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किसान आन्दोलन और उसकी चिन्ताएँ

 

आन्दोलन समाज में परिवर्तन लाने अथवा सामाजिक परिवर्तन को रोकने की दृष्टि से किया जाने वाला एक सचेतन और सामूहिक प्रयास है। वर्तमान समय में सरकार द्वारा सार्वजनिक संपत्तियों को बेचने और उसको निजी हाथों में सौंपने की कवायद ने आम जनता के बीच एक गंभीर आशंका प्रकट कर दी है। एक-एक कर सरकारी कम्पनियों के निजीकरण ने धीरे-धीरे इस सुगबुगाहट को और उद्वेलित कर दिया है कि क्या अब देश के अन्नदाता किसान भी पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली बनकर रह जायेंगे? इसके पीछे सरकार द्वारा लाये जा रहे वे तीन कृषि कानून हैं जिसके लागू होने की आशंका किसान को चिंतित कर रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था के रीढ़ की हड्डी कहा जाने वाला प्राथमिक क्षेत्र कृषि इसी झंझावात से गुजर रहा है। यही वजह है कि देश का अन्नदाता कृषि कानून को वापस करने की मांग को लेकर आज सड़कों पर आन्दोलनरत है।

भारत में किसान आन्दोलन के इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह ज्ञात होता है कि कृषकों का यह असंतोष कोई नया नहीं है। अवध के किसान आन्दोलन से लेकर नक्सलबारी आन्दोलन तक तथा तेलंगाना आन्दोलन भी किसानों के असंतोष की ही उपज रही है। ब्रिटिश काल में समय-समय पर आन्दोलन होता रहा है। कभी यह आन्दोलन सामन्तों की शोषणकारी व्यवस्था खिलाफ रहा हैतो कभी अंग्रेजों की लूट और दमनकारी नीति के खिलाफ। लेकिन देखा जाय तो सत्ता चाहे अंग्रेजी हुकूमत की रही हो या स्वदेशी सरकार की किसान हमेशा से निशाने पर रहा है। इतिहास इस तथ्य की ओर भी इशारा करता है कि जब-जब सरकारें किसानों से टकराई हैं तब-तब एक बड़ा आन्दोलन खड़ा हुआ है। और इन आन्दोलनों ने सरकार के मूल को हिलाकर रख दिया है। वर्तमान में जारी किसान आन्दोलन उसी का जीता-जगता उदाहरण है।

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वर्तमान किसान आन्दोलनने एक बहुवर्गीय चेतना को जन्म दिया है। क्योंकि इस आन्दोलन में उच्च वर्ग- निम्न वर्ग, अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, बूढ़े, बच्चे तथा सभी धर्मों के लोग सम्मिलित हो रहे हैं। यह चेतना उसकी अपनी जीविका को बचाने का है। इस देश की आबादी का लगभग 69 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। ग्रामीण क्षेत्र का मूल आधार ही किसानी का कार्य है। किसान से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो स्वेच्छा से खेती को अपनी जीविका के साधन के रूप में अपनाता है तथा कृषि कार्य में अपने औजारों के साथ अपने परिवार के श्रम का इस्तेमाल करता है। लिहाजा नयी कृषि नीति के अंतर्गत व्याप्त प्रावधानों के विरोध में यह आबादी संघर्षरत है। इस आन्दोलन की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि यह पूरी तरह अहिंसक है तथा इसमें बड़ी संख्या में बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं हिस्सा ले रही हैं।

वर्तमान सरकार ने 2016 में वादा किया था कि 2022 तक किसानों की आय दुगुनी कर देगी। अब प्रश्न यह है कि क्या किसानों की आय दुगुनी हुई या ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति में इसके अनुरूप कुछ परिवर्तन आये हैं? ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर इकॉनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलेपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 से 2016 के बीच सही मायने में किसानों की आय केवल 2 प्रतिशत बढ़ी है। 2017 में एक सरकारी कमेटी ने रिपोर्ट दी थी कि 2015 के मुकाबले 2022 में आय दोगुनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किसानों को 10.4 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ना होगा। जो कि एक दिवास्वप्न मात्र बनकर रह गया।

सरकार की नयी कृषि नीति की तीन मुख्य बातों पर गौर किया जाये जिसकी वजह से विवाद उत्पन्न हुआ है। पहला, द फ़ार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फ़ैसिलिटेशन), 2020 क़ानून के मुताबिक़, किसान अपनी उपज एपीएमसी यानी एग्रीक्लचर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी(APMC) की ओर से अधिसूचित मण्डियों से बाहर बिना दूसरे राज्यों का टैक्स दिये बेच सकते हैं। जबकि एपीएमसी मंडियों में कृषि उत्पादों की खरीद पर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग मंडी शुल्क व अन्य उपकर हैं। इसके चलते आढ़तियों और मंडी के कारोबारियों को डर है कि जब मंडी के बाहर बिना शुल्क का कारोबार होगा तो कोई मंडी आना नहीं चाहेगा।

दूसरी प्रमुख बात यह है कि फ़ार्मर्स (एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फ़ार्म सर्विस क़ानून, 2020के अनुसार, किसान अनुबन्ध वाली खेती (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग )कर सकते हैं और सीधे उसकी मार्केटिंग कर सकते हैं।

तीसरे प्रावधान, इसेंशियल कमोडिटीज़ (एमेंडमेंट) क़ानून, 2020 के अनुसार इसमें उत्पादन, स्टोरेज के अलावा अनाज, दाल, खाने का तेल, प्याज आदि की बिक्री को असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर नियंत्रण-मुक्त कर दिया गया है।

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अब किसानों की समस्या यह कि इन कानूनों से उनकी स्थिति में कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है.? कहीं इसका प्रभाव उलटे उन्हें और गहरे संकट में धकलने वाला साबित तो नहीं हो रहा है। इसके उत्तर स्वरूप निम्न बातों की ओर हमारा ध्यान जाता है पहली बात तो यह कि उनके फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी समाप्त हो जाएगी अर्थात सरकार उनकी फसल खरीदने के लिए बाध्य नहीं होगी जो कि किसानों के लिए एक राहत की बात होती थी। नए प्रावधान के तहत यह सुरक्षा छीन जाएगी। किसानों की एक सामान्य सी मांग है कि जिस प्रकार बाजार में प्रत्येक वस्तु की कीमत तय होती है ठीक उसी तरह किसान के अनाज की एक कीमत होनी चाहिए, जिसे ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ कहा जाता है। और यह लिखित रूप में होनी चाहिए न कि मौखिक। जहाँ तक मंडियों में अनाज बेचने का प्रश्न है तो यह हमेशा देखा गया है कि मंडी में किसान अपने अनाज की कीमत कभी तय नहीं करता बल्कि वह तय दर पर ही बेचने को विवश होता है। ऐसे में उसे ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ के अभाव में फसल का उचित दाम नहीं मिल सकेगा।

हरित क्रांति के जनक कहे जाने वाले प्रोफ़ेसर स्वामीनाथन ने कृषि क्षेत्र में सुधार और किसानों की स्थिति को देखते हुए इस आयोग ने 2006 में कुछ अहम सुझाव दिए थे जिनमें से कुछ प्रमुख सुझाव इस प्रकार थे: किसानों को फ़सल उत्पादन क़ीमत से 50% ज़्यादा दाम मिले। उन्हें कम दामों में क्वालिटी बीज मुहैया कराए जाएं। गांवों में ‘विलेज नॉलेज सेंटर’ या ‘ज्ञान चौपाल’ की स्थापना की जाए। महिला किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड मिले। प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में किसानों को मदद मिले। अतिरिक्त और इस्तेमाल नहीं हो रही ज़मीन के टुकड़ों का भूमिहीनों में वितरण किया जाए। खेतिहर जमीन और वनभूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए कॉरपोरेट को न दिया जाए। फसल बीमा की सुविधा पूरे देश में हर फसल के लिए मिले। खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था हर गरीब और जरूरतमंद तक पहुँचे। सरकारी मदद से किसानों को मिलने वाले कर्ज की ब्याज दर कम करके 4% की जाए। इनमें से अधिकांश सुझाव अभी तक लागू नहीं किये जा सके हैं। यह सरकारों की किसानों के प्रति उपेक्षित व्यवहार को दर्शाता है।

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हरित क्रांति के कारण भले ही हम कुछ फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में सफल रहे लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस प्रकार उपनिवेशकाल में ब्रिटिश सरकार भारतीय किसानों पर नकदी फसल के रूप में केवल ‘नील की खेती’ का दबाव बना रही थी, सरकार की नयी अनुबन्ध अथवा संविदा कृषि में ठीक उसी तरह हम सिर्फ कुछ फसलों (उद्योग की दृष्टि से जरुरी फसलों) के उत्पादन तक सीमित रह जायेंगे। देखा जाय तो ‘संविदा कृषि’ एक तरह से हरित क्रांति की ही तरह है। फर्क बस इतना है कि हरित क्रांति के तहत किसानों ने जो फसल उगाया, सरकार ने उसका न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर खरीद लिया। सरकार की इस गारंटी की वजह से किसानों ने साल दर साल सिर्फ गेहूं और धान के उत्पादन पर अत्यधिक ज़ोर दिया। वह बाजार के उतार-चढ़ाव से निश्चिन्त रहा क्योंकि फसलों की खरीद की गारंटी सरकार ने दे दी थी। वर्तमान किसान नीति में इसी न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुरक्षा का अभाव है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कम्पनी का एकमात्र लक्ष्य मुनाफ़ा कमाना होता है, जबकि एक कल्याणकारी राज्य के रूप में सरकार का लक्ष्य जन कल्याण का।

हम जानते हैं कि प्रत्येक वर्ष फ़सलों की बुआई में कुल 23 फ़सलों के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है। लेकिन देखा जाये तो केन्द्र सरकार बड़ी मात्रा में केवल धान, गेहूँ और कुछ ख़ास दालें ही ख़रीदती है।

शांता कुमार कमेटी (2015) ने नेशनल सेंपल सर्वे का जो डेटा इस्तेमाल किया था, उसके मुताबिक़ केवल 6 फ़ीसदी किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य की दर पर अपनी उपज बेच पाते हैं। सरकार जो उपज ख़रीदती है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा पंजाब और हरियाणा से आता है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसारएक तरफ पंजाब में होने वाले 85 प्रतिशत गेहूँ-चावल और हरियाणा के क़रीब 75 प्रतिशत गेहूँ-चावल, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदे जाते हैं, वहीं बिहार में सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाने वाली कुल ख़रीद दो प्रतिशत से भी कम है। इसी वजह से, बिहार के अधिकांश किसानों को मजबूरन अपना उत्पादन 20-30 प्रतिशत तक की छूट पर बेचना पड़ता है।

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इसी वजह से पंजाब और हरियाणा के किसानों को डर है कि अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था ख़त्म हुई तो उनकी स्थिति बिगड़ेगी। इन राज्यों के किसानों को यह भी डर है कि बिना न्यूनतम समर्थन मूल्य के उनकी फ़सल का मार्केट प्राइस गिरेगा और मंडी के बाहर टैक्स मुक्त कारोबार के कारण सरकारी ख़रीद प्रभावित होगी और धीरे-धीरे न्यूनतम समर्थन मूल्यकी यह व्यवस्था कमजोर और अप्रासंगिक हो जाएगी। किसानों की माँग है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को सरकारी मंडी से लेकर प्राइवेट मंडी तक अनिवार्य बनाया जाये ताकि सभी तरह के ख़रीदार; चाहे सरकारी हों या निजी इस दर से नीचे अनाज ना ख़रीदें।

दरअसल, देश के कुल किसानों की आबादी में छोटे किसानों का हिस्सा 86 प्रतिशत से अधिक है और वो इतने कमज़ोर हैं कि व्यापारी उनका आसानी से शोषण कर सकते हैं। कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के तहत बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ एक बड़े क्षेत्र के सभी किसानों की ज़मीने ठेके पर ले सकती हैं और कोई भी फसल उगाने के लिए बाध्य कर सकती हैं। इस स्थिति में किसान मात्र बंधुआ मज़दूर बन कर रह जाएँगे। सरकार ने नए क़ानून लाकर कृषि क्षेत्र का निगमीकरण करने की कोशिश की है और इसे भी ‘अंबानी-अडानी और मल्टीनेशनल कम्पनियों के हवाले’ कर दिया है। समझने की बात ये है कि निजी कॉर्पोरेट कम्पनियां जब आएँगी तो उत्पाद में मूल्य संवर्धन करेंगी, जिसका लाभ केवल उन्हें होगा। यह लाभ जिसे ‘अतिरिक्त मूल्य’ या ‘सरप्लस वैल्यू’ भी कहा जाता है उसमें किसानों की कोई हिस्सेदारी नहीं होगी तथा वह लाभ केवल पूँजीपति ही उठाएंगे। उदाहरण के तौर पर आप जो ब्रैंडेड बासमती चावल खरीदते हैं वो मूल्य संवर्धन के साथ बाज़ार में लाए जाते हैं। जिसमें किसान को प्रति किलो के केवल 30-40 रुपये ही मिलेंगे लेकिन बाज़ार में मूल्य संवर्धन के बाद 150 रुपये से लेकर ब्रैंड वाले बासमती चावल का दाम 200 रुपया प्रति किलो तक जा सकता है।

भारत एक कल्याणकारी राज्य है और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हमारे देश के किसान हैं। किसानों की स्थिति में सकारात्मक सुधार हुए बगैर देश के भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। निजीकरण से उत्पन्न अनिश्चितता और अविश्वास के इस दौर में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सरकार और किसान दोनों के समक्ष यह एक गंभीर चुनौती है कि इस किसान नीति का क्या हल निकाला जाये। देश का अन्नदाता किसान के रूप में पूरे देश की जनसंख्या का भरण-पोषण करता है। अतः उसकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता में होनी चाहिए। उचित होगा कि सरकार किसानों से वार्ता कर उनके हित में निर्णय ले और उनकी आशंकाओं को दूर करे।

 

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