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हाँ और ना के बीच

बेटे का जश्न : इधर भी उधर भी

 

इस बार हमारे आवासीय परिसर में 8 मार्च को महिला दिवस के अवसर पर विचार-विमर्श का आयोजन हुआ। मुझे यहाँ रहते हुए सात-आठ साल हो गये हैं पर इस तरह का कार्यक्रम पहली बार ही देखा। अब तक इस या ऐसे अवसरों पर किटी पार्टी, शॉपिंग, कीर्तन या बच्चों से जुड़ी गतिविधियाँ ही सामूहिकता का निमित्त होती थीं। कोरोना महामारी के आतंक और थमी हुई अन्य व्यस्तताओं के कारण जीवन-जगत में आए बहुत से बदलाव का ही परिणाम यह कार्यक्रम था। इस बीच खाली समय में पढ़ना-लिखना और सोशल मीडिया में होने वाले विचार-विमर्शों में लोगों की शिरकत बढ़ी थी। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम आदि के जरिए सहज उपलब्ध अर्थपूर्ण फिल्मों, वेबसीरिज ने भी उनका ध्यान खींचा था। पुरुषों के दिन भर घर में ही जमे रहने से उनके मिजाज के कार्यक्रम देखने का सिलसिला भी बढ़ा। अगर समाज के स्वतःचालित चक्के पर विचार-विमर्श न किया जाए तो वह जहाँ और जैसे ले जाता है, उसकी एक खास लय होती है। औरतों के लिए एक तरह की पुरुषों के लिए दूसरे तरह की। कमोबेश 99 प्रतिशत लोग उसी लय के अधीन हैं। वही लय उनकी दिनचर्या को घर्षणरहित लेकिन अदृश्य और नामालूम तरीके से संचालित करती है।

पूर्णकालिक गृह प्रबन्धक और नौकरीपेशा होने के साथ गृह प्रबन्धक, दोनों तरह की महिलाओं ने कुछ अलग मिजाज का जीवन इस एक साल में जिया था। लिहाजा इस बार महिला दिवस पर रचनाओं के पाठ और विचार-विमर्श की रूपरेखा बनी। रिफ्रेशमेंट का जिम्मा आवास के पुरुषों को सौंपा गया। वे उसी तरह सहर्ष तत्पर हुए जैसे करवा चौथ के दिन कुछ कामों का बंदोबस्त अपने ऊपर वे ले लेते हैं। उन्हें यह भी लगा होगा कि बेचारी संगिनियाँ पहली बार कुछ लिखने-बोलने का मौका पा रही हैं। इसके लिए रात-रात भर जग कर तैयारी उन्होंने की है। इसमें संतोषजनक प्रदर्शन कर लें तो आगे घर की लय समान्य गति पकड़े। पत्नियों के तैयारी में लगे होने के कारण होमवर्क भी बच्चों का खुद करवाना पड़ा और उनकी ऑनलाइन क्लास के लिए अपना लैपटॉप देना पड़ा। घर के कंप्यूटर में घर की स्वामिनी भाषण जो तैयार कर रही थी।

परिसर में नौकरीपेशा स्त्रियों की तादाद कम नहीं। मगर उन्हें थम कर सोचने का समय और अवकाश कम ही मिलता है। इसलिए वे परम्परा की लय से और गहरे जुड़ी हैं। पहनावे और बोल-चाल में जरूर अधिक आत्मविश्वास दिखता है। एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, नेहा। वह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाली एक संस्था चलाती हैं और अनेक संस्थानों में बोलने के लिए बुलाई जाती रहती हैं। एक हैं यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाली शालिनी। उन दोनों को ही मुख्य भूमिका सौंपी गयी। कुछ महिलाएँ जो पहले कविताएँ लिखती या गाती रहीं थीं। उन्होंने गाने, कविताएँ तैयार कीं। सुचारू रूप से प्रस्तुति करके तालियाँ बटोरने के बाद तनाव रहित होकर वे श्रोताओं में शामिल हो गयीं। चाय पीते हुए पकौड़ेनुमा कुछ बीच-बीच में टूँग भी लेती थीं। जिन्होंने अभी बोला नहीं था, उनका खाने-पीने में बिल्कुल ध्यान नहीं था। वे नाखून चबाती या उंगलियाँ चटकाती हुई बैठी थीं। दुपट्टे तो महानगरों के अपार्टमेंट में कम ही नजर आते हैं इसलिए उसके कोने को उंगलियों में लपेटने-खोलने की सुविधा तो एक-दो स्त्रियों के ही पास थी।

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नामी स्कूल में हिन्दी पढ़ाने वाली स्मिता अन्य महिला सदस्यों की अपेक्षा अधिक बोल्ड है। सच जहाँ तक देख पाती है, वहाँ तक बिना लाग-लपेट बोलती भी है। भाषा पर अच्छी पकड़ और परिजनों के सामने स्त्रियों में अक्सर पाए जाने वाले अतिरिक्त संकोच से रहित बेबाक स्वभाव के कारण शालिनी ने उसे सुझाया कि वह अपने निज अनुभव साझा करे। इस निज अनुभव में हमने जाना कि उसकी चार बहनें हैं। 5 बेटियाँ होने के कारण उसके माता-पिता को दादी और समाज से बहुत कुछ सुनना पड़ता था। बेटा न होने कारण माँ की हैसियत उसकी चाची-ताई से कम आँकी जाती थी। ‘5 बेटियों की शादी रिटायरमेंट तक हो जानी चाहिए।‘ यह बात उनके घर में टेपरिकॉर्डर की तरह बजती रहती थी। इसलिए जल्दी-जल्दी उन पाँचों की शादियाँ की गयीं।

जिसने भी पढ़ा या कुछ किया अपने बूते पर। स्मिता ने भी अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उसे नौकरी की बहुत साध थी मगर बेटी पैदा हो जाने पर उसके लिए नौकरी संभव नहीं रह गयी थी। पाँच साल बाद उसका बेटा हुआ तो परिवार में उसके मान में इजाफा होना शुरू हो गया। हालांकि किसी किस्म का कोई भी दुर्व्यवहार उसके साथ पहले भी नहीं हुआ था। कुछ फर्क है भी, यह उसे खुद भी बेटा होने के बाद ही पता चला क्योंकि उसे लगता था उसके बच्चे उसकी जिम्मेदारी हैं। दादा-दादी की स्वतंत्रता है उनकी देखभाल का जिम्मा लें या न लें। यह तो उसने भी बाद में जाना कि पोते के सब काम वे लोग खुद ही किया करते और इस बार स्मिता की भी खूब अच्छी देख-रेख की। खुद उसे नौकरी के लिए प्रोत्साहित किया और बच्चे का जिम्मा सहर्ष स्वीकार कर लिया। बेटी माँ के ही साथ स्कूल जाती और लौटती। स्मिता के मायके वालों को भी घर पर पहले से अधिक सम्मान दिया जाने लगा।

यह सब सुन कर शालिनी भड़क गयी और दोनों के बीच जोर-शोर से बहस होने लगी। प्रोफेसर होने के साथ ही बुद्धिजीवी और लेखिका शालिनी का कहना था कि वह पुत्रोत्पत्ति को गौरवान्वित कर रही है। स्मिता ने पहले तो ठंडे दिमाग से समझाने की कोशिश की कि “जब यही है मेरे जीवन का सच तो मैं क्या बोलूँ? जिन्दगी है, कहानी तो नहीं कि किसी का अचानक हृदय-परिवर्तन दिखा दूँ। समाज की प्रतिक्रियाएँ ऐसी ही आईं तो मैं क्या करूँ?” मगर जब शालिनी ने उसकी स्थितियों को न समझते हुए धुआँधार प्रगतिशील और स्त्रीवादी विचार उगलने शुरू कर दिए, वह भी इस अंदाज में जैसे स्मिता स्त्री-विरोधी और कूढ़मगज हो- तो स्मिता का आत्म सम्मान जाग गया। अब तक जो कुछ पढ़ा-लिखा-समझा था, उनमें से निष्कर्ष निकालने का विवेक बोध भी शालिनी के शब्दों की रगड़ खा कर जाग उठा और उसने कहना शुरू किया- “ओ हलो मैडम ! सारा स्त्रीवाद, सारा ज्ञान एक ही इंसान पर उड़ेल दोगी क्या? और वह इंसान जिएगा किस समाज में ये भी कृपया आप बता दें।

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आपके ही प्रगतिशील पति एक ओर क्रांति की बात करते हैं मगर हमारे घर आते हैं तो मैंने खुद उन्हें जे-एन-यू और अन्य संस्थानों में शोधरत लड़कियों पर जोक मारते और हँसते सुना है संजय और विशाल के साथ कि पढ़-पढ़ कर बूढ़ी हो जाती हैं। ‘लड़की नहीं बूढ़ी’ कह कर ताली बजा बजा के हंसते हुए। समाज की डाइनामिज्म से कोसों दूर की प्रगतिशीलता झाड़ने का काम पुरुषों के लिए छोड़ दो। अग्रगामिता के मुहावरे उगलते हुए जिनके पैरों को इत्मीनान से परंपरा थामे हुए होती है, जिनकी जेबें बिना कुछ किए मिले हुए प्रिविलिजेज से भरी रहती है- वे शतरंज के वजीर की तरह आगे-पीछे दोनों तरफ चाल चल सकते हैं। जिसके पास सिर्फ एक दिशा में ही चलने का विकल्प हो, वह सरपट नहीं भाग सकता। वह जमीन के गुरुत्वाकर्षण बल से संतुलन बिठा कर ही तो दौड़ेगा। जब तक व्यवस्था में बदलाव न आए, बेटियों की शादी एक मुश्किल काम बना रहे, उन्हें विदा होना पड़े तब तक आम लोग बेटा चाहना कम नहीं कर सकते। जिनके हाथों में सत्ता होती है, निर्णायक फैसले होते हैं और सर्वानुमति का बल होता है, उनके विरूद्ध चलने के लिए हिम्मत बटोरनी पड़ती है।

अनेक उदाहरणों से ये सिद्ध करने के बाद कि सार्वजनिक जीवन में भी स्त्रियाँ सर्वानुमति पाने की कोशिशों में जाने-अनजाने लगी रहती हैं, किन अदृश्य डोरियों से साहित्यिक अकादमिक जगत की उपेक्षा को उनकी-सी कह कर चीरती हैं। उसने आगे कहा “जब तुम पुरुष अनुमोदित बातें लिख कर या मंच पर बोल कर वाहवाही लूटती हो, सर्वानुमति की आवाज धारण कर व्यवस्था में जगह बनाती हो तब तुम भी सार्वजनिक जगत में ‘बेटा’ ही पैदा कर रही होती हो,

’बेटे’ को गौरवान्वित कर रही होती हो और ‘बेटियों’ के लिए स्थिति कमजोर कर रही होती हो।”

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इसके बाद कुछ लेखिकाओं की हाल में आई हुई किताबों पर बहुत अफसोस के साथ वह बोलने लगी। “उन्हें पढ़ कर ही मैंने अपनी शर्तों पर जीने की ताकत अर्जित की। स्त्री की जिन्दगी की कीमत और गरिमा को समझा। खेद है कि अब उनका लेखन बौद्धिक जगत की मुख्यधारा माने जाने वाली सोच को आत्मसात करके उनकी तवज्जो हासिल करने की कवायद बन कर रह गया है। अग्रगामी सोच का दावा करने वाले आप प्रबुद्ध लोग इन किताबों और भाषणों के जरिए ‘बेटा’ पैदा नहीं कर रहे? पुरुष वर्चस्व को मजबूत नहीं कर रहे? अनंत संघर्षों के बाद स्त्री यहाँ तक पहुँची है। क्या उस पर यह पुरुषवादियों के अनुमोदन का मुँह निहारने वाली प्रवृत्ति प्रहार नहीं कर रही?”

उसके इन सवालों ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। आपको?

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