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	Comments on: हिजाब को लेकर छिड़ा विवाद	</title>
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	<description>सच के साथ, सब के साथ</description>
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		<title>
		By: Niwas Chandra Thakur		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Niwas Chandra Thakur]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Feb 2022 08:22:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सबसे पहले चर्चा प्रारंभ करने वाले के व्यक्तित्व और मंतव्य को जाना जाना चाहिए। तो इनके सुदीर्घ जानने वाले जानते हैं कि  ये न तो भक्त हैं और न वाम भक्त हैं।ये  दार्शनिक सुकरात के कथन पर चलते हैं कि...आप उधर ही जाएं जिधर सत्य ले जाएं।यह तय है कि सत्य अपनी नजरों से भी देखा जाता है,पर कुछ शास्वत कौसटी होती है, सत्य को परखने की, और अंततः वहीं सामान्य तौर पर सत्य माना जाता है।
  धीरंजन मालवे जी ने प्रश्न उठाया है कि खिजाब  धर्म का प्रश्न है या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का? यदि धर्म की बात है तो विश्व के अनेक मुस्लिम देशों में इसको क्यों नहीं लागू है,या फतवा क्यों नहीं है? और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अगर बात है तो वह सार्वजनिक स्थलों और पेशे पर हावी नहीं हो सकता।
 आजकल अचानक पहचान की धार्मिकता की बाढ़ आ गई है। नेताओं का ललाट पर टीके का फैसला और मुस्लिम महिलाओं के हिजाब को बढ़ावा देना इसमें शामिल है।
सही है कि पच्चीस वर्ष पूर्व  हम क्लास की लड़कियों के धर्म , कपड़े से नहीं जान पाते थे।समय को पीछे खींच कर लाने का प्रयास विचित्र है। ड्रेस कोड मनुष्य में या खास समूह में एकरूपता लाने और दिखाने का बहुत बड़ा कदम है।
हम अपने उद्देश्य श्रेष्ठ रखें। किसी के बहकावे या प्रच्छन्न भावों की पहचान करें। श्रेष्ठ यही है कि तर्कसंगत बात-व्यवहार करते हुए समाज में समरसता भरें।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सबसे पहले चर्चा प्रारंभ करने वाले के व्यक्तित्व और मंतव्य को जाना जाना चाहिए। तो इनके सुदीर्घ जानने वाले जानते हैं कि  ये न तो भक्त हैं और न वाम भक्त हैं।ये  दार्शनिक सुकरात के कथन पर चलते हैं कि&#8230;आप उधर ही जाएं जिधर सत्य ले जाएं।यह तय है कि सत्य अपनी नजरों से भी देखा जाता है,पर कुछ शास्वत कौसटी होती है, सत्य को परखने की, और अंततः वहीं सामान्य तौर पर सत्य माना जाता है।<br />
  धीरंजन मालवे जी ने प्रश्न उठाया है कि खिजाब  धर्म का प्रश्न है या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का? यदि धर्म की बात है तो विश्व के अनेक मुस्लिम देशों में इसको क्यों नहीं लागू है,या फतवा क्यों नहीं है? और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अगर बात है तो वह सार्वजनिक स्थलों और पेशे पर हावी नहीं हो सकता।<br />
 आजकल अचानक पहचान की धार्मिकता की बाढ़ आ गई है। नेताओं का ललाट पर टीके का फैसला और मुस्लिम महिलाओं के हिजाब को बढ़ावा देना इसमें शामिल है।<br />
सही है कि पच्चीस वर्ष पूर्व  हम क्लास की लड़कियों के धर्म , कपड़े से नहीं जान पाते थे।समय को पीछे खींच कर लाने का प्रयास विचित्र है। ड्रेस कोड मनुष्य में या खास समूह में एकरूपता लाने और दिखाने का बहुत बड़ा कदम है।<br />
हम अपने उद्देश्य श्रेष्ठ रखें। किसी के बहकावे या प्रच्छन्न भावों की पहचान करें। श्रेष्ठ यही है कि तर्कसंगत बात-व्यवहार करते हुए समाज में समरसता भरें।</p>
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		<title>
		By: P. S. THAPLIYAL		</title>
		<link>https://sablog.in/controversy-over-hijab/15534/#comment-1337</link>

		<dc:creator><![CDATA[P. S. THAPLIYAL]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Feb 2022 17:51:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हिजाब को लेकर छिड़ा विवाद एक सामयिक लेख है जिसे समय की कसौटी पर परख कर लिखा गया है। यह अगर धार्मिक अस्मिता को लेकर होता तो अवश्य ही सम्मान किया जाना चाहिए था लेकिन एक जाग्रत समाज में इसके पीछे छुपे उद्देश्य की अनदेखी करना भी कोई उचित दृष्टिकोण नही है। इस आंदोलन के बढ़ने के बाद सोशल मीडिया में मुस्लिम महिलाओं के तरह तरह के चित्र देखने को मिले उन्हें देखकर कहीं ऐसा नही लगा कि हिजाब धर्म का आवश्यक अंग है।
    तीन तलाक पर बने कानून के बाद मौलवियों को अपना बाजार बंद होते हुए दिखाई देने लगा तो उन्होंने कई तरह के आंदोलन खड़े किए। नागरिकता संशोधन अधिनियम को आड़ बनाकर मुस्लिम समाज को आंदोलित किय्या गया। दिल्ली में दंगे कराए गए। सिम्मी का बदला चेहरा पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के मार्फत भारत को बदनाम करने का प्रयास किया गया।
   बंगाल चुनाव और यूपी चुनाव को भी एकत्र होने का संवहन बनाया गया उसी कड़ी में कर्नाटक में हिजाब को स्थापित करने का प्रयास किया गया। यह भारत को कमजोर करने की साजिश से अधिक कुछ भी नही। इसका इस्लाम से कोई लेना देना नही है। कुरान में सएना ढकने की बात है। अश्लीलता किसी भी समाज मे अभिव्यक्ति की स्वतंत्र नही हो सकती। 56 इस्लामी मुल्कों में से दर्जनभर देशों में ही यह रिवाज है। उनमें बड़े देश इसी क्षेत्र के हैं। यह कट्टरपंथी सोच है जो महिलाओं को समानता के अधिकार से दूर करती है। प्रगतिशील समाज मे इन विषयों पर सोचने की अधिक आवश्यकता है।
मुताह निकाह, मिस्यार निकाह, हलाला और बनउ विवाह।
आपका लेख शानदार, जानदार और शिक्षाप्रद है। बधाई।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हिजाब को लेकर छिड़ा विवाद एक सामयिक लेख है जिसे समय की कसौटी पर परख कर लिखा गया है। यह अगर धार्मिक अस्मिता को लेकर होता तो अवश्य ही सम्मान किया जाना चाहिए था लेकिन एक जाग्रत समाज में इसके पीछे छुपे उद्देश्य की अनदेखी करना भी कोई उचित दृष्टिकोण नही है। इस आंदोलन के बढ़ने के बाद सोशल मीडिया में मुस्लिम महिलाओं के तरह तरह के चित्र देखने को मिले उन्हें देखकर कहीं ऐसा नही लगा कि हिजाब धर्म का आवश्यक अंग है।<br />
    तीन तलाक पर बने कानून के बाद मौलवियों को अपना बाजार बंद होते हुए दिखाई देने लगा तो उन्होंने कई तरह के आंदोलन खड़े किए। नागरिकता संशोधन अधिनियम को आड़ बनाकर मुस्लिम समाज को आंदोलित किय्या गया। दिल्ली में दंगे कराए गए। सिम्मी का बदला चेहरा पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के मार्फत भारत को बदनाम करने का प्रयास किया गया।<br />
   बंगाल चुनाव और यूपी चुनाव को भी एकत्र होने का संवहन बनाया गया उसी कड़ी में कर्नाटक में हिजाब को स्थापित करने का प्रयास किया गया। यह भारत को कमजोर करने की साजिश से अधिक कुछ भी नही। इसका इस्लाम से कोई लेना देना नही है। कुरान में सएना ढकने की बात है। अश्लीलता किसी भी समाज मे अभिव्यक्ति की स्वतंत्र नही हो सकती। 56 इस्लामी मुल्कों में से दर्जनभर देशों में ही यह रिवाज है। उनमें बड़े देश इसी क्षेत्र के हैं। यह कट्टरपंथी सोच है जो महिलाओं को समानता के अधिकार से दूर करती है। प्रगतिशील समाज मे इन विषयों पर सोचने की अधिक आवश्यकता है।<br />
मुताह निकाह, मिस्यार निकाह, हलाला और बनउ विवाह।<br />
आपका लेख शानदार, जानदार और शिक्षाप्रद है। बधाई।</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: Nilesh Kumar (Dumrawan)		</title>
		<link>https://sablog.in/controversy-over-hijab/15534/#comment-1336</link>

		<dc:creator><![CDATA[Nilesh Kumar (Dumrawan)]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Feb 2022 15:33:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://sablog.in/controversy-over-hijab/15534/#comment-1332&quot;&gt;प्रदीप बर्मन&lt;/a&gt;.

Aapkay uprokat vichar say mai puri tarah sahmat hu.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://sablog.in/controversy-over-hijab/15534/#comment-1332">प्रदीप बर्मन</a>.</p>
<p>Aapkay uprokat vichar say mai puri tarah sahmat hu.</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: डा॰ कुसुम जोशी		</title>
		<link>https://sablog.in/controversy-over-hijab/15534/#comment-1335</link>

		<dc:creator><![CDATA[डा॰ कुसुम जोशी]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Feb 2022 15:25:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मेरे विचार पूर्णरूप से मालवेजी के लेख के तथ्यों पर आधारित हैं और मुझे उनपर संदेह करने की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती क्योंकि मालवेजी उस तरह के व्यक्ति नहीं हैं जिनकी गणना झूठी ख़बर फैलाकर लाभ उठाने वालों में होती है! 

कुछ दूसरे स्रोतों से भी तथ्य पढ़कर मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं हो रही है कि इस मामले के पीछे राजनैतिक कारण हैं। यदि ऐसा न होता, तो यह वादविवाद उसी समय शुरू होना चाहिए था जब इन लड़कियों ने कॉलेज में दाख़िला लिया था! उनको अपनी मूल ज़रूरतों को पहचानने में इतना लम्बा समय नहीं लगता! उदाहरणार्थ, यदि चलने-फिरने के लिए हम मानते हैं कि हमारे लिए व्हीलचैयर अनिवार्य है, तो क्या इसकी माँग करने में हमें समय लगता है?  बिल्कुल नहीं! 

दूसरी बात यह है कि किसी संस्था में यूनिफ़ॉर्म है और आप वहाँ भर्ती होते हैं, तो वहाँ भर्ती होने के बाद आप मनमानी नहीं कर सकते। स्वेच्छा से काम करने की हदें होती हैं! आप मनमानी और अपने विश्वास से जुड़े कपड़े आदि अपने घर पर पहन सकते हैं, सार्वजनिक रोड आदि पर भी पहन सकते हैं, पर ऐसी संस्थाओं के प्रांगण के भीतर नहीं पहन सकते, जहाँ कोई विशेष यूनिफ़ॉर्म निर्धारित की जा चुकी है। ऐसे स्थानों में मनमानी करने की अनुमति देना, समाज को अराजकता की ओर ले जाएगा! 

आपने बिल्कुल सही कहा है कि हम लोग जब स्कूल कॉलेज में पंढ़ते थे, तब इस तरह की बातें सुनने में नहीं आती थी। समाज का हर हिस्सा प्रगति की ओर उन्मुख था! आज समाज के कुछ हिस्से जानबूझकर अपने कुछ लोगों को पीछे चलने को कह रहा है! एक और हैरानी की बात है कि कुछ उन्मुक्त मुस्लिम औरतें हैं जिन्होंने कभी भी न बुर्क़ा पहना न हिजाब पहना, जो दुनिया भर घूमती है, शराब भी पीती हैं, अपने मन से विवाह भी करती हैं, पर अपने से छोटी उम्र की अपने ही मज़हब की लड़कियों को अच्छी सीख देने और प्रगति की ओर प्रोत्साहित करने के बजाय उनसे कहती हैं कि हिजाब पहनें!  प्रगति की तरफ़ बढ़ाने के बजाय वे भोली बनने का स्वाँग रचकर  उनके पक्ष से कहती हैं कि हिजाब पहनकर शिक्षा लेना हिजाब न पहनकर शिक्षा न लेने  से बेहतर है! पर, इस बात की गारंटी कौन देगा कि उनकी अगली माँग उनकी मनमानी या विश्वास पर आधारित कोई दूसरी नई माँग नहीं होगी?

एक और बात भी आपने सही कही है कि आज क्या करना चाहिए उसके लिए हज़ारों साल पहले कही या लिखी बात को याद करना या पीछे पलटकर देखने में किस तरह की बुद्धिमानी है? क्या धर्मपरायण कहलाने के लिए हमें अपनी अक़्ल बेच देनी चाहिए?

अंत में, यह स्पष्ट है कि पूरा जाल षड़यंत्रियों द्वारा बिछाया गया है! इसमें कुटिल राजनीति ही भरी हुई है! इन देशद्रोहियों पर रोक लगनी चाहिए! वैचारिक और हर प्रकार की स्वतंत्रता की हद होती है!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे विचार पूर्णरूप से मालवेजी के लेख के तथ्यों पर आधारित हैं और मुझे उनपर संदेह करने की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती क्योंकि मालवेजी उस तरह के व्यक्ति नहीं हैं जिनकी गणना झूठी ख़बर फैलाकर लाभ उठाने वालों में होती है! </p>
<p>कुछ दूसरे स्रोतों से भी तथ्य पढ़कर मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं हो रही है कि इस मामले के पीछे राजनैतिक कारण हैं। यदि ऐसा न होता, तो यह वादविवाद उसी समय शुरू होना चाहिए था जब इन लड़कियों ने कॉलेज में दाख़िला लिया था! उनको अपनी मूल ज़रूरतों को पहचानने में इतना लम्बा समय नहीं लगता! उदाहरणार्थ, यदि चलने-फिरने के लिए हम मानते हैं कि हमारे लिए व्हीलचैयर अनिवार्य है, तो क्या इसकी माँग करने में हमें समय लगता है?  बिल्कुल नहीं! </p>
<p>दूसरी बात यह है कि किसी संस्था में यूनिफ़ॉर्म है और आप वहाँ भर्ती होते हैं, तो वहाँ भर्ती होने के बाद आप मनमानी नहीं कर सकते। स्वेच्छा से काम करने की हदें होती हैं! आप मनमानी और अपने विश्वास से जुड़े कपड़े आदि अपने घर पर पहन सकते हैं, सार्वजनिक रोड आदि पर भी पहन सकते हैं, पर ऐसी संस्थाओं के प्रांगण के भीतर नहीं पहन सकते, जहाँ कोई विशेष यूनिफ़ॉर्म निर्धारित की जा चुकी है। ऐसे स्थानों में मनमानी करने की अनुमति देना, समाज को अराजकता की ओर ले जाएगा! </p>
<p>आपने बिल्कुल सही कहा है कि हम लोग जब स्कूल कॉलेज में पंढ़ते थे, तब इस तरह की बातें सुनने में नहीं आती थी। समाज का हर हिस्सा प्रगति की ओर उन्मुख था! आज समाज के कुछ हिस्से जानबूझकर अपने कुछ लोगों को पीछे चलने को कह रहा है! एक और हैरानी की बात है कि कुछ उन्मुक्त मुस्लिम औरतें हैं जिन्होंने कभी भी न बुर्क़ा पहना न हिजाब पहना, जो दुनिया भर घूमती है, शराब भी पीती हैं, अपने मन से विवाह भी करती हैं, पर अपने से छोटी उम्र की अपने ही मज़हब की लड़कियों को अच्छी सीख देने और प्रगति की ओर प्रोत्साहित करने के बजाय उनसे कहती हैं कि हिजाब पहनें!  प्रगति की तरफ़ बढ़ाने के बजाय वे भोली बनने का स्वाँग रचकर  उनके पक्ष से कहती हैं कि हिजाब पहनकर शिक्षा लेना हिजाब न पहनकर शिक्षा न लेने  से बेहतर है! पर, इस बात की गारंटी कौन देगा कि उनकी अगली माँग उनकी मनमानी या विश्वास पर आधारित कोई दूसरी नई माँग नहीं होगी?</p>
<p>एक और बात भी आपने सही कही है कि आज क्या करना चाहिए उसके लिए हज़ारों साल पहले कही या लिखी बात को याद करना या पीछे पलटकर देखने में किस तरह की बुद्धिमानी है? क्या धर्मपरायण कहलाने के लिए हमें अपनी अक़्ल बेच देनी चाहिए?</p>
<p>अंत में, यह स्पष्ट है कि पूरा जाल षड़यंत्रियों द्वारा बिछाया गया है! इसमें कुटिल राजनीति ही भरी हुई है! इन देशद्रोहियों पर रोक लगनी चाहिए! वैचारिक और हर प्रकार की स्वतंत्रता की हद होती है!</p>
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			</item>
		<item>
		<title>
		By: Chaitanya Bharathi		</title>
		<link>https://sablog.in/controversy-over-hijab/15534/#comment-1334</link>

		<dc:creator><![CDATA[Chaitanya Bharathi]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Feb 2022 15:11:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यह पूरा प्रकरण इस काबिल नहीं था कि इस पर इतना बवाल मचाया जाता। यदि किसी कॉलेज की 6 लड़कियां हिजाब पहनकर आना चाहती थीं तो उन्हें ऐसा करने दिया जाता और व्यर्थ विरोध ना किया जाता तो यह मुद्दा बनता ही नहीं। असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए सत्तासीन वर्ग ऐसे ही बिना मतलब के विवादों को हवा देता है ताकि असली मुद्दों पर कोई बात ही ना हो। इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका अत्यंत निंदनीय है। मीडिया और टुच्ची राजनीति की जितनी भर्त्सना की जाए कम है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यह पूरा प्रकरण इस काबिल नहीं था कि इस पर इतना बवाल मचाया जाता। यदि किसी कॉलेज की 6 लड़कियां हिजाब पहनकर आना चाहती थीं तो उन्हें ऐसा करने दिया जाता और व्यर्थ विरोध ना किया जाता तो यह मुद्दा बनता ही नहीं। असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए सत्तासीन वर्ग ऐसे ही बिना मतलब के विवादों को हवा देता है ताकि असली मुद्दों पर कोई बात ही ना हो। इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका अत्यंत निंदनीय है। मीडिया और टुच्ची राजनीति की जितनी भर्त्सना की जाए कम है।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>
		By: प्रदीप बर्मन		</title>
		<link>https://sablog.in/controversy-over-hijab/15534/#comment-1332</link>

		<dc:creator><![CDATA[प्रदीप बर्मन]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Feb 2022 08:14:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हिजाब   के नाम पर भारत को अशांत करने का प्रयास करना किसी भी हालात मे बरदास्त नही किया जा सकता है, शिक्षा की जगह पर धर्म का चोला कदापि नहीं पहनाया जा सकता है ,अधिकांश  मुस्लिम   देशो मे भी हिजाब मान्य नहीं है , देश मे बैठे गद्दारों की सोची समझी साजिश है  जो चुनाव  के समय मे  देश को बदनाम  करना चाहते है  सर्वप्रथम  कर्णाटक के उन 6 परिवारों  के  लोगो पर देश को अशान्त करनें के  लिए  जुर्माना लगाना चाहिए एवं कड़ी सजा देनी चाहिए  इस तरह की मानसिकता  के  लोग  देश के दुश्मन हैं उनके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए प्रशासन  को]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हिजाब   के नाम पर भारत को अशांत करने का प्रयास करना किसी भी हालात मे बरदास्त नही किया जा सकता है, शिक्षा की जगह पर धर्म का चोला कदापि नहीं पहनाया जा सकता है ,अधिकांश  मुस्लिम   देशो मे भी हिजाब मान्य नहीं है , देश मे बैठे गद्दारों की सोची समझी साजिश है  जो चुनाव  के समय मे  देश को बदनाम  करना चाहते है  सर्वप्रथम  कर्णाटक के उन 6 परिवारों  के  लोगो पर देश को अशान्त करनें के  लिए  जुर्माना लगाना चाहिए एवं कड़ी सजा देनी चाहिए  इस तरह की मानसिकता  के  लोग  देश के दुश्मन हैं उनके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए प्रशासन  को</p>
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