्थापित किया। यह कंपनी क्यूबन सोलर ग्रुप की सदस्य थी। 2013 में दस और सोलर प्लांट लगाए गये। जिनसे अनेक भागों में विद्युत आपूर्ति संभव हो सकी। इसी वर्ष कानेल को फर्स्ट वाईस प्रेसीडेंट चुना गया। क्‍यूबा पर तमाम आर्थिक पाबंदियों के चलते वहाँ बड़ा आर्थिक संकट था। समुद्री तूफानों के कारण भी परेशानियाँ बढ़ गयी थीं। आय के स्रोत सीमित थे। शकर, तंबाकू, सिगार, मछली, कॉफी, चावल, आलू और पशुओं के निर्यात पर अर्थव्यवस्था टिकी हुई थी। पर्यटन कम हो गया था। ऐसे में क्‍यूबा के सामाजिक ढांचे को छिन्नभिन्न होने से बचाना और अमेरिका समर्थक असंतुष्टों से निपटना बहुत कठिन कार्य था।

राऊल कास्त्रो

राऊल कास्त्रो क्‍यूबा की आजादी के लिए सशस्त्र विद्रोह तथा अमेरिकी साजिशों निपटने तथा क्‍यूबा के लोगों को बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति, उनकी हौसला अफजाई तथा तथा असंतुष्टों से निपटने के कौशल में फिदेल कास्त्रो के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे थे। अब उन्हें एक समर्थ उत्तराधिकारी की तलाश थी। जिसे उन्होंने कानेल के रूप में पहचाना और विकसित किया। ऐक बात यह थी कि कानेल ने न तो क्‍यूबा की मुक्ति की लड़ाई देखी थी न लगातार युद्ध और भयानक साजिशों से निपटने का उनका अनुभव था पर नीति निर्धारण और उनके कार्यान्वयन में वे पारंगत थे। इसीलिए राऊल कास्त्रो के विश्वासपात्र थे।

इसका सुफल यह मिला कि 2018 में वह क्‍यूबा की राज्य समिति के अध्यक्ष नामित हुए और 2019 में क्‍यूबा के राष्ट्रपति। इसी वर्ष नया संविधान बना। खाद्य सामग्री की राशनिंग की। राऊल कास्त्रो ने राष्ट्रपति पद छोड़ दिया। अब वे सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी के फर्स्ट सेक्रेटरी थे। जो वहाँ की राजसत्ता में सर्वोच्च स्थान है। 19 अप्रैल 2021 को उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया और मिगेल डायस कानेल को वहाँ की नेशनल असेंबली द्वारा चुने जाने के बाद राष्ट्र की बागडोर सौंप दी। यह करीब-करीब तय था क्योंकि राऊल कास्त्रो ने 2021 में कमान छोड़ने की बात पहले ही बता दी थी।

दुनियाभर ने इसे कास्त्रो परिवार के अंत के रूप में देखा। अब कानेल की भविष्य की क्या नीति होगी इसे उनके कांग्रेस मे दिए गये वक्तव्य के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं। हम अपने विचारों पर दृढ़ हैं। इतिहास (अतीत) को समझते हैं। भविष्य पर विचार किया है। मतलब विचारों पर दृढ़ हैं तो विचारधारा अपरिवर्तित रहेगी। इतिहास से जो समझा है, सबक लिए हैं भविष्य उनके आलोक में समझा जाएगा और हर स्थिति पर विचार करने के बाद ही आगे बढ़ा जाएगा।

दरअसल कानेल एक अनुशासित व्यक्ति हैं, प्रशासनिक दक्षता रखते हैं, अपने देश के साथ-साथ दुनिया की नब्ज भी समझते हैं। उनमें लचीलापन भी है। विगत दो वर्षों में तमाम उद्योगों और सेवा क्षेत्र में निजी भागीदारी को प्रोत्साहन दिया है। पर्यटन और निर्यात को बढ़ाया है। हाल ही में इंटरनेट को सरकारी जकड़ से मुक्त किया है। दक्षिण अमेरिकी और कैरीबियन पड़ोसी देशों से सम्बन्ध सुदृढ़ किये हैं। लेकिन अगर हम अन्य साम्यवादी देशों में अपने उत्तराधिकारियों का इतिहास देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वहाँ बाद के शासक पूंजीवादी उदारीकरण और व्यापार के प्रभाव में फंसते चले गये। एकदलीय शासन बना रहा पर समाजवादी समाज निर्माण का लक्ष्य अधूरा ही रहा।

चीन का उदाहरण सामने है। क्‍यूबा के बाद मैं वियतनाम भी गया। वहाँ भी यह देखा कि व्यापार प्रमुख है। उनके चीन और अमेरिका दोनों से अच्‍छे सम्बन्ध हैं। व्यापारी धनी हैं, जनता खाने कमाने लायक। गरीबी भी कायम है। कानून व्यवस्था बेहतर है। क्‍यूबा के संदर्भ में अभी पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन कानेल की अब तक की कार्यशैली से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह कोई भी जरूरी कदम सावधानी और संतुलन के साथ ही उठाएंगे। लेकिन आर्थिक सुधारों को गति अवश्य देंगे। आखिर उत्तरजीविता उर्फ सर्वाईवल का सवाल तो है ही।

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राजीव दीक्षित
शख्सियत

राजीव दीक्षित : स्वदेशी आन्दोलन के असाधारण प्रवक्ता

 

आजाद भारत के असली सितारे – 58

हमारे देश में स्वदेशी को देशप्रेम से जोड़कर देखने वालों की संख्या बहुत हैं। लोग स्वदेशी कंपनियों के उत्पाद को अपनाना प्रकारान्तर से देश की सेवा के रूप में देखते हैं। उनका तर्क है कि अपने देश की कंपनियों द्वारा अपने ही देश में उत्पादित वस्तुओं का यदि हम इस्तेमाल करेंगे तो उसका मुनाफा अपने ही देश में रहेगा और उससे अपने देश की प्रगति होगी। यह बात आँशिक रूप से ही सही है और इस धारणा के बहाने देश की भोली भाली जनता को गुमराह अधिक किया गया है। गुमराह होने वालों में अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रभक्त और ईमानदार बुद्धिजीवी भी हैं। उन्हीं में से एक हैं राजीव दीक्षित।

राजीव दीक्षित( 30.11.1967—30.11.2010) ने हमारे देश को लूटने वाली हजारों विदेशी कंपनियों के खिलाफ स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत की। देश में स्वदेशी-विदेशी वस्तुओं की विस्तृत सूची तैयार करके स्वदेशी अपनाने का आग्रह किया। 1991 में डंकल प्रस्ताव के खिलाफ घूम- घूम कर जन जाग्रति अभियान चलाया।  कोका कोला और पेप्सी जैसे पेयों के खिलाफ अभियान चलाया और कानूनी कार्यवाही की। पिछली सदी के अन्तिम दशक में राजस्थान के अलवर जिले में केडिया कंपनी के शराब कारखानों को बंद करवाने में भूमिका निभाई। टिहरी बाँध के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष किया और भयंकर लाठीचार्ज में चोटें खाईं। स्वदेशी जनरल स्टोर की एक श्रृंखला खोलने के आंदोलन का समर्थन किया। स्वदेशी आंदोलन और आजादी बचाओ आंदोलन जैसे आंदोलनों की शुरुआत की और बाबा रामदेव के साथ मिलकर उन्होंने भारत स्वाभिमान न्यास की स्थापना की।

दरअसल पूँजी कभी देशी या विदेशी नहीं होती। वह तभी तक देशी होती है जबतक उसके पास विदेश से भी मुनाफा कमाने की क्षमता नहीं होती। पूँजी का सिर्फ एक ही चरित्र होता है मुनाफा कमाना। वह मुनाफा चाहे कहीं से भी मिले। जबतक उसके पास अपने उत्पाद विदेश में भेजने, विदेश में निर्मित करने और विदेश के बाजार में बेचने की क्षमता नहीं होती तभी तक वह अपने देश के बाजार पर निर्भर रहती है, किन्तु उसका उद्देश्य हमेशा विदेशी बाजार तक पाँव पसारना होता है। स्वदेशी का सबसे मुखर आवाज लगाने वाले बाबा रामदेव अब अपने पतंजलि के उत्पाद दुनिया के बहुत से दूसरे देशों में बेंच रहे हैं और खूब मुनाफा कमा रहे हैं।

 दरअसल बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कोई अपना देश नहीं होता। उनका वही देश होता है जहाँ से मुनाफा मिलता है। विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी आदि न जाने कितने स्वदेशी व्यापारी आज अपनी पूँजी के साथ विदेश की धरती पर मौज कर रहे हैं और हमें ठेंगा दिखा रहे हैं। उनके लिए स्वदेश का कोई अर्थ नहीं। जहाँ वे रह रहे हैं वही उनका स्वदेश है। हमारे देश के ग्राहकों से रिलाएंस भी उसी तरह अपने उत्पाद का लाभ लेता है जैसे सैमसंग, जबकि सैमसंग विदेशी कंपनी है।

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने आजादी की लड़ाई के दौरान एक बार कहा था कि हमें ऐसी आजादी नहीं चाहिए जिसमें ‘जॉन’ की जगह ‘गोविन्द’ कुर्सी पर बैठ जायँ। किन्तु हुआ वही जिसकी प्रेमचंद को आशंका थी। गोरी चमड़ी वाले अंग्रेजों की जगह सत्ता काली चमड़ी वाले ‘अंग्रेजों’ के हाथ में आ गई। सच यह है कि सन् 1947 में सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण हुआ था। हमारे देश की आम जनता तब भी शोषित थी और आज भी शोषित है। शोषण चाहे जो भी करे, वह शोषण ही होता है। अंग्रेजों के जमाने में हमारे देश के जमींदार लोग अपने आसामियों का खूब शोषण करते थे तो क्या हम उनके शोषण को इसलिए जायज ठहराएंगे क्योंकि वे जमींदार हमारे देश के निवासी थे ?   

राजीव दीक्षित अत्यंत प्रतिभाशाली राष्ट्रभक्त थे। उनकी वाणी में जादू था। उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत थी। देश की सेवा को ही उन्होंने अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लिया। वे अविवाहित रहे और पूरी तरह देश के प्रति समर्पित। उनकी दृष्टि में स्वदेशी अपनाना ही सच्ची देशसेवा है। बाबा रामदेव द्वारा स्थापित भारत स्वाभिमान न्यास के वे महासचिव थे। वे उस समय हमें छोड़कर चले गए जब वे अपना सर्वोत्तम हमें दे सकते थे।

राजीव दीक्षित का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद की अतरौली तहसील के ‘नाह’ नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम राधेश्याम दीक्षित एवं माँ का नाम मिथिलेश कुमारी था। उन्होंने फिरोजाबाद जिले के पी.डी.जैन इंटर कॉलेज से इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त की और फिर 1984 में के.के.एम. कालेज, जामूई, बिहार से इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार में बी.टेक की डिग्री के लिये दाखिला लिया।  कहा जाता है कि अपनी बी.टेक. की पढ़ाई के दौरान एक शोध पत्र पढ़ने के लिए वे नीदरलैंड गए। वहाँ एम्सटर्डम में उन्हें अपना शोध पत्र पढ़ना था। जब उन्होंने अंग्रेजी में अपना शोध पत्र पढ़ना शुरू किया तो एक डच वैज्ञानिक ने उन्हें रोकते हुए कहा कि, “तुम अपनी मातृभाषा हिन्दी में शोध पत्र क्यों नहीं पढ़ते ?” इसपर राजीव दीक्षित ने जवाब दिया कि, “अगर मैं हिन्दी में पेपर पढ़ूँगा तो यहाँ पर किसी को समझ में नहीं आएगा।” इसपर उस डच वैज्ञानिक ने कहा कि, “हमारे समझने या न समझने की चिन्ता आप क्यों करते हैं ? और आप से पहले आए हुए कई वैज्ञानिकों ने अपनी मातृभाषा में रिसर्च पेपर पढ़ा है जबकि वे भी चाहते तो अंग्रेजी में पढ़ सकते थे। इसके अलावा यहाँ पर भाषा के अनुवाद की सुविधा उपलब्ध है जिससे आपकी बात लोगों तक पहुँच जाएगी।”  

इसके बाद राजीव दीक्षित ने मातृभाषा का महत्व समझा। उन्होंने हिन्दी पर अपनी पकड़ बनानी  शुरू की क्योकि बचपन से अंग्रेजी विद्यालयों में पढ़ने की वजह से उनकी आदत अंग्रेजी भाषा की बनी हुई थी। वहीं पर उन्होंने अन्य देशों के वैज्ञानिकों से उनकी शिक्षा के माध्यम के बारे में प्रश्न किया तो उन्हें पता चला कि उनकी शिक्षा का माध्यम उनकी अपनी मातृभाषाएं हैं। तब राजीव दीक्षित ने सोचा कि अगर दूसरे देश अपनी मातृभाषा में उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं तो भारत में शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से क्यों है?  इसके बाद मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने के वे कट्टर समर्थक हो गए।

लेकिन मातृभूमि की सेवा के जुनून ने उन्हें स्वदेशी आंदोलन के लिए बीच में ही शिक्षा छोड़ने को बाध्य कर दिया। 1991 में उन्होंने आजादी बचाओ आंदोलन शुरू किया। उन्होंने भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों के जीवन से देशप्रेम का पाठ सीखा। बाद में जब उन्होंने महात्मा गाँधी को पढ़ा तो उनसे भी प्रभावित हुए। 

राजीव का मानना था कि भारत का मौजूदा समूचा सिस्टम पश्चिम की नकल है और इसे बदलने की जरूरत है। भारत की शिक्षा पद्धति को मैकाले की देन बताने वाले राजीव दीक्षित के अनुसार शिक्षा के लिए आज भी हमारे यहाँ की पुरानी गुरुकुल प्रणाली ही उत्तम है। उनके अनुसार हमारे यहाँ की न्याय व्यवस्था अंग्रेजों के बनाए हुए कानून की फोटोकॉपी जैसी है, जिसके कई कानून भारतीयों को अपमानित करने वाले हैं और इन्हें बदला जाना चाहिए।  उनका दावा था कि देश का 80% टैक्स रेवेन्यू नेताओं और नौकरशाहों के हिस्से में चला जाता है। उनके अनुसार लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन भारत के सबसे बड़े दुश्मन हैं, जो भारत को आत्मघाती स्थिति में ले जा रहे हैं। राजीव कहते थे कि देश के विचारकों ने खेती के क्षेत्र में पर्याप्त काम नहीं किया, जिसकी वजह से आज किसान खुदकुशी करने को मजबूर हैं।

सन 1999 में राजीव दीक्षित की मुलाक़ात योग गुरु स्वामी रामदेव से हुई। उस समय स्वामी रामदेव योग को देश-विदेश में फ़ैलाने की मुहिम पर थे। स्वामी रामदेव से मुलाकात के बाद उन्होंने भारत को स्वावलम्बी और स्वदेशी बनाने के लिए दस वर्ष तक अथक प्रयास किया। दोनों ने मिलकर 2009 में “भारत स्वाभिमान ट्रस्ट” की स्थापना की। “भारत स्वाभिमान ट्रस्ट” के महासचिव राजीव दीक्षित बनाए गए।  स्वामी रामदेव भी राजीव दीक्षित जी के व्याख्यानों से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने कई व्याख्यान अपने पतंजलि योगपीठ में करवाए ताकि उनकी बात टीवी के माध्यम से पूरे देश की जनता तक पहुँच जाए।

 1 अप्रैल 2009 को भारत स्वाभिमान ट्रस्ट का उद्घाटन हुआ जिसे आस्था टीवी चैनल पर सीधा प्रसारित किया गया था। अब राजीव दीक्षित की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी और देश के करोड़ो लोग उनके व्याख्यान सुनने लगे।  उनके व्याख्यान अत्यंत सरल भाषा में और रोचक होते थे। उन्होंने भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के मंच से तमाम विदेशी कंपनियों द्वारा वर्षों से भारत को लूटने की कहानी का प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया। उन्हें भारत की राजीनीतिक पार्टियों से भी आपत्ति थी और उनपर वे खुलकर प्रहार करते थे। इसी के साथ उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति, देश के सविधान, कानून प्रणाली जैसे मुद्दों की भी आलोचना की और तथ्यों के साथ उनपर प्रहार किए।

वे अपने व्याख्यानों में बताते थे कि अँगरेज़ भारत क्यों आये थे, उन्होंने हमें गुलाम क्यों बनाया, अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता को, हमारी शिक्षा को, उद्योगों को क्यों और किस तरह नष्ट किया ? उन्होंने देश भर में घूम- घूम कर 12000 से अधिक व्याख्यान दिए। उनके व्याख्यान के प्रमुख विषय हैं, ‘मौत का व्यापार’, ‘स्वदेशी से स्वावलंबन’, ‘व्यवस्था परिवर्तन’, ‘भारत के सामाजिक एवं चारित्रिक पतन का षड्यंत्र’, ‘अँग्रेजी भाषा की गुलामी’, ‘अंतराष्ट्रीय संधियो मेँ फँसा भारत’, ‘विष- मुक्त खेती’, ‘ऐतिहासिक भूलें’, ‘भारत का सांस्कृतिक पतन’, ‘विदेशी कंपनियो की लूट एवं स्वदेशी का दर्शन’, ‘भारत का स्वर्णिम अतीत’, ‘संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता’, ‘भारत की विश्व को देन’, ‘मांसाहार से हानियाँ’, ‘संगठन की मर्यादा एवं सिद्धान्त’, ‘गुजरात व्याख्यान’, ‘अर्थव्यवस्था को सुधारने के उपाय’, ‘अर्थव्यवस्था मे मंदी के कारण और निवारण’, ‘भारतीय आजादी का इतिहास’, ‘प्रतिभा पलायन’ आदि।

इस तरह राजीव दीक्षित ने राजनीतिक प्रश्नों के अलावा घरेलू आरोग्य पद्धतियों और स्वदेशी चिकित्सा का भी प्रसार किया जिससे देश के लाखों लोग लाभान्वित हुए। उन्हें  खुलकर बोलना पसंद था और वे किसी नेता से नही डरते थे। वे सदा भारत के नेताओ की असलियत को देश की जनता तक पहुंचाते रहे।

भारत के सोये हुए स्वाभिमान को जगाना तथा भ्रष्टाचार, गरीबी, भूख, अपराध और शोषण मुक्त भारत का निर्माण करना भारत स्वाभिमान ट्रस्ट का उद्देश्य है। इसके लिये अखिल भारतीय स्तर पर एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन खड़ा करना इसकी अनिवार्यता। राजीव दीक्षित ने विदेश से कालेधन की वापसी, स्वदेशी तथा भ्रष्टाचार-मुक्त भारत के लिए जी तोड़ मेहनत की। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट का देश की जनता से आह्वान था कि “हम केवल देशभक्त ईमानदार, बहादुर, दूरदर्शी और कुशल लोगों के लिए ही मतदान करेंगे। हम अपने आप को 100% वोट करने के साथ दूसरों को भी मतदान के लिए प्रेरित करेंगे।“ उसका यह भी लक्ष्य था कि “हम देशभक्त, ईमानदार, जागरूक, संवेदनशील, बुद्धिमान और ईमानदार लोगों को एकजुट करेंगे और राष्ट्र की शक्तियों को एकजुट करने का प्रयास करेंगे। हमें भारत को दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बनाना है।“

भारत में रामराज्य स्थापित करने के पक्के समर्थक राजीव दीक्षित के अनुसार भारत के मेडिकल सिस्टम को आयुर्वेद आधारित किए जाने की जरूरत है, क्योंकि एलोपैथी शरीर को नुकसान पहुँचाती है और इससे पैसा विदेश चला जाता है। उनके अनुसार विदेशी कंपनियों को भारत में व्यवसाय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, देश का पैसा बाहर जाता है, विदेशी कंपनियाँ घटिया माल बनाकर भारतीयों को बेचती हैं और इससे भारत का पश्चिमीकरण हो रहा है।

गाय के गोबर से ईंधन बनाने और गोहत्या पर प्रतिबंध के लिये आजीवन लड़ने वाले राजीव दीक्षित के राष्ट्रवाद की अवधारणा बहुत कुछ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राष्ट्रवाद से मिलती-जुलती है। वे कहते थे कि गाय के गोबर से बने साबुन से नहाने के 10 मिनट बाद शरीर से खुशबू आने लगती है। पुराने समय में राजा यज्ञ से पहले गोबर से नहाते थे और राम को भी ऐसा ही करना पड़ा था। राजीव के मुताबिक यूनीलीवर कंपनी का नाम बदलकर हिंदुस्तान लीवर इसलिए कर दिया गया, ताकि भारतीयों को बेवकूफ बनाया जा सके। नए नाम की वजह से भारतीयों को लगेगा कि ये एक भारतीय कंपनी है और वे इसका सामान खरीदने में हिचकेंगे नहीं। उनका दावा था कि नेस्ले कंपनी के प्रोडक्ट मैगी में सुअर के मांस का रस मिलाया जाता है और उनकी चर्बी का इस्तेमाल होता है। कोका कोला में तेजाब होने की बात भी राजीव कहते थे। 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी पर राजीव दीक्षित का मानना था कि ये कोई हादसा नहीं, बल्कि अमेरिका द्वारा किया गया एक परीक्षण था, जिसमें भारत के गरीब लोगों को शिकार बनाया गया। राजीव लंबे समय तक इस हादसे की जिम्मेदार कंपनी यूनियन कार्बाइड के खिलाफ प्रदर्शन करते रहे। चट्टान से मज़बूत इरादे रखने वाले देश भक्त कर्मयोगी राजीव दीक्षित नें अपने 43 वर्ष के अल्प जीवन में समाजसेवा और लोक-कल्याण कार्यों के द्वारा ऐसी ख्याति प्राप्त की थी जिसे याद कर के आज भी हम गौरवान्वित महसूस करते हैं।

 

स्वामी रामदेव और राजीव दीक्षित दोनो ने काफी दिन तक एक साथ मिलकर काम किया। आस्था और संस्कार जैसे चैनलों पर दोनो एक साथ आते थे, किन्तु कहा जाता है कि बाद में दोनों में विवाद हो गया। 30 नवंबर, 2010 को राजीव दीक्षित की मौत हो गई, जो विवादास्पद है।

नवंबर के आखिरी सप्ताह में राजीव दीक्षित छत्तीसगढ़ दौरे पर थे। 26 से 29 नवंबर तक अलग-अलग जगहों पर व्याख्यान देने के बाद जब वे 30 नवंबर को भिलाई पहुँचे, तो वहाँ उनकी तबीयत खराब हो गई। वहाँ से दुर्ग जाने के दौरान कार में उनकी हालत बहुत खराब हो गई और उन्हें दुर्ग में रोका गया। दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें भिलाई के सरकारी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया और फिर वहाँ से अपोलो बीएसआर हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

राजीव दीक्षित के समर्थकों का दावा है कि मौत के बाद उनका शव नीला पड़ गया था। ऐसा लगता था कि उन्हें जहर दिया गया हो। उनके समर्थकों ने पोस्टमॉर्टम कराए जाने की भी जिद की, लेकिन उनकी नहीं सुनी गई। राजीव का शव हरिद्वार में स्वामी रामदेव के पतंजलि आश्रम ले जाया गया और वहीं उनकी अंत्येष्टि कर दी गई

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पुस्तक-समीक्षा

जेएनयू: हक़ीक़त के आईने में

 

जेएनयू के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ के अध्यापक प्रो. आमिर अली की एक बात वहाँ के शोधार्थी पंकज द्रविड़ ने बताई कि किसी भी किताब के संदर्भ में दो बातें देखी जानी चाहिए- एक उसका टाइटल, और दूसरा उसकी टाइमिंग। इस लिहाज से जेएनयू अनंत, जेएनयू कथा अनंता सही समय पर आई है। यह जेएनयू के बारे में एक ज़िंदा दस्तावेज़ है, आँखों देखा हाल है। जे सुशील ने बड़े प्यार से जेएनयू को जस देखा, तस लेखा है। इसे पढ़ते हुए उनके अनुभवों की सदाक़त महसूस की जा सकती है। बड़ी सहजता और प्रांजलता है इसमें। डॉ. दुष्यन्त ने बड़ी सुंदर भूमिका लिखी है। जेएनयू अपने शिक्षकों और छात्रों द्वारा बनाये गये लोकतांत्रिक ठौर-ठांव-ठिकाने एवं स्वतन्त्र ज्ञान परम्परा के लिए जाना जाता रहा है जिसे सरल-सहज शब्दों के ज़रिये लेखक ने उकेर कर पाठक के सामने रख दिया है। ग़ालिब की मानें, तो

सद जल्वा रूबरू है जो मिज़्गां उठाइए

ताक़त कहाँ कि दीद का अहसां उठाइए।

जेएनयू को लेखक ने फ़क़त रूमानियत के साथ नहीं देखा है, बल्कि परिवार, समाज व दुनिया की कड़वी हक़ीक़त से रूबरू होते हुए अपने भोगे हुए यथार्थ को बरता है। पर इस क्रम में कहीं भी कड़वाहट या अतिशय भावुकता नहीं दिखती है। वो अपने यशस्वी शिक्षकों को बड़ी अक़ीदत से याद करते हुए उनकी शख़्सियत व सलाहियत को धीरे से पाठकों के सामने रख देते हैं। प्रो. अभिजीत पाठक के बारे में जैसा जे सुशील ने लिखा है, भिगो गया। पिछले दिनों प्रो. राकेश बटबयाल व प्रो. मणीन्द्रनाथ ठाकुर से मैंने साझा किया, “जब कभी मैं थोड़ा मायूस होता हूँ, प्रो. पाठक की किताब – द कैऑटिक ऑर्डर और द रिद्म ऑव लाइफ़ एंड डेथ के पन्ने उलट लेता हूँ”। ईपीडब्ल्यू के संपादक सचिन चौधरी के आग्रह पर अर्थशास्त्र की शिक्षक कृष्णा भारद्वाज द्वारा पिएरो सराफ़ा की किताब प्रोडक्शन ऑव कॉमोडिटीज़ बाय मीन्स ऑव कोमोडिटीज़ का तीन साल में रिव्यू करने व प्रकाशित कराने के वाक़ये को जिस तरह से बयां किया गया है, वह बताता है कि कितना श्रमसाध्य काम करने वाले लोग जेएनयू में रहे हैं। प्रभात पटनायक के योगदान, इतिहास के प्रोफेसर नीलाद्रि भट्टाचार्य की मेथडोलॉजी की कक्षा में नामचीन इतिहासकार रोमिला थापर का बैठना, बिपन चंद्रा, आदित्य मुखर्जी, मृदुला मुखर्जी जैसे बेहतरीन शिक्षक व इंसान का होना, पुष्पेश पंत की आत्मीयता, सबऑल्टर्न स्टडीज़ में सुदीप्तो कविराज के योगदान, और कबीर को पढ़ाने वाले पुरुषोत्तम अग्रवाल की सहृदयता का ज़िक़्र इस किताब को मानवीय संवेदना व चेतना से लैस कैम्पस की रिवायत की तर्जुमानी के लिहाज से और समृद्ध व सुंदर बनाता है। एक समय इस कैम्पस में अलग-अलग विषयों के एक साथ कम-से-कम 150 स्टॉलवार्ट हुआ करते थे।

जेएनयू

पाककला की बेहतरीन समझ रखने वाले पुष्पेश पंत संगीत के शौकीन हैं, और मैनोशी के बारे में डायनिंग टेबल पर बात करते हुए कहते हैं, “शराब पीना एक कला है, संगीत सुनना भी। लिखना कला है, आलोचना सबसे बड़ी कला है”। जे ने प्रो. नीलाद्रि द्वारा फ़ूको की पावर व डिस्कोर्स की अवधारणा पर दिये गये व्याख्यान का ज़िक्र करते हुए उनको कुछ यूं उद्धृत किया, “आपको यह सोचना चाहिए कि हमारे आसपास जो विमर्श होता है, वह कौन तय कर रहा है? क्या यह डिस्कोर्स पावरफुल लोग तय कर रहे हैं या जिनके पास ताक़त नहीं है, वे यह बात तय कर रहे हैं”। जे कहते हैं, “यह एक दृष्टि थी, जो बाक़ी चीज़ों को देखने, देख पाने में स्पष्टता ला सकने में सक्षम थी। मनुष्य क्या पढ़ता है, उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि वह कैसे पढ़ता है और पढ़े हुए को समझता कैसे है”। अल्लामा इक़बाल के शब्दों में,

महरूम-ए-तमाशा को वह दीद-ए-बीना दे

देखा है जो कुछ मैंने, औरों को भी दिखला दे।

इस पुस्तक में अलग-अलग ढाबे की अलहदा संस्कृति, नदियों के नाम पर बने हॉस्टल्स के अलबेले-अनोखे क़िस्से और होली के समय कैम्पस के अल्हड़पन व मिठास का जैसा वर्णन है, वह पाठक को बांधे रखने में सक्षम है। इस किताब में करीने से बताया गया है कि जेएनयू आप पर कुछ थोपता नहीं है, बल्कि आप यहाँ सलीक़े से “समता, स्वतन्त्रता व बंधुत्व” के मर्म को सीखते, समझते व आत्मसात करते हैं। गंगा ढाबे की चाय, परांठे और उसके इर्दगिर्द जवान होती बहसों के बारे में बड़ी मीठी शरारत के साथ लिखा गया है। लेखक कहते हैं, “गंगा ढाबा की ख़ासियत यह है कि पिछले बीसियों सालों से वहाँ एक ही तरह की चाय बन रही है। यह चाय न बेहतर हुई है, न ख़राब हुई। गंगा की चाय में नॉस्टैल्जिया है। गंगा के आलू-परांठे मिथकीय परांठे होते हैं। इनमें जो आलू खोज लेता है, वह बुद्धिजीवी घोषित कर दिया जाता है”। ऐसा कुछ ही भागलपुर के टीएनबी कॉलेज, जहाँ बांग्ला के उपन्यासकार शरतचंद्र पढ़ा करते थे; के वेस्ट ब्लॉक हॉस्टल के मेस के बारे में भूषण चौधरी कहा करते, “रामू मेस का खाना खाने के बाद नींद और जगने के बाद कमज़ोरी का आभास होता है”।

यह वही यूनिवर्सिटी है जहाँ के तीसरे वाइस चांसलर के. आर. नारायणन देश के दसवें राष्ट्रपति बने। एक से बढ़ कर एक लोकतांत्रिक मिजाज़ के कुलपति हुए जिनमें से कुछ का ज़िक़्र जे सुशील ने किया है जिनके साथ छात्र टहल सकते थे, मेस बिल नहीं भर पाने की लाचारगी निस्संकोच साझा कर सकते थे। यहाँ की एक ख़ूबसूरत रिवायत है पोस्ट डिनर टॉक आयोजित करने की, जहाँ अलग-अलग विषयों के नामचीन, सिद्धहस्त लोग बतौर वक्ता बुलाये जाते हैं, उन्हें सुन कर लोग अपनी समझ और मालूमात को और दुरुस्त करते हैं, क्योंकि वहाँ मोनोलॉग नहीं, बल्कि डायलॉग का चलन है। और, अलग-अलग राजनैतिक मसलों पर अपने स्टैंड का इज़हार मुख़्तलिफ़ संगठनों के लोग पर्चा-पैम्फ़लेट के ज़रिये करते हैं। और, वे पर्चे इतने अव्वल दर्ज़े के हुआ करते हैं कि कोई चाहे तो उनसे बहुत कुछ सीख सकता है। वोल्तेयर को यहाँ अक्षरश: जीने की कोशिश की जाती है, “I may disagree with everything that you say, but I will defend to the last drop of my blood, your right to say so”।

यह किताब जेएनयू के बारे में कई मिथकों व भ्रांतियों को भी तोड़ती है। मिसाल के तौर पर जहाँ जेएनयू को दीन-हीन-विचाराधीन की यूनिवर्सिटी के रूप में पिछले कुछेक वर्षों से प्रचारित किया गया, वहीं इसमें बताया गया है कि यहाँ महज ग़रीब नहीं पढ़ते, बल्कि ग़रीबों में जो प्रतिभासंपन्न हैं, वे पढ़ते हैं। एक साथ मंत्री, सांसद, राजनयिक, ब्यूरोक्रेट, किरानी, चपरासी, सबके बच्चे पढ़ते हैं। सकारात्मक कार्रवाई के तहत भारत सरकार द्वारा चिह्नित पिछड़े इलाक़े के लोगों को अलग से प्वॉइन्ट्स दिये जाते हैं, लड़कियों को उनकी वंचना के चलते अलग से प्वॉइंट्स दिये जाते हैं, और एक तरह से इस यूनिवर्सिटी का उद्देश्य आपका सेलेक्शन करना होता है, न कि रिजेक्शन।

बहुत से शिक्षकों ने अपने जीवन का एकमात्र ध्येय तय कर रखा है- पढ़ना-पढ़ाना, बच्चों को सामाजिक-राजनैतिक-सांस्कृतिक रूप से चेतनासंपन्न बनाना। डॉ. राधाकृष्णन की इस स्पिरिट के साथ यह कैम्पस ज़िंदा है, “A university is essentially a community of students and teachers। The two have to work together for the single purpose of advancing knowledge and disseminating it। If they’re at any time distracted from this straight path of pursuing truth for its own sake and get led away, there’ll be a jeopardy to the community of the university”।

पर, बीते कुछेक वर्षों में विश्वविद्यालय युगबोध व वैश्विक दृष्टि को विकसित करने के अपने स्वाभाविक काम को अंज़ाम देने में अवरोध महसूस करता रहा। और, तब प्रो. अभिजीत पाठक जैसे लोग दर्द व वेदना के साथ कलम उठाते हैं, और देश को बताते हैं कि विश्वविद्यालयों पर हो रहा क्रूर हमला उतनी ही बुरी ख़बर है, जितनी किसी विदेशी ताक़त द्वारा देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर हमला। देश भर में ढाहे जा रहे विश्वविद्यालयों की दीवारें चीख-चीख कर कह रही हैं कि हमें इन असामाजिक तत्त्वों से बचा लो। ये देश तोड़ने वाले लोग हैं। दुनिया में कहीं भी सरकार बदलती है, वे अपने संस्थानों को बर्बाद नहीं करते, ऑक्सफ़र्ड, कैम्ब्रिज, कैलिफ़ोर्निया, कोलम्बिया, हार्वर्ड, आदि पर किसी भी सरकार की गिद्धदृष्टि नहीं पड़ती। वे समझते हैं कि संस्थान-निर्माण के बगैर राष्ट्र-निर्माण की बात बेमानी है। लेकिन अपने यहाँ शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर कुछ लोग मुल्क की रूह को मसल देना चाहते हैं। ये भगत सिंह-लोहिया के देश को जहालत की ओर ले जाना चाहते हैं। नये विश्वविद्यालय खोले नहीं जा रहे, उल्टे बने-बनाये संस्थानों को तबाह करने पर तुले हैं। जे सुशील कितना सही लिखते हैं, “विज्ञान तथ्य है और सामाजिक विज्ञान मूल्य। विश्वविद्यालयों का शोध मानव जीवन के मूल्य तय करने में मदद करता है। वह बताता है कि तथ्यों को क्यों और कैसे सामाजिक हित में इस्तेमाल किया जाए”।

जेएनयू के विविध रंगों को जे सुशील ने मोहब्बत से छलकाया है। वे लिखते हैं, “दुनिया को समझने के लिए जिन विचारों की ज़रूरत थी, वह यहाँ आने के बाद पता चले। एक पूरा का पूरा वैचारिक इंद्रधनुष था, जिसमें से आपको अपना पसंदीदा रंग चुनने का अधिकार था”। यहाँ भाँति-भाँति के लोग हुए हैं। फक्कड़पन की कोई इंतहा नहीं! गोरख पांडेय की गोरखिया को लोग आज भी चाव से गाते हैं, वहीं रमाशंकर विद्रोही की पंक्तियाँ यहाँ की दीवारों पर देश-दुनिया के बड़े कवियों व दार्शनिकों के साथ नुमायां होती हैं। हिन्दुस्तानी सिनेमा के गीतकार सागर ने एक बार झेलम छात्रावास में कहा कि जब एक बार आप जेएनयू में दाखिल हो जाते हैं, तो फिर किसी बात का रोना नहीं रोया जा सकता। इससे बड़ा और उदार प्लैटफॉर्म देश में कम ही होगा! जेएनयू का क्लासरूम जितना आपको सिखाता है, उतनी ही यहाँ की दीवार पर लिखी इबारतें।

जेएनयू में होने वाले छात्रसंघ चुनावों में भिन्न विचारधारा के प्रति सहिष्णुता के कई उदाहरण इस पुस्तक में पेश किये गये हैं। प्रकाश करात को हराने वाले यशस्वी ओरेटर आनंद कुमार से लेकर अध्यक्ष बने डीपी त्रिपाठी तक, सीताराम येचुरी द्वारा आपाताकाल के बाद इंदिरा गांधी से यूनिवर्सिटी के चांसलर पद से इस्तीफ़ा मांगना, और उनके द्वारा इस्तीफ़ा देना, आदि कई रोचक प्रसंगों का ज़िक्र शाइस्ता लहजे में हुआ है। जे लिखते हैं, “राजनीति एक अच्छी चीज़ है। हम इसे अच्छा या बुरा बनाते हैं। एक छात्र क्या सिर्फ़ नौकरी के लिए पढ़ाई करता है? क्या उसकी ज़िम्मेदारी समाज को बेहतर करने की नहीं है? हम सामाजिक प्राणी हैं, यह तो सब मानते हैं, लेकिन सामाजिक प्राणी होने का अर्थ जागरूक होना भी तो है। यह जागरूकता जेएनयू देता है”। साथ ही, लड़कियों का सिगरेट पीना बुरा होता है, और लड़कों का सिगरेट पीना अच्छा होता है, वे ऐसी समझों से बाहर निकल गये थे। वे लिखते हैं, “जेएनयू में कोई सीनियर नहीं कहता कि दहेज मत लो। वे शादी करते हैं और आप उस शादी में जाएं, जो कोर्ट में हो रही हो या मंदिर में, तो आपको ख़ुद लगता है कि यह एक सही फ़ैसला है”।

यहाँ जीएसकैश (जेंडर सेंसिटाइजेशन कमिटी अगैंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट) नामक एक इलेक्टेड बॉडी हुआ करती थी जिसका चुनाव 2017 तक हुआ था। इसका गठन 1997 में विशाखा बनाम राजस्थान सरकार के सर्वोच्च न्यायालय में आए मामले के बाद 1999 में किया गया। कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइन्स दिये थे। जेएनयू ने एक क़दम आगे बढ़ कर बिना किसी बाध्यता के 1999 में कमिटी गठित कर दिया। जेएनयू में सहमति बड़ा मानीख़ेज़ लफ़्ज़ है। लोहिया के उस स्पिरिट को भरसक जीने की कोशिश रहती है, “वादाख़िलाफ़ी व बलात्कार को छोड़ कर परस्पर सहमति से क़ायम किया गया हर संबंध जायज है”।

पुस्तक में अनेक रोचक वाक़ये का उल्लेख है जिनमें से कुछ का ज़िक्र न किया जाये, तो बात अधूरी रहेगी। एक प्रेमी जोड़ा था, लड़की पटना की, लड़का लखनऊ का। दोनों जगजीत सिंह के गाने सुनते और आशिक़ी की बातें करते। दोनों को देखते तो लगता कि प्रेम तो यही है। लड़की गंगा से बढ़िया खाना नर्मदा लाती और अपने ब्यॉयफ़्रेंड के मित्रों को खिलाती। गर्ल्स हॉस्टल का खाना लड़कों के हॉस्टल की अपेक्षा बेहतर हुआ करता था। सर्द रातों में दोनों डिनर के बाद कंबल लेकर बाहर निकल जाते। सुबह वह क़रीब पांच बजे आता और सो जाता। कई दिन ऐसा देखने के बाद मैंने पूछा, “आप इतनी ठंड में करते क्या हैं बाहर जाकर?” जवाब था, “प्रेम करता हूँ भाई”। मैंने कहा, “कमरे में क्यों नहीं कर लेते? हमलोग बाहर चले जाएंगे”। बंदे ने कहा – “तुम प्रेम करो यार, तब समझ में आएगा। जो मज़ा प्रकृति में है, वह कमरे में कहां!” दोनों जने घंटों पार्थसारथी रॉक्स पर बैठते और चांद को निहारते थे एक ही कंबल में बैठे। मैंने बाद में नोटिस किया कि रात्रिकाल में कंबल लेकर ये दोनों उन पंद्रह दिनों में ग़ायब होते थे, जब चांद की चांदनी चरम पर होती थी। मैंने ज़िक्र किया तो उस लड़के का कहना था, “अब आप प्रेम में पड़ने वाले हो”।

प्रेम आपको मनुष्य बनाता है, संवेदनशील इंसान बनाता है। आप प्रेम में सहज होना सीखते हैं, पहले से बेहतर इंसान होने की यह यात्रा है। प्रेम में इंसान आते हैं, और कई दफे वे जाकर भी नहीं जाते कहीं, होते हैं हमारे भीतर ही कहीं हमारा एक हिस्सा होकर। डॉ. बशीर बद्र इस अहसास की तर्जुमानी कितनी ख़ूबसूरती से करते हैं-

मोहब्बत एक ख़ुशबू है, हमेशा साथ चलती है

कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता।

जे बताते हैं:

एक जोड़ा था। लड़का बिहारी, लड़की उड़ीसा की। ख़ूब प्रेम। साथ में खाना-पीना, उठना-बैठना। दोनों साथ में यूपीएससी की तैयारी करते थे। दोनों ने परीक्षा दी। लड़की का हो गया, लड़का बेचारा रह गया। लड़की चली गई ट्रेनिंग करने मसूरी। न केवल वह ट्रेनिंग करने गई, बल्कि उस लड़के के साथ रिश्ता भी टूट गया। लड़का रह गया जेएनयू में। प्रेम छिन्न-भिन्न हो गया। जेएनयू में मान्यता है कि जो अफ़ेयर एक सेमेस्टर के बाद रह गया, वह शादी में बदलता है। यह अफ़ेयर चार से पाँच सेमेस्टर रहा था, फिर भी इसका छिन्न-भिन्न होना सबका दिल दुखा गया था। कुछ समय बाद लड़का लेक्चरर हो गया, लेकिन मन की ख़लिश रही होगी। उसने फिर दिया यूपीएससी। इस बार सफल हुआ। लड़की को जो कैडर मिला था, उससे बढ़िया लड़के को मिला। लड़की तब तक शादी कर चुकी थी। फिलहाल लड़का भी शादी कर दो बच्चों का बाप हो चुका है। कहने को तो इस कहानी में कुछ भी नहीं है। यह एक सामान्य प्रेम कहानी लगती है, लेकिन जब लड़के का दिल टूटा, तो उसका साथ देने सारे दोस्त आ गये थे। किसी ने यह नहीं कहा कि लड़की की ग़लती है। सबने कोशिश की कि यह बात भुला दी जाए। मित्रताएँ जेएनयू की ऐसी ही होती थीं। दिल टूटा हो, तो शराब का सहारा कोई नहीं लेता। ऐसे में दोस्त आ जाते हैं। कोई दर्शन से, कोई प्रकृति के ज़रिए, तो कोई बातों से मन बहला कर टूटे दिल वाले लोगों को ठीक रास्ते पर ले आता है।

जे एक और शानदार किरदार का ज़िक्र करते हैं, जो बिहार के गया ज़िले का आदित्य है। जापानी भाषा में 8 सीजीपीए लाता है वह। जे ने पूछा, “बहुत पढ़ते हो?” आदित्य इतना सुनकर उनके पास बैठ गया और बोला, “सर, आपको पता नहीं है। मेरा एडमिशन थर्ड लिस्ट में हुआ था, इसलिए हॉस्टल नहीं मिला। जापानी भाषा ही पढ़नी थी। मन लग गया है, तो नंबर आ रहे हैं”। जो एंट्रेंस में टॉपर था, वह जापानी भाषा में फेल हो रहा था। यह भी होता है जेएनयू में। जो प्रवेश परीक्षा में टॉप करता है, ज़रूरी नहीं कि वह अपनी क्लासेज़ में बेहतर ही करे।

लेखक फरमाते हैं, “जेएनयू सबके बस की बात भी नहीं है। यहां रट्टा मार कर पढ़ना संभव नहीं है। अगर आप अपने आस-पास, अपने समाज के विषय में सोच नहीं रहे हैं, तो आपके लिए मुश्किल हो सकती है कि आप पढ़ाई और अपने शोधकार्य में आगे कैसे बढ़ेंगे। अगर आपके जीवन का उद्देश्य पढ़ने के बाद सिर्फ़ नौकरी पाना है, तो जेएनयू आपके लिए नहीं है”। जेएनयू को उकेरते हुए जे सुशील ने कुछ यूं तस्वीर बनाई है:

अगर 615 नंबर की बस देख कर आपको कुछ-कुछ होता है

तो आप जेएनयू के हैं।

अगर एक लड़का-लड़की को प्रेम करते देख कर आप मुस्करा पाते हैं

तो आप जेएनयू के हैं।

अगर बड़ी से बड़ी बहस में भी आप अपना आपा नहीं खोते हैं

तो आप जेएनयू के हैं।

आईने में अपनी दाढ़ी देख कर अगर आपको अच्छा लगता है

तो आप जेएनयू के हैं।

किसी ग़रीब को देख कर मन में हूक-सी उठती है

तो आप जेएनयू के हैं।

अगर अब भी यदा-कदा झोला और किताबें ख़रीद लेते हैं

तो आप जेएनयू के हैं।

अगर लड़कियों के साथ रिश्तों को बहन-बेटी-मां-पत्नी से इतर एक इंसान के तौर पर देख पाते हैं

तो आप जेएनयू के ही हैं।

अगर सवाल उठा रहे हैं, चाहे आप कहीं भी हों

तो आप निश्चित रूप से जेएनयू के ही हैं।

पुस्तक में श्वान रक्षा दल के आवश्यकता से अधिक सक्रिय होने का भी सरस बखान है। मानव की तरह ही या बहुधा उससे भी अधिक मानवेतर प्राणियों, ख़ास कर कुक्कुड़ों की फ़िक्र जितनी इस कैंपस में कन्याओं द्वारा की जाती है, वैसी संवेदनशीलता अन्यत्र दुर्लभ है। कहते हैं, इल्म-ओ-तालीम के मानी ही हैं कि हमारी शिक्षा हमें करुणा से भर दे, वाग्स्वातंत्र्य के साथ विचारों की आज़ादी भी दे। इतिहासकार प्रो. राकेश बटबयाल ने अपनी किताब जेएनयू: द मेकिंग ऑव ए यूनिवर्सिटी में तफ़्सील से इस विश्वविद्यालय के बनने की कहानी बताई है। जहाँ प्रो. बटबयाल की श्रमसाध्य किताब गरिष्ठ व गम्भीर है, एवं पाठक से धैर्य व एकाग्रता की मांग करती है, वहीं जे सुशील ने दिलचस्प अंदाज़े-बयां से जेएनयू की एक तरह से तवाफ़ करा दी है, उसके चटक रंग से मन-प्राण को सराबोर किया है। सचमुच जेएनयू अनन्त है, जेएनयू की कथाएँ अनन्त हैं। किसी ने ठीक ही कहा-

हमने उसको इतना देखा जितना देखा जा सकता था

लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था।

अंतत: यह शैक्षणिक परिसर है जहाँ ज्ञानार्जन कोई बोझ भरा काम नहीं, बल्कि जीवन के साथ संवाद है, उससे रूबरू होना है। जे लिखते हैं, “कुछ अच्छे प्रोफ़ेसर अच्छे छात्रों का निर्माण करते हैं, और वही छात्र आगे चल कर प्रोफ़ेसर बनते हैं”। गांधी कहते थे, “A student acquires quarter of his or her knowledge from his or her own intelligence, second quarter from his or her teachers, third quarter from his or her co students, and the final quarter, in course of time, by his or her own experience”। जेएनयू यही माहौल, दोस्त व अध्यापक देता है, जहाँ जिनके साथ आप अपनी अनुभूति का चिंतन कर सकते हैं, और चिंतन की अनुभूति।  नेहरू विश्वविद्यालय को विचारों के एडवेंचर की जगह के रूप में देखने की अभिलाषा रखते थे। जेएनयू की ख़ुशक़िस्मती कि इसे वैसे लोग मिले या इसने लोगों को वैसा बनाया। “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम” के साथ “सा विद्या या विमुक्तये” की स्पिरिट लिए यह इदारा ज़िंदा रहेगा, और रहेंगे ज़िंदा जे सुशील जैसे लोग जो जेएनयू के गीत उन्मुक्त कंठ से गाते रहेंगे!

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मैनेजर पाण्डेय आलोचक
शख्सियत

मैनेजर पाण्डेय साहित्यवादी आलोचक नहीं हैं

 

मैनेजर पाण्डेय (23.9.1941- 6.11.2022) को केवल हिन्दी और साहित्य का आलोचक कहना गुनाह है, उन्होंने साहित्य समझने की और आलोचना की एक नयी दृष्टि दी। उन्होंने साहित्य को सदैव मनुष्य की सामाजिक चेतना और सामाजिक चिन्ता की देन माना और यह बताया कि उसकी बड़ी भूमिका केवल ‘सामाजिक चेतना के निर्माण’ की न होकर सामाजिक जीवन की रूपान्तरणशीलता के साधन के रूप में भी है। आलोचना उनके अनुसार केवल कृति की व्याख्या भर नहीं है। साहित्य का इतिहास उनके लिए केवल साहित्य का इतिहास नहीं है, उसका सम्बन्ध सामाजिक इतिहास से है और सामाजिक इतिहास कभी स्थिर नहीं रहता। साहित्य-विवेक के विकास के लिए उन्होंने इतिहास बोध आवश्यक माना। “इतिहास बोध के बिना साहित्य विवेक अंधा होगा और साहित्य विवेक के बिना इतिहास बोध लँगड़ा” मैनेजर पाण्डेय ने हमें दृष्टि और दिशा प्रदान की। आलोचना की भूमि और भूमिका बदली। साहित्य के समाज से रिश्ते की बात हमेशा की जाती रही है, पर साहित्य की सामाजिकता के साथ ‘आलोचना की सामाजिकता’ पर विचार करने वाले, उस पर बल देने वाले वे दुर्लभ आलोचक हैं। उनके पहले आलोचना की सामाजिकता पर विचार करने की कोई गम्भीर कोशिश न की गयी थी। इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में, जब ‘उत्तर आधुनिक’ होने और ‘उत्तर आधुनिकता’ का अधिक जयगान हो रहा था, पाण्डेय जी ने आलोचना की सामाजिकता की चिंता को ‘पूँजीवाद द्वारा प्रकृति और संस्कृति के निजीकरण के प्रयत्न के विरुद्ध प्रतिरोध की चिन्ता’ से जोड़ा। वे साहित्यवादी आलोचक नहीं हैं। केवल साहित्यवादी आलोचना न तो समकालीन होगी और न सामाजिक।

मैनेजर पाण्डेय के आलोचनात्मक लेखन का आरम्भ नक्सलबाड़ी आन्दोलन के बाद हुआ। नक्सलबाड़ी आन्दोलन ने देश की विविध भाषाओं के साहित्य को प्रभावित किया था। भारतीय कवियों में कई प्रमुख कवि हैं जो इस विचारधारा से प्रभावित हुए। आलोचना में केवल एक नाम मैनेजर पाण्डेय का है। उनकी आलोचना में प्रतिरोध और संघर्ष पर बल है। निर्मल वर्मा जिस समय शब्द को ‘स्मृति’ से जोड़ रहे थे, पाण्डेय जी ने ‘शब्द’ को ‘कर्म’ से जोड़ा। निर्मल के स्मृतिलोक पर मुग्ध आलोचकों को यह एक प्रकार से दिया गया जवाब भी था। वैयक्तिक और जातीय स्मृति में अन्तर है। जातीय स्मृति में कर्म और संघर्ष की मौजूदगी है। ‘शब्द और कर्म’ (1981) उनकी पहली पुस्तक है। इसकी भूमिका ‘दो शब्द’ के आरम्भ में उन्होंने लिखा- सातवें दशक के अन्त में भारतीय जनता की संघर्षशील चेतना का जो नया विकास हुआ, उसका आठवें दशक की सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों पर गहरा असर पड़ा। शब्द को उन्होंने ‘जनता के कर्म’ और ‘लेखक के रचना-कर्म’ से एक साथ जोड़ा। उन्होंने गोर्की को  उद्धृत किया- रचना-कर्म से लगा हुआ लेखक एक ही समय में कर्म को शब्दों में और शब्दों को कर्म में बदलता है। शब्द की चिन्ता सबसे अधिक कवियों ने की है। पाण्डेय जी हिन्दी के ही नहीं संभवत: अकेले भारतीय आलोचक हैं, जिनमें शब्द की अधिक चिन्ता है। शब्द और कर्म पुस्तक के अड़तीस वर्ष बाद उनकी पुस्तक ‘शब्द और साधना’ (2019) प्रकाशित हुई। हिन्दी के एक लेखक ने शब्द और कर्म को अलग-अलग माना था। शब्द और कर्म के सम्बन्ध को उन्होंने ‘साहित्य और क्रान्ति’ के सम्बन्ध से जोड़ा और दोनों के ‘जटिल द्वन्द्वात्मक  सम्बन्ध’ को गहराई से समझने की  सलाह दी। शब्द को कर्म से जोड़ कर उन्होंने शब्द को अर्थ से, साहित्य को जीवन से, चिन्तन को यथार्थ से, विचार क्षेत्र को कर्म क्षेत्र से और साहित्य को क्रान्ति से जोड़ा था। उनके पहले किसी भी भारतीय आलोचक ने हमें यह दृष्टि प्रदान नहीं की। अड़तीस वर्ष बाद ‘शब्द और साधना’ की भूमिका में उन्होंने लिखा- “मनुष्य का जीवन जीना, जानना, सोचना, अनुभव करना और रचना करना भाषा में ही संभव होता है।”

मैनेजर पाण्डेय का आलोचनात्मक लेखन लगभग 54 वर्ष का है। उनका पहला लेख 1968 में प्रकाशित हुआ था। उनका सारा जीवन संघर्षमय रहा है। उनके गाँव में पढ़े-लिखे लोग नहीं थे। जन्म सामान्य कृषक-परिवार में हुआ था। पिता ब्रह्मदेव पाण्डेय किसान थे और खेती ही सब कुछ थी। सारण जिला के गोपालगंज अनुमण्डल के लोहटी गाँव में 33 सितम्बर 1941 को उनका जन्म हुआ था। यह दिनकर की भी जन्मतिथि है, ज्योतिष जोशी का गाँव उनके गाँव के समीप है। उनके गाँव धर्मगता के प्राथमिक विद्यालय से उन्होंने पहली से तीसरी कक्षा तक की प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। चौथी से  सातवी तक की उनकी शिक्षा राजकीय मध्य विद्यालय बगही बाजार से हुई। ज्योतिष जोशी के गाँव में इनके कई सहपाठी थे जिन्होंने उनकी अत्यधिक जिज्ञासु-वृत्ति की बात कही है। पत्र-पत्रिकाओं से पाण्डेय जी का सम्बन्ध मिडिल स्कूल से ही था। उन्हें प्रेरित-प्रोत्साहित करने में मिडिल स्कूल में हिंदी अध्यापक शेख वाजिद और हाई स्कूल के अध्यापक, हिन्दी और भोजपुरी के कवि लक्ष्मण पाठक ‘प्रदीप’ की अधिक भूमिका थी। इन दोनों अध्यापकों ने उनमें संभावनाएँ देखी। ‘प्रदीप’ जी के प्रभाव से पाण्डेप जी ने अपने छात्र-जीवन में हिन्दी और भोजपुरी में कविता लिखना आरम्भ किया। उनके गाँव के लोग उन्हें कवि के रूप में याद करते थे। भक्ति-साहित्य पढ़ने की ओर उन्हें शिव गोविंद पाण्डेय ने, जो स्वयं ‘भक्ति-साहित्य’ के बहुत प्रेमी और जानकार थे, प्रेरित किया। पाण्डेय जी ने राजकीय विद्यालय खुरहुरिया से हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त की। उनके गाँव से इस विद्यालय की दूरी 8 किलोमीटर थी। बीच में भरही नदी पार कर वे स्कूल पहुँचते थे। पाण्डेय जी ने अपने उन दिनों को याद किया है- “घर से दस किलोमीटर चलकर स्कूल जाता था। कोई सवारी-साइकिल तक चलाना नहीं आता था।” उनके मन में “ज्ञान के प्रति लगाव और ज्ञानियों के प्रति श्रद्धा का भाव” आरम्भ से था। नौवीं क्लास में उनकी पढ़ाई छूट गयी थी। फिर दुबारा नौवीं पढ़े बिना दसवीं से पढ़ाई शुरू की। प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास कर आगे पढ़ाई करने के लिए अपने अध्यापक पाठक जी की प्रेरणा से वे बनारस गये। डी.ए.वी. कॉलेज और बी.एच.यू. से उन्होने उच्च शिक्षा प्राप्त की। बनारस में उनका सम्पर्क महत्वपूर्ण, अध्यापकों, लेखकों से हुआ और उनमें ज्ञान की ऊँची सीढ़ियों पर चढ़ने की आकांक्षा पैदा हुई।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. करने के बाद बरेली कॉलेज में वे हिन्दी के प्राध्यापक नियुक्त हुए और उसके बाद जोधपुर विश्वविद्यालय गये। मार्च 1977 में वे जेएनयू आये। ज्ञान के प्रति उनका समर्पण अद्‌भुत था। राम‌विलास शर्मा के बाद वे अकेले आलोचक हैं, जिन्होंने साहित्य के अलावा समाज और संस्कृति पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया है। सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचना को उन्होंने कभी एक दूसरे से विच्छिन्न कर नहीं देखा। सत्तर के दशक से ही सामाजिक चेतना और सामाजिकता पर उनका बल रहा है। 1973 से 1980 के बीच के उनके निबन्ध ‘शब्द और कर्म’ में संकलित हैं। उन्होंने कॉडवेल की कृति – ‘रोमांस एण्ड रियलिज़्म’ पर विचार किया। पहली बार व्यवस्थित ढंग से उन्होंने कॉडवेल पर लिखा। ‘साहित्य का समाजशास्त्र और मार्क्सवादी आलोचना’ निबन्ध  के लगभग एक दशक बाद ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ प्रकाशित हुई। आज भी इस विषय की यह अकेली प्रामाणिक पुस्तक है, जिसका उर्दू में अनुवाद हो चुका है। डॉ. मेनेजर पाण्डेय समाजशास्त्री आलोचक नहीं, मार्क्सवादी आलोचक हैं। मार्क्सवाद में उनकी निष्ठा आद्यन्त रही है। वे मुक्तिकामी, परिवर्तनकामी, क्रान्तिकारी मार्क्सवादी आलोचक हैं। हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना की बृहत्त्रयी, जो भारतीय मार्क्सवादी आलोचना की भी है, उसके अन्तिम आलोचक डॉ. पाण्डेय थे। रामविलास शर्मा, नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय के निधन के बाद अब अब वह बृहत्त्रयी इतिहास में है। हिन्दी आलोचना में डॉ. पाण्डेय का योगदान अप्रतिम है। रामविलास शर्मा के निधन (2000) के पश्चात की रिक्ति को उन्होंने पूरा किया। उनका व्यक्तित्व सरल, आडम्बर विहीन और गरिमापूर्ण था। सत्तर के दशक में उनके निबन्ध प्रकाशित हुए थे। अस्सी के दशक में उनकी चार पुस्तकें आई-  ‘शब्द और कर्म’ (1981), ‘साहित्य और इतिहास- दृष्टि’ (1981) ‘कृष्ण-कथा की परम्परा और सूरदास का काव्य’ (1983) और ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’। उनकी निर्मिति में नामवर सिंह की बड़ी भूमिका है, जिसे उन्होंने स्वीकारा भी है, पर नामवर सिंह की तरह उनमें विचलन नहीं है। हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना को उन्होंने निषेधवाद, उदारवाद, संकीर्णतावाद और बौद्धिक चमत्कारवाद से मुक्त कर उसका सन्तुलित रूप से विकास किया। उनकी आलोचना में न निषेधवाद है, न उदारवाद है, न संकीर्णतावाद है और न बौद्धिक चमत्कार है। इस दृष्टि से मार्क्सवादी आलोचना में वे सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विशिष्ट हैं। उन्होंने मार्क्सवादी होने और बनने में फर्क किया है। वे बड़े आलोचक थे। उनकी आलोचना बड़ी है, जो हर समय पैदा नहीं होती। वे  बोलकर आलोचना का शास्त्र रचने वाले आलोचक नहीं थे और न उन्होंने नये-नये लेखकों को डिठौना लगाने का धन्धा किया।

अस्सी के दशक, सोवियत रूस के विघटन, नव उदारवादी अर्थ व्यवस्था के आगमन और भूमंडलीकरण  के बाद उनकी आलोचना के दूसरे दौर का आरम्भ होता है। इस दौर में उनकी आलोचना कहीं अधिक सामाजिक-सांस्कृतिक हुई। अब उनके यहाँ ‘मुक्ति की पुकार’ (1996) थी। वैश्विक होने से पहले वे स्थानीय होना आवश्यक मानते थे। उन्होंने – ‘सीवान की कविता’ (1998) से हमें परिचित कराया। उनके यहाँ ‘अतीत का ज्ञान’ ही सब कुछ नहीं है। वर्तमान की कर्मशीलता भी आवश्यक है। भारत का वर्तमान बदलने लगा था। “आज के समय में निर्भीक होकर सच कहना आलोचना का पहला दायित्व है, संघर्ष ही आलोचना का स्वाभाविक धर्म है।” वे सत्यनिष्ठ, निर्भीक एवं संघर्षशील आलोचक थे। उन्होंने न किसी की अतिरंजित ‘प्रशंसा’ की, न ‘अतिरंजित निन्दा’? उन्होंने अपनी आलोचना से इतिहास-चेतना और इतिहास-बोध को नष्ट होने से बचाया। सत्तर के दशक में अज्ञेय और निर्मल वर्मा इतिहास-विरोधी थे। ‘इतिहास के अन्त’ की घोषणा बाद में की गयी। इतिहास-विरोधी चिन्तन को उन्होंने जीवन-विरोधी, मानव-विरोधी और समाज विरोधी चिन्तन कहा और इतिहास-विरोधी आठ आलोचना- सिद्धान्तों- प्रभाववादी, मनोवैज्ञानिक, नई समीक्षा, मिथकीय  और आद्य बिम्बात्मक, विषमवादी, संरचनावादी, शैली वैज्ञानिक और सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्तों पर विचार किया। वे अकेले आलोचक हैं, जिन्होंने एक साथ इस सभी सिद्धान्तों की आलोचना की। उन्होंने आलोचना के संदर्भ में इतिहास की सार्थकता देखने के बाद साहित्येतिहास के संदर्भ में आलोचना की सार्थकता पर ध्यान दिया। पाण्डेय जी का महत्व मात्र अकादमिक दृष्टि से नहीं है। वे सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचक थे। उन्होंने घुर्ये, पी सी जोशी और श्यामाचरण दुबे पर भी लिखा है। वे अकेले मार्क्सवादी आलोचक हैं, जिन्होंने दलित, स्त्री और आदिवासी लेखन पर न केवल ध्यान दिया, उन पर लिखा और अनेक सार्थक एवं मूल्यवान बातें कहीं। अपनी आलोचना के जरिये उन्होंने प्रतिरोध की संस्कृति विकसित की। भारतीय समाज में ‘प्रतिरोध की परम्परा’ (2013) दिखाकर आज के समय में प्रतिरोध के महत्व पर बल दिया। उनका स्पष्ट मत है कि प्रतिरोध की प्रवृत्ति और प्रक्रिया को समझने से ही संस्कृति की पूरी समझ विकसित होती है। ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ के बाद उन्होंने ‘संस्कृति का समाजशास्त्र’ लिखा।

मैनेजर पाण्डेय गहरी खुदाई करने वाले आलोचक थे। उनके कई निबन्ध क्लासिक हैं। क्या आपने ‘वज्रसूची’ का नाम सुना है? ‘संवादधर्मी दाराशिकोह’, ‘संस्कृति का समाजशास्त्र’, ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’, ‘मुक्ति की राहें’, ‘उपन्यास और लोकतन्त्र’,  ‘आलोचना की सामाजिकता’ ऐसे ही निबन्ध हैं। इनके  चिन्तन, सोच-विचार और आलोचना का रेंज बहुत बड़ा है। नामवर सिंह ने उन्हें ‘आलोचकों का आलोचक’ कहा है। आचार्य शुक्ल स्वाधीनता आन्दोलन से गहरे रूप जुड़े आलोचक थे। मैनेजर पाण्डेय स्वाधीन भारत की वास्तविकताओं, जन-चिन्ताओं, आदि से जुड़े बड़े आलोचक है। उनके पास एक साथ सही, सुसंगत और आवश्यक साहित्य-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि, जीवन-दृष्टि, समाज-संस्कृति दृष्टि, राजनीतिक दृष्टि और अर्थशास्त्रीय दृष्टि है। हम सब जिस समय में सृजनरत है, उसमें व्यक्तिवाद, सम्बन्धवाद, जातिवाद और अवसरवाद का अधिक बोलबाला है। मार्क्सवादी भी मार्क्स से कुछ नहीं सीखते। पाण्डेय जी का बल आचरण की सभ्यता पर भी था। उन्होंने मार्क्स के जीवन से मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों को सीखने की बात कही। मुक्तिबोध की याद दिलाई, जिन्हें रावण के घर पानी भरना स्वीकार नहीं था। “आज के अनेक मार्क्सवादी बुद्धिजीवी रावण के घर पानी भरने के लिए ही नहीं, बल्कि कुआँ खोदने के लिए भी तैयार बैठे हैं”।

मैनेजर पाण्डेय के निधन से हिन्दी आलोचना, भारतीय मार्क्सवादी आलोचना की जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। उनके सैकड़ों योग्य-सुयोग्य शिष्य हैं, पर अब उनके जैसा हिन्दी में ही नहीं, भारत की किसी भी भाषा में कोई आलोचक नहीं है। नामवर सिंह के निधन के बाद उन्होंने कहा था- “साहित्य, समाज, संस्कृति का कोई क्षेत्र किसी एक के चले जाने से स्थायी रूप से सूनापन और खालीपन में नहीं रहता- जो जाते हैं, उनकी यादें रहती है, उनकी लिखी किताबें रहती हैं। उससे भी सीखते हुए लोग बाद वाले आगे बढ़ते हैं और उनकी जगह जितना सम्भव है, उतना लेते हैं।” दूर-दूर तक मैनेजर पाण्डेय की जगह लेने वाला कोई आलोचक नजर नहीं आता। हमारे समय की आलोचना की सबसे तेज रोशनी बुझ चुकी है

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लाचित बरफूकन
शख्सियत

मुगल साम्राज्यवाद को चुनौती देने वाला उत्तर-पूर्व भारत का वीरयोद्धा : लाचित बरफूकन

 

      भारतवर्ष का इतिहास लाचित बरफूकन जैसे भारत के वीर सपूतों के शौर्य और वीरता का महाख्यान है। इसके कोने-कोने से आने वाले इसके वीर सपूतों की अनेक गाथाएँ, अपनी मातृभूमि के प्रति इन वीरों की निष्ठा, त्याग और समर्पण की अनेक अकल्पनीय कहानी प्रस्तुत करती हैं। ऐसी ही एक अद्भूत और अकल्पनीय कहानी है– लाचित बरफूकन की। मुगल आक्रांताओं से उत्तर-पूर्व भारत की पवित्र भूमि की रक्षा करने वाले वीरयोद्धा लाचित बरफूकन का जीवन और व्यक्तित्व शौर्य, साहस, स्वाभिमान, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का पर्याय है। प्रसिद्ध इतिहासकार सूर्यकुमार भूयान ने उनकी मौलिक रणनीति और वीरता के कारण उन्हें उत्तर-पूर्व भारत का “शिवाजी” माना है। वास्तव में, लाचित बरफूकन ने उत्तर-पूर्व भारत में वही स्वातंत्र्य-ज्वाला जलायी जो मुगल आक्रांताओं के विरुद्ध दक्षिण भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज ने, पंजाब में गुरू गोविंद सिंह ने और राजपूताना में महाराणा प्रताप ने जलायी थी। इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए पूर्व राज्यपाल श्री श्रीनिवास कुमार सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘मिशन असम’ में लिखा है— “महाराष्ट्र और असम हमारे विशाल और महान देश के दो विपरीत छोर पर हो सकते हैं लेकिन वे एक सामान्य इतिहास, एक साझी विरासत और एक सामान्य भावना से एकजुट होते हैं। मध्ययुगीन काल में उन्होंने दो महान सैन्य नेताओं, महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी और असम में लाचित बरफूकन को जन्म दिया है।”

भारत में इस वीर योद्धा की स्मृति को नमन करते हुए प्रतिवर्ष 24 नवम्बर को “लाचित दिवस” के रूप में मनाया जाता है। लाचित बरफूकन का जन्म 24 नवंबर, 1622 ई को अहोम साम्राज्य के एक अधिकारी सेंग कालुक–मो–साई के घर में चराइदेऊ नामक स्थान पर हुआ था। उनकी माता कुंदी मराम थीं और उनका पूरा नाम ‘चाउ लाचित फुकनलुंग’ था। उन्होंने सैन्य कौशल के साथ–साथ मानविकी तथा शास्त्र का भी अध्ययन किया था। बचपन से ही अत्यंत बहादुर और समझदार लाचित जल्द ही अहोम साम्राज्य के सेनापति बन गए। “बरफूकन” लाचित का नाम नहीं, बल्कि उनकी पदवी थी। उत्तर-पूर्व भारत के राजनीतिक इतिहास का अनुशीलन करने पर यह ज्ञात होता है कि अहोम सेना की संरचना बहुत ही व्यवस्थित थी। एक देका दस सैनिकों का, बोरा बीस सैनिकों का, सेंकिया सौ सैनिकों का, हजारिका एक हजार सैनिकों का और राजखोवा तीन हजार सैनिकों का जत्था होता था। इस प्रकार बरफूकन छः हजार सैनिकों का संचालन करता था। लाचित बरफूकन इन सभी का प्रमुख था।

‘बरफूकन’ के रूप में अपनी नियुक्ति से पूर्व वे अहोम साम्राज्य के राजा चक्रध्वज सिंह की शाही घुड़साल के अधीक्षक थे। वे परमवीर और राजा के अत्यंत विश्वासपात्र थे। प्रारम्भ में उन्हें रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सिमलूगढ़ किले के प्रमुख और शाही घुड़सवार रक्षक दल के अधीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। लाचित बरफूकन जैसे योद्धा के रहते मुगल आक्रांता भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र को अपने अधीन नहीं कर सके। लाचित ने शक्तिशाली मुगलों से न सिर्फ टक्कर ली, बल्कि उन्हें परास्त करके उनके अभिमान और अभियान को तहस-नहस करते हुए उत्तर-पूर्व विजय के उनके अरमान को सदा के लिए चकनाचूर कर दिया।

 लाचित ने बीमार होते हुए भी भीषण युद्ध किया और अपनी असाधारण नेतृत्व क्षमता और अदम्य साहस से सरायघाट की प्रसिध्द लड़ाई में लगभग 4000 मुगल सैनिकों को मार गिराया। 1671 ई में सरायघाट, ब्रह्मपुत्र नदी में अहोम सेना और मुगलों के बीच ऐतिहासिक लड़ाई हुई, जिसमें लाचित ने पानी में लड़ाई (नौसैनिक युद्ध) की सर्वथा नई तकनीक आजमाते हुए मुगलों को पराजित किया। उन्होंने अपने भौगोलिक-मानविकी ज्ञान और गुरिल्ला युद्ध की बारीक रणनीतियों का प्रयोग करते हुए सर्वप्रथम मुगल सेना की शक्ति का सटीक आकलन किया और फिर ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर भीषण नौसैनिक युद्ध में उन्हें हरा दिया। लाचित ने अपनी मौलिक युद्धनीति के तहत रातोंरात अपनी सेना की सुरक्षा हेतु मिट्टी से दृढ़ तटबंधों का निर्माण कराया। उन्होंने मातृभूमि और देशवासियों के स्वाभिमान और हित को अपने सगे-संबंधियों से सदैव ऊपर रखा। अत: युद्धभूमि में अपने मामा की लापरवाही को अक्षम्य मानकर उनका वध कर दिया और कहा कि- “मेरे मामा मेरी मातृभूमि से बढ़कर नहीं हो सकते।”

युद्ध के समय अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए कहा गया उनका यह बोधवाक्य –“लाचित जियाइ थका माने गुवाहाटी एरा नाही (अर्थात् जब तक लाचित जीवित है, उससे गुवाहटी कोई नहीं छीन सकता)” उनकी निर्भीकता, वीरता और कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय देता है। घायल और अत्यंत अस्वस्थ लाचित ने अपने सैनिकों में जोश भरने के लिए कहा था— “जब मेरे देश पर आक्रमणकारियों का खतरा बना हुआ है, जब मेरे सैनिक उनसे लड़ते हुए अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा रहे हैं, तब मैं महज़ बीमार होने के कारण कैसे अपने शरीर को आराम देने की सोच सकता हूँ।” ऐसे आदर्श और प्रेरक सेनानायक की स्मृति को सम्मान देने के लिए राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को “लाचित बरफूकन स्वर्ण पदक” से सम्मानित किया जाता है। लाचित बरफूकन की स्मृति को चिरस्थायित्व प्रदान करने के लिए उनके समाधि-स्थल जोरहाट से 16 किमी. दूर हुलुन्गपारा में ‘स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह द्वार’ का भी निर्माण किया गया है।

दरअसल, लाचित बरफूकन का महत्त्व समझने के लिए अहोम साम्राज्य का सारांश व इतिहास जानना-समझना आवश्यक है। बारह सौ अठाईस ई में असम में ताई अहोम वंश का शासन स्थापित हुआ जो मयंमार से आए थे। इस राजवंश ने सदियों तक खिलजी, तुगलक, इलियास शाही, लोदी और बंगाल सुल्तानों के आक्रमण से सफलतापूर्वक अपनी रक्षा की। लेकिन सन सोलह सौ अड़तीस ई में मुगलों के एक बड़े आक्रमण में हारकर उन्हें बड़ी आर्थिक हानि झेलनी पड़ी। फिर सन सोलह सौ अठावन ई में औरंगजेब मुग़ल बादशाह बना और सन सोलह सौ इकसठ ई में उसने अपने दो प्रमुख सेनापतियों मीर जुमला और दिलेर खान को पहले बंगाल और फिर असम पर आक्रमण करने के लिए भेजा। अहोम साम्राज्य की शक्ति और शौर्य, जिसके बल पर इस साम्राज्य ने इतने लंबे समय तक सारे आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना किया था, वह क्षीण होने लगा था। मुग़ल सेनापतियों मीर जुमला और दिलेर खान द्वारा किए गए इस हमले में अहोम साम्राज्य पराजित हो गया। इस साम्राज्य के कई किले तो बिना कोई लड़ाई लड़े हाथ से निकल गए। अहोम के राजा जयध्वज सिंघा को इस युद्ध में पीछे हटना पड़ा और उन्होंने पूर्वोत्तर का बड़ा हिस्सा इस युद्ध में खो दिया। इतना ही नहीं, उनको मुग़ल साम्राज्य के साथ एक अपमानजनक संधि के लिए राजी होना पड़ा जिसके तहत उन्हें न सिर्फ धन, भूमि, हाथी; बल्कि अपनी छः साल की बेटी को भी मुग़ल हरम में देना पड़ा।

अहोम साम्राज्य की पराजय और अपमान के कारण राजा जयध्वज सिंघा को बहुत बड़ा सदमा पहुँचा जिसके कारण जल्दी ही उनकी मृत्यु हो गई। उनके बाद चक्रध्वज सिंघा को राजा बनाया गया। उसका बरफूकन बनने के बाद लाचित के सामने बहुत-सी चुनौतियाँ थीं। उसके सामने एक तरफ मुगलों की विशाल और संगठित सेना थी, जिसका संचालन करने वाले साइस्ता खान और दिलेर खान जैसे अनुभवी सेनापति थे। दूसरी तरफ अहोम साम्राज्य की निराश और विभाजित सेना थी। अगले चार वर्षों तक लाचित बरफूकन ने अपना पूरा ध्यान अहोम सेना के नव-संगठन और अस्त्र-शास्त्रों को इकठ्ठा करने में लगाया। इसके लिए उन्होंने नए सैनिकों की भर्ती की, जल सेना के लिए नौकाओं का निर्माण कराया, हथियारों की आपूर्ति, तोपों का निर्माण और किलों के लिए मजबूत रक्षा प्रबंधन इत्यादि का दायित्व अपने ऊपर लिया। उन्होंने यह सब इतनी चतुराई और समझदारी से किया कि इन सब तैयारियों की मुगलों को भनक तक नहीं लगने दी। लाचित बरफूकन की चतुराई के कारण कूटनीतिक तरीके से मुगलों के साथ में दोस्ती का दिखावा भी चलता रहा। ये लाचित की राजनीतिक सूझबूझ एवं दूरदर्शिता का उत्तम उदहारण था।

मुग़ल शासन द्वारा सन सोलह सौ सड़सठ ईस्वी में गोहाटी के फौजदार रशीद खान को बदल कर फ़िरोज़ खान को नियुक्त किया गया। वह बेहद ऐय्याश किस्म का व्यक्ति था। उसने चक्रध्वज सिंघा को सीधे-सीधे असमिया लड़कियों को ऐय्याशी के लिए अपने पास भेजने का आदेश दिया। इससे लोगों में मुगलों के खिलाफ लड़ने के लिए जोश और आक्रोश भरने लगा। लाचित ने लोगों के इस जोश और आक्रोश का सही प्रयोग करते हुए इसी समय गोहाटी के किले को मुगलों से छीनने का निर्णय लिया। लाचित बरफूकन के पास एक शक्तिशाली और निपुण जल सेना के साथ समर्पित जासूसों का संजाल तो था, परन्तु घुड़सेना की भारी कमी थी। यही कारण है कि अहोम सेना द्वारा घेराबंदी करने के बाद भी महीनों तक गोहाटी के किले को स्वतंत्र नहीं कराया जा सका जिसकी रक्षा इटाकुली का किला कर रहा था। अंत में लाचित बरफूकन ने दूसरी योजना बनाई, जिसके अनुसार दस-बारह सिपाहियों ने रात के अँधेरे का फायदा उठाते हुए चुपके से किले में प्रवेश कर लिया और मुग़ल सेना की तोपों में पानी डाल दिया। अगली सुबह ही लाचित ने इटाकुली किले पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

इस विजय के साथ ही एक बार फिर गोहाटी ने आजादी की साँस ली। लेकिन यह आजादी ज्यादा दिन तक कायम नहीं रह पायी। जब औरंगजेब को इसके बारे में पता चला तब वह गुस्से से तिलमिला उठा। उसने मिर्जा राजा जयसिंह के बेटे रामसिंह को सत्तर हजार सैनिकों की बड़ी सेना के साथ अहोम से लड़ने के लिए असम भेजा। रोचक बात यह है कि रामसिंह के साथ सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर भी असम आए थे, किंतु उन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए लाचित के विरुद्ध होने वाले इस युद्ध में भाग नहीं लिया। उधर लाचित ने बिना एक पल व्यर्थ किए किलों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए सभी आवश्यक तैयारियाँ प्रारंभ कर दीं।

अपनी भूल से अहोम सेना के प्राण संकट में डालने वाले अपने मामा को प्राणदंड देने की घटना ने लाचित बरफूकन को अपने ही सैनिकों की दृष्टि में बहुत ऊँचा उठा दिया। अब सबको यह विश्वास होने लगा कि मुगलों का सामना करना और उनका मुकाबला करना असंभव नहीं है। इस युद्ध में अहोम सेना जब तक छापामार या गुरिल्ला युद्ध कर रही थी, तब तक रामसिंह पर भारी पड़ रही थी। लेकिन फिर कुछ ही समय बाद रामसिंह ने युद्ध-नैतिकता का उल्लंघन करते हुए छल-कपट शुरू कर दिया। लाचित से रुष्ट कुछ टुकड़ी प्रमुखों को लालच देकर रामसिंह अपनी ओर करने में भी सफल हो गया। फिर उसने अहोम सेना को मैदानी युद्ध के लिए उकसाया। लाचित को पता था कि खुले युद्ध में मुगलों से जीत पाना असंभव है, क्योंकि उनके पास बेहतरीन घुड़सेना थी। लेकिन राजा चक्रध्वज सिंघा ने आवेश में आकर मैदानी युद्ध का आदेश दे दिया। इस प्रकार सोलह सौ उनहत्तर के अलाबोई के इस मैदानी युद्ध में अहोम सेना की भयानक हार हुयी और लाचित के दस हजार से ज्यादा सैनिकों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी।

दुर्भाग्य से सोलह सौ सत्तर में राजा चक्रध्वज सिंघा का देहांत हो गया और उदयादित्य सिंघा नए राजा बने। सन सोलह सौ इकहत्तर के आरंभ में रामसिंह को अपने गुप्तचरों से पता चला कि अन्दुराबली के किनारे पर रक्षा इंतजामों को भेदा जा सकता है और गोहाटी को फिर से हथियाया जा सकता है। उसने इस अवसर का फायदा उठाने के उद्देश्य से मुग़ल नौसेना खड़ी कर दी। उसके पास चालीस जहाज थे जो सोलह तोपों और छोटी नौकाओं को ले जाने में समर्थ थे। दुर्भाग्यवश लाचित इस समय इतने अस्वस्थ हो गए कि उनका चलना-फिरना भी अत्यंत कठिन हो गया। सन सोलह सौ इकहत्तर के मार्च महीने में सरायघाट का युद्ध आरंभ हुआ। यह युद्ध उस यात्रा का चरमोत्कर्ष था जो यात्रा आठ वर्ष पहले मीर जुमला के आक्रमण से आरंभ हुई थी। भारतवर्ष के इतिहास में कदाचित् यह पहला महत्त्वपूर्ण युद्ध था जो पूर्णतया नदी में लड़ा गया। ब्रह्मपुत्र नदी का सरायघाट इस ऐतिहासिक युद्ध का साक्षी बना । इस युद्ध में ब्रह्मपुत्र नदी में एक प्रकार का त्रिभुज बन गया था जिसमें एक ओर कामख्या मंदिर, दूसरी ओर अश्वक्लान्ता का विष्णु मंदिर और तीसरी ओर इटाकुली किले की दीवारें थीं। यह भीषण युद्ध जलस्थिति इसी त्रिभुजाकार सेना-संरचना में लड़ा गया।

इस निर्णायक युद्ध में अहोम सेना ने महान योद्धा लाचित बरफूकन के नेतृत्व में अपने वर्षों के युद्धाभ्यास से अर्जित रणकौशल का अद्भुत प्रदर्शन किया। इस युद्ध में अहोम सेना ने अनेक आधुनिक युक्तियों का उपयोग किया। यथा- पनगढ़ बनाने की युक्ति। युद्ध के दौरान ही बनाया गया नौका-पुल छोटे किले की तरह काम आया। अहोम की बच्छारिना (जो अपने आकार में मुगलों की नाव से छोटी थी) अत्यंत तीव्र और घातक सिद्ध हुई। इन सभी आधुनिक युक्तियों ने लाचित बरफूकन की अहोम सेना को मुग़ल सेना से अधिक सबल और प्रभावी बना दिया। दो दिशाओं से हुए प्रहार से मुग़ल सेना में हडकंप मच गया और सांयकाल तक उसके तीन अमीर और चार हजार सैनिक मारे गए। इसके बाद मुग़ल सेना पूरी तरह तबाह होकर मानस नदी के पार भाग खड़ी हुयी।

दुर्भाग्यवश इस युद्ध में घायल लाचित बरफूकन ने कुछ दिन बाद ही प्राण त्याग दिए। वीर सपूत लाचित बरफूकन के नेतृत्व में अहोम सेना द्वारा अर्जित की गई सरायघाट की इस अभूतपूर्व विजय ने असम के आर्थिक विकास और सांस्कृतिक समृद्धि की आधारशिला रखी। आगे चलकर असम में अनेक भव्य मंदिरों आदि का निर्माण हुआ। यदि सरायघाट के युद्ध में मुगलों की विजय होती, तो वह असम के लिए सांस्कृतिक विनाश और पराधीनता लेकर आती। लेकिन लाचित बरफूकन जैसे भारत माँ के वीर सपूत के अदम्य साहस और असाधारण नेतृत्व क्षमता के कारण ही मुग़ल साम्राज्य के दुष्प्रभाव से अहोम साम्राज्य बच सका। मरणोपरांत भी लाचित असम के लोगों और अहोम सेना के ह्रदय में अग्नि की ज्वाला बनकर धधकते रहे और उनके प्राणों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। लाचित बरफूकन द्वारा संगठित सेना ने सन सोलह सौ बयासी में मुगलों से एक और निर्णायक युद्ध लड़ा, जिसमें उसने अपने सेनापति लाचित को श्रधांजलि अर्पित करते हुए इटाकुली किले से मुगलों को खदेड़ दिया। परिणामस्वरूप, मुग़ल फिर कभी असम की ओर नहीं आए।

मुगल आक्रांताओं को पराजित करके स्वराष्ट्र के स्वाभिमान और गौरव की रक्षा करने वाले लाचित बरफूकन जैसे प्रेरणास्पद पूर्वजों से प्रभावित होकर ही तिरोत सिंह, नंगबाह, पा तागम संगमा, वीरांगना रानी रुपलियानी, रानी गाइदिन्ल्यू, मनीराम दीवान, गोपीनाथ बारदोलोई, कुशल कुँवर, कनकलता बरुआ आदि स्वाधीनता सेनानियों ने आगे चलकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध भी आजीवन संघर्ष किया। उत्तर-पूर्व भूमि की पवित्रता और स्वाधीनता की रक्षा में लाचित बरफूकन के शौर्य और बलिदान का अप्रतिम और आदि महत्व है। उनका जीवन-आदर्श और जीवन-मूल्य ही परवर्ती स्वाधीनता सेनानियों का पाथेय और प्रेरणा बने। यही कारण है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 24 नवम्बर 2015 को “लाचित दिवस” के अवसर पर उनकी वीरता को रेखांकित करते हुए कहा था कि “लाचित भारत के गौरव हैं। सरायघाट के युद्ध में उनके द्वारा प्रदर्शित अभूतपूर्व साहस को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है।” इसवर्ष असम सरकार द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में उनकी जन्मजयंती को बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। आज़ादी की अमृत महोत्सव बेला में इतिहास के उपेक्षित नायकों की पुनर्प्रतिष्ठा सराहनीय पहल है

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सूर्य अस्त पहाड़ मस्त
हाँ और ना के बीच

यह और वह नशा

 

सूर्य अस्त, पहाड़ मस्त’इस वाक्य में पर्वतीय जीवन की सच्चाई का एक महत्त्वपूर्ण पहलू छुपा है। अन्य सब बच्चों की तरह पहाड़ के बच्चे भी कंधों पर बस्ते डालकर उछलते-कूदते स्कूल जाते। खेलते-पढ़ते घर के छोटे-मोटे काम करते। न जाने कैसे और कब इन्हें कच्ची उम्र में ही नशे की आदत ने घेर लिया। शायद अपने पिताओं-काकाओं-मामाओं-दादाओं की जिन्दगी से इन्होंने समझ लिया हो कि लड़का होने भर से सख्त कसौटियों पर खरा उतरने की मजबूरी खत्म हो जाती है। उन मासूस शक्लों को देखकर माँ-बाप भी नहीं समझ सके कि यह ढील उन्हें किन अंधेरे रास्तों की ओर ले जा रही है। जब तक यह समझ आये, इतनी देर हो चुकी होती है कि नशे को एक बुरी आदत भर समझने और लड़के को इंसान समझ कर उससे मानवीय गरिमा से बातें कर पाने की समझदारी भी उनमें शेष नहीं रहती।

इन युवाओं पर ‘नशेड़ी’ की चिप्पी चिपका दी जाती है। सबके मन में उनके लिए सिर्फ हिकारत और शिकायतें बचती हैं। इससे कच्ची उम्र के किशोर पहले पढ़ाई से, फिर समाज से, फिर अपनों और अंततः अपने आप से ही बेगाने होकर नशे तक पहुँचाने वालों की मीठी जुबान और नशे की खुमारी को ही जीने का सहारा बना लेते हैं। ऐसे कुछ बच्चों ने क्लास बंक करके जुआ खेलना शुरू किया, फिर धीरे धीरे बड़ों और एक-दूसरे की  देखा-देखी शराब, चरस और स्मैक्स जैसे नशों की गिरफ्त में आ गए। तथाकथित सभ्य समाज तो फिसलन के पहले कदम से ही उनसे कतराने लगा था, परिवार वालों की नजरें बदलने पर उनसे दूर रहने की विवशता भी नशेड़ियों और नशा मुहैया कराने वालों को आपस में अधिकाधिक जोड़ती गयी। वह एक ऐसा समूह बन गया, जिसके सदस्यों का अस्तित्व एक-दूसरे पर आश्रित था। कोई निजी प्रेरणा या किसी आत्मीय जन के विवेकपूर्ण दखल से इस लत से बाहर जाकर घर लौटना, पढ़ाई जारी रखना चाहता भी तो अन्य सदस्य इन चीज़ों को ‘औरताना’ कहकर उपहास उड़ाते और समूह में वापस खींच लेते। समाज की राय को अपनी राय बनाकर जीने की परवरिश तो हमारे समाज में सभी को बालपन से ही मिल जाती है। उनके एक साथ होने से मिलने वाली सामूहिक ताकत के चलते गाँववासी उनसे खौफ से ही सही, मगर ठीक व्यवहार करते तो इससे उन युवाओं का दरकता आत्मसम्मान थोड़ा बहुत बचा रहता।

उनकी इस जीवन-गति का नतीजा यह हुआ कि वे हाई स्कूल तक भी शिक्षा पूरी न कर सके। उम्र बढ़ने के साथ बढ़ती ताकत को अनर्गल कामों और नए नए नशों में नष्ट करना ही उनके लिए शेष रहा। अनियमित रूप से किसी छोटे मोटे धंधे से वे मामूली कमाई कर लेते। पुरुष होने भर से परंपरा-प्रदत्त विशेषाधिकारों के चलते जीवन की बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी होती रहीं। भाई का रौब दिखाकर बहनों से काम कराये ही जा सकते हैं। पिता की वंशबेल बढ़ाने का साधन होना भी तमाम अधिकार दिलाता है। इसलिए घर की दशा थोड़ी भी ठीक हो तो विवाह में बाधा नहीं आती।

इसी तरह के एक समूह के नीरज की शादी सीमा से कर दी गयी थी। वह दसवीं में इनकी क्लासमेट हुआ करती थी। नीरज लगातार फेल होता रहा और अंत में हार कर उसने पढ़ाई छोड़ ही दी। घरवालों ने जमीन का एक टुकड़ा बेच कर उसके लिए दो टैक्सियाँ खरीद दीं। खुद भी कभी गाड़ी चला लेता अन्यथा ड्राइवर के भरोसे उसका काम चलता। स्कूल के उन दिनों में भी वह सीमा को पसंद करता था जो पढ़ने में तेज, आचार-व्यवहार में मधुर होने के कारण सभी की चहेती थी। उस समय वह नीरज जैसे बैक-बैंचर्स के लिए ‘आकाश-कुसुम’ सरीखी थी।

कुछ सालों बाद नीरज ट्रांसपोर्ट के काम से कुछ कमाने जब लगा तो उसने दबी हुई इच्छा माँ के सामने रखी और मनभायी लड़की से उसकी शादी हो गयी। उस समय सीमा बी.एस.सी के अन्तिम वर्ष में थी और आगे पढ़ाई के बाद बॉटनी में पीएचडी करना चाहती थी। मगर घर-परिवार ने ऐसा चक्कर चलाया कि बात पक्की करने के लिए सपरिवार पहुंचे नीरज से वह इतना ही कह सकी कि कम से कम अन्तिम वर्ष की परीक्षा तो देने दें। दोनों परिवारों के बीच रजामंदी हुई कि शादी के बाद सीमा को परीक्षा देने मायके भेजा जाएगा। घर वालों को ही नहीं, नीरज के दोस्तों को भी सीमा जैसी सहचर मिलने पर हैरानी थी और उम्मीद भी कि अब उसके साहचर्य में वह सुधर जाएगा। मगर ऐसा हुआ नहीं। हमारे समाज में जिसे ‘प्रेम’ कहा जाता है, वह तो पति होने के अधिकार से मिल ही जाता है। उसके लिए पात्रता अर्जित करने के लिए सही दिशा लेने की जरुरत ही कहाँ होती है। कभी-कभी नीरज सुधरने का संकल्प लेता और कुछ दिन नशे और समूह से दूर रहता। चंद दिन नवदम्पत्ति के बड़े खुशनुमा गुज़रते मगर फिर उसकी जिन्दगी पुरानी ढब में आ जाती। सीमा ने उसे सही डगर पर लाने के लिए आगे पढ़ने और काम करने के अपने सब अरमान छोड़ दिए। उसके गर्भवती होने पर भी नशे की गिरफ्त से वह बाहर नहीं आ पाया। सास-बहू ने सपने देखने शुरु किए ही थे कि शायद बच्चे का मुँह देखकर उसे कोई फर्क पड़े कि उन पर कहर टूट पड़ा। पी कर गाड़ी चलाने की आदत नीरज को जिन्दगी से इतना दूर ले गयी जहाँ न पीने की लत बाकी बची, न सुधरने की गुंजाइश।

  नीरज का करीबी मित्र प्रदीप इस हादसे से हतप्रभ रह गया। सीमा उसकी भी बैचमेट रही थी। उसकी और नीरज के माँ-पिता की हालत देखकर उसका कलेजा मुँह को आता था। इस पल से पहले तक वह भी अपने लिए नीरज जैसी जिन्दगी की कामना और उम्मीद करता था। अब उसे सामान्य नज़र आती स्थिति के भीतर का भयानक सत्य दिखने लगा। नतीजतन उससे नशा और जुआ छूट गए। नशा त्यागने से उसे बहुत तकलीफ हुई लेकिन नीरज औऱ सीमा का चेहरा ध्यान आता तो गले के नीचे शराब उतरती ही न थी। समूह के लोगों के ताने और उपहास उसके लिए बेअसर हो गए इसलिए समूह से जोड़े रखने वाली ताकत भी नि:शेष हो गयी।

आघात से कुछ उबरने के बाद उसने छूटी हुई पढ़ाई दोबारा शुरू की। ओपन स्कूल से पहले हाईस्कूल, फिर इंटर पास किया। गलत राह त्यागने और मेहनत की ईमानदार कमाई खाने का मजबूत संकल्प उसके भीतर पैदा हुआ। घर वाले पढ़ाई का खर्चा उठा सकने या उसके लिए किसी काम का बंदोबस्त करने में समर्थ न थे। इसलिए पढ़ाई के साथ वह कौशल प्रशिक्षण की एक सरकारी योजना के तहत प्लंबरिंग का काम भी सीखता था।

पूरी लगन से काम सीखने, कुशल कारीगर बनने के बाद भी ‘नशेड़ी’, ‘उचक्का’, ‘आवारा’ जैसी पहचानों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। उसे कोई काम न देता, न उस पर भरोसा करता। घरों के भीतर उसका प्रवेश वर्जित रहा। समूह से बिछड़ कर अकेला होने के कारण गाँव भर के लड़कों की आवारगी का दोष उस पर ही मढ़ा जाता। अपनी भड़ास निकालने और कोसने के लिए वह सबको नर्म चारा लगता।

मेहनत की रोटी खाने की कोशिशें फेल होने लगीं तो वक्त के जरूरतमंद नाजुक मोड़ में उसे याद आया कि उसके बालपन में जब उसकी दीदियाँ मेहँदी लगाती थीं, तब वह भी उनकी देखा-देखी अपनी नन्ही कोमल मुट्ठी में मेहंदी का ‘कोन’ भींचकर ऐसे-ऐसे खूबसूरत डिजाइन उकेरता कि वे उसकी कला पर मुग्ध होकर उसी से मेहंदी लगवाने के लिए आपस में होड़ करने लगतीं। पिता-काका लोग गुस्से से आँखें तरेर कर कहते, “दीपू मर्द बन, मर्द। चार लड़कियों के बाद पैदा होने के कारण तू भी लड़की होता जा रहा।”

प्रदीप को लगा कि शायद उसका यही हुनर उसे और उसके माँ-बाप को रोटी दे सके। मेहँदी का ‘कोन’ लेकर उसने नजदीकी गाँव के बाजार के एक छोटे से कोने को अपनी कर्मस्थली बना लिया और अपने सामने फैली हथेलियों में खूबसूरत बेल-बूटे बनाने लगा। विवाह, तीज-त्योहार आदि त्योहारों से धड़कते उत्सवधर्मिता वाले जन-जीवन में यह काम चल पड़ा और वह घर पैसे भेजने के साथ अपना कोई काम शुरू करने के लिए भी धन जोड़ने लगा। प्रदीप नाम के इस किरदार की यह गहरी त्रासदी में घुली सच्ची कहानी एक सुखद अंत के साथ पूरी हो सकती होती अगर मैंने उसके माँ-बाप को माथा पीटते हुए यह कहते न सुना होता कि “खानदान की नाक कटा डाली इस मुए दीपू ने। इससे तो पैदा ही न हुआ होता या इसी गाँव में नशेड़ी बन के ही पड़ा रहता, कम से कम लड़कियों जैसी हरकत तो न करता

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पुरूष दिवस
सामयिक

पितृसत्‍तामक समाज का वर्तमान पुरूष

 

पिछले कुछ वर्षों में पितृसत्‍तामक समाज में भी पुरूष दिवस मनाने का चलन महिला दिवस की ही तर्ज पर जोर पकड़ने लगी है। किंतु, दोनों दिवस मनाने के उद्देश्‍य के पीछे काफी अंतर है। महिला दिवस जहाँ उनकी अस्मिता को रेखांकित करता है तो वहीं पुरूष दिवस पुरूषों के योगदान को रेखांकित करता है। अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस की एक थीम निर्धारित होती है, जिसके आधार पर इस दिन को मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस 2022 की थीम ‘पुरुषों और लड़कों की मदद करना’ (Helping Men and Boys) है। इस थीम का उद्देश्य विश्व स्तर पर पुरुषों के स्वास्थ्य और कल्याण में सुधार के लिए कार्य करना है।

पहली बार अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस भारत में साल 2007 में मनाया गया था। दरअसल, इस साल पुरुषों के अधिकार के लिए लड़ने वाली संस्था ‘सेव इंडियन फैमिली’ (Save Indian Family) ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस भारत में मनाया था। वर्तमान में 80 देशों में 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जाता है और इसे युनेस्को का भी समर्थन प्राप्त है। यह दिन मुख्य रूप से पुरुषों को भेदभाव, शोषण, उत्पीड़न, हिंसा और असमानता से बचाने और उन्हें उनके अधिकार दिलाने के लिए भी मनाया जाता है। जिस समाज में महिलायें पुरूषों के अधीन रहा करती थी, उसी समाज में आज महिलाओं द्वारा पुरूषों को भी प्रताडि़त किया जाने लगा है। महिलाओं की रक्षा के लिए बने कानून ही पुरूषों की प्रताड़ना का कारण बन गया है। आज इनसे उबारना पुरूषों के लिए अति आवश्‍यक हो गया है। आज पत्नियों से प्रताडि़त पतियों के लिए मुक्ति केंद्र तक स्‍थापित किये जा रहे हैं।

कहा जाता है कि हर कामयाब पुरूष के पीछे एक महिला का हाथ होता है, किंतु इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अब महिलाओं के कामयाबी के पीछे भी पुरूषों का योगदान बढ़ता जा रहा है। जिस पितृसत्‍तामक समाज में महिलाओं का घर से बाहर कदम रखना दुभर था, उस समाज में आज महिलायें पुरूषों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने लगी हैं। आज के अधिकांश पुरूष महिलाओं के काम में इसलिए हाथ बंटा रहे हैं ताकि आधी आबादी का प्रतिनिधित्‍व करने वाली महिलायें अपने भविष्‍य को संवार सकें, सदियों की गुलामी की दासता से आजाद हो सकें। लंबे समय से चले आ रहे उस भ्रम को तोड़ सके, जिसमें नारी को नर्क का द्वारा माना जाता था। जहाँ, महिलायें सिर्फ भोग-विलास की वस्‍तु के तौर पर उपयोग की जाती थी, वहीं आज वह अपनी योग्‍यता और क्षमता के कारण सम्‍मान प्राप्‍त कर रही हैं। आज के पुरूष यह समझने लगे हैं कि महिलाओं को यदि उड़ान भरने के लिए छोड़ दिया जाये तो वह आसमां को छूने में देर नहीं करेंगी।

किसी भी समाज में महिला और पुरूष नदी के दो किनारे नहीं बल्कि नदी की एक धारा है, जो एक के भी असहयोग से निर्वाध नहीं बह सकती है। इनके आपसी तालमेल के बिना समाज और जीवन दोनों बाधित होता रहेगा। यदि संतुलित समाज का निर्माण करना है तो दोनों को साथ-साथ चलना आवश्‍यक है। एक के बिना दूसरा अधूरा है। वर्तमान दौर का पुरूष महिलाओं की हर हिस्‍सेदारी को सहजता से स्‍वीकार करने लगा है। हर जिम्‍मेदारी को मिल-बांट कर उठाने लगा है। महिलाओं की सहभागिता, सलाह और निर्णय के बिना शायद ही कोई कदम उठा रहा है। आज का पुरूष महिलाओं को यह एहसास कराने में भी पीछे नहीं हट रहा है कि उन्‍हें अपनी रक्षा के लिए पिता, प्रेमी, भाई, बेटे के रूप में किसी रक्षक की जरूरत नहीं है, बल्कि वह स्‍वयं सक्षम है।

किंतु, एक स्‍याह पक्ष यह भी है कि बहुत सारे पुरूष आज भी ऐसे हैं जो महिलाओं को अपना गुलाम या फिर पैर की जूती ही समझ रहे हैं। सदियों से चली आ रही रूढि़वादी मानसिकता उनके दिमाग से नहीं निकल पा रही है। परिणामस्‍वरूप कभी निर्भया तो कभी श्रद्धा आदि जैसी घटनायें सामने आती रहती है। आज पूरे देश में आफताब और श्रद्धा के किस्‍से सुर्खियों में है। किसी डेटिंग एप के संपर्क में आने पर किसी के लिए ऐसा दुष्‍परिणाम साबित हो सकता है, यह सोच कर ही रूह कांप जाता है। जिस तकनीक को मानव सभ्‍यता के विकास का अहम् हिस्‍सा माना जा रहा है, उस तकनीक का इस्‍तेमाल कर कुछ कुंठित पुरूष महिलाओं को बर्बाद करने का जो प्रयास कर रहे हैं वह बेहद निराशाजनक है। यह पुरूषों की पितृसत्‍तामक सोच ही है जो ‘बुल्‍ली बाई एप’ के रूप में समय-समय पर सामने आती है। जब भी किसी पुरूष को यह लगने लगता है कि कोई महिला उसकी या उसके कामयाबी के आड़े आ रही है तो वह सबसे पहले उस महिला का चरित्र हनन करता है या फिर उसकी देह से अपनी भूख मिटाता है। या फिर हिंसा पर उतारू हो जाता है। या फिर मां-बहन अथवा जेंडर आधारित गालियों का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार पितृसत्‍तामक समाज का पुरूष अपनी पितृसत्‍तामक मानसिकता का तुष्टिकरण करता रहता है।

निष्‍कर्षत: हम यह कह सकते हैं महिला-पुरुष दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और दोनों को यह बात स्‍वीकार करनी ही होगी। पुरूषों का भी पालन-पोषण उसी माहौल में होनी चाहिए, जिस माहौल में महिलाओं की होती है। पुरूषों को श‍क्तिशाली बताना और महिलाओं को कमजोर बताने की मानसिकता भी खत्‍म करनी होगी। दोनों की प‍रवरिश सिर्फ योग्‍यता और क्षमता को ध्‍यान में रखकर ही करनी चाहिए। यदि लड़कियों पर सवाल उठाये जाते हैं तो लड़कों को भी सवालों के घेरे में रखना चाहिए। दोनों की परवरिश में समता और समानता का समावेश होना ही चाहिए।

एक के बिना दूसरे की कल्‍पना भी बेईमानी प्रतीत होती है। महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए पुरुषों को प्रताडि़त करना या फिर पुरुषों को आगे बढ़ाने के लिए महिलाओं को पीछे धकेलना दोनों ही गलत है। यह दिवस सफलता तभी सबित हो सकता है, जब समाज पुरुषों के योगदान को वह मान्‍यता दे, जिसके वे हकदार हैं और पुरुष भी महिलाओं को वह सम्‍मान अथवा तवज्‍़जो दे, जिसमें वह अपनी बराबरी को देख सके। महिलाओं को साथ लेकर बढ़ने में ही पुरुष दिवस की सार्थकता निहित है। साथ ही स्‍वस्‍थ और समतामूलक समाज की संकल्‍पना भी इसी में संभव है

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भाजपा की पसमांदा
राजनीति

भाजपा की “पसमांदा” पहल : मंशा और इरादा

 

हिन्दुतत्व को केंद्र में रखकर राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी अब पसमांदा मुसलमानों को अपने साथ जोड़ना चाहती है। भाजपा की छवि हमेशा से ही मुस्लिम विरोधी रही है। वो पिछले आठ सालों से सत्ता में है, इस दौरान उसपर यह आरोप और गहरा होता गया है। इन आरोपों के पीछे ठोस वजूहात भी हैं जिनकी जड़ें उसके हिन्दुतत्व की मूल विचारधारा में निहित है। पिछले आठ सालों के भाजपा के शासन काल के दौरान मुसलमान लगातार हाशिये पर गए हैं और उनके खिलाफ डर व असुरक्षा का माहौल बना है। आज की तारीख में मोदी सरकार में कोई मंत्री मुस्लिम नहीं है और सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसका कोई सांसद या विधायक मुस्लिम नहीं है। ऐसे में पसमांदा मुसलमानों को लेकर भाजपा में उभरे इस स्नेह के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

जाति भारतीय उपमहादीप की एक पुरानी बीमारी है। इलाकाई और सांस्कृतिक विभिन्नताओं के बावजूद जाति व्यवस्था इस क्षेत्र में लगभग सारे धार्मिक समूहों में पायी जाती है। हालाँकि इस्लाम में जाति की कोई व्यवस्था नहीं है लेकिन भारतीय मुसलमान भी जातीय विषमता के शिकार हैं। 2007 में आयी न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट में स्वीकार किया गया था कि भारत में जाति व्यवस्था ने मुसलमानों सहित सभी धार्मिक समुदायों को प्रभावित किया है। यह विडंबना ही है कि भारत में नीची माने जाने वाली जातियों के कई लोगों ने जातिप्रथा के उत्पीड़न से बचने के लिए इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाया लेकिन इसके बाद भी वे जाति व्यवस्था के मजबूत जकड़ से अपना पीछा नहीं छुड़ा सके। भारतीय नवशास्त्रीय सर्वेक्षण के प्रोजेक्ट पीपुल्स आफ सीरिज के तहत के।एस सिंह के सम्पादन में प्रकाशित “इंडियाज कम्युनिटीज” के अनुसार भारत में कुल 584 मुस्लिम जातियाँ और पेशागत समुदाय हैं। मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर पिछड़े वर्गों को जो 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है उसमें 79 मुस्लिम जातियां शामिल हैं जिनमें से अधिकतर पसमांदा हैं।

ऐसा माना जाता है कि भारत के मुस्लिम समाज का 85 फीसदी हिस्सा पसमांदा है। “पसमांदा” का अर्थ है ‘पीछे छूटे हुए’ या ‘दबाए गये लोग’। दरअसल पसमांदा शब्द का उपयोग मुसलमानों के बीच दलित और पिछड़े मुस्लिम समूहों के संबोधन के लिए किया जाता है।ऐसा माना जाता है कि ज्यादातर पसमांदा मुसलमान हिन्दू धर्म से कन्वर्ट होकर मुसलमान बने हैं लेकिन वे अपनी जाति से पीछा नहीं छुड़ा सके हैं। इनमें से अधिकतर की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति हिन्दू दलितों एवं आदिवासियों के सामान या उनसे भी बदतर है। संख्या में अधिक होने के बावजूद पसमांदा मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी काफी कम है। पहली से लेकर चौदहवीं लोकसभा तक चुने गए कुल 400 मुस्लिम सांसदों में केवल 60 पसमांदा सांसद शामिल हैं।

इसी गैरबराबरी को ध्यान में रखते हुये पसमांदा मुस्लिम लंबे समय से अपनी सामाजिक-आर्थिक बेहतरी के लिए संघर्ष भी कर रहे हैं, आजादी से पहले अब्दुल कय्यूम अंसारी और मौलाना अली हुसैन असीम बिहारी जैसे लोगों द्वारा इसकी शुरुआत की गयी। मौजुदा दौर में पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर जैसे नेता इस मुहिम की अगुवाई कर रहे हैं जिन्होंने “अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम महाज़” की स्थापना की है और “मसावात की जंग” जैसी किताब लिख चुके हैं। इस सिलसिले में मसूद आलम फलाही की किताब “हिंदुस्तान में जात-पात और मुसलमान” भी काबिले जिक्र है जो मुस्लिम समाज के अन्दर व्याप्त जातिगत ऊंच-नीच और भेदभाव का बहुत प्रभावी तरीके से खुलासा करती है।

देश की तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियों द्वारा पसमांदा मुसलमानों की अपेक्षा की गयी है लेकिन अब भाजपा जैसी हिंदुत्ववादी पार्टी ने इन्हें अपने साथ जोड़ने का इरादा जताया है। जुलाई 2022 में हैदराबाद में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मुस्लिम समुदाय के कमजोर और वंचित तबकों को भाजपा से जोड़ने की सलाह दी गयी थी। दरअसल भाजपा हिन्दू एकता के अपने विराट प्रोजेक्ट के तहत पहले ही ओबीसी के ग़ैर-यादव जातियों और ग़ैर जाटव दलितों के बीच अपना पैठ बना चुकी है, अब पसमांदा मुसलमानों को अपनी तरफ आकर्षित करके अपने सोशल इंजीनियरिंग को अभेद बना देना चाहती है। इसकी कवायद लम्बे समय से चल रही है, 2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा द्वारा पहली बार एक पसमांदा मुस्लिम अब्दुल रशीद अंसारी को पार्टी के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया। इससे पहले भाजपा अधिकतर शियाओं और कुछ हद तक बरेलवी मुसलामानों पर ही ज्यादा ध्यान देती थी। इसी प्रकार से उत्तर प्रदेश में दूसरी बार सत्ता हासिल करने के बाद इकलौते मुस्लिम मंत्री के रूप में दानिश अंसारी को जगह दी गयी जो एक पसमांदा मुसलमान हैं। 

गौरतलब है कि देश के पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, झारखंड और असम में मुस्लिम आबादी 19.26 प्रतिशत से 34.22 प्रतिशत के बीच है, जाहिर हैं इनमें से अधिकतर पसमांदा मुस्लिम हैं। इन पाँचों राज्यों में 190 से ज्यादा लोकसभा की सीटें आती हैं, इसके साथ ही दक्षिण भारत के राज्यों में भी पसमांदा मुस्लिमों की अच्छी तादाद है। इसी को ध्यान में रखते हुये भाजपा पसमांदा मुसलमानों को साधना चाहती है। इसके लिए भाजपा ने अपनी रणनीति पर अमल करना शुरू भी कर दिया है। पिछले दिनों संपन्न हुये मध्यप्रदेश नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा ने कुल 6671 पार्षद सीटों में से 380 सीटों पर मुस्लिमों को टिकट दिया था जिनमें से अधिकतर पसमांदा मुसलमान थे। इनमें से भाजपा के 92 मुस्लिम उम्मीदवार अपनी जीत दर्ज कराने में कामयाब भी रहे हैं। अब भाजपा पूरे देश में पसमांदा मुसलमानों की बस्तियों में स्नेह यात्रा निकालने की योजना पर काम कर रही है।

भारतीय मुसलमान

लेकिन भाजपा की यह रणनीति क्या केवल पसमांदा मुसलामानों के वोट हासिल करने की रणनीति है या इससे कुछ अधिक है। गौरतलब है भाजपा एक विचारधारा आधारित पार्टी है जिसका वैचारिक आधार  आरएसएस के हिन्दुतत्व की विचारधारा पर निर्भर है। इसीलिए एक पार्टी के तौर पर वो लम्बे समय की की योजना बनाकर काम करती है और इसके केंद्र में हिन्दुतत्व की विचारधारा निहित होती है।

इसीलिए भाजपा पसमांदा मुसलमानों तक अपनी पहुँच बनाकर एक तीर से कई निशाने लगाना चाहती है। सबसे पहला और बाहरी तौर पर दिखाई पड़ने वाला निशाना तो उनका वोट हासिल करना है, साथ ही मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से के भाजपा से जुड़ने के और भी फायदे हैं इससे मुस्लिम वोटों का बिखराव होगा और समुदाय का एक हिस्सा चुनावों में जातिगत आधारों पर बंट कर वोट कर सकता है। मुस्लिम वोटों का बिखराव का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को ही पहुंचाएगा और मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से के जुड़ने से उसकी छवि भी सुधरेगी खास करके अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर।

इस पहल के पीछे एक और छुपा मकसद हो सकता है जो संघ के लंबे समय की रणनीति का एक हिस्सा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत लम्बे समय से यह दोहराते रहे हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग हिन्दू हैं भले ही उनकी पूजा और इबादत का तरीका अलग हो। यहाँ संघ द्वारा “हिन्दू” को रहन-सहन के तरीके और संस्कृति के तौर पर परिभाषित किया जाता है। आजकल संघ और भाजपा के लोग यह कहते हुये भी दिखलाई पड़ते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानों (खासकर पसमांदा मुसलामानों) के पूर्वज एक ही हैं। इस कड़ी को बीते अगस्त में भोपाल में आयोजित हुये विश्व हिन्दू परिषद शिविर से समझा जा सकता है जिसके तहत संघ प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी में विश्व हिन्दू परिषद को मध्य प्रदेश के 9 जिलों में मुसलामानों और ईसाइयों के घर वापसी को लेकर अभियान चलाने की जिम्मेदारी दी गयी है। इस अभियान के लिए एक नारा भी तैयार किया गया है “शून्य प्रतिशत धर्मांतरण और शत प्रतिशत घर वापसी”।

पसमांदा आन्दोलन का एक नारा है “हिन्दू हो या मुसलमान पिछड़ा-पिछड़ा एक समान”। यह पसमांदा आन्दोलन की मूल आत्मा हैं। यह नारा धार्मिक पहचान की जगह सभी समुदायों के सामाजिक या जातीय रूप से संगठित करने की वकालत करता है। यह एक प्रगतिशील नारा है लेकिन भाजपा और संघ इसका अपनी तरह से फायदा उठाना चाहते हैं। हालांकि उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा क्योंकि पसमांदा आन्दोलन के नेता इस बात की आशंका जता रहे हैं कि कहीं अचानक पसमांदा समाज के लिए “स्नेह यात्रा” निकालने के पीछे मकसद मुसलमानों को आपस में लड़ा कर तोड़ने जैसी सियासत करना तो नहीं है? इस सम्बन्ध में ‘आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़’ के नेता अली अनवर द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खत भी लिखा गया है जिसमें वे कहते हैं कि ‘हम पसमांदा हैं और अब पेशमांदा (आगे रहने वाला) होना चाहते हैं और पसमांदा मुसलमानों को ‘स्नेह’ नहीं सम्मान चाहिए।’

इसी कड़ी में पसमांदा संगठनों द्वारा मोदी सरकार से अपनी मांगों को दोहराया गया है जिसमें तीन प्रमुख मांगें है। पहली मांग है अनुच्छेद 341 के तहत दलित मुस्लिमों को भी आरक्षण मिले दूसरा बिहार में जिस तरह से कर्पूरी ठाकुर ने आरक्षण का फार्मूला लागू किया था उसे अपनाया जाये और तीसरी मांग है पसमांदा मुस्लिमों के लिए नौकरी के अवसर और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के लिए सहायता मिले।

भाजपा के लिए इन मांगों को पूरा करना आसान नहीं होगा और शायद वो इस तरफ कान भी ना धरे, दूसरी तरह उसे पसमांदा मुसलामानों का विश्वास जीतना भी आसान नहीं होगा। पिछले सालों में मॉब लिंचिंग और पूरे समुदाय के खिलाफ नफरत का जो माहौल बनाया गया है उससे जाहिर तौर पर पसमांदा मुस्लिम भी बड़े पैमाने पर प्रभावित रहे हैं। लेकिन इन सबके बावजूद अगर भाजपा पसमांदा मुसलमानों के लिए एक ठोस कार्यक्रम करती है तो इसके प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह ना केवल भाजपा बल्कि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता है

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मोनिका ओ माय डार्लिंग
सिनेमा

मोनिका ओ माय डार्लिंग

 

मोनिका आज भी डार्लिंग है’

70 के दशक का अत्यन्त लोकप्रिय गीत ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ आज भी थ्रिल पैदा करता है, हेलेन का मादक क्लासिक नृत्य, रोमांच से भरपूर अदाकारी, हाव-भाव बाँधे रखता है। वासन बाला के निर्देशन में इसी टाइटल मोनिका ओ माय डार्लिंग से नेटफ्लिक्स पर सस्पेंस और रेट्रो संगीत के जादू से भरपूर मर्डर मिस्ट्री फिल्म आई है। फिल्म की कहानी जापानी लेखक केईगो हिगाशिनों के उपन्यास ‘बुरुतासु नो शिंजो’ का रूपांतरण है, कहानी का भारतीयकरण किया है योगेश चंदेकर ने, कहानी में सही-ग़लत, नायक-खलनायक, पाप-पुण्य जैसी स्टीरियोटाइप धारणाएं तोड़ी गई हैं इसमें मुख्य है कि परिस्थितियों के बीच मनुष्य के निर्णयों के परिणाम के वे खुद जिम्मेदार हैं दूसरे किस्मत कब आपको झटके में ऊँचाइयों तक पहुंचा दे और कब लुढ़काकर वापस पहले पायेदान पर नहीं पता। बढ़िया पटकथा, बेहतरीन निर्देशन, दमदार अदाकारी कहानी में अप्रत्याशित मोड़ और जबरदस्त संगीत फ़िल्म की सफलता के कारक है। बल्कि फ़िल्म का एक्स फैक्टर ही है रेट्रो टच के साथ अचिंत ठक्कर का अत्यन्त प्रभावशाली संगीत जो नॉस्टेल्जिया के साथ-साथ कहानी को तीव्र गति से आगे बढ़ाता है। बैकग्राउंड में भी रेट्रो-धुनों से सराबोर कहानी का फ्लो आपको पलक झपकाने का भी समय नहीं देते बल्कि आप एक बार भी कहीं इधर- उधर हुए कि आपको फ़िल्म रिवाइंड करनी पड़ जायेगी, जो थिएटर में संभव नहीं।

फिल्म मर्डर से शुरू होकर मर्डर पर ख़त्म होती है और रहस्य बरकरार शायद दूसरे पार्ट के लिए । पुणे शहर की एक प्रसिद्ध रोबोटिक कंपनी ‘युनिकोर्न’ मानव की सुविधा के लिए रोबोट बनाता है ताकि लेकिन एक रोबोट की तकनीकी गड़बड़ी (अथवा जानबूझकर की गई) से एक कर्मचारी की मौत हो जाती है लेकिन कंपनी का मालिक इस दुर्घटना को रफ़ा-दफ़ा कर देता है, कंपनी की 50वीं एनिवर्सरी पर कर्मचारियों को बोनस दे सबको खुश कर दिया, इस दुर्घटना के बारे में अब कोई कुछ नहीं बोलेगा। ‘फ़रीदी’ नाम के सुपरवाइजर को नौकरी से निकाल दिया जाता है वह बार बार सवाल कर रहा है। इस दुर्घटना (मर्डर) के छह महीने बाद फिर सीरियल मर्डर्स का सिलसिला चालू होता है, क़त्ल किसने किये, क्यों किये दर्शकों के सभी अनुमान फेल हो जाते हैं, रहस्य रोमांच, हास्य-भय को गीत-संगीत, सिनेमेटोग्राफी का अद्भुत् समायोजन व असाधारण ढंग से पर्दे पर उतारा है, दर्शक साँस रोककर फ़िल्म का आनंद लेते हैं।

6 महीने बाद ‘युनिकोर्न रोबोट कंपनी’ की मोनिका (हुमा कुरैशी) एक साथ तीन कर्मचारियों को ब्लैकमेल कर रही है तो तीनों मिलकर मोनिका की मर्डर की तैयारी करते हैं निशिकांत (सिकंदर खेर) उसका मर्डर करने की बात करता है जयंत (राजकुमार राव) बॉडी को ठिकाने लगाएगा और अरविंद (भगवती पेरूमल) से जंगल में फेंक देगा लेकिन पासा पलट जाता है पहले निशिकांत फिर अरविन्द का मर्डर हो जाता है, इनके बीच गौर्या (सुकांत गोयल) जो साइकिक है कहानी बढ़ाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, कौन कातिल है, कौन मर रहा है इसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी।  

अब वो महत्वपूर्ण तथ्य जिनका इस समीक्षा के माध्यम से मैं आपको ध्यान दिलाना चाहूंगी जिस वजह से फ़िल्म सिर्फ़ मर्डर मिस्ट्री से आगे भी बहुत कुछ कह जाती है जिसे पटकथा लेखन में संवादों में आसानी से पकड़ा जा सकता पर रहस्य रोमांच की गति में पकड़ में नहीं आते पर उन्हें भी जानना ज़रूरी है। कहानी एक ओर तेज़ी से बदलते परिवेश को दिखाती है तो दूसरी ओर वर्ग/वर्ण व्यवस्था की जड़ मानसिकता की ओर भी इंगित करती है; स्त्रियों की प्रगतिशील सोच सामने रखती है तो स्त्री के प्रति पुरुष की परम्परागत सोच भी उघाड़ कर रख देती है। कुछ संवादों से आपको रूबरू करवाती हूँ, अविवाहित लेकिन प्रेग्नेंट होने पर मोनिका किसी भी स्टीरियोटाइप फ़िल्मी डायलाग ‘मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ’ के स्थान पर कहती है “तुम बाप बनने वाले हो जय” सुनकर आपको हँसी आती है, लेकिन मोनिका कहीं भी चालाक या तथाकथित चरित्रहीन नहीं प्रतीत होती इसके लिए दोनों बराबर जिम्मेदार है। हमें लगता है जो सही भी लगता है कि वह ब्लैकमेल कर रही है लेकिन उसका कहना कि बच्चे की परवरिश पढ़ाई लिखाई के लिए पैसा तो चाहिए न”? ये तरीका कितना सही या गलत है इस पर सबके विचार अलग हो सकतें हैं, विवाह के बाद बच्चों की जिम्मेदारी अभिभावक लेतें हैं लेकिन अविवाहित होने पर सिर्फ लड़की को अपराधी की तरह कटघरे में खड़ी कर दिया जाता है लेकिन आज के युग में ‘मोनिका का चारित्रिक प्रमाणपत्र’ आप नहीं बना सकतें, यह फिल्म का महत्वपूर्ण ट्रीटमेंट का है कि आप नैतिकता को परिस्थितियों में कैद नहीं कर सकते, कौन सही है कौन गलत ? लेकिन आज भी कोई लड़का विवाह पूर्व बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता। हाल ही में श्रद्धा-अफताब का केस ज्वलंत उदाहरण हैं फिल्म में भी मोनिका के मर्डर की बात हो रही है एक दृश्य में जय मोनिका को मार रहा है और पीछे अंग्रेजी गाना चल रहा है Love You So Much (I Want to Kill You) “मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, तुम्हें मरना चाहता हूँ” 

तीनों में से कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता उनका रवैया वही कि “चलो मैं अच्छे डॉक्टर को जानता हूं और रफ़ा-दफा करते हैं”। मोनिका बेहिचक कहती है तू करा ले अबार्शन…तेरह साल की उम्र से खुद को संभालती आई हूं इस बच्चे को भी संभाल लूंगी… तू जिम्मेदारी तो उठाएगा नहीं कम से कम फोन नहीं उठा ले” एक सीन में निशिकांत कहता है मोनिका ने अरविन्द से भी कहा कि ‘अरविंद जूनियर उसके पेट में पल रहा है” जबकि अरविन्द तो एक पारिवारिक आदमी है, गोवा की कोंफ्रेंस में पी कर उनके सम्बन्ध बन भी गए तो क्या हुआ! “मुझे तो कुछ याद भी नहींयानी वो पारिवारिक है इसलिए उसे माफ़ किया जाना चाहिए। मरने से पहले मोनिका कहती है ‘तुम तो अच्छे लोग हो न’ सफ़ेदपोश लोगों पर कटाक्ष है।

मिडिल क्लास जयंत का कहना है कि “मुझे मिडिल क्लास के दलदल से निकलना था, बहुत मेहनत की, बहुत पढ़ाई की यहां तक पहुंचा” लेकिन निशिकांत उसके संघर्ष को सिरे से खारिज कर देता है कहता है “तुम पैरासाइट हो मैं तुमसे नफरत करता हूं, स्टाइलिश कपड़े यह सफेद जूते और यह खराब सड़े हुए परफ्यूम जिसमें तू नहा कर आया है इससे तुम हमारे जैसे नहीं होंगे रहोगे वही है” सदियों के सामाजिक वैषम्य को हम इस संवाद में देखतें हैं, इसी परिवेश में ‘फरीदी’ नामक व्यक्ति जिसे बलि का बकरा बना कर निकाल दिया गया यह उसके अनुसार “यदि आपकी फैक्ट्री की मशीनरी हंड्रेड परसेंट सुरक्षित है, सुपरवाइजर देव प्रकाश की मौत मशीन की वजह से नहीं हुई सर तो मुझे, फरीदी शेख, को नौकरी से क्यों निकाला गया? देव प्रकाश की मौत एक दुर्घटना थी उसमें रोबोटिक मशीनरी से कोई लेना-देना नहीं किसी कोई हाथ नहीं है! आई वांट आनसर राइट नाउ” लेकिन कोई जवाबदेही नहीं इसमें मशीनरी के दुष्प्रभाव और आदमी के मशीन होते चले जाने का संकेत है रोबोटिक पावर के नुकसान। रिश्तों में धोखेबाजी और छद्म व्यवहार भी नज़र आता है निशिकान्त के मरने पर उसकी बहन कहती है “क्या मैं दुखी दिख रही हूं? मैं दुखी दिखने की कोशिश कर रही हूं, मैं दुखी नहीं हूं, मुझे खुशी है कि वह कमीना मर गया…डैडू की पिछली शादी का बेटा था, डैडी ने मेरी मां के लिए उसकी मां को छोड़ा”

इन सबके बीच एसीपी नायडू के रूप में राधिका आप्टे के मजेदार सहज ढंग से अपना किरदार निभाया है नायडू खूब हँसते हुए कहती है “मुझे सीरियसली लेना, मेरी सूरत पर मत जाना अब मैं इतनी सुंदर हूं तो क्या करूं क्या करूं” साँप सीढ़ी के खेल-सी (पोस्टर भी देख सकतें है) इस मर्डर मिस्ट्री को डार्क कॉमेडी के साथ बहुत सलीके से प्रस्तुत किया गया है, रहस्य-रोमांच में हास्य का पुट दर्शक को बाँधे रखता है, फिल्म बिना किसी फूहड़ता, घटिया जोक्स का सहारा लिए आगे बढ़ती है, हयूमेर कहानी के साथ उभरता है। टिपिकल बॉलीवुड फिल्मों की तरह आप दिमाग साइड पर नहीं रख सकते बल्कि फिल्म आपसे अच्छी खासी कसरत करवाती है पर थकाती नहीं आपको मज़ा आता है जैसे जिसका क़त्ल करना था वह बच गया! जिसने क़त्ल करना था उसका ख़ून हो गया ! कातिल कौन है? “मोनिका का एक डायलोग ‘वाय वाय वाय वाय वाय नहीं, हाऊ हाऊ हाऊ हाऊ हाऊ’ यानी फ़िल्म में आपके सभी पासे ग़लत पड़ते जाते हैं और आपको लगता है ये कैसे हुआ? यही रहस्य रोमांच फिल्म को रोमांचक व मजेदार बना रहा है, क़ातिल कभी रोबोट, कभी इंसान, कभी साँप वो भी कोबरा है फिल्म में साँप सीढ़ी का खेल चल रहा है जिसकी किस्मत अच्छी होगी सांप से बच जाएगा अंत में जयंत का क्या हुआ दो-दो साँप उसे डसने को तैयार खड़े है इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी

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देवासुर संग्राम
खुला दरवाजा

देवासुर संग्राम का अर्थ

 

जब भी किसी पौराणिक टी.वी सीरियल या सिनेमा में देवासुर संग्राम के नाम पर भव्य,सुंदर दिखने वाले देवताओं अथवा प्रतापी राजाओं को बड़ी-बड़ी दांतों, सींगों, लाल-लाल आंखों वाले कुरूप, कदाचारी असुरों या राक्षसों से लड़ते देखता हूं तो हमारी ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक समझ पर शर्म आती  है। इस अधकचरी, पक्षपाती समझ को बनाने में हमारे प्राचीन साहित्य और पुराणों ने बड़ी भूमिका निभाई हैं। ये सारे ग्रंथ आर्य पुरोहितों या दरबारी कवियों द्वारा अपने स्वामियों की प्रशस्ति में लिखे गए। असुरों ने अपना इतिहास नहीं लिखा। या शायद उनका लिखा हुआ कुछ भी अब उपलब्ध नहीं है। प्राचीन भारत में देवों और असुरों का संग्राम वस्तुतः सदाचार और दुराचार, अच्छे और बुरे, सत्य और असत्य के बीच की लड़ाई नहीं थी। यह उस काल की अलग सभ्यताओं और संस्कृतियों के बीच का टकराव था। देव या सुर कहे जाने वाले आर्यों और असुरों में फर्क उनकी दैहिक बनावट और चरित्र का नहीं, उनकी अलग आस्थाओं, पूजा पद्धतियों और जीवन मूल्यों का था। यह फर्क इतना प्रबल था कि ऋग्वेद की सैकड़ों ऋचाएं असुरों की निंदा और उन्हें दिए गए शापों से भरी हुई हैं। असुर राज हिरण्यकश्यप ने वैदिक धर्म से प्रभावित अपने ही पुत्र प्रह्लाद की हत्या का प्रयास किया था। बावजूद इस आस्थागत फर्क के देवों और असुरों के बीच मित्रता, प्रेम और विवाह के भी असंख्य उदाहरण पुराणों और महाकाव्यों में भरे पड़े हैं। 

देवों और असुरों के बीच आस्थागत विभेद ने हिंसक संघर्ष का रूप तब लिया था जब आजीविका के लिए पशुधन पर निर्भर आर्यों द्वारा खेती की खोज हुई। अथर्ववेद के अनुसार वैवस्वत मनु के वंश के राजा वेन के पुत्र पृथी ने कृषि का आरंभ कराया। ऋग्वेद में कृषि को यज्ञ कहा गया है। उसे इतना पवित्र माना गया कि राजा को स्वयं हल पकड़कर खेती का आरंभ करने का आदेश है। कृषि आर्यों के जीवन में आमूल परिवर्तन लेकर आई। घुमक्कड़ आर्यों के स्थायी घर बने और परिवार नाम की संस्था की शुरुआत हुई। कालांतर में खेती या यज्ञ के लिए भूमि कम पड़ी तो उसके विस्तार के लिए उन्होंने आसपास के वनों की कटाई शुरू की। आजीविका के लिए वन-उत्पादों पर निर्भर आर्येतर अर्थात असुर जनजातियों – नाग, दैत्य, राक्षस, दानव आदि ने वनों की कटाई के बहाने आर्यों की विस्तारवादी नीति का मुखर विरोध किया। अपना जंगल बचाने के लिए वे सीधी लड़ाई में भी उतरे और छिपकर कृषि अथवा यज्ञ को नुकसान भी पहुंचाया। असुरों द्वारा आर्यों के यज्ञ में व्यवधान उत्पन्न करने और आर्य नायकों द्वारा यज्ञ-विरोधी असुरों के संहार के असंख्य किस्से प्राचीन साहित्य में बिखरे पड़े हैं। रामायण काल में राक्षसों के यज्ञ-विरोधी आक्रमणों का शमन करने के लिए ऋषि विश्वामित्र ने राजा दशरथ के पराक्रमी पुत्रों राम और लक्ष्मण की सहायता ली थी।

इस टकराव में देवों और असुरों के बीच असंख्य युद्ध हुए। हजारों साल चले इन युद्धों को देवासुर संग्राम कहा जाता है। इन युद्धों में विजय कभी देवों की हुई, कभी असुरों की। ऋग्वेद में देवराज इंद्र द्वारा वृत्रासुर की हत्या और असुरों के कई पुरों को ध्वस्त करने के उल्लेख मिलते हैं। युद्धों में ज्यादातर असुर ही देवों पर भारी पड़े थे। कई बार उन्होंने देवों को पराजित किया। कई असुर राजाओं ने देवराज इंद्र को उनके वैभवशाली राजधानी स्वर्ग से निष्कासित कर स्वयं उसपर आधिपत्य जमाया था। प्रतापी और दयालु असुरराज बलि का स्वर्ग विजय इसका एक उदाहरण है। उनसे अपना स्वर्ग छीनने में असफल देवों ने छल का सहारा लिया था। उन्होंने वामन ब्राह्मण के रूप में विष्णु को उनके पास भेजा जिन्होंने अपने घर के लिए तीन कदम भूमि की मांग के बहाने अपने तीन विराट कदमों से उनका पूरा साम्राज्य नाप लिया था।

पुराणों में देव बहुधा असुरों से पराजित होकर विष्णु, शिव, ब्रह्मा या दुर्गा से मदद की याचना करते दिखते हैं। एक शिव ही ऐसे थे जिनके प्रति देवों और असुरों में एक जैसा सम्मान था। वे सदा न्याय के पक्ष में खड़े दिखते हैं। उनके हस्तक्षेप से कई बार दोनों पक्षों के बीच सुलह हो सकी थी। दोनों पक्षों के संयुक्त प्रयास से समुद्र मंथन अर्थात समुद्र पार के देशों में लंबा व्यापारिक अभियान शिव की कोशिशों से ही संभव हुआ था। यह और बात है कि उस अभियान में संधि की शर्तों को तोड़कर देवों ने असुरों के साथ बड़ा छल किया था। मंथन में प्राप्त चौदह में से अधिकांश रत्नों को देवों ने आपस में बांट लिया था। असुरों के हिस्से में सिर्फ वारुणी आई थी। वे शिव थे जिन्होंने अभियान में प्राप्त विनाशकारी हलाहल पीकर विष के दुष्प्रभाव से संसार को बचाया और नीलकंठ कहलाए।

देवासुर संग्राम आज भी थमा नहीं है। आज कृषि के लिए तो नहीं, लेकिन उद्योगों और सड़कों के विस्तार के लिए अपने को सभ्य कहने वाले उद्योगपति और ठेकेदार आदिवासी जनजातियों की जीविका के एकमात्र साधन वनों की निर्मम कटाई में लगे हैं। इस लूट में देश की सरकार उनके साथ खड़ी है। अपने वन, अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए आदिवासी जनजातियां आज भी वनों की निर्मम कटाई का मुखर प्रतिरोध कर रही हैं। पिछले कुछ दशकों में माओवादी कही जाने वाली एक हिंसक राजनीतिक विचारधारा के समर्थकों के प्रवेश के बाद यह प्रतिरोध रक्तरंजित हुआ है। इस टकराव में पिछले पांच दशकों में हजारों लोगों और सुरक्षाकर्मियों की जान जा चुकी है। 

ज़रूरत आज फिर किसी नीलकंठ शिव की है जो इन दोनों संस्कृतियों और जीवन-मूल्यों, परंपराओं और आधुनिकता, प्रकृति के संरक्षण और विकास के बीच कोई सार्थक, सम्मानजनक रास्ता निकालकर इस संघर्ष का अंत करा सके

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लाल बहादुर शास्त्री का भारत
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लाल बहादुर शास्त्री के सपनों का भारत

 

आज़ादी के बाद भारत के सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण और भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ बनाने में जिन राजनेताओं ने उल्लेखनीय योगदान दिया, उनमें भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का योगदान अग्रणी है। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री पद संभालने वाले लाल बहादुर शास्त्री नेहरू सरकार में गृह मंत्री और रेल मंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के विचारों से गहरे प्रभावित रहे लाल बहादुर शास्त्री अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए आज भी भारत के आम लोगों द्वारा याद किए जाते हैं।

लाल बहादुर शास्त्री कैसे भारत का सपना देखते थे, इसकी एक झलक राष्ट्र के नाम उनके उस पहले सम्बोधन में मिलती है, जो उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद 11 जून, 1964 को दिया था। अपने इस सम्बोधन में जहाँ एक ओर शास्त्रीजी ने दिवंगत प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मार्मिक ढंग से याद किया। वहीं उन्होंने उस दुःख की घड़ी में देश की जनता को ढाँढस बँधाते हुए देश के आर्थिक-सामाजिक पुनर्निर्माण का आह्वान किया। अपने इस आह्वान में उन्होंने देश के सभी राजनीतिक दलों को भी सम्मिलित किया। भारत के पुनर्निर्माण का रास्ता बताते हुए उन्होंने समाजवादी लोकतंत्र के विचार पर ज़ोर दिया और कहा :

हर राष्ट्र के जीवन में एक वक़्त आता है जब वह इतिहास के चौराहे पर खड़ा होता है और उसे अपनी दिशा का चुनाव करना होता है। लेकिन हमारे सामने इसे लेकर कोई दुविधा या परेशानी नहीं है। हमारी राह सीधी और स्पष्ट है – हमें देश में समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना करते हुए हरेक की आज़ादी और समृद्धि को सुनिश्चित करना है और दुनिया के सभी देशों के साथ मित्रता और विश्वशांति को बढ़ावा देना है।[1]

देश की एकता और लोगों के बीच भाईचारे की भावना को शास्त्रीजी ने सर्वोपरि स्थान दिया और सेवा, सहानुभूति और मानवता पर बल दिया। इसी व्याख्यान में जवाहरलाल नेहरू की याद दिलाते हुए उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द और सहिष्णुता के भाव को भी रेखांकित किया। अपने इस व्याख्यान में उन्होंने भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक संरचना को लेकर अपने विचारों को जनता के सामने रखा। आर्थिक विकास और सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए शास्त्रीजी ने प्रशासनिक ढाँचे में व्यापक बदलाव को ज़रूरी बताया। जहाँ एक ओर वे अपने वक्तव्यों में प्रशासनिक अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों से अधिक दक्षता के साथ काम करने का आह्वान करते थे। वहीं उनसे यह अपेक्षा भी करते कि वे ग़रीब और कमज़ोर लोगों को तवज्जो देंगे और उनकी अनदेखी नहीं करेंगे। 

अक्टूबर 1965 में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक को सम्बोधित करते हुए भी शास्त्रीजी ने प्रशासनिक सुधारों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनका कहना था कि ‘प्रशासन को सुधारना बहुत ज़रूरी है। बिना इसे सुधारे अर्थव्यवस्था स्थिर नहीं हो सकती। प्रशासन के सुधारने से ही सरकारी योजनाएँ तेज़ी से पूरी की जा सकती हैं और निजी क्षेत्र में भी ज़िम्मेदारी से काम हो सकता है।’ ज़िले के विभिन्न सरकारी महकमों के बीच समन्वय बनाने और सरकारी योजनाओं और विभागों की कार्यपद्धति को किसानों और गाँवों के लिए सुविधाजनक बनाने पर भी शास्त्री जी ने ज़ोर दिया।

जय जवान, जय किसान 

लाल बहादुर शास्त्री ने सीमा पर चाकचौबंद सुरक्षा और देश के भीतर कृषि सुधारों पर बल दिया। उन्होंने सीमा पर तैनात जवानों और खेत में काम कर रहे किसानों को भारतीय लोकतंत्र के प्रहरी और निर्माता के रूप में देखा। अकारण नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कृषि ऐसे मसले थे, जो उनके भाषणों में बार-बार आते हैं। उनका कहना था कि ‘राष्ट्र की आय बढ़ाने और देश को समृद्ध बनाने का दायित्व प्रत्येक कृषिप्रधान देश में किसानों के विशाल कंधों का ही आश्रय लेता है।’

भारत आत्मनिर्भर बने और रक्षा और कृषि दोनों ही क्षेत्रों में भारत की शक्ति बढ़े, इस बात पर शास्त्रीजी ज़ोर देते रहे। इसी संदर्भ में 20 अक्टूबर, 1965 को राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर राष्ट्र के नाम अपने संदेश में आत्मनिर्भरता के विचार को रेखांकित करते हुए शास्त्रीजी ने कहा कि ‘आत्मनिर्भरता का मतलब यह है कि हमारे पास जो कुछ भी है उसका हम अधिक अच्छा इस्तेमाल करें और जो कुछ नहीं है, उसके बिना काम चलाने का हौसला रखें…जो लोग हमारी मदद के लिए आगे आते हैं, उनके हम कृतज्ञ हैं, शुक्रगुज़ार हैं। लेकिन हमें अपने ही पाँवों पर मज़बूती से खड़े होने के लिए भी तैयार रहना है और यह काम आज और अभी करना है।’

वर्ष 1964 में गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर आकाशवाणी से प्रसारित एक ऐसे ही संदेश में किसानों से पैदावार बढ़ाने और खाद्यान्न के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान करते हुए शास्त्रीजी ने कहा :

मैं, भारत के तीस करोड़ काश्तकारों से जो लगभग छह लाख गाँवों में रहकर, पैंतीस करोड़ एकड़ भूमि में कृषि उत्पादन करते हैं, इस संदेश द्वारा अपील कर रहा हूं कि वे देश की इस संकटकालीन स्थिति में खेतों की पैदावार अधिक-से-अधिक बढ़ाकर मातृभूमि की सेवा करें। अपने कुटुम्ब, समाज और देश के हित के लिए आज इससे बढ़कर कोई दूसरा कर्त्तव्य आपके सामने नहीं हो सकता।[2]

योजनाओं का निर्माण हिंदुस्तान के ग़रीब और कमजोर लोगों को ध्यान में रखकर हो, जिससे उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पहले से कुछ बेहतर हो सके, इस बात पर शास्त्री जी का ज़ोर था। खाद्यान्न के आयात से भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर जो बोझ पड़ रहा था, वह भी शास्त्रीजी के लिए चिंता का विषय थी। अकारण नहीं कि अपने इस संदेश में शास्त्रीजी ने जहाँ एक ओर पंचवर्षीय योजनाओं को सफल बनाने में कृषि की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। किसानों को उनकी मेहनत की वाजिब क़ीमत मिले, इसके लिए भी शास्त्रीजी सदैव चिंतित रहे।

इसी क्रम में उन्होंने व्यापारियों का भी आह्वान किया कि वे देश को इस संकट से उबारने में अपनी भूमिका निभाएँ और कालाबाज़ारी या जमाख़ोरी की प्रवृत्ति से बचें। हरित क्रांति की बुनियाद लाल बहादुर शास्त्री ने अपने इन्हीं प्रयासों से रखी थी। शास्त्रीजी ने पंचायती राज और सामुदायिक विकास की योजना की सफलता की कसौटी खेती को ही माना। और कहा कि :

पंचायती राज का सबसे ज़रूरी काम ज्यादा-से-ज्यादा कृषि उत्पादन कर देश की माली हालत सुधारनी है। खेती की पैदावार का विषय इतना महत्त्वपूर्ण है कि यही आजकल सामुदायिक विकास आंदोलन की सफलता की मुख्य कसौटी है। अगर लोगों के खाने के लिए अनाज बाहर से मंगाना पड़े और अपने उद्योगों के लिए ज़रूरी कच्चे सामान के वास्ते हमें दूसरे देशों का मुँह ताकना पड़े, तो देश की अर्थव्यवस्था की नींव कैसे मज़बूत बन सकती है और जनता के रहन-सहन का स्तर कैसे ऊपर उठ सकता है।[3] 

युद्ध नहीं, सृजन

ऐसे समय में जब दुनिया भर के शक्तिशाली देशों के बीच अणु बम बनाने या उसका परीक्षण करने के लिए एक होड़-सी लगी हुई थी। यहाँ तक कि पड़ोसी देश चीन भी अणु बम का परीक्षण कर चुका था। तब लाल बहादुर शास्त्री ने अणु बम की इस प्रतिस्पर्धा की आलोचना की। जमनालाल बजाज की जन्मस्थली बजाज ग्राम में दिए अपने एक भाषण में लाल बहादुर शास्त्री ने अणु बमों की संस्कृति को नकारते हुए सृजन और निर्माण का आह्वान किया। उन्होंने कहा :

आज हम एक नया समाज बनाना चाहते हैं, एक नया भारत बनाना चाहते हैं, हँसता खेलता हुआ देश देखना चाहते हैं, हम दुनिया में लड़ाई नहीं चाहते, हम एटम बम को नहीं चाहते इसलिए अणुबम या किसी तरह की लड़ाई, समर-महासमर यह हम नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि शांति के साथ देश का विकास करें। देश को बढ़ाएँ, ग़रीबी को मिटाएँ, बेरोज़गारी को दूर करें। लोगों को काम मिले और हमारे बच्चे नौजवान थोड़ा सुख सुविधा से रह सके। इस तरह के समाज की हमारी कल्पना है।[4]  

विदेश नीति

राष्ट्र के नाम अपने पहले ही सम्बोधन में शास्त्रीजी ने स्पष्ट कहा था कि विदेश मामलों की जहाँ तक बात है, सभी देशों के साथ मित्रता और सम्बन्ध स्थापित करना हमारी प्राथमिकता होगी। गुट निरपेक्षता की नीति को उन्होंने भारत की विदेश नीति का बुनियादी विचार माना। पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी बात रखते समय भी शास्त्रीजी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान साझे अतीत और साझी परम्परा से जुड़े हुए हैं। इसलिए उन्होंने इन दोनों देशों के बीच सौहार्द, मित्रता और परस्पर सहयोग पर ज़ोर दिया।

कोसीजिन के पहल पर जनवरी 1966 में हुए ताशकंद के ऐतिहासिक सम्मेलन के आरम्भ में 4 जनवरी को दिए गए अपने भाषण में भी शास्त्री जी ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर ज़ोर दिया था। उनका कहना था कि शांति की राह का अनुसरण करते हुए ही भारत और पाकिस्तान अपनी आर्थिक प्रगति सुनिश्चित कर सकेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रों के बीच मतभेद और जटिल समस्याओं को शक्ति प्रयोग या हथियारों के बल पर नहीं बल्कि बातचीत और समझौते से ही हल किया जा सकता है। क्योंकि सशस्त्र संघर्ष या युद्ध समस्या को सुलझाने की बजाय और बढ़ा ही देता है। इन्हीं बातों को चिह्नित करते हुए शास्त्री जी ने कहा :

हमारे कंधों पर एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। हमारे उस महाद्वीप में 60 करोड़ जनता बसती है। यह पूरी मानव-जाति का पाँचवाँ भाग है। यदि संघर्ष और बैर बना रहेगा, तो हमारे लोग और बड़ी-बड़ी मुसीबतों में फँसते जाएँगे। इसके बजाय कि हम आपस में लड़ें, हमें आज ग़रीबी, बीमारी और युद्ध के विरुद्ध युद्ध छेड़ना है। दोनों देशों के जनसाधारण की समस्याएँ, आशाएँ तथा सपने एक हैं। वे संघर्ष और युद्ध नहीं, शांति और प्रगति चाहते हैं। उन्हें अस्त्र-शस्त्र की नहीं, भोजन की आवश्यकता है, वस्त्र और घर की ज़रूरत है। यदि हमें अपनी जनता को इन आवश्यकताओं को पूरा करना है तो हमें इस सम्मेलन में कुछ ठोस और विशिष्ट उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील होना होगा।[5]

शास्त्रीजी उसी दिशा में प्रयत्नशील भी थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौते के मसौदे पर शास्त्रीजी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खाँ के साथ हस्ताक्षर किए। मगर उसी रात हृदयाघात हो जाने से लाल बहादुर शास्त्री का आकस्मिक निधन हो गया। इस तरह उस क़द्दावर और दूरदर्शी नेता के असमय मृत्यु के साथ भारतीय राजनीति के एक सुनहरे अध्याय का पटाक्षेप हो गया। बतौर प्रधानमंत्री शास्त्री जी ने देश की प्रतिरक्षा, कृषि और आर्थिक सुधार, निःशस्त्रीकरण, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, भाषा के जटिल प्रश्न आदि के संदर्भ में जो विचार प्रकट किए थे, वे मौजूदा दौर में और भी प्रासंगिक हो चले हैं। वर्ष 2022 में जब हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तो हमारा यह कर्त्तव्य हो जाता है कि हम शास्त्री जी के उन सपनों को साकार करें

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[1] सेलेक्टेड स्पीचेज़ ऑफ़ लाल बहादुर शास्त्री (नई दिल्ली : प्रकाशन विभाग, 1974), पृ. 4

[2] कृष्णबिहारी सहल (संपा.), लालबहादुर शास्त्री व्यक्तित्व और विचार (जयपुर : चिन्मय प्रकाशन, 1967), पृ. 480.

[3] वही, पृ. 482.

[4] वही, पृ. 493.

[5] वही, पृ. 576.