अंतरराष्ट्रीय

क्‍यूबा में नेतृत्व परिवर्तन

 

क्‍यूबा के बारे में जानने की मेरी उत्सुकता बहुत पुरानी है। जब मैं इंजीनियरिंग का छात्र था और स्टूडेंट फेडरेशन में शामिल हुआ था तब दिल्ली में मावलंकर हॉल में एक एजुकेशनल कांफ्रेंस हुई थी। उस कांफ्रेंस के बाद बहुत से छात्र चे गुयिवारा और फिदेल कास्त्रो के बारे में कुछ उसी क्रान्तिकारी रूमान के साथ बतिया रहे थे जैसे कि हम भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद या रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियों के बारे में बात कर रहे हों। तो चे और फिदेल हमारे आदर्श बने। उनके बारे में और अधिक जानने की उत्सुकता बढ़ी। तो कुछ किताबें छानीं।

लेकिन तब क्‍यूबा जाने की बात सोचना शेखचिल्ली के सपने से ज्यादा कुछ न होता इसलिए सोचा ही नहीं गया। हिन्दुस्तान में ही कश्मीर, शिमला और अंडमान देखना न पूरे होने वाले सपनों की तरह थे। फिर क्‍यूबा का तो इतिहास-भूगोल ही कुछ पता नहीं था। बहरहाल एक लम्बे अंतराल के बाद ही ये सभी जगहें देखने की इच्छा पूरी हो सकी। जनवरी 2019 में क्‍यूबा जाने का सपना भी साकार हुआ। क्‍यूबा पहुँच कर वहाँ का सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना समझने की कोशिश चलती रही तो वहाँ की राजनीति के बारे में जानने-समझने की इच्छा भी प्रबल रही।

लेकिन भाषा की समस्या बहुत आड़े आ रही थी। दुभाषिया महंगा सौदा था अतः गाईड और कैब ड्राईवर से काम चलाया। फिर जो अंग्रेजी बोलता दिख जाता दो चार बातें उससे हो जातीं। हवाना में केपिटल बिल्डिंग के सामने पहुँच कर मैने गाईड से पूछा कि अभी पॉलिटिकल सिचुएशन कैसी है? राऊल के बाद जो नये प्रेसीडेंट मिगेल डायस कानेल आए हैं उनका क्या हाल है? तो गाईड ने जवाब दिया कि बूढ़े लोगों का वही पुराना घिसा पिटा सोच होता है। राऊल कास्त्रो बहुत बूढ़े हो चुके हैं वो कुछ नया नहीं कर सकते। कुछ नया करने के लिए ऊर्जा चाहिए, क्रिएटिव मस्तिष्क चाहिए। कानेल युवा हैं उनमें एक नयी सोच भी है और एनर्जी भी है। तब मैने पूछा कि कम्युनिस्ट पार्टी पर अधिकार तो राऊल का ही है। वही फर्स्ट सेक्रेटरी यानि महासचिव हैं। गाईड बोला वो ठीक है पर चूंकि कानेल उन्हीं की मर्जी से प्रेसीडेंट बने हैं तो वह दखल नहीं देंगे। और उन्होंने 2021 में महासचिव का पद छोड़ने की बात भी कही है। इससे ज्यादा बात नहीं हो सकी।

बाद में मुझे पता चला कि राऊल ही कानेल के मेंटर (मार्गदर्शक) हैं और वे वाईस प्रेसीडेंट से प्रेसीडेंट उनकी मर्जी से ही बने हैं। राऊल ने उनके लिए ही प्रेसीडेंट का पद छोड़ दिया है। अब 19 अप्रैल को कानेल राष्ट्रपति के साथ-साथ क्‍यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया यानि फर्स्ट सेक्रेटरी भी बन गये। जैसाकि विगत में फिदेल कास्त्रो और राऊल कास्त्रो थे। यह क्‍यूबन कम्युनिस्ट पार्टी का शीर्ष स्थान है। कानेल से क्‍यूबा के लोगों की अलग अपेक्षाएं हैं। पहली अपेक्षा बेरोजगारी कम करना, आर्थिक सुधार और सामाजिक सुरक्षा तथा संतुलन बनाए रखने की है।कोरोना वायरस का संक्रमण 195 देशों में फैल चुका है. संक्रमित मामलों की संख्या पौने चार लाख के आस पास पहुंच रही है.

लेकिन पिछले वर्ष में कोरोना के चलते बाकी दुनिया की तरह वहाँ की आर्थिक स्थिति को भी बड़ा झटका लगा है। अर्थव्यवस्था में 11 प्रतिशत की गिरावट हुई है। यह इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि क्‍यूबा एक गरीब देश है। और अमेरिका तथा यूरोपियन यूनियन के प्रतिबंध यथावत हैं। ऐसी स्थिति में क्‍यूबा में स्थिरता और शांति बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। अमेरिका समर्थक असंतुष्ट भी काफी हैं। देखना यह है कि इस चुनौती से कानेल किस तरह निपटते हैं। क्या वह वर्तमान नीतियों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन करेंगे?

अपने पूर्ववर्ती शीर्ष नेताओं की आर्थिक नीतियों और विदेश नीति में आगे सुविचारित सुधारात्मक कदम उठाएंगे, यह सावधानी रखते हुए कि देश का सामाजिक ढ़ाचा भी न गड़बड़ाए। अमेरिका से। बिना दवाब झेले कूटनीतिक सम्बन्ध कैसे बेहतर हों यह भी बहुत कठिन काम है। अब कानेल की भविष्य नीति और दक्षता का पूर्वानुमान दो बातों से लगाया जा सकता है। पहला यह कि विगत वर्षों में कानेल की कार्यप्रणाली क्या रही है। और क्‍यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी तथा सरकार में उनकी भूमिका और प्रशिक्षण कैसा रहा है। कानेल के कैरियर की अगर बात की जाए तो 1982 में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की। उसके बाद तीन वर्षों तक क्‍यूबा की सेना में सेवाएं दीं जो कि हर क्यूबाई युवा के लिए आवश्यक है। कुछ और जिम्मेदारियाँ संभालते हुए 1993 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने।

यह वह समय था जब सोवियत संघ का विघटन हो चुका था। वहाँ साम्यवादी व्यवस्था खत्म हो चुकी थी। सोवियत संघ से मिलने वाली सहायता और सब्सिडी बंद हो गयी थी। पेट्रोल, खाद्यान्न और दवाईयों की भारी कमी थी। यह समय क्यूबा के लिए बहुत परेशानी का समय था। इसे ‘स्पेशल पीरियड इन पीस टाईम’ कहा गया। तब वेनेजुएला ने तेल दिया और बोलीविया ने सहयोग किया। ह्यूगो शावेज फिदेल के बहुत निकट थे। इस समय पर्यटन पर फिर जोर दिया गया। इस कठिन समय में कानेल की कार्यक्षमता के दम पर 2003 में उन्हें पोलित ब्यूरो का सदस्य बनने का अवसर मिला। यहाँ से उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ गयीं, साथ ही चुनौतियाँ और कार्यनिष्पादन की अपेक्षाएं भी।

2006 में फिदेल कास्त्रो गंभीर रूप से बीमार हो गये और सार्वजनिक जीवन से अलग हो गये। तब राऊल कास्त्रो कार्यकारी राष्ट्राध्यक्ष नियुक्त हुए। 2008 में फिदेल कास्त्रो ने त्यागपत्र दे दिया और राऊल कास्त्रो क्‍यूबा के राष्ट्रपति और क्‍यूबन कम्युनिस्ट पार्टी के फर्स्ट सेक्रेटरी बन गये। राऊल कास्त्रो के साथ कानेल की अच्‍छी समझदारी थी। 2008 से ही क्‍यूबा में कृषि सुधार लागू हुए। एक वर्ष बाद ही 2009 में कानेल को उच्च शिक्षा का मंत्री तथा प्रारंभिक उपराष्ट्रपति बना दिया गया। 2010 से कुछ और सुधार शुरू हुए। नागरिकों को छोटे निजी व्यवसाय की छूट दी गयी। 2011 में क्‍यूबा के नागरिकों को व्यक्तिगत तौर पर घर खरीदने-बेचने का संवैधानिक अधिकार दे दिया गया।

अगस्त 2012 में क्यूबन एनर्जी नामक सार्वजनिक कंपनी ने पहला सोलर संयंत्र स्थापित किया। यह कंपनी क्यूबन सोलर ग्रुप की सदस्य थी। 2013 में दस और सोलर प्लांट लगाए गये। जिनसे अनेक भागों में विद्युत आपूर्ति संभव हो सकी। इसी वर्ष कानेल को फर्स्ट वाईस प्रेसीडेंट चुना गया। क्‍यूबा पर तमाम आर्थिक पाबंदियों के चलते वहाँ बड़ा आर्थिक संकट था। समुद्री तूफानों के कारण भी परेशानियाँ बढ़ गयी थीं। आय के स्रोत सीमित थे। शकर, तंबाकू, सिगार, मछली, कॉफी, चावल, आलू और पशुओं के निर्यात पर अर्थव्यवस्था टिकी हुई थी। पर्यटन कम हो गया था। ऐसे में क्‍यूबा के सामाजिक ढांचे को छिन्नभिन्न होने से बचाना और अमेरिका समर्थक असंतुष्टों से निपटना बहुत कठिन कार्य था।

राऊल कास्त्रो

राऊल कास्त्रो क्‍यूबा की आजादी के लिए सशस्त्र विद्रोह तथा अमेरिकी साजिशों निपटने तथा क्‍यूबा के लोगों को बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति, उनकी हौसला अफजाई तथा तथा असंतुष्टों से निपटने के कौशल में फिदेल कास्त्रो के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे थे। अब उन्हें एक समर्थ उत्तराधिकारी की तलाश थी। जिसे उन्होंने कानेल के रूप में पहचाना और विकसित किया। ऐक बात यह थी कि कानेल ने न तो क्‍यूबा की मुक्ति की लड़ाई देखी थी न लगातार युद्ध और भयानक साजिशों से निपटने का उनका अनुभव था पर नीति निर्धारण और उनके कार्यान्वयन में वे पारंगत थे। इसीलिए राऊल कास्त्रो के विश्वासपात्र थे।

इसका सुफल यह मिला कि 2018 में वह क्‍यूबा की राज्य समिति के अध्यक्ष नामित हुए और 2019 में क्‍यूबा के राष्ट्रपति। इसी वर्ष नया संविधान बना। खाद्य सामग्री की राशनिंग की। राऊल कास्त्रो ने राष्ट्रपति पद छोड़ दिया। अब वे सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी के फर्स्ट सेक्रेटरी थे। जो वहाँ की राजसत्ता में सर्वोच्च स्थान है। 19 अप्रैल 2021 को उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया और मिगेल डायस कानेल को वहाँ की नेशनल असेंबली द्वारा चुने जाने के बाद राष्ट्र की बागडोर सौंप दी। यह करीब-करीब तय था क्योंकि राऊल कास्त्रो ने 2021 में कमान छोड़ने की बात पहले ही बता दी थी।

दुनियाभर ने इसे कास्त्रो परिवार के अंत के रूप में देखा। अब कानेल की भविष्य की क्या नीति होगी इसे उनके कांग्रेस मे दिए गये वक्तव्य के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं। हम अपने विचारों पर दृढ़ हैं। इतिहास (अतीत) को समझते हैं। भविष्य पर विचार किया है। मतलब विचारों पर दृढ़ हैं तो विचारधारा अपरिवर्तित रहेगी। इतिहास से जो समझा है, सबक लिए हैं भविष्य उनके आलोक में समझा जाएगा और हर स्थिति पर विचार करने के बाद ही आगे बढ़ा जाएगा।

दरअसल कानेल एक अनुशासित व्यक्ति हैं, प्रशासनिक दक्षता रखते हैं, अपने देश के साथ-साथ दुनिया की नब्ज भी समझते हैं। उनमें लचीलापन भी है। विगत दो वर्षों में तमाम उद्योगों और सेवा क्षेत्र में निजी भागीदारी को प्रोत्साहन दिया है। पर्यटन और निर्यात को बढ़ाया है। हाल ही में इंटरनेट को सरकारी जकड़ से मुक्त किया है। दक्षिण अमेरिकी और कैरीबियन पड़ोसी देशों से सम्बन्ध सुदृढ़ किये हैं। लेकिन अगर हम अन्य साम्यवादी देशों में अपने उत्तराधिकारियों का इतिहास देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वहाँ बाद के शासक पूंजीवादी उदारीकरण और व्यापार के प्रभाव में फंसते चले गये। एकदलीय शासन बना रहा पर समाजवादी समाज निर्माण का लक्ष्य अधूरा ही रहा।

चीन का उदाहरण सामने है। क्‍यूबा के बाद मैं वियतनाम भी गया। वहाँ भी यह देखा कि व्यापार प्रमुख है। उनके चीन और अमेरिका दोनों से अच्‍छे सम्बन्ध हैं। व्यापारी धनी हैं, जनता खाने कमाने लायक। गरीबी भी कायम है। कानून व्यवस्था बेहतर है। क्‍यूबा के संदर्भ में अभी पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन कानेल की अब तक की कार्यशैली से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह कोई भी जरूरी कदम सावधानी और संतुलन के साथ ही उठाएंगे। लेकिन आर्थिक सुधारों को गति अवश्य देंगे। आखिर उत्तरजीविता उर्फ सर्वाईवल का सवाल तो है ही।

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राजनीति

विपक्ष खत्म और तीसरा पक्ष लाचार क्यों ?

 

आजादी मिलने के साथ ही साथ कांग्रेस का लालच भारत की सत्ता को पाने के लिए हमेशा से रहा। आजादी के बाद जैसा कि गांधी ने कहा था कि अब काग्रेस की जरूरत नहीं, इसे बंद कर देना चाहिए और इसके चलते नेहरू, पटेल और मौलाना आजाद ने उनसे दूरी बना ली। उससे एक कदम आगे बढ़ते हुए जयप्रकाश, लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव ने सड़क पर और संसद में कांग्रेस और नेहरू दोनों को चुनौती दी और विपक्ष क्या होता है इसकी मिसाल प्रस्तुत की। आगामी चुनावों में देश ने देखा उत्तर भारत के युवाओं ने आगे बढ़ चढ़कर कांग्रेस की मुखालफत शुरू की और एक नए सपनों के साथ भारत की तस्वीर देखी और पूरे देश की जनता को दिखाई।

उस राजनीतिक युद्ध में तमाम ऐसे चेहरे बाहर निकल कर आए जो हमेशा सत्ता को चुनौती देते रहे और किसानों,  मजदूरों के हक की बात करते रहे,  लेकिन जब इन ताकतों को सत्ता मिली तो वह भी पुरानी सत्ता की तरह ही संवेदनहीन होते दिखाई दिए। इसका एक मुख्य कारण इन लोगों का कम्युनिस्टों से सम्बन्ध होना ही रहा। लोहिया ने इस देश को कम्युनिस्टों के घिनौने चेहरे से हमेशा सचेत किया उन्होंने कहा कि कम्युनिस्टों की अंदरूनी जांच करके पता लगाया जाए कि जब उन्होंने भारत विभाजन का समर्थन किया तो उनके मन में क्या था। संभवतः भारतीय कम्युनिस्टों ने विभाजन का समर्थन इस आशा से किया था कि नवजात राज्य पाकिस्तान पर उनका प्रभाव रहेगा,  भारतीय मुसलमानों में असर रहेगा और हिन्दू मन की दुर्बलता के कारण उनसे निपटने का कोई भारी खतरा भी ना रहेगा।

लोहिया हमेशा एक कट्टर विपक्ष की तरह संसद में घुसकर कांग्रेस को चुनौती देते नजर आए। वह समाजवाद के खेमे के उन ढुलमुल नेताओं की तरह नहीं थे जो सत्ता या सहारा लेने के लिए बार-बार कांग्रेस का दामन थाम लेते हैं,  वो कहते थे कि एक सच्चे समाजवादी को कांग्रेस और कम्युनिस्टों से हमेशा दूर रहना चाहिए। लेकिन जिन लोगों ने उनका नाम लेकर सत्ताएं हासिल की आज वह भी भ्रष्टाचार के गलियारों से खुद को,  अपनी पार्टी को और अपने परिवारों को दूर ना रख पाए। नेतृत्व के नाम पर देश को नए नेतृत्व देने की बजाय उन्हें हमेशा अपने ही पुत्र तक सीमित रखने की भरपूर कोशिश की। पिछले दशकों तक जहां हम लोहिया और जयप्रकाश के पद चिन्हों पर चलने वाले नेताओं की लंबी कतार देखते थे आज वह विरासत नई युवा पीढ़ी में जाने की बजाय केवल उन नेताओं के परिवार और पुत्रों तक ही सीमित रह गई जो कि देश के लिए एक बहुत खतरनाक विषय है।

समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह के परिवार और उत्तर प्रदेश तक सीमित होकर रह गयी, यही हाल लालू प्रसाद यादव की जनता दल का बिहार में और शिव सेना का महाराष्ट्र में है। इस देश को लोहिया का समाजवाद ही बचा सकता है लेकिन कब वह समाजवाद धीरे-धीरे का मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के परिवार का सपावाद बनकर रह गया, उत्तर प्रदेश यह समझ ही नहीं पाया। यही बजह रही कि यह दल न तो सोच में पूरे देश को ले पाए और न ही पूरे देश में फैल पाए, अब तो अपने राज्यों में ही अस्तित्व तलाश रहे हैं। लोहिया के व्यक्तित्व को अगर हम बहुत गहराई से देखें तो पाएंगे कि लोहिया कभी रिक्शे पर नहीं बैठे और उनका मत था कि जब भी किसी को कोई चीज देनी हो तो अपनी सबसे प्रिय वस्तु देनी चाहिए। हंसी ठिठोली का अंदाज भी अद्भुत था,  एक बार किसी ने कहा कि आप नास्तिक हैं आप भगवान का नाम ले लिया करिए बुढ़ापे में बहुत दिक्कत होगी तो वह कहते – तुम्हारा भगवान मुझे बुढ़ापे की कमजोरी में सताएगा, अभी जवान हूं कभी आए।

लेकिन उसके बावजूद लोहिया ने अपने लेखों में राम, सीता, द्रौपदी, कृष्ण, शिव को लेकर बहुत विस्तार से चर्चा की और इन सबको भारत को एक सूत्र में पिरोने का आधार माना और यह भी माना कि भारतीय राजनीति पर राम, कृष्ण और शिव का ही पूरा असर है। और इन लोगों ने हमेशा उन ताकतों का साथ दिया जो भारत को जोड़ने के बजाए तोड़ने में लगी रहीं। हमेशा आस्था पर ही सवाल उठाए और वह भी केवल वोट बैंक के लिए। अपने समाजवादी साथियों से लोहिया हमेशा कहते हैं कि अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाओ, लेकिन यह बात उनके पदचिन्हों पर चलने वाले नेताओं को समझ में नहीं आई,  वह अपने बच्चों की शिक्षा, अपना इलाज सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में कराने की बजाय महंगे,  यहां तक कि विदेशी अस्पतालों में ढूंढने लगे।

लोहिया कहते थे कि हर भारतीय चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान उसे समझना होगा कि गजनी, गौरी, बाबर हमलावर थे और रजिया, शेरशाह और जायसी उनके पुरखे। दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मकबूल फिदा हुसैन से कहा था यह जो तुम बिरला टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो रामायण को पेंट करो,  लेकिन यह बात समझने और समझाने की बजाय परिवारवादी राजनीतिक दलों ने इस देश में हमेशा मुसलमानों को वोट बैंक की तरह प्रयोग किया। देश के हिन्दू और मुसलमान दोनों को यह सोचना होगा कि जो दल पूरे देश को नही सोच सकते,  केवल अपने परिवार की ही सोच रहे हों वो देश की अखण्डता के लिये कितने ज्यादा खतरनाक होंगे

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क्षमा बिंदु
हाँ और ना के बीच

जिन्दगी का आस्वाद अपने प्याले से

 

जब सोनिया ने हमारी मित्र-मंडली को ज्वाइन किया, हम मंडी हाउस के एक चबूतरे पर छोटे-छोटे गिलासों से बिना छलकाए चाय पीने की कोशिश करते हुए गुजरात की क्षमा बिंदु के ‘स्व-विवाह’ पर अपनी-अपनी राय झोंक रहे थे। हाय-हैलो के बाद अधबीच छूटे मुद्दे पर बात आगे बढ़ी। सोनिया के माथे की सलवटों से जाहिर था कि वह इस बारे में कुछ नहीं जानती। वह ध्यान से इंदु को सुनती रही जो एक दुत्कार-भाव के साथ कह रही थी – “’पब्लिसिटी स्टंट है यह! या बिना किसी दायित्व के मार्केट और ग्लैमर की चकाचौंध में डूबी युवा पीढ़ी की सनक। छड्डो यार इस बेमतलब की बात को।“ यह सुनकर इतनी देर से शांत बनी मैं और चुप न रह सकी- “’पब्लिसिटी स्टंट’ शब्द स्त्रियों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगा है इन दिनों। यह शब्द किसी भी स्त्री के लिए प्रयोग होने पर मन अडोल सा हो जाता है। कितनी ही मर्मांतक घटनाएँ मन में कौंध जाती हैं।

प्रसिद्धि के शिखर पर आसीन किसी शख्स पर बलात्कार जैसे जघन्य जुर्म का आरोप हो तो भी कितनी आसानी से न्याय से मुँह फेर कर मामले को लड़की के ’पब्लिसिटी स्टंट’ के खाते में डाल दिया जाता है। परमुखापेक्षी हिन्दी समाज से यह उम्मीद करना तो फ़िज़ूल ही है कि वह स्थापित ‘देवमूर्तियों’ के बारे में कुछ प्रतिकूल सुन-समझ सकेगा। लेकिन हम एतराज़ और इल्जाम के बाजारू शब्दों के ढेलों से इसकी सम्भावना ही कुचल देते हैं। अन्यथा कम से कम न्यूनतम संवेदना के साथ मासूम बच्ची की ओर से सोचकर देखने, पीड़ित स्त्री के मनोविज्ञान में झाँकने की ईमानदार कोशिश की जा सकती। स्त्री यथास्थिति से उलट कुछ भी करे, उसे ’पब्लिसिटी स्टंट’ कह दिया जाता है। शादियों में आडम्बरपूर्ण अनुष्ठान और दिखावे सबके लिए गलत हैं।

यह समाज के सामूहिक चेतन का दोष है और इसमें सुधार की बातें काफी समय से की जा रही है। ‘गुनाहों के देवता’ समेत हिन्दी की तमाम रचनाएँ इन सुधारों को अपरिहार्य बताती हैं और इस बात पर अचरज और अफसोस जताती हैं कि विवाह समारोह दूल्हे-दुल्हन से भी महत्वपूर्ण हो जाता है। जो समय और संसाधनों की इस फिजूलखर्ची को गलत समझते हैं, वे भी किसी कमजोर यानी समाज के अनुमोदन से वंचित शख्स की नब्ज दबाकर अपना दायित्व पूरा मान लेते हैं। रंजना, तुम्हारी असहमति यह है कि इतना महँगा लहँगा पहन कर, इतना खर्चा कर आत्मप्रेम का ढिंढोरा पीटकर अपने साथ रहना शुरू करने में क्या तुक है है। क्या तुम बताओगी कि तुम्हारी शादी में कितना खर्च हुआ था?“

“मेरी ही क्यों, यहाँ मौजूद सबकी शादियों में घर वालों ने अपनी सीमा से अधिक खर्च किया था। अपुन तो उनमें से हैं कि साफ बोलो और सुखी रहो। साफ–सच्ची बात यह है कि वर पक्ष ने हमारी हैसियत का और खर्चों के बजट का अनुमान लगाकर, उस आधार पर ही हमें चुना। पुरुष किसी अन्य स्त्री के साथ प्रेम में बंधा हो तो भी अपनी सामाजिक हैसियत के अनुरूप पत्नी पाने की लालसा में अपनी कीमत आँकता है। प्रेमिका का पलड़ा हल्का हुआ तो सही वजन की ओर मुड़ जाता है। मगर जिसे दूल्हाविहीन शादी करनी हो, उसे किसके दवाब में यह सब करना था? अब भी उसे क्या जरूरत पड़ेगी खुश दिखने की कोशिशों के अनवरत सिलसिले के रूप में वस्त्र-परिधान, साज-सज्जा, प्रसाधन में खुद को उलझाए रखने की?” रंजना ने यह जवाब दिया तो उसकी फेसबुक पोस्ट को याद करते हुए मैंने सवाल दागा, “ठीक, शादी के दिन को छोड़ें। मगर हर सालगिरह पर जो इतनी तड़क-भड़क और शान-शौकत वाली फोटो डालती हो और शादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर भव्य समारोह की योजनाएं बनाती रहती हो, उसे क्या कहा जाए?”

बीच में ही सोनिया बोल उठी, “रंजना क्या कह रही थी तुम? दूल्हा-विहीन शादी?” “उसे वर नहीं चाहिए था मगर शादी के उत्सव की लालसा थी। अनुष्ठान का शौक पूरा करना था।” मधु ने कहा तो सोनिया को गुजरात की क्षमा बिंदु द्वारा शादी के सारे अनुष्ठान कर खुद से शादी करने के प्रसंग की जानकरी हुई। बीच-बीच में सब अपनी सूचनाएं जोड़ते जाते। कोई बताता उसने दर्पण में अपनी छवि को चूमा। खुद ही दूल्हा बनी, खुद ही दुल्हन। अपने नाम का सिंदूर भी डाला। किसी ने जोड़ा कि पंडित उसकी शादी घड़े, पेड़ … निर्जीव चीजों से करवाने के लिए तैयार था मगर ‘आत्म-विवाह’ सुनकर वह बिदक गया। फिर भी क्षमा ने पूरे विधि-विधान से फेरे लिए, कसमें लीं। हनीमून के लिए एक सुंदर जगह गई। एक सेलीब्रिटी की तरह मीडिया को दूर रखा। समाज और नेताओं का विरोध तो स्वाभाविक ही था। उनका कहना था कि वह हमारी संस्कृति को दूषित कर रही है। यह परम्पराओं का उपहास है, विवाह संस्था का उल्लंघन है।

…सब अपने-अपने अनुभव जोड़ ही रहे थे कि बीच में ही सोनिया की तल्ख आवाज फूट पड़ी – “यही, यही है सबके लिए समस्यात्मक पहलू कि इससे संस्कृति, यथास्थिति में छेद हो रहा है। अविवाहित स्त्रियों को परंपरा कायम रखने में जोतने की सबकी मंशा को उसने बेअसर जो कर दिया। कोई स्त्री अपनी रचनात्मकता, आजादी को जीने या किसी भी वजह से विवाह के पचड़े में न पड़ना चुने तो वह सबको ऐसी कोरी स्लेट नजर आती है, जिस पर कुछ भी लिखा जा सके। सब अपनी-अपनी जरूरत के छोटे बड़े अनगिनत काम उसे सौंपते रहते हैं, वह भी अपनी सुविधानुसार। सुबह, शाम दोपहर, रात, देर रात। उनका कोई समय उनका नहीं समझा जाता। रिश्तेदार और परिजन तो उसके हर पल पर अपना हक समझते हैं, इस हद तक कि उसे यह सोचने का अवकाश भी नहीं मिल पाता कि इससे बहुत कम ऊर्जा में तो विवाह ही निभ जाता। दुनिया गृहस्थ-जनों के एकांत में सेंध लगाने से कुछ परहेज़ करती है, लेकिन एकाकी स्त्री के जीवन में निजी पल समाज के वर्तमान ढाँचे में असंभव से जान पड़ते हैं।

अविवाहित स्त्री की सारी ऊर्जा परंपरा को पुष्ट करने, पुरुष सदस्यों के विकास में जबरन लगाई जाती है। कुछ कसर रह जाए तो वह शैक्षणिक संस्थाओं का सामंती ढाँचा पूरा कर देता है। अकादमिक वृत्त में स्त्री की प्रतिभा और रचनात्मकता वरिष्ठों और पुरुष समकक्षों को चमकाने के लिए इस्तेमाल कर ली जाती है। किसी पुरुष संबंधी के बिना उसे सीखने-सिखाने के स्पेस भी नहीं मिलते। ऐसे में अगर स्वस्थ प्रतियोगी परीक्षा न हो तो अव्वल तो नौकरी उसे मिलेगी नहीं, मिलेगी तो अतिरिक्त जिम्मेदारियों से लाद दी जायेगी। उसके बोझ तले उसके लिए सृजन का सुख तो दूर, स्वास्थ्य का ध्यान रखना तक दुष्कर हो जाता है। हमारे समाज में स्त्री का स्व-मूल्य तो नगण्य ही होता है। उसका सामाजिक पद रिश्तों से संदर्भित होता है। अन्यों से सम्मान, गरिमा और देख-रेख न मिलना स्त्री का अपना चुनाव था तो इसे लेकर कोई शिकायत नहीं। मगर उसे अपने जीने के मायने खुद अपने भीतर खोजने पाने के लिए तो अकेला रहने दिया जाना चाहिए। उसके ‘स्व’ का थोड़ा सा हिस्सा तो उसके लिए रहने दें।”

आमतौर पर मितभाषी सोनिया का यह रूप देखकर हम सब भौंचक्के थे और कुछ शर्मिंदा भी। मधु ने कहा “हाँ यार, यह कुसूर तो हमारा भी है। रात के दो बजे भी जरूरत पड़ी तो तुझे फोन कर लिया। घर में कुछ खटपट हुई तो बैग उठाकर तेरे घर पहुँच गए। कभी तुम्हारा रूटीन नहीं पूछा।” सोनिया ने रुँआसे स्वर में कहा – “यार तुम पुरानी दोस्त हो, फिर भी मैं तुम्हें और अपनों को यह एहसास नहीं करवा पाई कि इस तरह जीने के लिए घर-बाहर एक बड़ी कीमत चुकानी होती है। हर संभावना खुली थी, लेकिन उसे नकारने के फैसला लिया तो इसके पीछे कुछ तो सोच रही होगी। किसी ने इतना तक न सोचा कि हम इसकी सारी ऊर्जा लगा भी कहाँ रहे, उसी जीवन-पद्धति की बाधा दूर करने में, जिसकी सुविधाओं को इसने अपने लिए नकारा है। मगर लेखन में ‘निजता’ और ‘आजादी’ की बड़ी बड़ी बातें करने वाली लेखिकाएँ भी किसी भी समय घंटी घनघना देती हैं।

“सोचती हूँ कि काश मेरे दिमाग में क्षमा बिंदु की तरह अपने आप से शादी करने की सार्वजनिक घोषणा करने का विचार आया होता तो जिन्दगी जाया होने से शायद बच जाती।” उसने फिर दोहराया कि “ किसी ने नहीं सोचा या पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ। वे यह कैसे समझ सकते कि अपने समय को सार्थक उपक्रमों में बदलने के अपने मूल्य-बोध को मौका देना चाहती हूँ।” रंजना बोली “हमारी शादी में तो सोनिया, तू भव्य आयोजनों के खिलाफ होने के कारण नहीं आई। अपने से शादी कैसे करती?” सोनिया ने जवाब दिया कि “सादगी मेरा जीवन मूल्य है तो दूल्हा कोई पुरुष होता या मैं खुद–शादी सादगी से ही होती। मगर समाज को संदेश जाता कि मैंने अपने साथ जीना चुना है। अपने समय की मिट्टी से, अपने स्वप्नों से कुछ सार्थक रचने का।

मेरी जिन्दगी कोरा कागज़ नहीं जिस पर कोई भी अपनी कहानी लिखकर चलता बने, ऐसी कहानी जिसमें एक शब्द भी मेरा न हो। जिस समाज में ‘मैं जिंदा हूँ’ कहने के लिए मरना तक पड़ जाता है, उस समाज में “मैं हूँ और अपने लिए, अपने मुताबिक जीने के लिए भी” कहने के लिए सामाजिक अनुष्ठान करने में क्या हर्ज है? वह भी एक स्त्री के लिए, जिसे घर-बाहर का सारा प्रशिक्षण दूसरों के लिए खुद को खपाने का मिलता है। स्त्री शादीशुदा न हो तो पुरुषों को उपलब्ध लगती है और स्त्रियों को खतरा। क्षमा बिंदु ने सबको यथोचित संदेश अपने निराले अंदाज में दे दिए। अगर उसका मकसद बाहरी चमक-दमक से प्रभावित हो भी तो भी मेरी शुभेच्छा है कि उसे अपना भरपूर साथ मिले। स्त्री के उस निजी ‘समय-सरोवर’ में रचनाओं और सोच के सबसे सुन्दर पुष्प जो खिला करते हैं।

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रामपुर की रामकहानी

कृषि-संस्कृति की समाधि

 

रामपुर की रामकहानी -4

“आदमी हो या पशु, भूख और प्यास से मरने में भी बड़ा वक्त लगता है। 17 दिन के बाद यहीँ प्राण निकले थे उसके। इतने दिन तक किसी ने उसे न पानी दिया था न चारा। ऐसा नहीं था कि लोगों का दिल पत्थर का हो चुका था और दया खत्म हो चुकी थी। लोग चाहते थे कि वह जल्दी मर जाय। उसका दुख देखा नहीं जाता था, किन्तु उसके प्राण थे कि निकलते ही नहीं।”

यह कहते हुए रामबृंद ने मुझे पास ले जाकर अपनी लाठी के संकेत से उस जगह को दिखाया जहाँ वह बैल असीमित कष्ट सहकर मरा था। रामबृंद ने बताया कि अभी उसकी उमर ज्यादा नहीं थी किन्तु रात-दिन किसानों के डंडे खा-खाकर वह कमजोर हो गया था। फसलें बचानी किसानों की मजबूरी थी। इधर से उधर उसे खदेड़ना पड़ता था। इसी बीच किसी कारण से उसका एक पैर टूट गया और वह जमीन पकड़ लिया। फिर दुबारा नहीं उठ सका। जहाँ गिरा था वहीं बगल में गड्ढा खोदकर उसे समाधि दे दी गई थी। मैंने देखा अब भी वहाँ की फसल जमीन से सटकर दबी हुई थी और लगभग नष्ट हो गई थी। मुझे अपने ‘भुअरा’ की याद आ गई। भूअर रंग का होने के कारण उसे ‘भुअरा’ कहकर हम बुलाते थे।

मेरे घर हमेशा दो बैल रहते थे, किन्तु कुछ विपरीत परिस्थितियों के कारण तीन-चार साल तक नाद पर अकेला भुअरा ही था। अकेले उसे भी अच्छा नहीं लगता था किन्तु वह बेजुबान बेचारा क्या करता? हम उसके अकेलेपन को महसूस करते और ज्यादा प्यार करते। मैं हर हफ्ते तालाब में ले जाकर उसे रगड़-रगड़ कर नहलाता। माँ शाम को उसके लिए दो रोटी अलग से बनाती और खुद उसे मुँह में प्यार से खिलाने के बाद ही भोजन करती। उसे ‘कौरा’ कहा जाता। रात में जबतक उसे ‘कौरा’ नहीं मिलता वह बैठता ही नहीं था, खड़े-खड़े अगोरता रहता था। खिलाते समय जब उसके चेहरे पर माँ हाथ फेरती तो वह अपना चेहरा माँ के सामने कर देता।

तिरबेनी के घर भी एक ही बैल था। फिर क्या था, एक बैल उनका और एक हमारे भुअरा को जोड़कर जोड़ी बन गई और हल चलने लगा। उन दिनों सुखदेव काका हलवाही करते थे। इस तरह तीनों के घर बराबर हल चलता जैसे दो दिन तिरबेनी के घर, दो दिन मेरे घर और दो दिन सुखदेव काका के घर। बैल का श्रम आदमी के श्रम के बराबर ही माना जाता। सुखदेव काका के यहाँ खेती बहुत कम थी इसलिए उनका काम दो-चार दिन में ही पूरा हो जाता। बाकी दिनों वे हमारे और तिरबेनी के घर हल चलाते और अपनी मजदूरी लेते।

रामबृंद सुगर के मरीज हैं। सुबह चार बजे सीवान में टहलने निकल जाते हैं। मुझे भी हिदायत देते हैं कि छड़ी के बिना मैं घर से बाहर न निकलूँ। आजकल कुत्ते गाँव में कम, सीवान में ही ज्यादा रहते हैं, आठ-दस-बारह के झुंडों में। उन्हें मांस खाने की लत लग गई है। गाँव के नजदीक होने के कारण इस बैल की तो समाधि दे दी गई किन्तु गाँव से दूर सरेह में मरने वाले जानवरों को समाधि देने की फुरसत किसे है? बहुत खतरनाक हो गए हैं ये कुत्ते। आदमखोर। अकेला खाली हाथ पाकर ये किसी को नहीं छोड़ते। समूह में टूट पड़ते हैं। हकीक चाचा तो गाँव के ही थे। सभी पहचानते थे उन्हें। किन्तु अकेला पाकर घर से थोडी दूर पर उन्हें नोच-नोच कर अधमरा कर दिया था गाँव के इन्हीं कुत्तों ने। बहुत इलाज करने पर भी डॉक्टर उन्हें बचा नहीं पाए।

रामबृंद बताते हैं कि घायल पड़े हुए जानवरों को ये कुत्ते नहीं छूते, मरने का इंतजार करते हैं। जानवर जबतक गिरा हुआ है तबतक कुछ नहीं बोलेंगे किन्तु, यदि वह किसी तरह उठकर चलने लगा तो उसे दौड़ा-दौड़ा कर, काटकर उसे जमीन पर गिरा देते हैं और घायल कर देते हैं। सत्रह दिन तक पड़े रहे उस बैल को कुत्तों ने भी नहीं काटा। बड़ी असह्य पीड़ा के बाद मौत आयी थी। घुरुच-घुरुच कर मरना इसे ही कहते हैं।

इस बैल की मौत क्या सिर्फ एक बैल की मौत है? पिछले दस-पंद्रह सालों में तमाम प्रयास करने के बावजूद बैल नामक प्रजाति को हम बचा नहीं पाए। पहले गाँवों में किसानों की हैसियत उनके नाद पर बँधे बैलों से ही आँकी जाती थी। कोई बिरला ही होता जिसके दरवाजे पर बैल न हों। आज मेरे गाँव में किसी के घर भी बैल नहीं है। जैसे-जैसे कृषि में मशीनों का चलन बढ़ा है, बैलों की उपयोगिता घटी है। पिछले एक दशक में तो मानो उनके ऊपर शामत ही आ गई है। गाय यदि बछड़े को जन्म देती है तो वह घर के लिए एक समस्या बनकर ही आता है। कुछ दिन बाद ही वह सीवान के लावारिश जानवरों में शामिल हो जाता है। सदियों का यह साथी आज किसान का सबसे बड़ा शत्रु बना हुआ है। किसान डंडे लेकर रात-दिन उसके पीछे पड़ा रहता है और वह बेचारा तब तक मारा-मारा फिरा करता है जबतक उसकी मौत नहीं आ जाती।

कृषि एक संस्कृति है जो सदियों पहले वजूद में आई। जंगलों से बाहर आकर इन्सान ने जब खेती करना सीखा तो उसका सबसे पहला साथी बना बैल। पशुपालन सभ्य मनुष्य का सबसे पहला व्यवसाय था। पशुपालन में भी गाय पालना सबसे मुफीद था। गाय हमें दूध देती थी, गोबर देती थी जिससे खाद बनता था और उसके बछड़े बैलगाड़ी चलाने, माल ढोने और हल जोतने के काम आते थे। गाय तो आज भी बैतरणी पार करा देती है।

मैंने रामबृंद से कहा, “आप के घर में तो कोई पशु नहीं है। गोबर की खाद होती ही नहीं है। सिर्फ रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बल पर कबतक खेती कर पाएंगे? आप सनई या ढैंचा बोकर हरी खाद बना लीजिए।” उन्होंने तपाक से उत्तर दिया, “ सनई बोएंगे तो एक एकड़ की जुताई का ही दो हजार लग जाएगा। फिर एक बार जोतने से तो काम चलेगा नहीं। पहले की तरह अपना हल-बैल तो हैं नहीं कि अपनी मर्जी से चाहे जितनी बार जोतिए। आज तो हरी खाद बनाने में जितनी लागत लगेगी उतने की उपज ही नहीं बढ़ेगी।” फिर वे लगे अपनी खेती में आने वाले खर्च का ब्योरा देने। जुताई ट्रैक्टर से, बुआई भी ट्रैक्टर से। जमीन में डाई, बाद में यूरिया कम से कम दो बार, कीटनाशकों के बगैर कुछ बचेगा नहीं। सिंचाई के लिए घर में पंपिग सेट तो है किन्तु तेल आसमान छू रहा है। कटाई के लिए कंपायन वाले कम नहीं लूटते हैं। और जब फसल काँटा पर पहुँचती है तो दाम नहीं मिलता। सरकार कुछ और रेट घोषित करती है, बनिया कुछ और रेट से खरीदता है। कुंतल पीछे चार-पाँच सौ रूपए कम। और उन्होंने सब जोड़कर बता दिया कि खेती आज घाटे का सौदा है।

 मैंने कहा, “आप इतना जोड़-घटा रहे हैं और मुनाफे को देखकर फसल बो रहे हैं तो आप किसान कैसे हुए? आप तो व्यापारी हैं।” वे अचकचा गए। कुछ जवाब नहीं सूझा। मैंने आगे भी जोड़ा, “अब तो खेती सीजन आने पर पाँच -छ: दिनों का काम है और उन पाँच-छ: दिनों में से भी कुछ घंटे ही खेती को देने पड़ते हैं। आप खुद सुबह दो घंटा खेत में देकर घर आ जाते हैं और नहा-खाकर दूकान चले जाते हैं।“ वे मेरी ओर तिरछी नजर से देखने लगे। दरअसल उन्होंने गाँव के ही चौराहे पर सोने-चांदी की एक दूकान खोल रखी है। दिनभर वहीं रहते हैं। उनका बेटा भी उसमें हाथ बँटाता है। खेती अब उनका मुख्य काम नहीं है। किन्तु यही दशा गाँव में सबकी है।

मुझे अपने बाऊजी याद आ गए। उन दिनों खेती करना किसान का पूर्णकालिक काम था। पूरा घर उसमें लगा रहता था। खेती के लिए बैल रखने पड़ते थे। लोग दूध के लिए गाय या भैंस भी रख लेते थे। उन्हें खिलाने, उनके लिए चारा जुटाने और उनकी सेवा में ही सारा दिन गुजर जाता था। अपनी बैलगाड़ी भी थी, काठ के पहिए वाली। फसल ढोने, खाद गिराने आदि के लिए बैलगाड़ी का इस्तेमाल होता था। खेती में बाऊजी गोबर की खाद ही डालते थे। वे अपनी जरूरत की सभी फसलें उगाते थे। धान और गेहूँ तो पैदा करते ही थे, इसके अलावा भी बाजड़ा, मड़ुआ, कोदो, मकई, साँवाँ, टांगुन आदि ऐसी फसलें भी उगाते थे जिनके अब कहीं दर्शन भी नहीं होते। चरी भी बोते थे पशुओं के लिए। मक्के के खेत में काँकर का फूट देखे मुझे कई दशक हो गए। वे दलहन के लिए अरहर, ऊड़द, लतरी, मसूरी, मटर, चना सभी थोड़ा-बहुत बोते ताकि हमें किसी चीज के लिए तरसना न पड़े।

खेत में जब मटर की फली गदा जाती तो हम खेत में होरहा लगाते और भुनी हुई सोंधी फलियों का स्वाद लेते। चने का भी होरहा बड़ा ही मजेदार होता। तेल के लिए सरसो, तीसी, तिल, गुड़ के लिए गन्ना आदि सब उगाते थे बाउजी। गन्ने से जरूरत भर की भेली (गुड़) बना ली जाती, एक हाँड़ी राब ढाल लिया जाता और बाकी गन्ना घुघुली सुगर फैक्ट्री में भेज दिया जाता। गाँव में हर टोले पर कोल्हुआड़ होता। बैल वहाँ भी चलते। कड़ाह में गुड़ के लिए जब गन्ने का रस उबलता और उसका महिया तैयार होता तो मैं उसकी सोंधी गंध से खिंचता हुआ बाँस की कोपल लिए पहुँच जाता। भभूती काका छन्नी से छानकर महिया कोपल में उड़ेल देते। गन्ने के ऊपरी हिस्से की, दाँत से दतुअन की तरह कूँची बनाकर गरम-गरम महिया खाने का मजा अब कभी नहीं मिलेगा। कोल्हुआड़ को याद करते हुए मैने उन्हें बताया कि मैं किस तरह कड़ाह में महिया तैयार होने से पहले धागे में आलू या सेम की फलियाँ गूँथकर डाल देता। वह रस में भीनते हुए पकता। जब महिया के साथ उसे निकाला जाता तो उसका स्वाद अवर्णनीय होता।

रामबृंद मुझसे कम से कम दस साल छोटे हैं। बहुत सारी चीजें उनकी स्मृतियों में भी हैं। मैंने उन्हें याद दिलायी कि किस तरह मेरे बाऊजी साल भर खाने के लिए आलू, प्याज, मरचा, लहसुन, अरुई, बंडा पैदा कर लेते थे। मेरे घर के मचान पर सब रख दिया जाता और साल भर चलता। पता नहीं क्यों, अब तो महीने भर में ही सड़ने लगता है। मेरे घर हर तरह की सब्जियाँ पैदा होतीं। गोभी, केला, बैगन, टमाटर, बकला, केंवाच आदि गोएंड़े के खेत में। कोंहड़ा, लौकी, भतुआ, घेंवड़ा, सरपुतिया, बोड़ा, तरोई, कुरदुन, सेम, करैली आदि तो छत पर या झमड़े पर ही इफरात का फलता। क्या नहीं होता था हमारे घर? माँ भतुआ की अदौरी बनाती जो हर मसालेदार सब्जी में पड़ती और उस सब्जी का स्वाद बढ़ जाता। वह पूरे साल भर चलता। पहली सिंचाई के बाद मटर या चने की बढ़ी हुई फुनगी को खोंटकर बनने वाला साग, सरसों और ताजा बथुआ का साग, सनई के फूल का साग अब कहाँ मिलता है? मैं हमेशा खेत से उखाड़कर ताजा मूली ही खाता था और खेत की ताजा सोया-धनिया, लहसुन के पत्ते और हरे मरचे की चटनी।

बाऊजी केवल किरासन का तेल और नमक खरीदने बाजार जाते थे। नदुआ बाजार, जो हफ्ते में सिर्फ एक दिन रविवार को लगता था। नदुआ बाजार में एक तरफ सिर्फ बैलों का बाजार लगता था। बहुत बड़ा। मैंने कई बार बाऊजी के साथ वहाँ से बैल खरीद कर लाया है या वहाँ बैल बेचने के लिए ले गया हूँ। नदुआ बाजार अब भी लगता है किन्तु अब वहाँ बैलों की खरीद -बिक्री नहीं होती। बैल की प्रजाति खत्म होने के कगार पर है। बैल और किसान का सदियों पुराना अटूट रिश्ता औद्योगीकरण की भेंट चढ़ गया। इसकी शुरुआत तो नब्बे के दशक में वैश्वीकरण के साथ ही हो गई थी। इस सदी की यह सबसे बड़ी दुर्घटना है। बैल के अभाव में किसान का कोई अस्तित्व है क्या?

मैने रामबृंद से पूछा, “आप खेती में कितनी मेहनत करते हैं? कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने जवाब दिया, “मेहनत कहाँ करते है? अब तो सिर्फ देखभाल करनी होती है। पैसा लगता है। काम तो सब मशीनों से होता है।” मैंने जोर देकर कहा, “फिर आप को मैं किसान नहीं कह सकता। आप सिर्फ व्यापारी हैं। व्यापारी भी मेहनत नहीं करता। जोड़ता -घटाता रहता है, बिचौलिए का काम करता है और सिर्फ मुनाफा कमाता है।”

मैंने उनसे कहा, “याद कीजिए उन दिनों को। किसान के पास कितना काम होता था। पशुओं की सेवा के अलावा सुबह से शाम तक अपने खेतों में वह कुछ न कुछ करता ही रहता था। किसानी एक पूर्णकालिक काम था। जेठ की पहली बरसात की हम बेसब्री से इंतजार करते थे। समय पर पानी नहीं बरसा तो इंद्रदेव को खुश करने के लिए तरह-तरह के उपक्रम करते। कभी-कभी तो गाँव की महिलाएं रात में नंगी होकर हल चलातीं, और जब आकाश में बादल दिखाई देते तो हमारी खुशी का ठिकाना न रहता। हम मानते कि हमारे प्रयास व्यर्थ नहीं गए। बारिश के बाद भी जबतक साइत न हो जाय धरती में बीज नहीं डाला जाता। किसी शुभ दिन को कलश में जल, आम का पल्लव, सिंदूर, दधि, अक्षत आदि के साथ खेत में जाकर पाँच छेव कुदाल से कोड़कर साइत होती। तब जाकर खेतों में हल चलता।

 

इसके बाद तरह-तरह की फसलें पैदा करने के लिए किसान को काम में जुते रहना पड़ता था। गोबर की खाद खेत में डालना, उसे फैलाना, फिर कई-कई बार की जुताई, बोआई, कुँए में ढेंकली लगाकर अथवा नदी या तालाब के किनारे है तो बेंड़ी से सिंचाई, निराई, पकने पर हँसिया के सहारे हाथ से कटाई, सुइला-बहिँगा या दूर है तो बैलगाड़ी से ढुलाई, खलिहान में बैलों के सहारे दँवरी, ओसौनी, फसल को सुखाकर बखार या डेहरी में रखने तक किसान लगा रहता था। लोहार, कोंहार, बढ़ई, हजाम, बुनकर सभी मिलकर गाँव की पूरी अर्थव्यवस्था सँभाले हुए थे। नब्बे पार करने वाले राम समुझ लोहार की चमड़े की भाथी अब अंतिम साँस गिन रही हैं।

सच पूछिए तो किसान के पास श्रम ही एक मात्र पूँजी होती थी। उसी के बल पर वह खेती करता था। पैसा खेती में बहुत कम लगता था। इसीलिए अगर दो बैल की खेती है तो आसानी से परिवार का पालन-पोषण हो जाता था। पुश्त-दर पुश्त हम खेती के बलपर ही तो जी रहे थे।

“लेकिन पैदावार बहुत कम होती थी । भादो आते ही कई लोगों के घरों में अनाज घट जाता था। लोग मन्नी लेकर काम चलाते थे। अब पैदावार दोगुनी-तीगुनी होने लगी है।” रामबृंद ने प्रतिकार किया।

“किन्तु आप तो कह रहे हैं कि खेती घाटे का सौदा है? पैदावार बढ़ी है तो घाटे का सौदा कैसे?” उनके पास कोई जवाब नहीं था। मैंने उन्हें समझाया कि घाटे का सौदा इसलिए है कि पैदावार बढ़ने का फायदा किसान को नहीं मिल पा रहा है। लाभ ले रहे हैं ट्रैक्टर-ट्राली, पंपिंग सेट और कंपायन बनाने वाले; डाई, यूरिया, पोटाश और कीटनाशक बनाने वाले; किसिम-किसिम के बीज तैयार करने वाले और सौ रूपए से भी ऊपर की रेट से डीजल बेचने वाले लोग। सरकार भी इसमें शामिल है। खेती आपकी है जरूर किन्तु उससे लाभ कमा रही हैं बड़ी-बड़ी कंपनियाँ, खेती का मशीनीकरण करके। मैं फिर कहूँगा। किसान का श्रम ही उसकी पूँजी है। कृषि-संस्कृति की आत्मा है श्रम की संस्कृति। चरम मशीनीकरण की इस राक्षसी सभ्यता ने कृषि को श्रम से मुक्त कर दिया है। अब कृषि-संस्कृति बची कहाँ? अपने दिल से पूछिए, क्या आप किसानी करते हैं? याद रखिए, खेती तो रहेगी किन्तु बाँझ हो जाएगी। भूखों मरेंगे लोग।

सोया-धनिया के पत्ते की चटनी मैं आज भी बनाता हूँ किन्तु खाते समय उसका बचपन वाला स्वाद नहीं मिलता। परभंस ने खेत से काटकर ताजा सोया-पालक भेजा था। मुझे इसका साग बहुत पसंद है किन्तु तनिक भी अच्छा नहीं लगा। मैंने उनसे शिकायत की तो उन्होंने बताया, “सोया-पालक हो या चौंराई, बिना कीटनाशकों के कुछ भी नहीं होता। कई-कई बार यूरिया और कीटनाशक डालने पड़ते हैं। इससे साग बेस्वाद हो जाता है।” इतना ही नहीं, इस तरह की साग-सब्जियाँ दूसरे रोगों की भी जनक होती हैं। इसीलिए अमीर लोग अपने लिए आर्गनिक खेती कराते हैं।

किसान खाली होने पर भी बैठा नहीं रहता था। बतकही मुँह से होती थी, हाथ काम करता रहता था। खटिया-मचिया बुनने के लिए सुतरी बाजार से नहीं खरीदी जाती थी। सनई-पटुआ हम खुद पैदा करते, उसे पानी में सड़ाते, फिर पीटकर साफ करते, सुखाते और सुतली के लिय़े तैयार कर लेते। बरसात में जब खेत में काम कम रहता तो घरों में हम सुतली कातकर और रस्सी बुनकर तैयार कर लेते। महिलाओं के पास क्या पुरुषों से कम काम था? तब न धान कूटने की मशीन थी और न आटा पीसने की। घर पर ही ढेंकी में धान कूटना पड़ता और घर की ही चक्की में आटा पीसना और दाल दरना भी। पशुओं को पालने की जिम्मेदारी ज्यादातर महिलाओं की ही होती थी।

आज खेती की नयी तकनीक ने, मशीनीकरण ने किसान के श्रम को निरर्थक बना दिया है। इसी के साथ बैल का विलुप्त होना सदियों पुरानी कृषि-संस्कृति का विलुप्त होना है। खेती में काम न रह जाने से आज हमारे गाँव के किसानों के बेटे देश-विदेश में जाकर मजदूरी करते हैं। गाँव के हर दूसरे घर का नौजवान सऊदी में मजदूरी कर रहा है। बाकी देश के दूसरे शहरों में है। बचे-खुचे सुबह-सुबह बिकने के लिए मुख्यालय की मजदूर-मंडी में चले जाते हैं। गाँव अब किसान नहीं, मजदूर पैदा करता है। उद्योगपतियों को उनके कारखानों के लिए सस्ता मजदूर जो चाहिए।

रामबृंद के भेजे में बात समा रही थी। वे खुद बी।ए। पास है। कोई नौकरी नहीं मिली तो गाँव पर रहकर ही व्यवसाय में लग गए। खेती भी कर लेते हैं। गाड़ी ढर्रे पर आ गई है। मैंने रामबृंद से अपने मन का दर्द बाँटते हुए कहा कि हर फसल कटने के बाद खेतों की पराली फूँक दी जाती है। उसके साथ खेती के लिए उपयोगी केचुओं से लेकर जमीन के दूसरे सभी जीव-जंतु जलकर स्वाहा हो जाते हैं। देशी खाद कभी खेतों में पड़ती नहीं। सिर्फ रासायनिक खादों और कीटनाशकों के सहारे धरती कबतक देश के निठल्लों का पेट भरती रहेगी? अपने गाँव में ही देखिए, बड़े-बड़े देशी आमों के बाग कट चुके हैं। पड़ोस का जंगल खत्म हो रहा है। पेड़ों के नाम पर ठिगने कद के पौधे रोपकर उनकी संख्या गिनाई जाती है और वृक्षारोपण का प्रचार किया जाता है। दूसरी ओर, खेती के काम में इस्तेमाल की जाने वाली तरह-तरह की मशीनों, नई-नई बीजों, रासायनिक खादों, कीटनाशकों आदि को बेचकर उद्योगपति मालामाल हो चुके हैं। सुना है अब खेती में ड्रोन का भी इस्तेमाल होने वाला है।

किसान अपने श्रम के बल पर पुश्त-दर-पुश्त अपने परिवार पालते आ रहे थे। क्षमता से ज्यादा लगान की वसूली और जमींदारों की ज्यादती का बोझ किसानों पर जरूर था किन्तु आज की तरह कर्ज के बोझ से दबकर उनके द्वारा आत्महत्याएं करने की घटनाएं मैंने नहीं सुनी थी। आखिर मैं खुद एक किसान-पुत्र हूँ। क्या आज मेरे बाऊजी मुझे पढ़ा पाते? बाऊजी पढ़ाने के साथ मुझे खेती करना भी सिखाते रहते थे। उनके मुँह से ये पंक्तियाँ मैंने अनेक बार सुनी है।-

“उत्तम खेती मध्यम बान / निषिध चाकरी भीख निदान।”

अब इन पंक्तियों ने अपना अर्थ खो दिया है

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मॉडर्न लव: मुंबई
सिनेमा

मॉडर्न लव: मुंबई में अधुना प्रेम

 

‘प्यार को रोकना भी नफरत फ़ैलाने जैसा ही है’

‘प्यार को रोकना भी नफरत फ़ैलाने जैसा ही है’ के मूल सिद्धांत को अपने भीतर समेटे मॉडर्न लव: मुंबई सीरीज़ की सभी छह  लघु फ़िल्में आधुनिक युग में प्रेम की सामाजिक स्वीकृति की ओर महत्वपूर्ण पहल है साथ ही व्यक्ति में प्रेम की व्यावहारिक समझ, साहस, व सहजता के विकास को हमारे सामने अलग-अलग चरित्रों के माध्यम से व्यक्त करता है। मुंबई के बहु-सांस्कृतिक परिवेश में पनपे ये अधुना प्रेम ‘लव आजकल’ सरीखे फ़िल्मी स्टाइल के बिलकुल नहीं बल्क़ि एक बड़े शहर में प्रेम के विविध पके, अधपके, कच्चे रंग बिखेरते सहज और सरलता से आपको भीतर तक सराबोर कर जाते हैं। फिल्म की सभी कहानियाँ प्रेम के लुके-छिपे, डरे-दुबके, परंपरागत नैतिकता के दबाब से परे आधुनिक सोच का विस्तार करती है, सबसे अच्छी बात कि ये फ़िल्में प्रेम की कोई नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश में नजर नहीं आती बल्क़ि  ‘चाहो जिसे मुक्त कर दो उसे’ के दर्शन को आत्मसात करती, प्रेम की उन्मुक्तता और स्वच्छंदता के सहज गुण को बिखेरती चलती हैं तभी ‘रात की रानी’ की लाली जो अब तक अपनी हर ख़ुशी को ‘प्रेमी से पति’ बने लुत्फ़ी से बंधकर ही देख पाती है अंत में लुत्फ़ी को मुक्त कर अथवा कहें अपनी खुशियों के लिए लुत्फ़ी के प्रेम पर अपनी निर्भरता से खुद को बंधनमुक्त करती है। मनमौजी, बिंदास व मेहनती लाली पुरानी ‘जेंट्स साईकल’ में अपने इरादों के दम पर जान भर देती है तथा पितृसत्ता के तमाम पुलों को पार कर लेती है। वह वो सब करती है जो ‘नॉट अलाउड’ है। जेंट्स साईकल पर लाली का बैठना और सुचारू रूप से चलाना अपने आप में चुनौती था जिसे लाली ने सफलता से निभाया।

मुंबई का अधुना प्रेम बताता है कि प्रेम एक शाश्वत भाव है, हर युगकाल में सामान रूप से विकसित होता है किसी आयु, वर्ग, लिंग, भाषा और सरहदों में नहीं बंधा होता।‘मुंबई ड्रैगन’ में भारतीय लड़का और चीनी लड़का जिसका जन्म भारत में ही हुआ,के प्रेम ने सरहदों को तोड़ने का साहस किया है। भारत में कई दशकों से रह रही चीनी माँ और उसके सिंगर बेटे के संबधो और प्रेम का ख़ूबसूरती से चित्रण करती है, माँ की शर्त है ‘तब तक हिन्दी नहीं बोलूँगी जब तक बेटा भारतीय लड़की को नहीं छोड़ देता, पर आज का आधुनिक प्रेम ‘शर्त’ आधारित नहीं है, माँ से भी नहीं अंतत: उसकी माँ गर्लफ्रेंड को वेजीटेरियन खाना भेजकर प्रेम को शर्तों से मुक्त करती है, स्वीकार्यता देती है, जो परम्परागत माँ के लिए आसान न था। आपको बता दें कि चीनी माँ का किरदार मलेशियाई-सिंगापुर अभिनेत्री यों यान यान ने बहुत ही शानदार तरीके से निभाया, अन्तरराष्ट्रीय स्तर की अभिनेत्री ने इसके लिए हिन्दी सीखी और सरदार के रोल में नसीरुद्दीन शाह से कहीं भी कमतर नहीं लगीं, बॉलीवुड के नए उभरते कलाकारों को इनसे अभी बहुत सीखना होगा।

पारिवारिक संस्था में बुजुर्ग अपनी इच्छाओं को मार देते हैं ताकि घर परिवार खुश रहे पर क्या  बढ़ती उम्र में जीवनसाथी के चले जाने पर उन्हें दोबारा उस अनुभव से गुजरने का अधिकार नहीं? प्रेम की पहली शर्त ‘आकर्षण’ जो कोई दायरा या दीवार नहीं मानता ‘दिल आया गधी पर तो परी क्या चीज है’ जैसे वाक्य समाज ने प्रेम को हीन बताने को ही गढ़े होंगे लेकिन ‘माय ब्यूटीफुल रिंकल्स’  प्रेम के प्रति परिपक्कव सोच को नया आयाम प्रदान करती हैं, 60 पार की दिलबर से प्रेम करने वाला 20-22 साल का युवा इस परिपक्वता का गवाह बनता है तो दिलबर (सारिका) किसी भी नैतिकता के दबाब से परे साहस (कुछ लोग इसे दुस्साहस कहेंगे) के साथ अपने प्रेम को फैंटसी की कल्पना में रचकर, प्रेम और आदिम दैहिक वासना का संजीदगी से आनंद लेती है ‘उम्र सिर्फ एक संख्या है’ जहाँ प्रेम बासी नहीं होता।

‘शहर बदल गये सड़कों के नाम बदल गए लेकिन अब्बू नहीं बदले’ जो अंत तक नहीं बदलते लेकिन माँ और बहन समलैंगिक प्रेम को आधुनिक सोच के साथ गले लगा लेतीं हैं अब्बू ‘पितृसत्ता’ हैं तो बहन और माँ प्रगतिशील‘बाई’ में समलैंगिक मंजूर अली की माँ कहती है ‘छोड़ क्यों नहीं देते सब’ तो वो कहता है ‘आदत नहीं है माँ’ उसकी पहचान स्वाभाविक है कृत्रिम नहीं इसलिए वो बार-बार जोर दिए जाने पर भी शादी से इंकार कर रहा है। ये भी सच ही है ‘विवाह संस्था’ बचपन से ही दो व्यक्तियों में साथ रहने की आदतों का विकास करना सिखातीं हैं जबकि प्रेम उन्मुक्त होता है, यहाँ अपनों तक अपनी भावनाएं पहुँचाने के संघर्ष व पितृसत्तात्मक बंधन तोड़ने का साहस दिखाई पड़ता है, मंजूर अली के किरदार में प्रतीक गांधी ने दिल जीत लिया। शेफ़ राजबीर जब मंजूर अली से कहता है -“खाना और गाना मुश्किल से मुश्किल बात को आसानी से कहने का जरिया बनता है” तब मंजूर अपनी बात ‘बाई’ से कह पाता है,व्यक्ति और परिवार दोनों पक्षों की प्रेम में यह स्वीकार्यता प्रेम को मज़बूत बनाती, जो पहले परिवार से ही आरम्भ होगी। अंत में मंजूर कहता है ‘जीवन में प्यार स्वादानुसार ही होना चाहिए’ यानी प्रेम के क्षेत्र में सबकी अपनी पसन्द और चुनाव होते हैं, होने चाहिए। मुंबई ड्रैगन और बाई के निर्देशकों विशाल भरद्वाज और हंसल मेहता ने सिंगर चांग और शेफ़ रणबीर बरार के वास्तविक जीवन के पेशे को कहानी में बखूबी पिरोया है, संगीत और खाने में प्रेमरस की घुलनशीलता ने फिल्म के अनुभव को बहुत स्वाभाविक और रोमांचक बना दिया है।

‘आई लव ठाणे’ की नायिका डेटिंग-एप पर प्रेम खोजने में असफल रही, उसे आश्चर्य होता है कि मुंबई से सटे ठाणे शहर में एक लड़का ऐसा भी है जो सोशल मीडिया से कोसों दूर है, खुश है उदार दृष्टिकोण सम्पन्न जबकि मुंबई जैसे बड़े शहरों के लड़के एप से लड़की ढूंढते है लेकिन शादी के लिए वही रूढ़िवादी सोच और शर्तें रखते हैं, तभी वो शादी करने से घबरा रही हैं।लेकिन अंत में कहती है ‘मुंबई आखिरकार एक ऐसा शहर है जो आपको आशा देता है! लेकिन शादीशुदा लतिका की समस्या प्यार नहीं बल्क़ि उपन्यास है जिसे वह सत्रह साल से पूरा नहीं कर पा रही ‘कटिंग चाय’ लतिका और डैनियल भरोसेमंद और व्यवहारिक रिश्ते को ख़ूबसूरती से प्रस्तुत करती है जो मतभेदों के बाद एक विश्वास के बंधन में सुख की कामना के साथ बंधा है ‘कितना सुख है बंधन में कि तर्ज पर’ अरशद वारसी और चित्रंगदा की केमिस्ट्री शानदार है,आश्चर्य इस फिल्म बात नहीं हो रही मुझे लगता है ये कहानी उन सभी उभरती स्थापित लेखिकाओं को समर्पित मानी जा सकती हैं जो अपने लेखन के लिए समय नहीं निकाल पाती उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं डाइवर्ट कर दिन हैं और अब बैचैन हैं इस पर थोड़ा विस्तार से बात करना बनता है।   

लतिका अभी तक शादी के सत्रह साल पहले पी गई ‘कटिंग चाय’ के स्वाद में ही जी रही है पर वह उपन्यास भी लिख रही है पर लिख नहीं पा रही, इसके लिए जिमेदार कौन है? खुद लतिका या उसका लेट लतीफ़ पति जो शेफ़ होते हुए भी घर के काम में हाथ नहीं बटाता जबकि होटल में अपनी जॉब के अंतर्गत वह सभी ‘घरेलु माने जाने वाले’ काम करता है। इस अंतिम फ़िल्म ‘कटिंग चाय’ में 17 साल पुरानी शादी में दर्शक शायद मॉडर्न लव खोज रहे हैं इसलिए उनका निराश होना लाजिमी ही है वास्तव में इसे आप आधुनिक रोमाँटिक क्लासिक कह सकते हैं जो मॉडर्न युग में भी उसी अंदाज़ में मोहित कर रही है जैसे अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा, बासु चटर्जी की फ़िल्में किया करती थी ‘कटिंग चाय’ बहुत सरल-सहज ढंग से यह गहरी बात समझाने की कोशिश कर रही है कि‘क्या प्रेम में हम दूसरे को खुश रखने के लिए खुद को बदलते है’ अथवा ‘ये हमें अच्छा  लगता है कि हम उन्हें ख़ुशी दे पा रहें है’ या हमें पता ही नहीं चलता ‘कब हम प्रेम के वशीभूत दूसरे के अनुसार ढलते जाते है’ फिल्म के दो संवाद इन स्थितियों को बहुत सूक्ष्मता से बयां कर रहें हैं जब उसका पति और बाद में ‘लेखकीय कल्पना’ में विक्रम चौधरी भी एक ही बात कहतें हैं “तुम्हें लिखना होता तो पहले लिख लेती…यू कान्ट राईट एंड डोंट ब्लेम में” क्या सचमुच उसमें लिखने की काबिलियत नहीं अथवा वह लिखने की स्थिति में नहीं वह अपने लेखन को जॉब मानती है इसलिए खुद को हाउस वाइफ नहीं मानना चाहती पति से झल्ला कर कहती है ‘व्हेवर इस स्पेस टू राईट…मेंटल स्पेस मेरे दिमाग में तो बस गैस बुक करना भिन्डी खरीदना धोबी का हिसाब भरे हैं लिखने के लिए स्पेस कहाँ बचा’  दूसरा संवाद रेलवे स्टेशन पर लतिका नये ज़माने की लड़की जिसकी अभी हाल ही शादी हुई है कहती है  ‘मैंने जो करैक्टर क्रीएट किया है न, उससे मेरी स्ट्रगल चल रही है मतलब जो मैं उससे करवाना चाह रही हूँ उससे पेज पर करवा नहीं पा रहीं हूँ’, वास्तव में ये करैक्टर लतिका ही है लड़की उसे त्वरित समाधान दे देती है ‘तो करैक्टर बदल दो, लतिका हैरान परेशान-सी पूछती है ‘ऐसे कैसे बदल दूं मैं अपना करैक्टर, ऐसे थोड़ी होता है’ लड़की बहुत सरलता से कहती है ‘क्यों आजकल तो सब कुछ बदल सकता है,जम नहीं रहा तो चेंज कर दो न’…‘जमता नहीं है तो बदल डालो’  लगता है हल मिल गया अब वो अपना उपन्यास पूरा कर लेगी ऐसा मुझे भी लगता है।

शादी के सत्रह साल बाद भी लतिका के पति डैनियल की (अरशद वारसी) आदतों में कोई बदलाव नहीं आया, वह पहले भी लेट लतीफ़ था आज भी लेट लतीफ़ है लेकिन उसके प्रेम के अंदाज़ में भी कोई परिवर्तन नहीं आया, फिर क्या कारण है कि जो बातें लतिका को पहले बहुत अच्छी और प्यारी लगती थी, जिन पर बहुत प्यार आया करता था वही बातें उसे चिढ़ा जाया करती हैं। अपनी ननद से वो कहती है ‘पहले तो इतना स्वीट सेंसटिव था और जो छोटी-छोटी चीज़े पहले क्यूट लगती थी न, अब इरीटेटिंग लगती है! जो चीज़े मैं इतनी आसानी से इग्नोर कर देती थी अब बम बनकर फूटती है’ जबकि लतिका के तो प्रेम की शुरुआत ही डैनियल की पसंदीदा कटिंग चाय पीने से हुई वह तो कॉफी पीना चाहती, वो कब उसके पसन्द के हिसाब से अपना जीवन बना लेती हो उसे भी नहीं पता चलता। जब उसकी ननद कहती है ‘ किसने कहा था उससे शादी करो’… ‘उसी ने कहा था’… ‘वो तो ऐसे ही बोलेगा’ न लतिका मासूमियत से कहती है ‘मैं बेफकूफ मान भी गई’ खुद को बेवकूफ मानकर पति और बच्चों की खुशियों और माँगो में खुद के ‘लेखकीय व्यक्तित्व’ को दफन जान बड़बड़ाती खीजती नजर आती है पति से कहती है ‘तुमने कभी सपोर्ट की मेरी राइटिंग? तुमने कभी परवाह नहीं की! इसलिए आज तक ‘अपनी नॉवेल पूरी नहीं कर पाई ! वास्तव में जीवन की एकरसता में अपने लेखकीय व्यक्तिव की खोज में लतिका झल्लाई हुई है उसकी झल्लाहट पर डैनियल कहता है ‘बट यू लव में’ तो वो कहती है ‘ हाँ पर हर साल थोड़ा कम हो रहा हैलेकिन अंत में ट्रेन के दृश्य को देख लगता ही नहीं ये प्रेम कम हो रहा है बल्कि साफ़ दिख रहा है कि मज़बूत हो रहा है।

वास्तव मेंलेखिका के रूप में लतिका कभी भी महत्वाकांक्षी नहीं थी उसकी बॉस जब कहती है ‘30 साल कि उम्र में देखो बेस्ट सेलर बन गया ‘लतिका तुम भी कर सकती हो लतिका लोगों से मिलो जुलो और उन्हें अपनी कहानियों में बुनो’  तो भी वह ऐसा नहीं करती, उसका संकोची स्वभाव है इसलिए नहीं बल्कि वह एक बहुत ही भावुक सरल लड़की रही है जिसे बौद्धिक वर्ग से मिलना जुलना पसन्द नहीं। वहीँ वह डेनियल से मिलती है जो ‘कटिंग चाय’ में जिन्दगी का फ़लसफ़ा बताता है ‘जिन्दगी उतनी ही सिम्पल और कम्पलीकेटिड है जितना हम उसे बनाते है’ कि ‘थोड़ी है पर बहुत बढ़िया’ याद आता है गीत ‘थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है जिन्दगी फिर भी यहाँ खूबसूरत है’ मजा तो तभी है जब थोड़े में ज़िदगी का लुत्फ़ उठाया जाये। लतिका स्टेशन पर भीड़ को देखकर कहती है ‘मुंबई की इनर्जी यहीं से शुरू होती है इतने लोगों में बंट जाती है पर कभी ख़त्म ही नहीं होती मुंबई सबको अपनी बाँहों में भर लेती है कितनी कहानियां बसी हैं’ अपनी पहली शोर्ट कहानी भी यही पर लिखी थी, आज जब वो डैनियल का इंतजार कर रही है तो समझ आ रहा है ‘इंतजार करवाने वालों की मर्ज़ी पर ही तो दुनियां चलती हैं’ सोचते हुए वो अकेले ही ट्रेन में चढ़ जाती है अब वो अपनी ट्रेन नहीं छोड़ेगी। कहानी का यह अंत आपको संतोष देता है जब वहां आपको डैनियल दिखाई देता है जिसने 10 साल से ट्रेन में सफ़र नहीं किया और अब ट्रेन में आया है लतिका की खातिर, उसे सॉरी बोलने के लिए लेकिन अब लतिका के लिए सॉरी कोई मायने नहीं रखता उसने इस सफर (लेखन) को अकेले शुरू कर दिया अब वो बेहतर लिखने की स्थिति में आ चुकी है क्योंकि एक चैप्टर तो उसने स्टेशन पर ही लिख लिया था विक्रम चौधरी वाला।

इसी सन्दर्भ में लतिका उस लड़की  के पति को डाँटते हुए कहती है ‘इन्हें चाय पसन्द है कॉफ़ी नहीं सिर्फ आपको खुश करने के लिए पीतीं हैं और ऐसी ही चीज़ों से शुरू होता है’  फ़िल्म सन्देश दे रही है कि अब कोई और लतिका न बने ‘आपका अपना जीवन आपकी प्राथमिकता’ ये फिल्म  भागदौड़ की जिन्दगी में खुद से प्यार करने की सीख दे रही है जब डैनियल ने कहा था ‘चाय से अधिक बौद्धिक कुछ नहीं हो सकता’ तो वो उस समय का सच मान बैठती है वास्तव में कोई  आपसे वह बातें करे, जो आप सुनना चाहते हो तो वो आपको पसन्द आता है अथवा कहें कि आपको वही पसन्द आता है जो आपके अनुकूल है तो आप वहीँ ठहर जाते हैं लेकिन लतिका सत्रह साल से वहीँ ठहर गई आखिर ‘जिन्दगी कितनी देर यहीं पर रुकी है कितनी देर कितनी देर…’ इसलिए ‘जो भी हुआ है तूने ही किया है, तूने ही चुना है’ के बाद भी आपको लगता है कि लतिका की स्थिति पर स्त्री विमर्श के सन्दर्भों पर अलग से विचार की जरूरत है! शायद नहीं, यह एक खूबसूरत क्लासिक वैवाहिक प्रेम कहानी है जो विश्वास पर टिकी है जिस पर बौद्धिकता का मुल्लमा नहीं चढ़ा सकते जो लतिका और डैनियल को भी पसन्द न था।

कुल मिलाकर मॉडर्न लव: मुंबई की सभी फ़िल्में आपको जीवन का सार यानी प्रेम की बात कर रहीं है, प्रेम जिसे आप किसी भी रूप में कहीं भी पा सकतें है जहाँ किरदारों के अद्भुत अभिनय, बेहतरीन पटकथा, और सरल कहानियों के बीच एक साथ मन को सुकून और बैचैन करने वाला गीत संगीत है जो मानव मन का सुंदर चित्रण करता है। आधुनिक जीवन से जब प्रेम गायब होता जा रहा है ऐसे में ये फ़िल्में आपके ह्रदय को निश्चय ही झंकृत करेंगी जहाँ प्रेम में वे सभी भाव जिनमें आपकी कमजोरियां, सुख दुःख में हँसी-ख़ुशी दुःख दर्द सिर्फ और सिर्फ प्रेम रह जाते हैं 

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पति द्वारा बलात्कार
कथित अकथित

पति द्वारा बलात्कार : अधिकार या अपराध

 

किसी भी व्यक्ति का शरीर एक ऐसे किले की भांति होता है जिसका सम्पूर्ण स्वामी वह व्यक्ति है। उस व्यक्ति की अनुमति के बिना उस किले को हाथ भी लगाना, यहाँ तक कि उस पर कुदृष्टि डालना एक शत्रुतापूर्ण कृत्य माना जाता है, सामाजिक और कानूनी – दोनों ही दृष्टियों से। ऐसे में किले में जबरन और अनाधिकार प्रवेश तो एक अक्षम्य और जघन्य अपराध माना ही जाना चाहिए।

बलात्कार किसी मानव का दूसरे मानव के साथ किए जाने वाले नृशंसतम अपराधों में एक है। कई अर्थों में यह हत्या से भी क्रूर कृत्य है। यह अपराध पीड़िता के न केवल शरीर को क्षति पहुँचाता है बल्कि उसकी आत्मा को भी क्षत-विक्षत करता है। पीड़िता के मानस को जो आघात पहुँचता है उसका घाव जीवन भर बना रहता है और अपने मवाद के साथ रिसता रहता है। पीड़िता कभी भी स्वाभाविक जीवन नहीं जी पाती। यहाँ तक कि अपने पुरुष रिश्तेदारों और कार्यालय के सहकर्मियों के साथ उसके सम्बन्ध असहज होते हैं। और वह उन पर कभी भरोसा नहीं कर पाती। आस्था और विश्वास का उसका आन्तरिक आधार बिखर चुका होता है, दीवार ढह चुकी होती है। वह अपने रिसते जख्म के साथ जीने को अभिशप्त होती है।

अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए भारतीय दण्ड संहिता में इसके लिए कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। सामान्यतः इस अपराध के लिए कम से कम सज़ा सात साल का सश्रम कारावास है, जो कतिपय विशिष्ट परिस्थितियों में कम से कम दस साल भी हो सकता है। अगर न्यायालय चाहे तो इस अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा भी दी जा सकती है। मगर पति द्वारा बलात्कार को कानून किस नज़र से देखता है? भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 बलात्कार को परिभाषित करती है और इस धारा के अन्त में एक अपवाद का जिक्र है। जिसके अनुसार बलात्कार करने वाला यदि पीड़ित का अपना पति हो और पीड़िता की उम्र यदि 15 साल से कम नहीं हो तो पति के इस कृत्य को बलात्कार नहीं माना जाएगा। यदि हम धारा 375 और 376 को साथ-साथ पढ़ें तो निष्कर्ष यह निकलेगा कि पीड़िता की आयु यदि 15 वर्ष से कम भी हो लेकिन 12 साल से कम नहीं हो तो पति के कृत्य को बलात्कार तो माना जाएगा मगर सजा की अवधि दो साल से अधिक नहीं होगी। हाँ! यदि पीड़िता की आयु 12 साल से कम है, तो बलात्कारी पति को एक सामान्य अपराधी के रूप में ही देखा जाएगा और उसे वहीं सजा मिलेगी जो बलात्कार के आम अपराधी को मिलती है।

ऊपर वर्णित 15 वर्ष की न्यूनतम आयु को लेकर कानूनी विवाद पैदा इस वजह से हुआ क्योंकि लड़की के ब्याह की न्यूनतम आयु 18 साल है। एक और कारण बना लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012, जिसे पोक्सो एक्ट के नाम से भी जाना जाता है। इस कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के बालक (नारी या पुरुष)  के साथ बलात्कार को अपराध माना गया है, चाहे बलात्कारी अपना पति ही क्यों न हो। अलग-अलग कानूनों में विरोधाभास को 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने सुलझाते हुए यह स्थापना दी कि 18 वर्ष की कम आयु की स्त्री के साथ उसका अपना पति भी अगर जबर्दस्ती करता है तो उसे बलात्कार का अपराधी माना जाएगा। हाँ! अठारह या इससे अधिक आयु की स्त्री के पति द्वारा बलपूर्वक बनाया गया शारीरिक सम्बन्ध अपराध की कोटि में अभी भी नहीं आता।

 

पति द्वारा बलात्कार से पीड़ित स्त्री को थोड़ी बहुत राहत घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005, जिसे डॉमेस्टिक वायलेंस एक्ट के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा भी मिल सकती है। इस अधिनियम की धारा 3 घरेलू हिंसा को परिभाषित करती है और इस परिभाषा के दायरे में जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाना भी शामिल है। लेकिन यह एक कमज़ोर कानून है और इसमें कारावास जैसे दण्ड का प्रावधान नहीं है। इस कानून का उद्देश्य पीड़क और पीड़िता को परामर्श देने, पीड़िता को संरक्षण देने, धरेलू संपदा में पीड़िता के अधिकारों की रक्षा करने और पीड़क से पीड़िता को हरजाना दिलाने तक ही सीमित है।

पिछले दिनों पति द्वारा बलात्कार का आपराधिक पक्ष अखबारों की सुर्ख़ियों में था जब नारी अधिकारों और मानवाधिकारों से जुड़ी कतिपय स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा विचार किया जा रहा था। याचिकाओं में न्यायालय से प्रार्थना की गई थी कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा के उस अपवाद को निरस्त कर दिया जाए जिसके अनुसार पति अपनी पत्नी के साथ बलात्कार अपराध की श्रेणी में नहीं आता। याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय के दो न्यायधीशों द्वारा विचार किया गया। ये दोनों न्यायधीश एक निर्णय पर एकमत नहीं हो पाए और दोनों ने ही अलग-अलग और परस्पर विरोधी निर्णय दिए।

दिल्ली उच्च न्यायालय की खण्डपीठ के दो न्यायधीशों में से एक न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने अपना फैसला याचिकाकर्त्ताओं के पक्ष में सुनाया। न्यायमूर्ति शकधर के अनुसार धारा 375 के अपवाद का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव के विरुद्ध अधिकार), अनुच्छेद 19(1) (ए) (संभाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वाधीनता का अधिकार) का अतिक्रमण करता है।

न्यायमूर्ति शकधर के अनुसार यदि महिला मित्र या बिना विवाह साथ रह रही महिला के साथ सहमति के बिना यौनाचार अगर बलात्कार माना जा है तो ब्याहता पत्नी के साथ यही व्यवहार बलात्कार क्यों नहीं माना जाना चाहिए। इनका मत है कि बलात्कार मानवाधिकार का घनघोर हनन है और इसे दण्डनीय अपराध माना जाना चाहिए चाहे ऐसा करने वाला अपना पति ही क्यों न हो। लेकिन खण्डपीठ के दूसरे न्यायधीश न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर ने धारा 375 के अपवाद को असंवैधानिक मानने से इन्कार कर दिया और इसे तर्कसंगत और न्यायोचित ठहराया। इनके अनुसार, यदि इस अपवाद को निरस्त किया गया तो इससे विवाह की व्यवस्था पर ही कुठाराघात होगा। पति द्वारा जबरन यौनाचार किसी अन्य द्वारा किए गए कुकृत्य से गुणात्मक रूप से भिन्न है और दोनों को समान धरातल पर रखना एक भूल होगी। विवाह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दोनों पक्षों को यह न्यायसंगत अधिकार है कि वे अपने जीवन साथी से यौन सम्बन्ध की अपेक्षा रखें। यह अपेक्षा तब अनुमान्य नहीं होती जब बलात्कारी और पीड़िता एक दूसरे के साथ विवाह के बन्धन में बंधे नहीं होते। यदि स्त्री और पुरुष वैवाहिक बन्धन में बंधे हुए हैं तो इसका अर्थ यही होता है कि स्त्री ने सोच-समझ कर और अपनी इच्छा से ऐसे बन्धन में बन्धना स्वीकार किया है जिसका यौन सम्बन्ध एक अहम हिस्सा है। अपने इस निर्णय से स्त्री ने अपने पति को यह अधिकार दिया है कि वह उस स्त्री के साथ एक सार्थक वैवाहिक सम्बन्ध की अपेक्षा रखे।

न्यायमूर्ति हरिशंकर ने अपने फैसले में यह भी कहा कि धारा 75 को निरस्त करना उस बच्चे के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा जिसका जन्म पति के बलपूर्वक यौनाचार के परिणाम स्वरूप होगा। अपवाद के निरस्तीकरण के बाद यदि पत्नी अपने पति पर बलात्कार का मुकदमा चलाती है और यदि पति को अन्ततः सजा हो जाती है तो वह संतान आजीवन इस कलंक के साथ रहेगी कि उसका पिता एक बलात्कारी था। क्या यह उस भावी शिशु के मानवाधिकार का हनन नहीं होगा?

जैसा कि स्पष्ट है, खण्डपीठ के दोनों न्यायधीशों के परस्पर विरोधी फैसलों के कारण मसला ज्यों का त्यों बना हुआ है। खण्डपीठ ने यह आधिकारिक रूप से प्रमाणित किया है कि इस मुकदमे के साथ कानून से सम्बन्धित महत्वपूर्ण प्रश्न जुड़े हुए हैं और इस कारण से यह सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत करने योग्य है। सम्बन्धित पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में पहुँच चुके हैं। अब यह देखा जाना है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मुकदमे से जुड़े सवालों का समाधान क्या निकालता है।

मेरे अपने मतानुसार किसी भी स्त्री के साथ पशुवत व्यवहार को कहीं से उचित नहीं ठहराया जा सकता, चाहे ऐसा व्यवहार करने वाला स्त्री का अपना पति ही क्यों न हो। लेकिन यह भी सच है कि यदि कोई स्त्री अपने पति के विरुद्ध मुकदमा दायर करने का निर्णय लेती है तो इसमें कई कानूनी अड़चन भी हैं। पहली समस्या है अपराध को तर्कसंगत सन्देह से परे प्रमाणित करने की। अगर आरोपी पति के अलावा कोई अन्य व्यक्ति है तो यदि डाक्टरी जाँच शारीरिक सम्बन्ध को प्रमाणित करता है और पीड़िता का बयान यदि विरोधाभासों से मुक्त है तो इसे अपराधी को दंडित करने का पर्याप्त प्रमाण मान लिया जाता है। मगर यदि आरोपी स्वयं पति ही हो तो डाक्टरी जाँच का बतौर सबूत वह महत्व नहीं रह जाता। ऐसे में शारीरिक सम्बन्ध सहमति के साथ था या इसके बिना, इसका सारा दारोमदार केवल पत्नी के बयान पर आकर टिक जाता है। कथित अपराध का स्थल पति पत्नी का अपना ही शयन कक्ष होता है, जहाँ किसी गवाह की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में किसी भी अदालत द्वारा आरोपी को दंडित कर पाना आसान नहीं होगा।

दूसरी समस्या है इस कानून के दुरुपयोग की संभावना की। ऐसे में हम भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498ए का उदाहरण ले सकते हैं। इस कानून को इस उदात्त उद्देश्य से लाया गया था कि दहेज के नाम पर पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने से रोका जा सके। मगर यह प्राय: ही देखा गया है कि पति और पत्नी के बीच आपसी रंजिश की हालत में पति और उसके परिवार वालों को सबक सिखाने के लिए इस कानून का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है।

तीसरी समस्या कानून की अपनी सीमा से जुड़ी हुई हैं। यह अपेक्षा करना बहुत सही नहीं होगा कि मानव समाज की हर समस्या का समाधान मात्र कानून और न्यायालय ही है। समाज को सुचारू रूप से चलाने में इनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है लेकिन अब इन पर बोझ इतना बढ़ चुका है कि न्याय व्यवस्था धीरे-धीरे चरमराने की दिशा में बढ़ रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार देश के विभिन्न न्यायालयों में कुल चार करोड़ सत्तर लाख मामले लंबित हैं। ऐसे यदि कोई मुकदमा दायर होता है तो वह वर्षों घिसटता रहता है और वादी एवं प्रतिवादी के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मुकदमे की ही भेंट चढ़ जाता है। बेहतर होगा कि हर समस्या का हल न्याय व्यवस्था में ढूँढने की बजाय देश और समाज की अन्य संस्थाओं और व्यवस्थाओं जैसे पुलिस, समाज, शिक्षा प्रणाली, धर्म इत्यादि को भी इस ओर सक्रिय होना चाहिए।

अभी तो ऐसा ही लगता है कि अत्यंत जटिल सवालों से जूझते इस मुद्दे पर कोई ऐसी स्थापना दे पाना, जो मुद्दे से जुड़े सभी पहलुओं को संज्ञान में ले पाता हो, सर्वोच्च न्यायालय के लिए एक चुनौती भरा काम होने वाला है

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धर्म राजनीति और संस्कृति
चतुर्दिक

धर्म, राजनीति और संस्कृति

 

हम सब एक भ्रष्ट और विकृत समय में जीने को अभिशप्त हैं। इस समय का निर्माण जिन शक्तियों ने (मुख्यत: आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक) किया है, उन शक्तियों की पहचान सबको है, ऐसा नहीं कहा जा सकता जिन्हें उनकी पहचान है भी, वे इस समय को बदलने के लिए सामूहिक रूप से शायद ही कृत संकल्प हैं। धर्म और राजनीति आज कहीं अधिक जीवन विरोधी, मानव विरोधी और सृजन विरोधी भूमिका में है। इन दोनों के गठबंधन ने अनेक प्रकार की समस्याएँ खड़ी कर दी है। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था धर्म में नये सिरे से प्राण फूंक डाले हैं। अस्सी के दशक के पहले राम जन्मभूमि को लेकर वैसा कुछ नहीं था जैसा लाल कृष्ण आडवाणी की राम जन्मभूमि रथ यात्रा के बाद संभव हुआ। यह सब सत्ता प्राप्ति के लिए था। राम महज एक सीढ़ी थे, जिस पर चढ़कर भाजपा उस ऊँचाई पर पहुँची जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी। पहले धर्म का न बाजार था और न उसकी कोई राजनीति थी। वह व्यक्ति के चित्त और स्वभाव में, परिवार के धार्मिक आयोजनों तक अधिक सीमित था। धर्म का प्रदर्शन बाद की घटना है।

 संस्कृत की जिस ‘धृ’ धातु से धर्म’ उत्पन्न है, उसका अर्थ धारण करना या संभालना है। इस प्रकार धर्म का अर्थ टैंक बनकर किसी दूसरी वस्तु को रोकना है। यह शब्द सर्वप्रथम ऋवेद में प्रयुक्त हुआ है। वैदिक साहित्य में ‘धर्म’ का शब्द का अर्थ उच्च है, व्यापक है। शब्द वही रहते हैं, पर समय के साथ-साथ उसके अर्थ का संकुचन और फैलाव होता जाता है, जिससे अर्थ-संकुचन और अर्थ-विस्तार होता है। ध्यान दिया जाना चाहिए कि जो शब्द हमारे लिए सर्वाधिक अर्थवान-मूल्यवान थे, उन सब का अर्थ अब पूर्ववत नहीं है, वे अपना मूल और वास्तविक अर्थ खोकर संकीर्ण और मनोनुकूल धर्म ग्रहण कर चुके हैं।

‘धर्म’ शब्द के साथ भी ऐसा ही हुआ है। ‘धर्म’ शब्द की अर्थ-यात्रा पर विचार करने से यह स्पष्ट होगा कि इसके वास्तविक अर्थ का लोप कब, कैसे और क्यों हुआ? वे कौन-सी शक्तियाँ हैं, जो मूल्यवान शब्दों को अपने हित में इस्तेमाल कर रही हैं, उसका वास्तविक अर्थ बदल रही है। अगर धर्म का वास्तविक अर्थ प्रचलन में, व्यवहारादि में कायम होता तो वासुदेव शरण अग्रवाल को ‘धर्म’ का वास्तविक अर्थ शीर्षक से एक स्वतन्त्र लेख लिखने की आवश्यकता क्यों होती? डॉ. अग्रवाल इस शब्द की आयु ‘4000 वर्ष लम्बी’ मानते हैं और इसे एक ऐसे शब्द के रूप में देखते हैं, जिससे हमको पग-पग पर काम पड़ता है। “इसका अर्थ गहरा और विस्तृत है, ‘धर्म’ की अर्थ-यात्रा या विकास-यात्रा एक स्वतन्त्र लेख का विषय हो सकता है। आज ‘धर्म’ शब्द सुन कर क्या सचमुच किसी के मन में सही अर्थों में धार्मिक भाव का जागरण होता है।

विगत तीन-चार दशक में धर्म, नैतिकता, समाज, घर, परिवार, सम्बन्ध, मैत्री, अड़ोस-पड़ोस, कुटुम्ब, समाज, सामाजिकता, शिक्षा, प्रेम सबके अर्थ बदल चुके हैं, जो शब्द कभी खनखनाते थे, अब वे झनझनाते हैं। जो शब्द अपने साथ कभी प्राणवायु लाते थे, वे अब वैसे नहीं रहे। ‘धर्म’ शब्द के सम्बन्ध में वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखा है- “इस शब्द में अमृत भी है, जिससे आदमी जी उठता है और इसमें ऐसा विष भी है कि यदि उसका पलड़ा भारी पड़ जाए तो समाज के शरीर को मूर्च्छित भी कर सकता है। आज धर्म ने अधर्म का रूप धारण कर लिया है। धर्म का अधर्मी रूप विचार का विषय है क्योंकि मनुष्य के मन में जो ऊँची भावनाएँ हैं, उन्हीं को प्रकट करने का साधन धर्म था; लेकिन मनुष्य ने स्वयं ही इस पवित्र शब्द को अपने नारकीय जीवन का साधन भी बना डाला” आज जब धर्म का वास्तविक स्वरूप और अर्थ मिट चुका है, हमें उस वास्तविक स्वरूप और अर्थ को पुन: एक बार देखना चाहिए।

अथर्व वेद के ‘पृथिवी सूक्त’ में पृथ्वी को ‘धर्मजा घृता’ कहा गया है अर्थात वह धर्म से धारण की हुई है। आज पृथ्वी स्वयं संकट में है। आधुनिक पृथ्वी पुत्रों ने उसे कहीं का नहीं रहने दिया है। भारत एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक, बहुजातीय, बहुभाषी देश है, जिसे एक रंग में रंग देने की कोशिश जारी है। एक ध्रुवीय विश्व में भारत को एक रंग में रंग देने वालों का अमेरिका से गहरा रिश्ता है। एकध्रुवीय विश्व का कंसेप्ट अमेरिका का है। साम्प्रदायिक मत के लिए, धर्म का प्रयोग और हिन्दू को एक धर्म और सम्प्रदाय के रूप में देखने का सिलसिला बाद का है। हिन्दू धर्म का आरम्भ में जो व्यापक अर्थ था, उसे हिन्दुत्व के ‘कंसेप्ट’ से खत्म किया गया और हिन्दुत्व का एक नया अभिलक्षण प्रस्तुत किया गया। पहले अदालत के लिए ‘धर्मासन’ और न्याय करने वाले अधिकारी के लिए ‘धर्मस्थ’ जैसे शब्द प्रयुक्त होते थे। सुप्रीम कोर्ट का ध्येय वाक्य (मोटो) महाभारत के स्लोक यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः से लिया गया है, जिसका अर्थ है, ‘जहाँ धर्म है, वहाँ जय (जीत) है- सुप्रीम कोर्ट के लोगों में अशोक चक के नीचे यतो धर्मः ततो जयः (या ‘यतो धर्मस्ततो जयः) लिखा हुआ है। भारतीय दर्शन में मनुष्य, समाज और सृष्टि की नीव में जिस एक सस की बात कही गयी है वही धर्म है। धर्म शब्द का आरम्भ में जो ‘नीतिमूलक उच्च अर्थ था, वह अब पूरी तरह मिट चुका है। धर्म के इस क्षणों में सत्य, संयम अक्रोध आदि हैं। आज झूठ का व्यापार करने वाले ही बढ़-चढ़कर धर्म और हिन्दू धर्म की बातें करते हैं।

धम्मं शरणं गच्छामि’ में धम्म’ शब्द का जो ऊँचा अर्थ इष्ट था, क्या उसका एक कण भी आज हम धर्मान्धों के यहाँ देख सकते हैं? आज धर्म का पताका फहराने वालों को वेदव्यास द्वारा धर्म शब्द की की गई व्याख्या समझनी चाहिए। इस व्याख्या को वासुदेव शरण अग्रवाल “सोने के हरूफ़ों में लिखने योग्य’ बताते हैं – “नमो धर्माय महते धर्मो धारयति प्रजा: यत् स्यात् धारण संयुक्तं स धर्म इत्युदाहृतः” अर्थात उस महान धर्म को प्रणाम है, जो सब मनुष्यों को धारण करता है। सबको धारण करने वाले जो नियम हैं वे धर्म हैं। राज्य और धर्म के जिस मेल की बात प्राचीन काल में की गयी थी, वह आज इन दोनों के कुमेल से बहुत भिन्न था। वह एक प्रकार से राज्य और धर्म का सुमेल था। उस समय का धर्ममूलक राज्य सत्य से जुड़ा था। आज भी भारत का ‘राष्ट्रीय आदर्श वाक्य’ ‘सत्यमेव जयते’ है जो  मूलत: मुण्डक उपनिषद् का मंत्र 3.1.6 है। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे देवनागरी लिपि में अंकित है। तब राज्य को सत्य की या धर्म की बुनियाद पर खड़ा माना गया था। धर्म का मतवाद, सम्प्रदायवाद या हिन्दूवाद से उस समय कोई सम्बन्ध नहीं था। महाभारत के अंत में व्यास जी ने भुजा उठा कर कहा था कि धर्म नित्य है, धर्म से ही अर्थ और काम मिलते हैं। व्यास जी की भुजा उसी तरह उठी हुई है, पर आज के दिन लोगों ने धन और काम के पीछे धर्म या सत्य को धता बता दिया है।

अधर्मी घर्म-धर्म की रट लगा रहे हैं। जो विवेकानन्द को माला जपते हैं, वे उनके कथनों पर ध्यान नहीं देते। विवेकानन्द ने धर्म को सम्पूर्ण मानव जीवन में परिव्याप्त माना था, केवल अतीत और वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी। उनके अनुसार धर्म-शाश्वत आत्मा का शाश्वत ब्रह्म से शाश्वत सम्बन्ध है। (विवेकानन्द साहित्य, खण्ड 4 पृष्ठ 189) धर्म का सम्बन्ध पहले सत्य से था अब नहीं है। राजनीति अब समाज सेवा, जनसेवा न होकर एक व्यवसाय है, निवेश है। शब्दों के अर्थ छुटभैयों ने अपने कर्मों से, धत करमों से बदल डाले हैं। राज करने की, शासन करने की अपनी नीति हुआ करती थी। राजा से सर्वोपरि प्रजा थी, जनता थी। राजा उसी के निमित्त था। गाँधी धर्म और राजनीति का सम्बन्ध स्वीकारते थे पर उनकी इन दोनों की परिभाषा भिन्न थी, उनका कथन है कि जो लोग धर्म का राजनीति से सम्बन्ध नहीं मानते, वे नहीं जानते हैं कि धर्म क्या है? गाँधी के लिए समाज के अंतिम जन का महत्व था। उन्होंने राजनीति को साँप की कुण्डली की तरह देखकर साँप के साथ कुश्ती करने की बात कही है। उनके लिए वह हर शासक पराया था, जो जनमत की अवहेलना करता है।

आरम्भ में प्राकृतिक व्यापार और मनुष्य के आचार परस्पर संबद्ध होते थे। धर्म और सत्य प्रकृति के नियम थे। बाद में ये समाज के नियम बने। रामविलास शर्मा ने ‘भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश’ खण्ड 1 में ‘धर्म और सत्य- प्रकृति के नियम एवं धर्म और सत्यः समाज के नियम’ पर विचार किया है। पहले धर्म और सत्य का सम्बन्ध था। अब न तो धर्म का वह रूप है और न उसका सम्बन्ध सत्य से है। जिस देश में धर्म, राजनीति एवं संस्कृति पर इतने मूल्यवान विचार रहे हों, उनका गायब होकर अपने निकृष्टतम रूपों में प्रस्तुत होने का सीधा अर्थ है कि भारत ने अब स्वयं अपना अर्थ (भा+रत – प्रकाश में रत) बदल दिया है। अब चारो ओर अंधकार है। स्वतन्त्र भारत के आरंभिक दौर में ही यह पतन आरम्भ हुआ, जो अब चरम पर है। इसे इस मुकाम तक पहुंचाने में आरएसएस एवं उसके राजनीतिक संगठन भाजपा की प्रमुख भूमिका है। उसने धर्म के वास्तविक अर्थ को समाप्त कर एक विकृत एवं मनोनुकूल अर्थ प्रदान किया है। हिन्दुत्व की संस्कृति और राजनीति में जो कुछ मूल्यवान था, सबमें पलीता लगा दिया है। धर्म और राजनीति के इस सहमेल ने एक अकल्याणकारी स्थिति उत्पन्न कर दी है। धर्म का सम्बन्ध सत्य से था न कि सत्ता से। राजनीति का सम्बन्ध सामान्य जन से था न कि पूंजीपति, उद्योगपति और कॉरपोरेट से। लोकतन्त्र लोक का तन्त्र था, न कि कॉरपोरेट का। इसके कारणों की तफसील में अभी जाया नहीं जा सकता, पर यह सब कल्याणकारी राज्य के विघटनकारी राज्य में बदलने, डेमोक्रेसी के कॉरपोरेटोक्रेसी में परिवर्तित होने के बाद हुआ है।

धर्म, राजनीति और संस्कृति का वर्तमान रूप कहीं से भी शुभ नहीं है। चुनावी राजनीति ने वोट प्राप्ति के लिए जनता को अनेक समूहों, समुदायों, जातियों उपजातियों, श्रेणियों में विभाजित कर डाला है। अंग्रेजों ने इस देश पर शासन करने के लिए बाँटो और राज करो’ (डिवाइड एण्ड कूल) को जो नीति अपनायी थी, हमारे देश के शासक वर्गों ने आगे भी वही नीति अपनायी है, जिसके परिणामस्वरूप देश भीतर से खंडित हो रहा है। संस्कृति को अपसंस्कृति में बदलने का कार्य ‘मार्केट कैपिटल’ ने किया है। समय-समय पर हम सब जिन सूक्तियों का उल्लेख करते हैं, जिन कल्याणकारी क्षेत्रों का जाप करते हैं, अब उन सब का कोई अर्थ नहीं है। धर्म, राजनीति और संस्कृति पर आज के संदर्भ में विचार इसलिए आवश्यक है कि जो धर्म का अर्थ नहीं जानते उनके कब्जे में धर्म है, राजनीति जिनके लिए, लूट-महालूट है, वे सत्ता पर काबिज हैं और जिनके लिए ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ ही सब कुछ है, वे हिंदुत्व की संस्कृति का महाराग अलाप कर भारतीय संस्कृति के मूल विचार-स्वभाव को नष्ट करने में लगे हैं।

इस समय धर्म और राजनीति ने मिलकर जिस एक नयी संस्कृति का विकास किया है, वह सत्ता-संस्कृति है। भारत, जो राष्ट्र से कहीं अधिक एक अइडिया था। उसे सुनियोजित ढंग से नष्ट किया जा रहा है। हत्या, भय, झूठ, अपराध और लूट की संस्कृति देश में विकसित हो रही है, ऊपर से सब कुछ लुभावन, मनमोहक और आकर्षक भले दिखाई दे रहा हो, पर समाज की चूलें हिल रही है। धर्म का उपयोग सत्ता प्राप्ति के लिए किया गया और सत्ता पाने के बाद बाद बहुसंख्यकवाद प्रभावी हो रहा है। इकबाल ने जिन कारणों से हमारी हस्ती के न मिटने की बात कही थी, अब उन कारणों को ही समाप्त किया जा रहा है। सावरकर एक सम्प्रदाय-समुदाय में गाँधी से बढ़कर हैं। गाँधी के हत्यारे गोडसे की मूर्ति स्थापित की जा रही है। धर्म, राजनीति और संस्कृति का ऐसा विकृत रूप पहले कभी नहीं था। राजनीति वोट में सिमट कर दम तोड़ रही है, धर्म अधर्मियों के हाथों अपना मूल स्वरूप नष्ट कर चुका है।

धर्म और संस्कृति को पर्याय मानकर एक धार्मिक संस्कृति आकार ले चुकी है। इन सबने मिलकर जीवन शैली और जीवन पद्धति को बदल डालने का अपना मुख्य कार्यभार बना डाला है। सच बोलने वालों को प्रताड़ित किया जा रहा है, उन पर एफ आई आर दर्ज किया जा रहा है। राजनीतिक पार्टियां केवल चुनाव लड़ने में लगी हुई हैं। श्रम-संस्कृति, सृजन संस्कृति पर हमले हो रहे हैं। फिर भी प्राचीन भारत की बातें दुहराई जा रही हैं। वर्तमान भारत का परिदृश्य असुन्दर ही नहीं, भयंकर है। अगर हमने धर्म, राजनीति और संस्कृति के वर्तमान रूप को बदल डाला, तो कुछ ठीक हो सकता है। मात्र अकादमिक स्तर पर इन पर विचार करने का यह अवसर नहीं है। यह अवसर है इन तीनों क्षेत्रों में आई विकृतियों को समाप्त करने का, जिसके लिए युद्ध स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है

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ग्लोबल विलेज
प्रेस रिलीज़

‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा ने हमें ‘वर्चुअल वर्ल्ड’ में पहुंचाया

 

आईआईएमसी के छात्र सूरज तिवारी की पुस्तक ‘विश्वविद्यालय जंक्शन’ का विमोचन

हिंदी के प्रख्यात कवि एवं ललित निबंधकार श्री अष्टभुजा शुक्ल ने कहा है  कि आज कागज पर लिखने की संभावनाएं खत्म होती जा रही हैं। हम आभासी समय में जी रहे हैं। ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा ने हमें ‘वर्चुअल वर्ल्ड’ में पहुंचा दिया है। श्री शुक्ल मंगलवार को भारतीय जन संचार संस्थान के छात्र श्री सूरज तिवारी की पुस्तक ‘विश्वविद्यालय जंक्शन’ के विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे। पुस्तक का प्रकाशन यश पब्लिकेशंस ने किया है। इस अवसर पर भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, डीन (अकादमिक) प्रो. गोविंद सिंह, हिंदी पत्रकारिता विभाग के पाठ्यक्रम निदेशक प्रो. आनंद प्रधान, डॉ. राकेश उपाध्याय, यश पब्लिकेशंस के निदेशक श्री जतिन भारद्धाज एवं पुस्तक के लेखक श्री सूरज तिवारी भी उपस्थित थे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में विचार व्यक्त करते हुए श्री अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि एक वक्त था जब साहित्य का केंद्र दिल्ली हुआ करता था। दिल्ली पर गालिब ने भी अपनी कविता लिखी। लेकिन अब दिल्ली में साहित्य का जो केंद्रीकरण हो रहा था, उसका अब विकेंद्रीरण हो रहा है। छोटे शहरों, नगरों और कस्बों के लोग न सिर्फ अच्छी किताबें लिख रहे हैं, बल्कि सफल भी हो रहे हैं।

श्री शुक्ल ने कहा कि कच्ची उमर में पक्का लिख लेने वाला अच्छा लेखक नहीं होता। युवाओं के लिए लिखने से ज्यादा पढ़ना महत्वपूर्ण है। छपी हुई किताब को स्पर्श करना शब्दों की जीवित सत्ता से आपका परिचय कराता है। उन्होंने कहा कि हड़बड़ी के समय में गड़बड़ी की संभावना ज्यादा होती है। इसलिए लेखक को चाहिए कि वह जो लिख रहा है, उसका मूल्यांकन करे।

इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि लेखक के लिए अपने अनुभव का दायरा बढ़ाना बहुत जरूरी होता है। अच्छी कहानियां शहरों से नहीं, बल्कि गांवों से आती हैं। लोक का अनुभव लेखक को समृद्ध बनाता है। उन्होंने कहा कि अगर लेखक का समाज से रिश्ता नहीं होगा, तो वह पत्रकारिता और साहित्य सृजन किसके लिए करेगा। लेखन का मूल तत्व ही समाज है।

कार्यक्रम का संचालन श्री देवेंद्र मिश्रा ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन सुश्री प्रगति चौरसिया ने दिया। इस अवसर पर आईआईएमसी के सभी विभागों के विद्यार्थी मौजूद थे

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यूपी पुलिस
उत्तरप्रदेश

पवित्र खाकी के धब्बे : यूपी पुलिस ऐसा क्यूं है?

 

केस नंबर 1 – जौनपुर में बर्खास्त सिपाही को अपने ही दोस्त की बेटी, हाईस्कूल छात्रा के यौन शोषण अपराध में अपर सत्र न्यायाधीश ने बारह साल की जेल और इक्क्यावन हजार अर्थदंड की सजा सुनाई।

केस नंबर 2- पीलीभीत में पुलिस ने भांग को चरस बताकर कथित बेकसूर को जेल भेजा। मामला सार्वजनिक होने पर छीछालेदार। कोर्ट ने सीओ समेत पूरे थाना स्टाफ को तलब किया। कोर्ट ने कहा, अंधेरगर्दी की पराकाष्ठा।

केस नंबर 3- बाराबंकी में ईंट भट्ठा व्यवसाई के अपहरण मामले में फरार चार सिपाहियों समेत पांच लोगों पर ईनाम घोषित। कोर्ट ने सभी आरोपियों के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया।

केस नंबर 4- सिकंदराबाद में फर्जी एनकाउंटर मामले में कोर्ट ने रिटायर्ड डिप्टी एसपी रणधीर सिंह की प्रापर्टी जब्त करने का आदेश दिया। सात अन्य पुलिसकर्मियों को पहले ही कोर्ट में पेश होना पड़ा।

केस नंबर 5- प्रयागराज में महिला सिपाही से छेड़छाड़ के मामले में उसी थाने के दरोगा महेश चंद्र निषाद गिरफ्तार कर जेल भेजे गए। खुद पीड़िता सिपाही की तहरीर पर जार्जटाउन थाने में मुकदमा दर्ज।

यह तो महज कुछ बानगी है। विस्तार से देखें तो एक से बढ़कर एक मामले, कि सामान्यजन दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाएं। गौर से देखा जाए तो यह साफ तौर पर दिखता है कि ज्यादातर मामले में कोर्ट को ही कड़ा रुख अपनाना पड़ा। उधर, सूबे के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ को सख्त टिप्पणी के साथ प्रदेश पुलिस के मुखिया मुकुल गोयल को हटाना पड़ा है। फिजां में सवाल हैं कि क्या यूपी की पुलिस वाकई अपना भरोसा खोती जा रही है? आखिर क्यों उसे कोर्ट में उसे बार बार कठघरे में खड़ा होना पड़ रहा है। समाज शास्त्री विवेक आर्य कहते हैं कि कई बार कार्य करने की हड़बड़ी में भी ऐसा हो जाता है। प्रख्यात पत्रकार शिवचरण सिंह चौहान और गुफ्तगू साहित्यिक संस्था प्रमुख पत्रकार इम्तियाज अहमद गाजी इसके पीछे वर्कलोड ज्यादा होने का तर्क देते हैं। उधर, शिवसागर सिंह और राकेश मिश्र बाबूजी तर्क देते हैं, वे कहते हैं – वर्कलोड और हड़बड़ी का ये मतलब तो नहीं कि जांच पड़ताल के नाम पर आंख में धूल झोंक दिया जाए।

आम जनता से जुड़ा है पुलिस महकमा, इसलिए जिम्मेदारी और जवाबदेही भी बड़ी है। पवित्र ‘खाकी’ को दागदार बनाने वाले इन ‘बदनुमा धब्बों’ की करतूतों ने न सिर्फ महकमे का बल्कि कर्तव्यनिष्ठ विभागीय अफसरों का भी सिर कई बार शर्म से झुका दिया। कई बार बड़े अफसरों की किरकिरी हो जाती है। उधर, मौका खोजता विपक्षी दल बार बार सरकार की घेरेबन्दी करने में जुट जाता है सो अलग। फिलहाल, इधर पुलिस की कई करतूतें सुर्खियों में रही हैं। बाराबंकी के सुबेहा कस्बा निवासी ईट भट्ठा व्यवसाई आफाक का अपहरण 30 नवम्बर को हो गया। अपहरणकर्ताओं को पांच लाख फिरौती का आश्वासन देकर आफाक सुरक्षित घर वापस आ गए। अगवा और फिरौती के इस मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी अमेठी जिला, जगदीशपुर थाना क्षेत्र के मोहब्बतपुर निवासी राजू को गिरफ्तार किया। पुलिस की जांच पड़ताल में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। पता चला कि अपहरण, फिरौती के मामले में जगदीशपुर में तैनात सिपाही राकेश सिंह, रतन कुमार, शिव दयाल राठौर और अरुण यादव भी शामिल रहे। पुलिस ने कड़ी कार्रवाई करते हुए इन सिपाहियों को भी नामजद किया पर तब तक चारों सिपाही फरार हो चुके थे।

ऐसे में फरार चारों सिपाहियों को इनामियां घोषित करना पड़ा। फरार बदमाशों को खोजने वाले सिपाही खुद अपराधी की तरह फरारी काटें, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा? उधर, कानपुर के प्रॉपर्टी डीलर मनीष गुप्ता बिजनेस टूर पर गोरखपुर गए थे। गोरखपुर के जिस होटल में मनीष रुके थे, वहाँ पुलिस रात साढ़े बारह बजे रूटीन चेकिंग करने गई थी। आरोप है कि आधी रात होटल के कमरे में जाकर डिस्टर्ब करने पर बिजनेसमैन मनीष गुप्ता ने पुलिस टीम पर आपत्ति जताई। गुस्साई पुलिस ने मनीष को इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। बाद में इस घटना को लेकर जमकर हंगामा हुआ। पुलिस पर हत्या का आरोप लगा। एक बार फिर पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई।

इसी प्रकार सिकंदराबाद में फर्जी एनकाउंटर के मामले में कोर्ट ने रिटायर्ड डिप्टी एसपी रणधीर सिंह की प्रॉपर्टी जप्त करने का आदेश दिया। इस मामले में सात अन्य पुलिसकर्मी पहले ही कोर्ट में पेश हो चुके थे। तीन अगस्त 2002 को सिकंदराबाद बुलंदशहर रोड पर बिलुसरी के पास रोडवेज बस लूट की वारदात हुई। इस दौरान लुटेरों ने बस कंडक्टर को गोली मारकर घायल कर दिया। बताया जा रहा है कि पुलिस ने घेराबन्दी कर प्रदीप नाम के एक बदमाश को एनकाउंटर में मार गिराया। परिजनों ने पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर करने का आरोप लगाया। परिजनों का कहना था कि बीटेक का छात्र प्रदीप कॉलेज में फीस जमा कर घर लौट रहा था कि तभी पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ दिखाकर उसकी हत्या कर दी। इस मामले में भी हफ्तों पुलिस की किरकिरी होती रही। प्रयागराज के बिगहिया कांड में भी कतिपय पुलिसकर्मियों की करतूत उजागर हुई।

बिगहिया में सात सितम्बर 2018 की रात एक ही परिवार में चार लोगों की सामूहिक हत्या हो गई थी। कमलेश, बेटी, दामाद और नाती की सामूहिक हत्या के मामले में छह आरोपी जेल में बंद थे। कोर्ट के आदेश पर गांधीनगर गुजरात की प्रयोगशाला में नार्को टेस्ट हुआ। नार्को टेस्ट की रिपोर्ट में एक तथ्य उभरकर सामने आया कि किस तरह स्थानीय थाने की पुलिस ने आरोपियों में एक वृद्ध का नाम हटाने के नाम पर दो लाख रुपए झटक दिए। गोरखपुर जिले में दो कारनामे प्रकाश में आए। एफ आई आर दर्ज करने में आनाकानी और मुकदमे से नाम हटाने के एवज में पैसा मांगने के आरोप में गोला थाने में तैनात दरोगा विवेक चतुर्वेदी के खिलाफ भ्रष्टाचार की धाराओं में केस दर्ज कराया गया। मुकदमे में आरोप सही पाए जाने पर एसएसपी जोगेंद्र कुमार ने सख्ती अपनाते हुए दरोगा विवेक चतुर्वेदी को सस्पेंड कर दिया। इसी प्रकार गोवंश तस्करी के मामले में देवरिया सलेमपुर थाने में तैनात सिपाही रामानंद यादव को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। इसके पहले भी गोरखपुर रेंज में कई मामले सुर्खियों में रहे हैं।

मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ जी के हस्तक्षेप पर अफसरों ने कड़ा रुख अपनाया था। 18 दिसम्बर 2017 को उरुवा थाने में तैनात रहे दो ट्रेनिंग दरोगा को अपहरण के मामले में मुकदमा और गिरफ्तारी दोनो करनी पड़ी। प्रदेश के एक सीनियर पुलिस अफसर बताते हैं कि बिहार प्रांत के गोपालगंज के छात्र एहसान आलम को धोखे से उसका दोस्त अफजल गोरखपुर लाया फिर परिचित दोनों ट्रेनी दरोगा के मदद से तीन लाख की फिरौती मांगी। मामला खुलने पर तत्कालीन एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज ने दोनों ट्रेनी दरोगा पर एफ आई आर के साथ गिरफ्तारी भी कराई। इसी प्रकार वर्ष 2006 में कुशीनगर जिले के कारखाने में एक युवक की सिर काटकर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि एक दरोगा ने सरकारी जीप का इस्तेमाल कर युवक की लाश को गंडक नदी में बहा दिया था मामला सुर्खियों में आने के बाद तत्कालीन आईजी ने दरोगा के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कराते हुए उसकी गिरफ्तारी भी कराई थी। बहरहाल, कतिपय पुलिसकर्मियों की मनमानी करतूतों ने ईमानदार और कर्मठशील सीनियर अफसरों को कड़ाई के लिए मजबूर किया है। दूसरी तरफ सरकार की मंशा को भी बाधित किया है

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सेहत

योग को धर्म और राजनीति के चश्मे से न देखें

 

योग मानव शरीर के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी माना गया है इसका उद्देश्य धार्मिक नहीं है बल्कि हमारे जीवन के वैज्ञानिक रहस्य से जुड़ा हुआ है। जैसा कि हम जानते हैं कि  राज योग, कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग; योग के चार प्रकार हैं जिसमें एक सामान्य व्यक्ति कर्म योग करता है। उसमें भी प्राणायाम और आसन के साथ-साथ मुद्राएं नियमित करके हम अपने शरीर के विकास के साथ अपने जीवन और समाज को विकसित कर सकता है। 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के 69 में सत्र को संबोधित करते हुए भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का आह्वान किया और इसको मानते हुए 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्यों ने रिकॉर्ड 177 समर्थक देशों के साथ 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का संकल्प सर्वसम्मति से अनुमोदित किया।

यदि हम प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की बात करें तो आयुष मंत्रालय के तत्वाधान में 21 जून, 2015 को नई दिल्ली के राजपथ में एक सफल आयोजन करते हुए लगभग 35,985 प्रतिभागियों ने एक साथ योग सत्र का विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया था। यदि हम अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के प्रत्येक चिन्ह को ध्यान से देखें तो दोनों हाथों को जोड़ना योग का प्रतीक है यह व्यक्तिगत चेतना का सार्वभौमिक चेतना के साथ सामंजस्य दिखाता है, यह शरीर और मन, मनुष्य और प्रकृति की समरसता का प्रतीक है यह स्वास्थ्य और कल्याण के समग्र दृष्टिकोण को भी चित्रित करता है। प्रतीक चिन्ह में चित्रित भूरी पत्तियां भूमि, हरी पत्तियां प्रकृति और नीली पत्तियां अग्नि तत्व का प्रतिबिंब हैं।

दूसरी ओर सूर्य ऊर्जा और प्रेरणा का स्रोत है। यह प्रतीक चिन्ह मानवता के लिए शांति और समरसता को प्रतिबिंबित करता है जो कि योग का मूल है। योग कोई धार्मिक तो नहीं है यह प्रत्येक व्यक्ति के शरीर और मन के बीच में सामंजस्य स्थापित करने का कार्य करता है। यह एक कला के साथ-साथ विज्ञान भी है। यदि आप नियमित योग करेंगे तो आपके अंदर चेतना विकसित होगी। जैसा कि आजकल देखा जा रहा है कि देश का युवा सोशल मीडिया के भ्रम जाल में फंसकर अपने शरीर और मन के सामंजस्य से बहुत दूर भटक चुका है। ऐसे में योग एक ऐसा माध्यम है जिससे युवा अपने शरीर और मन का संतुलन बैठा सकते हैं।

फोटो सोर्स : freepic

योग कोई बाहरी कला या विज्ञान नहीं है इसका विकास भारत में ही हुआ है। दंडासन और कोणासन से हाथ और पैर मजबूत होते हैं। पाचन शक्ति को दुरुस्त करने के लिए उष्ट्रासन कर सकते हैं। गैस और एसिडिटी की समस्या से निजात पाने के लिए भुजंगासन पेट के बल लेट कर किया जाता है। मन को शांत रखने के लिए शवासन बहुत फायदेमंद रहता है। लंबाई बढ़ाने और रीढ़ की हड्डी की कुशलता के लिए ताड़ासन और रक्त संचार सुचारू रखने के लिए सर्वांगासन सर्वाधिक उचित है। खड़े रहकर किए जाने वाले नटराज आसन से कंधे और फेफड़े मजबूत बनते हैं। जैसा कि आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में प्रत्येक व्यक्ति अधिक कार्य के बोझ के कारण चिंता से ग्रस्त हैं ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति तनाव को मिटाने के लिए सुखासन कर सकता है।

इसी प्रकार योग के आठ अंगों यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि में से प्राणायाम भी आप नियमित कर सकते हैं जिसका अर्थ है श्वास को लंबा करना। श्वास मतलब प्राण। भस्त्रिका प्राणायाम करने से हमारा हृदय मजबूत होता है उसके साथ ही साथ फेफड़े, मस्तिष्क भी मजबूत होता है और हमें भविष्य में पार्किंसन या पैरालिसिस जैसी बीमारियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। कपालभाति प्राणायाम करने से हमारे चेहरे, आंख, थायराइड, पाचन संबंधी रोग जैसे कब्ज, एसिडिटी, महिलाओं में यूट्रेस संबंधी बीमारियां, कोलेस्ट्रोल संबंधी बीमारियां, डायबिटीज, यहां तक कि कैंसर रोग में भी फायदा पहुंचता है।

बाह्य प्राणायाम करने से मन को एकाग्रता मिलती है, उसके साथ ही पेट संबंधी रोग भी सही होते हैं। अनुलोम विलोम प्राणायाम करने से हमारे हृदय के ब्लॉकेज तक खुल जाते हैं उसके अलावा किडनी, कैंसर जैसी बीमारियां हमें नहीं होती तथा हमारी मानसिक क्षमता भी बढ़ती है। सर्दी, खांसी नहीं होती और  गले के रोग भी हमें नहीं होते। टॉन्सिल के मरीजों के लिए भी यह बहुत फायदेमंद है। भ्रामरी प्राणायाम करने से माइग्रेन, डिप्रेशन और मन की अशांति दूर होती है। उज्जाई प्राणायाम करने से थायराइड टीबी, अनिद्रा मानसिक तनाव, हकलाने जैसी समस्याएं भी दूर होती हैं। शीतली प्राणायाम हमारे शरीर की अतिरिक्त गर्मी और पेट की जलन को कम करता है। इस प्रकार यदि हम देखें तो योग का संबंध किसी भी एक धर्म से ना होकर के हमारे अपने मन और हमारे शरीर के आपसी सामंजस्य को बेहतर बनाना ही है। इसलिए योग को धार्मिक और राजनैतिक चश्मे से देखना बंद करके इसको जीवन में उतारना सीखें।

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सेहत

दवाईयां बनी अभिशाप, योग मिटा रहा शरीर के रोग

 

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के सतत् प्रयास से पूरे विश्व में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह पूवर्क मनाया जाने लगा है जो भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। प्रधानमन्त्री स्वयं एक योगी पुरुष हैं अतएव वे योग की अच्छाईयों को भलि भांति समझते हुए योग की महत्ता को दुनिया के सामने रखा है। उन्होने लोगों को यह भी बताया कि विश्व में स्वास्थ्य विज्ञान ने बड़ी बड़ी सीमाएं पार की हैं। प्रतिदिन शोध हो रहे हैं। अनेकों बीमारियों पर विज्ञान ने विजय प्राप्त कर ली हैं परन्तु यह वरदान अब अभिशाप से कम नहीं रह गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने एक शोध रिपोर्ट में कहा है कि विश्व में जितने लोग मरते हैं आधे बीमारियों से मरते हैं और आधे दवाईयों के अत्यधिक और गलत उपयोग से मरते हैं जो सभी के लिए एक समस्या बनती जा रही हैं। ऐसे में प्रधानमन्त्री महोदय ने संयुक्त राष्ट्र संध के समक्ष 14 दिसम्बर 2014 को जो प्रस्ताव रखा उसमें उन्होने योग और योग से होने वाले फायदे के बारे में विस्तार से चर्चा की थी।

उन्होने यह भी बताया कि मानव शरीर में एन्टीबायोटिक दवाइयों के अनावश्यक उपयोग के कारण कई बीमारियाँ पैदा हो रही हैं। अमेरिका सरीखे अन्य कई देशों में  मौतें ऐसी दवाईयों के अत्यधिक और गलत प्रयोग करने से होती हैं। विश्व के अनेक देशों में अब भी गांवों में गुजर बसर करने वाले लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाएं सही ढंग से नहीं पहुँची हैं। यदि कही अस्पताल हैं भी तो बहुतों में या तो डॉक्टर नहीं हैं या दवाईयां नहीं  हैं। अनेको  गांवों में मीलों तक सड़के ही नहीं है ऐसे में  गम्भीर बीमारी होने पर रोगी न डॉक्टर के पास पहुँच सकता हैं और न ही चिकित्सक ही।  यही कारण है कि प्रधानमन्त्री नरेन्द मोदी के पहल के चलते आज विश्व में योग पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा है। इन दलिलों के मद्देनजर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व योग दिवस मनाने की स्वीकृति प्रदान कर दी।

इसके अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा पर नए प्रयोग हो रहे हैं जैसे ग्लोबल वार्मिंग की समस्याओं से निपटने हेतु प्रकृति की ओर वापस चलो के नारे पर जोर दिया जा रहा हैं। ठीक इसी प्रकार स्वस्थ विश्व के निमार्ण के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और योग की ओर लौटने की भी बात की जा रही है। चूंकि इसमें बगैर किसी खर्च के लोगों को उत्तम स्वास्थ्य मुहैया कराया जा सकता हैं। साथ ही अपने जीवन को भटकाव से बचाना ही योग कहलाता है। सामान्यतः लोगों के मन में यह धारणा रही है कि योग करने वाला साधु या संन्यासी बन जाता है, परन्तु ऐसी बात नहीं है। योग का सामान्य अर्थ जोड़ना होता  है अथार्त् मिलाप कराना। मिलाप से यहाँ तात्पर्य हैं मनुष्य अपने आप से मिलता है यानि शरीर और आत्मा का मिलन भी हम कह सकते हैं।

योग करने वाला मनुष्य सदा उमंग में रहता हैं। उसके मन में हमेशा एक तरंग उठता है जो जीवन में नव उत्साह और जोश लिए हुए रहता है। योग के बारे में आज लोगों के मन में अनेकानेक भ्रांतियां फैली हुयी हैं कि योग फलाना धर्म का अनुशरण करता है। योग करने से धर्म बदल जाता हैं। मनुष्य साधु, महर्षिं व मुनि बन जाता हैं जबकि योग जीवन जीने की एक अद्भुत कला है अथार्त् योग करने से वैसा मानव भी निश्छल सरल और अध्यात्मिक बन जाता है, जिन्होने कभी भी अपने अन्दर ऐसा महसूस नहीं किया है। योग एक ऐसी क्रिया है जिससे शरीर में स्थित बीमारियां तो दूर होती ही हैं साथ ही इसके जीवन में आत्मसाद करने से आत्मा और मन पर पड़ा मैल का परत और विकार स्वतः मिटता चला जाता है और हम तन तथा मन से पूणर्तः स्वस्थ व पवित्र और वे उम्र भर फूलों सा मुस्कराते और चिड़ियों की तरह चहचहाते रहते हैं।

योग का अभ्यास करके मनुष्य चिकित्सालयों में लग रही लंबी-लंबी कतारों से बच सकता हैं साथ ही इससे उनके बहुमूल्य समय और धन की भी बचत होगी। इस बात से सभी को सहमत होना ही चाहिए कि योग मनुष्य को अन्य कई प्रकार के रोगों और तनावों से मुक्ति दिला सकता है। योग क्रिया स्वयं तो करनी ही चाहिए साथ ही समाज और देश को भी योग के प्रति जागरुक करने की आवश्यकता है। योग के प्रति युवा वर्ग एवं बुजुर्गो को जागरुक करने के लिए तो विभिन्न प्रकार से प्रचारित-प्रसारित किया जा ही रहा हैं परन्तु बच्चों में योग की आदत डालने के लिए सरकार ने विद्यालयों को सहारा बनाया हैं। यह हृदय को आहलादित करने वाला समाचार है। देश की तत्कालीन शिक्षा मन्त्री श्रीमती स्मृति ईरानी द्वारा छठी क्लास से सरकारी स्कूलों में योग की शिक्षा की शुरुआती व्यवस्था करने की बात सुन मानो जेठ की दोपहरी में छांव मिल गया हो। साथ ही निजी स्कूलो में भी नवम् वर्ग से योग की पढ़ाई सुनिश्चित किये जाने को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। राष्ट्र निमार्ण में लगे हमारे देश के अनेकों ऐसे प्रकाण्ड योगी पुरुष हैं जिन्होने प्राकृतिक चिकित्सा और योग को कुछ ही समय में बहुत ज्यादा प्रचारित कर दिया हैं। जिनमें स्वामी रामदेव जी  और आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवि शंकर जी का नाम प्रमुख स्थान पर रखा जा सकता हैं। इन्होंने कुछ ही समय में भारत ही नही वरन् संपूर्ण विश्व को स्वस्थ बनाने की दिशा में क्रांति ला दिया हैं। ऐसे में संपूर्ण विश्व के स्वस्थ रहने की परिकल्पना शीध्र होती प्रतीत हो रही है।

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