दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (87)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

1995 और 1999 में कहलगाँव में भीषण बाढ़ आयी थी जिसमें जानमाल का काफी नुकसान हुआ था। दोनों बार की बाढ़ 25-26 सितम्बर को आयी थी जो बाढ़ के मौसम के गुजर जाने का समय होता है। यह बाढ़ गंगा का जलस्तर बढ़ने से नहीं आयी थी, बल्कि झारखंड के निकटवर्ती पूर्वी क्षेत्र में अवस्थित राजमहल पर्वत शृंखला से निकलने वाली मौसमी नदियों कौआ, भैना और खर्रा में उतरे बरसाती पानी (बोहा) का मार्ग अवरुद्ध हो जाने से आयी थी। दरअसल राजनीति के मकड़जाल में उलझकर विशेषज्ञ अभियंताओं के गलत निर्णय के कारण एनटीपीसी के कहलगाँव बिजलीघर का निर्माण उक्त नदियों के मार्ग में कर दिया गया है। भौगोलिक पारिस्थिकी में बड़े पैमाने पर ध्वंस का उदाहरण है कहलगाँव बिजलीघर। पूर्वी पर्वत शृंखला में जब भी सामान्य से अधिक बारिश होगी, तब क्षेत्र की आबादी को 95 और 99 जैसी प्रलयंकारी बाढ़ का सामना करना होगा। इस बिजलीघर का डीपीआर तैयार करने वाले नीति निर्माताओं ने निर्माणस्थल का भौतिक सर्वेक्षण किये बिना पहाड़ी नदियों के गंगा की ओर के बहाव क्षेत्र में कुल 5363 एकड़ जमीन पर प्लांट, ऐशडाइक और एमजीआर का निर्माण करवाने की ऐतिहासिक भूल कर दी है। इसके अलावा घनी आबादी होने के कारण प्रभावित गाँवों की संख्या भी एनटीपीसी के अन्य बिजलीघरों की तुलना में अत्यधिक है। अधिगृहित जमीन काफी उपजाऊ थी जिसके चलते प्रभावित व भूविस्थापित आबादी की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह तहस-नहस हो गयी है। रोजगार के अवसर बढ़ने के बजाय बेकारी की समस्या पैदा हो गयी। इसके ऊपर एक और विडम्बना यह कि नेताओं की स्वार्थपरक नीयत, प्रशासन और प्रबंधन के सुनियोजित षड्यंत्र से वास्तविक भुक्तभोगियों की हकमारी की गयी। अधिसंख्य पीड़ित परिवार देखते रह गये और नकली भूविस्थापितों ने रोजगार के अवसर छीन लिये। उक्त कारणों से सम्पूर्ण परियोजना क्षेत्र में असंतोष और औद्योगिक अशांति का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा, जिससे साढ़े तीन दशक बाद भी निजात नहीं मिल पाया है।

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दीप्तिनगर परिसर में रहते हुए और प्रभावित क्षेत्र के लोगों से सम्पर्क के कारण मैं उपर्युक्त घटनाक्रम और परिस्थितियों से भलीभाँति अवगत रहा हूँ। किन्तु जबतक संत जोसेफ्स स्कूल में सेवारत था तबतक मूक व लाचार था। 1995 की बाढ़ का कहर तो कॉलोनी में रहकर झेला था जब पूरा दीप्तिनगर जलप्लावित हो गया था। कॉलोनी वासियों को तीन दिनों तक नारकीय जीवन जीने को विवश होना पड़ गया था। विगत सैकड़ों वर्षों के इतिहास में इस टीकर क्षेत्र में कभी बाढ़ नहीं आयी थी। उस बाढ़ में आम जनता के जानमाल का व्यापक नुकसान तो हुआ ही था, एनटीपीसी लिमिटेड को भी करोड़ों की क्षति हुई थी और बिजली उत्पादन ठप हो गया था। 1999 वाली बाढ़ के समय हम सत्कार चौक पर उत्तम निवास में रह रहे थे। एक बड़ी बात यह हो गयी थी कि अब मैं विश्वविद्यालय की सेवा में आ गया था इसलिए अब जनसरोकार के मुद्दों पर बोलने व लिखने की आजादी मिल गयी थी। मैंने गौर किया था कि 1995 और 99 की बाढ़ की जमीनी हकीकत और एनटीपीसी प्रबंधन की जिम्मेदारियों के संबंध में स्थानीय नेतृत्व और मीडिया ने ईमानदारी से अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं किया था। इस कारण बाढ़ पीड़ितों के बीच कुछ क्विंटल चूड़ा-गुड़ और मोमबत्ती-माचिस बाँटकर प्रबंधन ने अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी। जबकि यह सिद्ध तथ्य है कि वह बाढ़ वास्तव में एनटीपीसी के कारण ही आयी थी। 1999 में भी जब वही सब दुहराया गया तो मुझे बहुत बुरा लगा था। जनहित में कुछ करने की अकुलाहट मन को बेचैन कर रही थी। नेतागिरी से जेपी के स्वार्थी चेलों की करतूतों के कारण नफरत पैदा हो गयी थी, अतः वह करना सम्भव नहीं था। एक विकल्प समझ में आ रहा था कि किसी प्रिंट मीडिया से जुड़कर जनसरोकार के मुद्दों पर कलम चलाऊँ। बाढ़ के बाद में भी भूविस्थापितों और मजदूरों के शोषण से जुड़े कुछ घटनाक्रम के चलते पत्रकारिता से जुड़ने का संकल्प मन में दृढ़तर होता चला गया था। इसी समय एक रिश्तेदार के पारिवारिक समारोह में भाग लेने मोहन बाबू के साथ पटना जाने का अवसर मिला। उस समारोह में जेपी आंदोलन के सेनानी व हिंदुस्तान अखबार के तत्कालीन प्रमुख संवाददाता श्री दिनेश सिंह से मुलाकात हो गयी। हालचाल पूछने के दरम्यान मैंने उन्हें एनटीपीसी के संदर्भ में कहलगाँव के मीडिया कवरेज के असंतोषजनक हाल से अवगत कराया और अपनी मंशा जाहिर की कि यदि अवसर मिले तो केवल एनटीपीसी से सम्बंधित स्टोरी लिखना चाहूँगा। दिनेश जी ने बताया कि “शीघ्र ही भागलपुर में हिंदुस्तान का क्षेत्रीय कार्यालय खुलने वाला है। स्थानीय संपादक योगदान कर लें तो आप हिंदुस्तान के लिए लिखना शुरू कर दें।”

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लगभग एक माह बाद कहलगाँव के वरियतम पत्रकार व हिंदुस्तान के तत्कालीन प्रतिनिधि श्री हरेन्द्र कुमार सिंह का फोन आया, “पवन जी अखबार में लिखने की रुचि रखते हैं क्या? हिंदुस्तान भागलपुर के स्थानीय संपादक श्री महेश खरे ने आपको मिलने बुलाया है। यदि चलना है तो कल मेरे साथ चलिये।” अगले दिन हरेन्द्र बाबू अपनी जीप से मुझे लेकर भागलपुर गये थे। ठीक इसी तरह वे मुझे 1973 में टीएनबी कॉलेज लेकर गये थे। भागलपुर के घंटाघर चौक पर चंद्रलोक कम्प्लेक्स में हिंदुस्तान का कार्यालय था। संपादक श्री महेश खरे ने मुझे अकेले बुलाकर बात की थी। उन्होंने दिनेश जी द्वारा दी गयी जानकारी का उल्लेख करते हुए पूछा था, “आप एनटीपीसी के संबंध में कितना जानते हैं?”
“मैं उतना जानता हूँ जितना एनटीपीसी वाले भी नहीं जानते।” जवाब सुनकर वे मुस्कुराए थे और कहा था कि “एक स्टोरी अगर अभी लिख सकते हैं तो दे दें।” मैंने वहीं उनके चेम्बर में बैठकर एक चार कॉलम की स्टोरी लिख दी थी, ‘एनटीपीसी ने कमांड क्षेत्र में नहीं किया विकास कार्य।’ वहाँ से निकलते हुए न्यूज़ डेस्क पर श्री संजय सिंह (सम्प्रति, दैनिक जागरण) मिले थे और उन्होंने चेताया था, “प्रोफेसर साहब, सतर्क रहियेगा। एनटीपीसी है, खा जायेगा। कुछ भी लिखियेगा तो संबंधित अधिकारी या पीआरओ से बयान जरूर ले लीजियेगा।” मैं मुस्कुराते हुए वहाँ से चला आया था। अगली सुबह व्यग्रता से अखबार खोला तो देखा कि मेरी खबर प्रादेशिक पेज पर लीड बनाकर छापी गयी थी। कॉलेज में अपने सहकर्मियों को गौरव के साथ बताता रहा था कि मैं अखबार में लिख रहा हूँ। दोपहर बाद घर पहुँचा तो संजय सिंह जी का फोन आया, “प्रोफेसर साहब, बोले थे न! आ गया एनटीपीसी से प्रेमपत्र। संपादक जी ने बुलाया है। शाम में आकर मिल लीजिए।” बाइक से भागलपुर पहुँचा और सीधे खरे साहब के कमरे में गया। उन्होंने बिना कुछ बोले मेरे सामने एक चिट्ठी रख दी और मुस्कुराये। चिट्ठी एनटीपीसी कहलगाँव के जनसंपर्क अधिकारी श्री असीम कुमार दास ने लिखी थी। कमांड एरिया वाली मेरी खबर का जोरदार खंडन किया था। नये संवाददाता को समेटकर रखने की चेतावनी के साथ। पत्र पढ़कर मैं थोड़ा गम्भीर हो गया था, किन्तु संपादक जी ने माहौल हल्का कर दिया। मेरे हाथ से पत्र लेकर फाड़ा और डस्टबिन में फेंकते हुए बोले, “ऐसे पत्रों के लिए मेरा डस्टबिन पड़ा है। पर आइंदा ध्यान रखें कि पीआरओ को खंडन लिखने का स्कोप ही न मिले। पहले फाइल फिर बयान तब खबर। कुछ ऐसी स्टोरी करिये कि एक सप्ताह में पीआरओ मेरे सामने बैठा हो।”
“एक सप्ताह नहीं सर, कल वे आकर त्राहिमाम कहेंगे। मैं अभी खबर लिख जाता हूँ।”
“हाँ ठीक है। लिखने से पहले डेस्क पर चौरसिया जी से मिल लें।”
मैं श्री राम नरेश चौरसिया को नाम और काम से जानता था। उनसे मिला तो उन्होंने फैक्स से आये एक रिपोर्ट की कॉपी दिखाते हुए कहा था, “यह देखिए हमारे भागलपुर संस्करण के बेस्ट रिपोर्टर की कॉपी। आप तो अधिक पढ़े-लिखे और हिन्दी के प्रोफेसर हैं। आप अधिक अच्छा लिख सकते हैं, किन्तु बाँका के मनोज उपाध्याय जी की इस कॉपी को फिलहाल आदर्श मानते हुए लिखने का अभ्यास कीजिये।”

अब मनोज जी मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं। किन्तु उस दिन उन्हें गुरु मानकर उनकी कॉपी को खूब गौर से पढ़ गया था। फिर पर्यावरण प्रदूषण से सम्बंधित एक गर्मागर्म स्टोरी लिखकर फोन पर एनटीपीसी के पीआरओ दास बाबू से बयान माँगा था। दास बाबू पहले से मेरे मित्रवत थे और अन्य सहकर्मियों के समान मुझे ‘गुरुजी’ पुकारते थे। उन्होंने प्रश्न सुनते ही जवाब में कहा था, “गुरुजी, आप लग जाइयेगा तो हम पार पा सकेंगे? आपसे क्या छिपा है? आप एग्रेसिव रिपोर्टिंग मत करिये प्लीज। और खंडन वाली चिट्ठी को दिल पर मत लीजिये। हमारी नौकरी की मजबूरी है। भविष्य में भी वैसा फिर से हो सकता है।” आगे मैंने उनके बयान के साथ वह खबर डेस्क के सुपुर्द करके मैं कहलगाँव लौट आया था।
अगले दिन फिर मेरी छः कॉलम की खबर पन्ने पर लीड बनी थी और जैसा कि मैंने सोचा था, दास बाबू दोपहर बाद स्थानीय संपादक जी के दफ्तर में उपस्थित थे। खरे साहब ने फोन करके मुझे कहा था, “आपके पीआरओ साहब मेरे सामने बैठे हैं। क्या आप बात करना चाहेंगे?”
“नहीं सर, मुझसे तो रोज भेंट होनी है। आप ही देख लें।”
बाद में खरे साहब ने बताया था कि दास बाबू का अनुरोध था कि पवन जी एग्रेसिव रिपोर्टिंग के लिए कम से कम गड़े मुर्दे न उखाड़ें। संपादक जी ने भी उन्हें समझा दिया था कि खबरों से समझौता नहीं किया जायेगा। मैंने भी अपनी सहमति दे दी थी। पर उसके बाद दर्जनों बार ऐसी स्थिति बनी थी कि ताजा घटनाओं की खबर बनाते हुए मुझे गड़े मुर्दे उखाड़ने की जरूरत पड़ती रही थी। पर मैंने फिर कभी एनटीपीसी प्रबंधन को खंडन करने का मौका नहीं दिया। हिंदुस्तान में लगातार बारह वर्षों तक मैं एनटीपीसी को कवर करता रहा। जनसरोकार से जुड़े मुद्दे मेरी रुचि के विषय रहे थे। मजदूरों, भूविस्थापितों, प्रभावित जनता और पर्यावरण संरक्षण के मामलों पर मेरी कलम निर्बाध रूप से चलती रही। बाद में तीन साल दैनिक जागरण के लिए काम किया और फिर दैनिक भास्कर के भागलपुर संस्करण के लिए एकमात्र खबर लिखी थी। 2017 में बेटी के विवाह के पहले मैंने इस शौक को तिलांजलि दे दी। इन सत्रह वर्षों के समाचार लेखन से कुछ लाभ और एक बड़ी हानि हुई जिसकी चर्चा आगे करूँगा। किन्तु मजलूमों की मदद करके और कतिपय भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करके जो संतोष मिला वह मेरे जीवन भर की पूंजी है।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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