दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (78)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

बाबूजी के स्वर्गवास के बाद उनकी बंदूक के उत्तराधिकार की समस्या उत्पन्न हो गयी थी। भैया ने पहले से अपने नाम पसंदीदा यूएसए मेड एकनाली बंदूक ले रखी थी। उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने अनिच्छा जाहिर करते हुए कहा था कि एक शिक्षक को बंदूक से क्या काम? और फिर बार-बार लाइसेंस रिन्युअल और भौतिक सत्यापन का झंझट अलग! छोटे भाई मनोज या सरोज का लाइसेंस बनवा दें अथवा बेच दें। मनोज और सरोज ने भी इंकार कर दिया तब भैया ने मुझे यह कहकर मजबूर कर दिया था कि बाबूजी की निशानी है, उसे बेच देना उचित नहीं होगा। उन्होंने आश्वस्त किया था कि रिन्युअल और इंस्पेक्शन आदि का काम वे देख लेंगे। अंततः मुझे हामी भरनी पड़ी थी। अनुज्ञप्ति के प्रपत्र पर मेरे हस्ताक्षर लेकर भैया ने कटिहार में आवेदन कर दिया। उस समय रश्मि वर्मा कटिहार की जिलाधिकारी थीं। पता नहीं उनका कहाँ क्या बुरा हो गया था कि उन्होंने आग्नेयास्त्र का लाइसेंस नहीं देने की कसम खा रखी थी। वे ढाई साल तक कटिहार में पदस्थापित रहीं और मेरी अनुज्ञप्ति का आवेदन ठंडे बस्ते में पड़ा रहा था। उनके विदा होते ही लाइसेंस बन गया और भैया के आदेशानुसार मैं बाबूजी वाली बंदूक कहलगाँव ले आया था।
बाबूजी की बंदूक मेड इन बेल्जियम डी बी बी एल 12 बोर शॉट गन थी। हैमर फायर सिस्टम की उस बंदूक में खराबी आ गयी थी, जिसके कारण कभी-कभी फायर मिस हो जाता था। कहलगाँव लाते हुए मैंने उसकी मरम्मत करवाने की योजना बना ली थी, किन्तु उसके पहले शिकार का सिलसिला चल पड़ा था। दीप्तिनगर के आसपास के बरगद, पीपल, पाकड़ आदि बड़े पेड़ों पर सुबह-शाम जुटने वाले हरियल (हारिल) के झुंडों का शिकार सबसे आसान और सुनिश्चित था। कहलगाँव के पूरब भदेश्वर पहाड़ के चारों ओर और कासड़ी व बटेश्वर स्थान की पहाड़ियों में तीतर की अच्छी-खासी आबादी थी। तीतर का शिकार पक्षियों में सबसे कठिन होता है। बाबूजी कहते थे कि शेर का शिकार और तीतर का शिकार एक समान होता है। मुश्किल होने के बावजूद सप्ताह में एक-दो बार एकाध तीतर मार ही लाता था। एक तीतर में बमुश्किल तीन से चार सौ ग्राम मांस निकलता है। उसके लिए पचास रुपये की गोली खर्च करना सुधा को अनुचित लगता था। वह आपत्ति जताती तो मैं तर्क देता कि बकरे के मांस और तीतर के मांस में वही अंतर है जो लोहे और सोने में होता है। सोना ग्राम की तौल में और लोहा क्विंटल की तौल में बिकता है। खैर, छिटपुट शिकार चल रहा था। अपनी खुराक से अधिक मात्रा में जब भी शिकार होता तो दीप्तिनगर के मित्रों के घर संदेश के रूप में भेजता रहता था। पानी में बैठने और चरने वाले पक्षियों का मांस बिसाइन महकता है। इसलिए जब उन पक्षियों का शिकार करके मित्रों को देता तो उसे पकाने की विशेष विधि उन्हें बता देता था।

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एनटीपीसी के प्रथम चरण के कुछ ठेकेदारों से मेरी अच्छी दोस्ती हो गयी थी। उन्हीं में से एक शंकर ब्रदर्स कम्पनी के मालिक उमेश जी का घर मुंगेर शहर में था। उनसे तय हुआ कि किसी शनिवार को बंदूक लेकर मरम्मत के लिए मुंगेर चलूँगा और रविवार को लौट आऊँगा। मेरे सहपाठी मित्र शेखर शर्मा मुंगेर के बड़े बंदूक व्यवसायी थे। उनकी अपनी बंदूक फैक्ट्री थी। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार हम मुंगेर गये थे। फैक्ट्री में बंदूक जमा कर देने के बाद उमेश जी ने कहा कि योग विद्यालय देख लिया जाए।
स्वामी सत्यानंद द्वारा स्थापित और स्वामी निरंजनानंद द्वारा संचालित विश्वप्रसिद्ध योग विद्यालय (सम्प्रति विश्वविद्यालय) के रिसेप्शन पर एक पोस्टर छपा हुआ था, ‘health managment course’ यानी ‘स्वास्थ्य रक्षा पाठ्यक्रम’। काउंटर पर बैठे गेरुआ वस्त्रधारी स्वामी जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह 15 दिनों का प्रशिक्षण कार्यक्रम गर्मी की छुट्टियों में आयोजित होता है, जिसमें शामिल होने पर यदि आप बीमार हैं तो स्वस्थ हो जाएंगे और स्वस्थ हैं तो बीमार नहीं होंगे। लॉजिंग व फूडिंग मिलाकर कुल आठ सौ रुपये शुल्क है। रजिस्ट्रेशन के समय एक सौ रुपये जमा करना होगा। मैं उन दिनों भीषण बैक पेन का मरीज था। ‘बैक पेन’ इस लिए कह रहा हूँ कि वह दर्द कंधों से लेकर कमर तक घूमता-टहलता रहता था। वह अजूबा दर्द प्रियवर विनोद जी के शोधकार्य के क्रम में ‘उपहार’ के रूप में मिला था। 1988 की गर्मी की छुट्टियों में सुधा को बेटे के साथ मायके भेजकर दोनों मित्रों ने दीप्तिनगर में थीसिस लिखने का काम किया था। बिछावन पर उल्टा-सीधा लेटने, उकड़ूँ या आरा-तिरछा बैठने के कारण रीढ़ की हड्डियों में विकार उत्पन्न हो जाने से वह विचित्र रोग मुझे हो गया था। दिनभर क्रियाशील रहने के दौरान तकलीफ नहीं रहती थी, पर रात में एक नींद पूरी होने के बाद भीषण पीड़ा शुरू हो जाती थी जो सुबह तक व्याकुल किये रहती थी। जब सारी दुनिया सोती थी तो मैं बिन पानी की मछली की तरह बिछावन पर छटपटाता था। एलोपैथी इलाज से थक चुका था। बड़े-बड़े पद्मश्री चिकित्सक हार मान चुके थे। उनकी समझ में वह ‘स्लिप डिस्क’ या ‘रयुमेटिक पेन’ था। ‘रूमा’ नामधारी मरहम लगाते, गोलियाँ खाते मैं आजिज आ गया था। पेनकिलर खा-खाकर पता नहीं, अपनी किडनी और लिवर का कितना नुकसान कर चुका था? सो हारे को हरिनाम वाली मानसिकता में मैंने उस दिन योगविद्यालय में स्वास्थ्य रक्षा पाठ्यक्रम में रजिस्ट्रेशन करवा लिया था। किन्तु अगले हफ्ते जब बंदूक वापस लेने गया तबतक उस प्रशिक्षण के प्रति उत्साह ठंडा पड़ गया था। दरअसल जबतक कोई बड़ी मजबूरी या दबाव न हो, मैं घर से बाहर रहना बिल्कुल पसंद नहीं करता हूँ।
हमारे वरीय मित्र रमेश भाई पटना हाईकोर्ट में वकील हैं। वे भी हमारी तरह मछली खाने के शौकीन हैं। सुधा की पकाई मछली उन्हें अत्यधिक पसंद है। उस दौर में वे जब भी भागलपुर आते तो सुधा को फरमाइश करके मछली खाने कहलगाँव आ जाते थे। ऐसे ही अवसर पर वे दीप्तिनगर आये हुए थे। योगविद्यालय से मेरे बुलावे का पोस्टकार्ड पहले से आया हुआ था, किन्तु मैं वहाँ जाना टाल रहा था। रमेश भाई के आने पर सुधा को मौका मिल गया। उसने शिकायत कर दी,”भाई जी, इनको कई सालों से पीठ दर्द की बीमारी है जो आप भी जानते हैं। इन्होंने योगविद्यालय में इलाज के लिए नाम लिखवा लिया है। यह देखिए बुलावा आया है। कल ही जाना है, पर ये नहीं जा रहे हैं।”

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भाई जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बढ़िया तो है। कल सुबह मैं इनको लेकर अपर इंडिया से निकलता हूँ। इन्हें मुंगेर जाकर योगविद्यालय के अंदर घुसा दूँगा तब पटना जाऊँगा। आप इनका बैग तैयार कर दीजिए।” और इस तरह मैं 1994 की गर्मी की छुट्टियों में 15 दिनों के लिए योग का प्रशिक्षण लेने पहुँच गया था। योगविद्यालय का विस्तृत अनुभव आगे लिखूँगा।

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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