एतिहासिक

पूना पैक्ट के बाद गाँधी और अम्बेडकर

 

  • योगेन्द्र

 

पूना पैक्ट 24 सितम्बर 1932 को दलित एवं हिन्दू नेताओं के बीच हो गया, तब भी गाँधी जी ने अनशन नहीं तोड़ा। पैक्ट का पूरा मजमून ब्रिटिश प्रधानमंत्री को भेजा गया। गाँधी जी का मानना था कि जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री इसकी स्वीकृति देंगे, तभी अनशन तोड़ा जायेगा। अंतत: ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने स्वीकृति दी और गाँधीजी ने गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और एक कुष्ठ कैदी के सामने अनशन तोड़ा। इस घटना को 87 वर्ष हो चुके हैं। अब पूना पैक्ट करनेवाले न हिन्दू नेता बचे, न दलित नेता। आखिर इस समझौते का हश्र क्या हुआ? क्या हिन्दू समाज से अस्पृश्यता पूरी तरह खत्म हो गयी या सम्मिलित निर्वाचन से दलितों को बहुत हानि हुई? गाँधी और अम्बेडकर के अपने अपने पक्षों का क्या हुआ? गाँधी की ओर से कहनेवाला कोई हिन्दू नेता अब नहीं है। जो हिन्दू नेता आज सक्रिय हैं, वे उदार ह्रदय नहीं रखते। अम्बेडकर की परंपरा में जो दलित नेता विकसित हुए, वे गाँधी से तीव्र घृणा करते हैं। उनका साफ साफ मानना है कि गाँधी ने दलितों के साथ धोखा किया है। अगर यह पैक्ट नहीं होता तो दलितों की स्थिति कुछ और रहती। सम्मिलित निर्वाचन से चुने नेता बहुसंख्यक हिन्दू वोट पर निर्भर करते हैं। नतीजा है कि वे दलितों के प्रति जिम्मेदार नहीं होते और हिन्दुओं की सेवा करते हैं। एकतरह से वे हिन्दू नेता के गुलाम होते हैं। एक हद तक यह आरोप सही भी है कि जब दलितों पर जुल्म होते हैं या मॉव लिंचिंग होता है तो ये चुने हुए दलित नेता चुप रहते हैं और वे अपनी पार्टी या नेता के प्रति ही प्रतिबद्धता दिखाते हैं। गाँधीजी एकजुटता चाहते थे कि हिन्दू समाज का बिखराव न हो और जबतक स्वेच्छा से दलित हिन्दू समाज में रहना चाहते हैं, वे रहें। कानून बनाकर उन्हें अलग नहीं किया जाये। यह भी सच था कि दलित जातिवाद की कुव्यवस्था से परेशान होकर मुसलमान या ईसाई बन रहे थे। गाँधी जी चाहते थे कि अस्पृश्यता खत्म हो जायेगी तो दलित हिन्दुओं के साथ खुशी रहेंगे। डॉ. अम्बेडकर चाहते थे कि जाति का विनाश हो, तभी समतापूर्ण समाज कायम हो सकता है। डॉ. अम्बेडकर ने अंतिम समय में एक ब्राह्मणी से शादी की और अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध हो गये। गाँधी जी इस समझौते के बाद लगभग सोलह वर्ष तक जीवित रहे और अंतत: एक हिन्दूवादी नेता की गोलियों के शिकार हुए।

Image result for पूना पैक्ट के बाद गाँधी और अम्बेडकर

पैक्ट के बाद बम्बई में 25 सितम्बर को हिन्दू नेताओं का सम्मेलन हुआ जिसमें संकल्प लिया गया-‘ आज से हिन्दुओं में किसी को जन्म के कारण अछूत नहीं समझा जायेगा। और जिन्हें अभी तक अछूत समझा गया है , उन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी भरने तथा सार्वजनिक सडकों और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं का उपयोग करने के वे सभी अधिकार होंगे जो अन्य हिन्दुओं को है। ’गाँधी जी से जुडे हजारों कार्यकर्ता दलितों को मंदिर प्रवेश कराने से लेकर सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल कराने के कार्य में लग गये। हिन्दुओं में भी जागृति और समझ आयी। बहुत से मंदिरों के दरवाजे खोल दिये गये। दूसरी तरफ यह भी हो रहा था कि कई स्थलों पर कट्टरपंथी मंदिर के दरवाजे दलितों के लिए नहीं खोल रहे थे। मसलन, केरल में के केलप्पन 20 सितम्बर से ही आमरण अनशन पर बैठे थे। 29 सितम्बर को गाँधी जी ने अनशन तोड़ने की अपील की। साथ ही कहा कि मंदिर प्रबंधक को तीन महीने की नोटिस दे दो कि अगर इस बीच मंदिर के दरवाजे दलितों के लिए नहीं खोले गये तो पुन: आमरण अनशन किया जायेगा। गाँधी जी की अपील पर के केलप्पन ने अनशन स्थगित कर दिया। मंदिर प्रबंधक को गाँधी जी ने लिखा कि अगर तीन महीने के अंदर दलितों के लिए मंदिर नहीं खोला गया तो अनिवार्य रूप से के केलप्पन के साथ उन्हें भी अनशन पर बैठना पडेगा। गाँधी जी अस्पृश्यता निवारण के लिए मुख्य रूप से स्पर्श, मंदिर प्रवेश आदि को मान रहे थे। सहभोज को ऐच्छिक कार्रवाई मानते थे, लेकिन साथ ही जोडते थे कि यदि दूसरों को तो ऐसे भोज में सम्मिलित किया गया हो किन्तु अस्पृश्यों को उनके अस्पृश्य होने के कारण बहिष्कृत किया गया हो तो बात दूसरी है। 6 अक्टूबर 1932 को गाँधी जी ने हरिभाऊ पाठक के एक पत्र के जवाब में लिखा-‘ रोटी बेटी व्यवहार अस्पृश्यता को समूल नष्ट करने का कार्यक्रम का कोई अंग नहीं है। ये दोनों तो एक अलग सुधार के विषय हैं और एक न एक दिन हिन्दू समाज की सारी जातियों को इन्हें स्वीकार करना ही होगा। ’गाँधी ने उसी पत्र में आगे लिखा-‘ मेरा अपना विचार है कि आज तो वर्ण व्यवस्था टूट गयी है। आज न कोई सच्चा ब्राह्मण रह गया है, न सच्चा क्षत्रिय और न सच्चा वैश्य। हम सब शूद्र हैं अर्थात् एक ही वर्ण के हैं। यदि यह बात स्वीकार कर ली जाय तो बात आसान हो जाती है। निश्चय ही अस्पृश्यता निवारण का मतलब ऊंच नीच के भाव का समूल नष्ट कर दिया जाना है।’

Image result for पूना पैक्ट के बाद गाँधी और अम्बेडकर
अस्पृश्यता निवारण के संदर्भ में रोटी बेटी व्यवहार का प्रश्न प्रमुखता से उठा। देश के विभिन्न कोने से गाँधी  जी के पास पत्र आये। गाँधी ने उत्तर भी दिया। रोटी बेटी व्यवहार के संदर्भ में प्रश्न करनेवालों में मणिशंकर गणपतराम, मोहनलाल, नारायण मोरेश्वर खरे, डा सुरेशचंद्र बनर्जी, कुमुदबान्धब चटर्जी, मीठी बहन, जात पांत तोडक मंडल के मंत्री को और कई आम नागरिकों को। 7 अक्तूबर 1932 को मणिशंकर गणपतराम को लिखा-‘ रोटी बेटी व्यवहार अस्पृश्यता निवारण का अंग नहीं है। इसमें किसी के साथ जबरदस्ती करने की तो बात ही नहीं है; लेकिन कोई रोटी बेटी व्यवहार रखे तो जिस तरह प्रत्येक जाति के बीच ऐसा व्यवहार करनेवाले को रोका नहीं जाता, उसी प्रकार उसे भी नहीं रोकना नहीं चाहिए। असपृश्यता निवारण और यह व्यवहार अलग अलग चीजें हैं। ’इसी से मिलते जुलते विचार 8 अक्तूबर को मोहनलाल को लिखते हुए जोडा-‘ जो लोग हरिजनों के साथ स्वेच्छा से ऐसे सम्बन्ध स्थापित करने को प्रेरित हों, उन्हें रोका भी नहीं जा सकता, वैसे ही जैसे कि स्पृश्य मानी जानेवाली जातियों में इस प्रकार के आपसी सम्बन्ध को रोकता नहीं। अस्पृश्यता निवारण का अर्थ है कि हिन्दू मात्र जिन स्वाभाविक मानवीय अधिकारों का उपभोग करते हैं, वे सब अधिकार हरिजनों को भी देना और दिलाना। ’अगर कोई जाति को तोडना चाहता है तो गाँधी को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन अस्पृश्यता को खत्म करने के लिए यह आवश्यक नहीं मानते थे। जिन जातियों में अस्पृश्यता नहीं थी, उनमें भी रोटी बेटी का व्यवहार नहीं था। गाँधी को लगता था कि अस्पृश्यता जाति से अलग है। उन्होंने नागपुर के एक मारवाडी सज्जन को पत्र लिखते हुए अस्पृश्यता, सहभोज और अंतर्जातीय शादी के बारे में साफ साफ लिखा-‘अस्पृश्यता निवारण का अर्थ है कि जो व्यवहार हम अन्य जातियों के साथ रखते हैं, वही इनके साथ भी रखें। यानी उन्हें छुएं, उनके हाथ का पानी वगैरह पीयें और वे घरों, मंदिरों, पाठशालाओं आदि में औरों की तरह ही जायें। यह तो अस्पृश्यता निवारण के आवश्यक अंग हैं। उनके हाथ का पकाया हुआ खायें या उनके साथ बैठकर खायें या बेटी व्यवहार रखें, यह सबकी इच्छा की बात है। धर्म में न उसका विधान है, न निषेध। अभी जो प्रीतिभोज हो रहे हैं, वे अस्पृश्यता निवारण के अंग नहीं हैं। मगर इसमें मुझे शक नहीं कि वे स्तुत्य हैं। ’मीठी बहन को गाँधी जी ने लिखा-‘अस्पृश्य माने जानेवाले हरिजनों के साथ जो भी रोटी बेटी व्यवहार रखता है, वह अधर्म करता है, ऐसा मैं नहीं मानता।’ 27 अक्तूबर 1932 को हरिसिंह गौर को उन्होंने लिखा- ‘अंतर्जातीय भोज और विवाह के बारे में उस पर जो प्रतिबंध थोप दिये गये हैं, उनमें और ऊंच नीच के विचार में मेरा विश्वास नहीं है।’

Image result for पूना पैक्ट के बाद गाँधी और अम्बेडकर

इस तरह से देखें तो अस्पृश्यता निवारण में गाँधी जी की दृष्टि स्पष्ट है। वे रोटी बेटी व्यवहार को इसका अंग नहीं मानते, लेकिन कोई रोटी बेटी सम्बन्ध करता है तो उन्हें आपत्ति नहीं है, बल्कि वे इसे अस्तुत्य मानते हैं। डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि अलग है। वे जाति विनाश करना चाहते हैं। दलितों को सम्मान दिलाने और मनुष्यता का भाव भरने में अभूतपूर्व काम करते हैं। सवाल यह है कि जाति टूटी क्यों नही? जो लोग डॉ. अम्बेडकर को मानते हैं, वे भी जाति नहीं तोड रहे। चमार और भंगी में रोटी बेटी सम्बन्ध नहीं है। दोनों में अछूत का व्यवहार तक है। दलितों जातियों में भी शादियां नहीं हो रहीं। यहां डॉ. अम्बेडकर सफल नहीं हो पाये। गाँधी जी ने अस्पृश्यता निवारण का आंदोलन चलाया। वह एक हद तक सफल रहा, लेकिन पूरी तरह सफल नहीं है। डॉ. अम्बेडकर एकल निर्वाचन के पक्षधर थे।  पूना समझौता 24 सितम्बर 1932 में हुआ। इस समझौते से डॉ. अम्बेडकर असहमत थे, तब भी उन्होंने समझौता किया। वे जीवन भर इसकी आलोचना करते रहे। डॉ. अम्बेडकर की परंपरा में जो आज खडे हैं कि वे भी इस समझौते की आलोचना करते हैं और गाँधी को अच्छी निगाह से नहीं देखते। यह स्वाभाविक है। अब दोनों नहीं हैं, न गाँधी, न अम्बेडकर। वर्तमान है और वर्तमान का राजनैतिक नेतृत्व है। गाँधी दलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के खिलाफ थे और डॉ. अम्बेडकर पृथक निर्वाचन के पक्षधर। कल्पना कीजिए कि यह समझौता नहीं हुआ होता तो दलितों की स्थिति क्या रहती? वर्तमान की एक कटु सच्चाई है कि दलितों के आरक्षित सीट से जीते हुए नेता पिछलग्गू हैं। उनकी अपनी आवाज नहीं है। दलितों पर ढाये जाते जुल्म के खिलाफ वे खडे तक नहीं होते। क्या यह पूना समझौते के कारण है? पिछडे अपना नेता चुनते हैं, तब भी वे श्रीहीन हैं। जबकि उन्होंने कई राज्यों में अपनी पार्टी बनायी। वे नेता भी हुए, लेकिन यह वर्ग कहीं कहीं तो दलितों से भी पिछडे हैं। पिछडों की दमदार आवाज तो होनी चाहिए थी, लेकिन नहीं है। मुझे दो वजह लगती है -1.जाति भेद और 2 .दूसरा लोकतंत्र की यह व्यवस्था। पिछडे जातियाँ विभक्त हैं। दलित जातियां भी कई जातियों और उप जातियों में बिखरी हैं। उनमें भी प्रतिस्पर्द्धा है और वह दुश्मनी के स्तर पर है। वे जातियां समाज से लेकर राजनीति तक में दूध की तरह फटी हुई हैं। दलितों को एकल निर्वाचन का अधिकार भी मिलता तो उनका हश्र भी पिछडों की तरह होता।  जो व्यवस्था है, वह अनिवार्य रूप से भ्रष्ट बनाती है। मायावती भी उदाहरण हैं, लालू प्रसाद भी। लेकिन समस्याएं आती हैं तो संभावनाएं भी हैं डॉ. लोहिया और कांशीराम के रूप में। हम चाहें तो डॉ. अम्बेडकर और गाँधी को आमने सामने कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रह सकते हैं या सबक लेते हुए नये रास्ते की तलाश कर सकते हैं।

लेखक टी.एन.बी. कॉलेज,भागलपुर में हिन्दी के प्रोफेसर और तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय में छात्र कल्याण के संकाय अध्यक्ष हैं।
सम्पर्क – +917903732395

.

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *