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पुस्तक-समीक्षा

बौद्धिक छद्म को उजागर करती “कवि की मनोहर कहानियाँ”

 

“कवि की मनोहर कहानियाँ” हमारे समय के महत्वपूर्ण व्यंग्यकार और इन दिनों चर्चित कृति बोस्कीयाना के लेखक यशवंत व्यास के नये व्यंग्य संग्रह का नाम है। संग्रह में लगभग पचास-बावन व्यंग्य रचनाएँ हैं जो इस दौर के सामाजिक तथा राजनीतिक विद्रूप पर जमकर प्रहार करती हैं। ये रचनाएँ यशवंत के मुकम्मिल व्यंग्य बोध की परिचायक हैं। एक कवि को पात्र के रूप में इस्तेमाल करते हुए उन्होंने सत्ता प्रतिष्ठान तथा व्यवस्था के लोक लुभवान नारों एवं फफूँद लगे आप्त वाक्यों की काफी मट्टी पलीद की है। यशवंत के पास मौलिक और चुटीली भाषा है। इस भाषा को ईजाद करना यशवंत के लिए एक चुनौती पूर्ण कार्य रहा है। एक ऎसी भाषा जो परसाई और शरद जोशी के भाषाई प्रेत से मुक्त हो। यशवंत ने अपने शुरुआती लेखन से ही यह तोहमत उठाई और वे उसमे कामयाब भी हुए। “अब तक छप्पन” और “यारी दुश्मनी” के व्यंग्य से ही पता लग गया था  कि यशवंत का रास्ता अलग है।

 “कंट्रास्ट” यशवंत व्यास के व्यंग्य की पूंजी है। वे विरूद्धों में सामंजस्य खोजने वाले व्यंग्यकार नही हैं बल्कि उन्हें सामंजस्य में विरुद्धों की शिनाख्त करना ज्यादा मुआफिक लगता है। हर किस्म के यथास्थिवाद में उन्हें संदेह की बू आती है। “संदेह” उनका परम प्रिय शब्द है बल्कि वेद वाक्य ही समझ लीजिये। कहने का तात्पर्य यह कि यशवंत के व्यंग्यकार को स्वागत गुलदस्तों से नही लुभाया जा सकता। उनके लेखन का उत्स वन्दनवारों के शाश्वत तिरस्कारों में ही ढूँढा जा सकता है। उनके व्यंग्य में प्रयुक्त रूपकों में बाज दफे ऎसी उड़ानें होती हैं जिनमे मनभावन साम्य तलाशने में पाठक को काफी मशक्कत से गुजरना पड़ सकता है। पर यह प्रयोगशीलता ही यशवंत के लेखन को  अलहदा पहचान देती है। ज्ञान चतुर्वेदी ठीक कहते हैं “यशवंत व्यास को पढ़ना पाठक से एक भिन्न एकाग्रता और सतर्कता की मांग करता है”। इसमें संदेह नही कि यशवंत भाषा का वह मुहावरा अर्जित कर चुके हैं कि उनके कहे को सच ही मानना पड़ेगा उनसे असहमत नही हुआ जा सकता। बहरहाल।

प्रस्तुत संग्रह में, मनोहर काहानियों के कवि का इकहरा व्यक्तित्व नही है उसके व्यक्तित्व में हिन्दी के उन तमाम मीडियाकर बुद्धिवादियों के चेहरे नुमाया होते हैं जो साहित्य के फटे में जबरिया टांग घुसाए हुए हैं तथा अपनी इस कथित बौद्धिक आत्मरति पर गंभीरता का लाबादा ओढ़े हैं। कालान्तर में यह लबादा ही उनका सुरक्षा कवच बन जाता है, जिसके बल पर वे बहसें करते हैं, चैनल के पैनलिस्ट बनते हैं, सरकारों से इनाम इकराम पाते हैं और सिद्धान्ततः उसी सत्ता व्यवस्था को गरियाते भी हैं। दरअसल मनोहर कहानियों का कवि एक ऐसा लीलाधारी चरित्र है जो हर वाकिये का गवाह है, हर परिस्थिति का साझेदार है और हर अच्छी या बुरी घटना के छत्ते से अपने योगक्षेम का रस निकाल लेने को लालायित है। कुल मिलाकर भडैंती ही उसकी कविताई का परम सत्य है और उसी में ऊभ चूभ होते रहना उसका यथेष्ठ भी है। कविता की दुनिया में इस मांजने के अनेक कवि हमारे इर्द गिर्द भी दिखाई देते हैं लेकिन यशवंत की खूबी यह है कि वे उन्हें आसानी से परख लेते हैं। परसाई जी ने इसी किस्म के बुद्धिवादियों के लिए कहा है कि वे ऐसे शेर हैं जो सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं। शरद जोशी का बुद्धिजीवी भी इसी कुल गोत्र का है।

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उल्लेखनीय है कि प्रस्तुत मनोहर कहानियों का कवि सच्चा कवि भले ही न हो पर पक्का कवि जरूर है। बकौल यशवंत व्यास पक्के कवि की पहचान यह है कि उसे भूख लगे तो वह मनुष्य को रोटी में बदल दे। वह मनोहर भी है और कातिल भी। वही पूजा भी है और वही फूल भी। ये ऐसे ही कवि की मनोहर कहानियां हैं। यशवंत की इन व्यंग्य उक्तियों में विलुप्त होती आदमीयत की गहरी तलाश है। और आदमीयत की ही क्यों , प्रकारांतर से मनुष्यता के उन तमाम उपादानों की भी जो आदमी को मनुष्यता की गरिमा प्रदान करते हैं। पर विडम्बना यह है कि मनोहर काहनियों का कवि इंडिया इंटरनेशनल में बैठ कर सोच रहा है कि वह आदमी बन गया तो कविता कौन करेगा। वाह, कवि की इस मासूमियत का, पाठक मजे ले सकता है, खीज सकता है और अपना सर दीवार में फोड़ सकता है। गरज यह कि इन पंक्तियों की व्यंजना एक गहरे त्रास की तरफ इशारा करती हैं।

यशवंत का दुःख यह है कि निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन जैसे कवि अपने युग की त्रासद सचाइयों से ही जूझते रहे और आखरी तक पक्के कवि नही बन पाए जबकि पक्का कवि उनके साथ सेल्फी लेकर केश कर्तनालय के धंधे में उतर आया और धड़ाधड़ कवितायें काट रहा है। मनोहर कहानियों का कवि जब थानेदार हो जाता है तो सट्टे वाले कविता संग्रह छपाते हैं और पुलिस के आई जी से विमोचन करवाते हैं। साहित्य में और ख़ास तौर से कविता में इस परस्परता और बन्धु भाव को सारे हिन्दी इलाकों में देखा जा सकता है। इस तरह के दोहरे और द्वंद्व युक्त व्यक्तित्व के चलते कथित कवि भाजपा के दफतर में घुसकर गुड़ चने खाते हुए अपनी पहचान छुपाकर सुरक्षित गली से कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में चला जाता है।

दुर्भाग्यवश इन दिनों कवियों ने ऐसी अनेक गलियाँ ईजाद कर ली हैं जिनकी आड़ में वे फंडामेंटलिस्टों की कढ़ाई का हलवा खाकर यथास्थिवाद और जड़ता के खिलाफ क्रान्ति का शंख नाद करते हैं। और उनकी इस प्रतिबद्धता की दशों दिशाओं में जय जयकार होती है। “कवि स्टार्ट अप में लगा” में उन सरकारी जुमलों और योजनाओं पर तीखे कशाघात हैं जिन्होंने करोड़ों युवाओं को भ्रमित कर रखा है। यह ऐसा कवि है जो डाके के के धंधे में उतरकर डकैती के सौन्दर्य बोध पर कविता ठोंकता है। उसे कविताई , अफवाह से ज्यादा सुरक्षित लगती है।

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कवि की झल्लाहट यह है कि वह जो कहता है उसके अर्थ का अनर्थ हो रहा है। वह नागपुर कहता है लोग दिल्ली समझ लेते हैं। वह राफेल कहता है लोग बोफोर्स समझ लेते हैं। पर दुर्भाग्यवश भाषा के साथ इस छल का जिम्मेदार भी तो वही है। कवि को जलेबी पसन्द है, में भाषा के छद्म पर तीखा व्यंग्य है।” उसने पाया कि वह उल्टा चले तो जलेबी को विचार बना सकता है। वस्तुतः ऊटपटांग और भ्रमित करने वाले इस भाषाई विभ्रम के युग ने हमारी वैचारिक स्थापनाओं को काफी क्षतिग्रस्त किया है। यशवंत कहते हैं कि ” उसके इलाके में अब विचार से लड्डू बनते हैं ये जलेबी से ज्यादा कारगर हैं। लड्डू से पता नही चलता कि विचार कहाँ से शुरू, कहाँ पर ख़तम। ऊपर कहाँ और नीचे कहाँ। यहाँ तक कि वाम और दक्षिण का भी पता नही चलता।

“कवि को एक दिन कबीर मिल गये” में कवि कबीर का दुपट्टा छीनकर उसकी करोड़ों कापियां करवाता है और कबीर का पेटेंट बनवाकर इतिहास के धंधे में उतर जाता है। “कवि का बॉस बदल गया” में कवियों की इस दुविधा पर करारा व्यंग्य है जो भौतिक दृष्टि से तनख्वाह भी लेते हैं और दार्शनिक दृष्टि से इस सामन्ती व्यवस्था को बदलना भी चाहते हैं। नौकरी शुदा कवि जिन्दगी भर इस भ्रम में जीते हैं। कथित विचारधारा और प्रतिबद्धता के तहत वे किसी को अपना बॉस नही मानते और व्यवहार के के धरातल पर रोज ब रोज मातहत की पीड़ा भोगेते हैं। इस द्वंद्व पर यशवंत, बहुत तीखा व्यंग्य करते हैं। व्यवस्था की गोदी के लिए इन दिनों मीडिया ही लोलुप नहीं है कवि भी गोदी लोलुप होते हैं। गोदी लोलुप कवि जब गोदी से गिर जाते हैं या गिरा दिए जाते हैं तब ये क्रान्ति के अग्रदूत बनकर दूसरों की कविता को गोदी कविता निरुपित करते हैं।

“कवि को गोदी बहुत पसन्द थी” में व्यंग्यकार ने इस गोदी प्रियता पर गहरा व्यंग्य किया है। कवि के चरित्र का एक आयाम यह भी है कि वह मंदिर पर कब्जा जमाकर पुजारी से कमीशन खोरी कर सकता है। कवि की मनोहर कहानियों में रामराज्य, बाजार, प्राइम टाइम लॉक डाउन, वेबिनार जैसे अनेक विषय हैं, जो हमारे तत्कालीन लोक व्यवहार में शामिल हो चुके हैं और आजकल सामाजिक जीवन के नियामक तत्व बनकर उभर रहे है। दरअसल कवि की मनोहर कहानियों में हमारे आहत वर्तमान की सच्ची तस्वीर दिखाई देती है जो निसंदेह त्रासद और पीड़ादायी है। यशवंत का व्यंग्य हमारे राष्ट्रीय चरित्र को परत दर परत खोलते चलता है। इन संक्षिप्त व्यंग्य उक्तियों में लम्बे और गहरे आलेखों की अंतर्वस्तु समाहित है , अकारण विस्तार से परहेज करती उनकी यह प्रयोगशीलता पठनीय है। उनकी व्यंजना में गहरे निहितार्थ हैं। यशवंत का व्यंग्य भाषा और शिल्प की ताजगी से भरा हुआ है। मेरा विश्वास है कि यह किताब व्यंग्य की मोनोटोनी को तोड़ने में कामयाब होगी।

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कृति – कवि की मनोहर कहानियाँ
लेखक – यशवंत व्यास
प्रकाशक – अंतरा इन्फो मीडिया
मूल्य – 150 रूपये मात्र

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