दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (88)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

एनटीपीसी के कहलगाँव बिजलीघर के कारण पर्यावरण और पारिस्थितिकी को हुआ नुकसान बहुत भारी है। इसकी भयावहता के प्रति स्थानीय लोगों में जागरूकता का अभाव है। उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण होने से यहाँ की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था बुरी स्थिति में पहुँच गयी है। राख के संग्रहण, भंडारण और निपटान के लिए कारगर नीति नहीं होने से समस्या विकराल होती जा रही है। ऐश डाइक की ऊँचाई कई साल पहले ही तय मानकों की सीमा पार कर चुकी है। तीन बार डाइक की ऊँचाई 5-5 मीटर बढ़ाई जा चुकी है। फलतः ऐशडाइक के बदले यहाँ ऐशमाउंट बन गया है। राख का निपटान लक्ष्य से 80 प्रतिशत तक पिछड़ जाता रहा है। यह तो बॉटम ऐश या पौंड ऐश की स्थिति है। फ्लाई ऐश को साइलो संयंत्र के माध्यम से कन्टेनर में भरकर बाहर भेजने का प्रावधान है। वह काम भी लक्ष्य से काफी पीछे है। निपटान के अभाव में कहलगाँव बिजलीघर में लगभग डेढ़ हजार एकड़ में करोड़ों करोड़ टन राख का पहाड़ खड़ा हो चुका है और रोज बढ़ता ही जा रहा है। कुल मिलाकर कहलगाँव एक भयानक ऐश बम के दहाने पर पड़ा है। बड़े भूकंप या बाढ़ में यदि यह बम फटा तो हजारों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन के बंजर हो जाने के अलावा गंगा नदी की मौत हो जाएगी। हिंदुस्तान में लिखते हुए मैं लगातार इस मुद्दे पर लिख रहा था। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कई मित्रों को प्रेरित करके इस मुद्दे को उजागर करने की कोशिश में लगा रहता था। भूविस्थापितों के पुनस्स्थापन व पुनर्वास सहित मुआवजा आदि का मामला अभी तक इस बिजलीघर के गले की फाँस बना हुआ है। फिर दुहरा दूँ कि राजनीतिक कारणों से इस बिजलीघर का निर्माण एक घनी आबादी वाले क्षेत्र में कर दिया गया। इस कारण बिहार और झारखंड के लगभग चार दर्जन गाँव प्रभावित हुए। पाँच गाँवों को पूरी तरह उजाड़ना पड़ा और 5363 एकड़ उपजाऊ जमीन किसानों से ले ली गयी। उपर्युक्त कारणों से कहलगाँव के भूविस्थापितों की समस्या अत्यंत जटिल हो गयी है। इसकी तुलना एनटीपीसी की किसी अन्य परियोजना से नहीं हो सकती। जरूरत से ज्यादा जमीन अधिगृहीत करने और घनी आबादी के प्रभावित होने के कारण इस बिजलीघर के भूविस्थापितों की संख्या बढ़ने के साथ उलझन भी अधिक रही है। यहाँ भूविस्थापितों की अलग अलग कई श्रेणियाँ बन गयी हैं। एक श्रेणी सुंदरपुर, राधेपुर, भदेर, सिकंदरपुर और हड़वाटोला के ग्रामीणों की है जो पूरी तरह उजाड़े गये। दूसरी श्रेणी उन किसानों का है जिनका घर तो नहीं उजड़ा किन्तु खेती की पूरी जमीन छिन गयी। तीसरी श्रेणी उन किसानों की है जिनकी खेती आंशिक रूप से छीनी गयी। चौथी श्रेणी में वे होशियार लोग शामिल हैं जिन्होंने परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होने के बाद अवसर का लाभ उठाते हुए कट्ठा-दो कट्ठा जमीन खरीद ली थी। सभी प्रकार को मिलाकर यहाँ हजारों भूविस्थापित हो गये। मुआवजा और पुनर्वास को लेकर समस्या विकराल होनी थी सो हो गयी। बिजलीघर के स्थापना काल में रोजगार और मुआवजे के लिए भूविस्थापितों का आंदोलन हुआ तो स्थानीय नेतृत्व, प्रशासन और प्रबंधन के लोगों ने जनता से अंधाधुंध वादे कर डाले कि सभी भूविस्थापितों को नौकरी मिलेगी, जबकि सभी को पता था कि ऐसा होना नहीं है। स्थाई नौकरी और मुआवजे के लिए जब भी आंदोलन हुए, उन्हें नये वायदों का प्रलोभन देकर खत्म करवा दिया गया। जो थोड़े रोजगार के अवसर बने भी, उनमें वास्तविक पीड़ितों के साथ हकमारी की गयी। यहाँ तक कि जिन गाँवों को बुलडोजर चलाकर उजाड़ा गया, उन्हें भी सही तरीके से पुनर्वासित नहीं किया गया। जबकि उजाड़ते समय उन्हें बड़े सब्जबाग दिखाये गये थे। इसी वादाखिलाफी और उपेक्षा का परिणाम है कि स्थापना के चौथे दशक में भी इस बिजलीघर को गृहविस्थापितों के आंदोलनों से छुटकारा नहीं मिल पाया है। इस मुद्दे पर भी मैंने पत्रकारिता के दौरान बार-बार स्टोरी लिखी थी।

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अधिगृहीत जमीन के मुआवजे के लिए भूविस्थापितों की तरफ से एनटीपीसी प्रबंधन पर हजारों मुकदमे दर्ज किये गये थे, जिनमें से सैकड़ों का निबटारा आजतक लंबित है। परिणामस्वरूप अबतक प्लांट की पूरी जमीन का दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही मासूम अनपढ़ किसानों को उचित मुआवजा दिलाने के नाम पर वकील-न्यायालय-प्रशासन और प्रबंधन का ऐसा नेक्सस बना जिसमें किसानों के हिस्से की दस से तीस प्रतिशत तक की राशि बंदरबांट कर ली गयी। गरीबों की हकमारी करके दर्जनों घाघ लोग बिना मेहनत के धनवान हो गये।
इस बिजलीघर का इस क्षेत्र पर व्यापक समाजार्थिक प्रभाव हुआ है। एक और बड़ी बात यह हुई कि जिन मध्यमवर्गीय किसान परिवारों की जमीन गयी थी, उनके युवा मुआवजे की राशि को पूंजी बनाकर प्लांट में ठेकेदारी शुरू कर दी। छोटे-छोटे कार्यों के लिए ठेकेदारों की भीड़ इकट्ठा हो जाने से निविदाएं डालने में ऐसी प्रतिद्वंदिता पनप गयी कि अकल्पनीय ढंग से अतार्किक और अव्यावहारिक दर पर काम लेकर इन नवठेकेदारों ने मुआवजे में मिला धन गँवा फिर गँवा दिया। कम दर पर काम लेकर घाटा उठाने वाले ठेकेदारों ने क्षतिपूर्ति के लिए मजदूरों के आर्थिक शोषण का रास्ता अख्तियार कर लिया। न्यूनतम मजदूरी में कटौती तो आम बात है, यहाँ निबोले मजदूरों की भविष्य निधि की पूरी की पूरी राशि कई ठेका कम्पनियाँ डकार गयीं। काम से हटा दिये जाने के डर से पीड़ित मजदूर चुप साध गये और उनके पैसों से सैकड़ों लोग पैसेवाले बन गये। मजदूरों के इस प्रकार के शोषण के खिलाफ आंदोलन का समय-समय पर नेतृत्व करने वाले नेताओं में से अधिकांश ने मजदूरों के साथ धोखा किया। ज्यादातर आंदोलन को इन स्वार्थी तत्वों ने प्रबंधन के हाथों सस्ते में बेच दिया। मजदूरों से जुड़ी इस विडम्बना को आवाज देने का काम थोड़ा जोखिम भरा था, किन्तु मैंने एक यज्ञ मानकर यथासंभव यह कार्य किया। इससे कुछ पीड़ितों का कल्याण भी हुआ पर यह नाकाफ़ी था। कई मजदूर आंदोलन के दरम्यान मेरे मन में कलम छोड़कर माइक पकड़ लेने की तीव्र इच्छा जागृत हुई थी, पर अफसोस है कि मैं वैसा नहीं कर सका। इस क्रम में बहुत शिद्दत से महसूस किया था कि मीडिया रिपोर्टिंग के संदर्भ में अब बहुत कम संस्थाएँ संवेदनशील रह गयी हैं। कुछ सरकारी विभागों की चमड़ी तो गैंडे से भी मोटी और भोथड़ी हो गयी है।

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पर्यावरण संरक्षण के तय मानकों के हिसाब से बिजलीघर की चिमनी से निकलने वाले धुएँ में धूलकण प्रति घनमीटर 125 मिलीग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। यदि इस मानक का अक्षरशः पालन किया जाए तो धुआँ नंगी आँखों से दिखाई नहीं देना चाहिए। किन्तु लगभग सभी थर्मल पावर स्टेशनों में इस नियम की अवहेलना होती है। यांत्रिक खराबी अथवा फ्लाई ऐश के निपटान की समस्या के कारण चिमनियों से धुएँ के साथ भारी मात्रा में राख उड़ाई जाती है। आसमान में ऊँचा उठकर यह राख हवा की गति और रुख के अनुसार 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में धीमे-धीमे बरसती रहती है। अदृश्य रूप से बरसने वाली इस राख का फूल और फल वाली फसलों पर बहुत बुरा असर होता है। आम, लीची, कटहल, पपीता, निम्बू, अमरूद, गोभी, टमाटर, मिर्च आदि के पैदावार के लिए मशहूर रहा कहलगाँव क्षेत्र इस औद्योगिक आफत का भी शिकार हुआ है। इन फसलों की उपज निरंतर कम होती जा रही है। इसके अलावा ऐश डाइक में संगृहीत राख को मिट्टी की मोटी परत से ढँकने के नियम के अनुपालन में कोताही बरतने से तेज रफ्तार हवा में व्यापक पैमाने पर बॉटम ऐश उड़ती है। कम नमी वाले मौसम में डाइक के निकटवर्ती गाँवों एकचारी, भोलसर, मजदाहा, कटोरिया, चाँयटोला, धनौरा, शोभनाथपुर, लगमा, ब्रह्मचारी, लक्ष्मीपुर, बभनिया, भुस्का, ओगरी, महेशामुंडा, नारायणपुर, आलमपुर, लालापुर, भदेर, छोपालटोला आदि में राख की आंधी चलती रहती है। स्वास्थ्य और फसलचक्र पर दुष्प्रभाव के मुद्दे विभिन्न मंचों से उठाये जाते हैं, पर समस्या से निजात नहीं मिल रही है।

उक्त सभी समस्याओं को लेकर मैं यथाशक्ति और यथासंभव अखबार में रिपोर्टिंग करता रहा था। पत्रकारिता करते हुए मैंने यह बात समझी कि किसी अखबार की अपनी दृष्टि और अपना तेवर नहीं होता है। संपादक और प्रबंधन के अनुसार ही स्थानीय खबरों की दशा और दिशा तय होती है। श्री महेश खरे के बाद दर्जनों बार ऐसा हुआ कि मैं अपने हिसाब से रिपोर्टिंग करता रहा और किसी भी तरह ‘मैनेज’ नहीं हुआ पर ऊपर वाले बड़ी आसानी से बहुत सस्ते में मैनेज हो गये। ऐसा जब भी होता तो यह काम छोड़ देने का मन करता था। कई बार अस्थाई रूप से छोड़ा भी किन्तु पीड़ित लोगों के दबाव में फिर से लिखना पड़ा था। एक बात यह हुई कि संत जोसेफ्स स्कूल में पढ़ाने और फिर बाद में पत्रकारिता के कारण एनटीपीसी के कई लोगों से जीवन भर का रिश्ता बन गया है। कई पदाधिकारी जिनसे बहुत ज्यादा निकटता बन गयी थी, वे एनटीपीसी के सर्वोच्च पदों तक पहुँचे। ऐसे लोगों में श्री टी शंकर लिंगम, श्री ए के झा, श्री एस एम नागमोती, श्री ए के मजुमदार, श्री आर सी श्रीवास्तव, श्री यू पी पाणि, श्री शुभाशीष घोष, श्री पी के महापात्र, श्री विश्वनाथ मुखर्जी, श्री एन एन राय, श्री एम पी सिन्हा, श्री एन के सिन्हा आदि प्रमुख हैं। इनमें से कई के द्वारा मैंने अपने प्रयासों से अपने कॉलेज और क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण निर्माण कार्य करवाये और दर्जनों लोगों के कल्याण का पुण्य अर्जित किया है। वर्तमान समय में भी मेरे दर्जनों मित्र एनटीपीसी के विभिन्न स्थानों पर उच्च पदों पर कार्यरत हैं। अब इन मित्रों का रिटायरमेंट शुरू हो गया है। पर हमारा सम्बन्ध तो जीवन भर का है।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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