Category: एतिहासिक

cbse board
दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (81)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

1995 के आरम्भ में सीबीएसई क्षेत्रीय मुख्यालय से पत्र मिला। कहा गया था कि तीन साल के अंदर बीएड कर लें नहीं तो परीक्षक, केंद्राधीक्षक नहीं बनाया जायेगा और वेतन-वृद्धि रोक दी जायेगी। प्रिंसिपल फादर वाल्सन जॉर्ज ने बुलाकर पत्र थमाते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “पवन सर, अभी तक आपको कोई नोटिस नहीं मिला था न! लीजिए यह नोटिस और इसका पालन कीजिए।” दरअसल उन दिनों फादर वाल्सन से उनकी कार्यशैली को लेकर मेरा मतभेद चल रहा था। उन्होंने एक शिक्षिका के मामले में कई लोगों को नोटिस जारी किया था तो मैंने चुनौती दे दिया था कि वे मुझे नोटिस देकर देख लें। मैं खुलेआम उस पीड़ित महिला का साथ दे रहा था। खैर…
बीएड करने का नोटिस मिलने पर मुझे वह पूरा घटनाक्रम याद आ गया जब मेरी नादानी और लेटलतीफी के कारण मेरा बीएड अधूरा रह गया था। अपने मित्र नील कंठ पाठक, राजकिशोर सिंह आदि के साथ मैंने भी एमए के बाद भागलपुर के बीएड कॉलेज में एडमिशन ले लिया था, किन्तु टॉपर होने के अहंकार, भागदौड़ और परिवार-मोह के कारण पाठ्यक्रम अधूरा रह गया था। हालांकि बाद में प्रोफेसर की नौकरी मिल जाने से यह सिद्ध हो गया कि भगवान जो भी करता है, अच्छे के लिए ही करता है। किंतु लिलार में विधाता ने जो गंजन लिख दिया है उसे भोगना भी पड़ता है। जो कोर्स भागलपुर में दोस्तों के साथ रहते आसानी से पूरा हो जाता, उसके लिए अचानक घोर दबाव और तनाव में आ जाना पड़ गया था। वह भी तब जब पीएचडी कर चुका था। बड़ी डिग्री लेने के बाद छोटी डिग्री लेने की पीड़ा क्या होती है, यह मुझसे अधिक कौन समझ सकता है? सच ही कहा है कि ‘अहंकार भगवान का भोजन होता है।’ नौकरी करते हुए अब कहीं से पत्राचार अथवा दूरस्थ पाठ्यक्रम के माध्यम से ही बीएड किया जा सकता था। यह भगीरथ कार्य मेरे अकेले बूते की बात नहीं थी। निश्चित रूप से मुझे एक टीम बनाने की जरूरत थी, जिसके लिए मुझे ही पहल करनी थी।
मैंने विनोद जी, अरुणजय जी, अर्चना आदि से बात की कि जब मुझे बीएड की जरूरत पड़ गयी है तो उन्हें भी साल-दो साल में पड़ ही जायेगी। अतः मेरे साथ कर लें। सब मिलजुलकर पता लगाएँ कि कहाँ से कोर्स किया जा सकता है?

Related image
पता चला कि महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी रोहतक (हरियाणा) से बीएड करना हमारे लिए मुफीद होगा। वहाँ पीसीपी के लिए तीन सप्ताह, थ्योरी एग्जाम्स के लिए भी तीन सप्ताह और प्रैक्टिकल एग्जाम्स के लिए एक सप्ताह प्रवास करना होगा। नामांकन के लिए रजिस्ट्रेशन कराने तक हमारे कनिष्ठ सुनील सिंह, चंद्रशेखर शर्मा, रूबी चौधरी और विजया लक्ष्मी दल में शामिल हो गये थे। नामांकन शुल्क ड्राफ्ट के माध्यम से जमा करना था। अन्य सभी का ड्राफ्ट डाक से जमा हो गया, किन्तु मेरा और अर्चना का शुल्क किन्हीं कारणों से नहीं जमा हो सका था। इस कारण 95 के जाड़े में मैं और अरुणजय जी रोहतक गये थे। आपातकालीन स्थिति में बिना रिजर्वेशन के वह यात्रा इतनी कष्टदायी थी कि भुलाये नहीं भूलती है। वहाँ मेरा काम तुरंत हो गया, पर अर्चना का शुल्क जमा करने में इस कारण बाधा उत्पन्न हो गयी कि महिला का ड्राफ्ट पुरूष जमा नहीं कर सकता। अरुणजय जी की हार न मानने की प्रकृति ने हल निकाल लिया था। नीचे से ऊपर की ओर प्रयास करते-करते वे रजिस्ट्रार तक पहुँच गये और सफल हुए थे। पत्नी के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के दरम्यान अरुणजय चारों बार रोहतक गये थे पर स्वयं कोर्स नहीं किये थे।
उस समय फरक्का एक्सप्रेस ट्रेन भिवानी तक जाती थी सो बिना गाड़ी बदले कहलगाँव से रोहतक तक जा सकते थे। हमारे दल में तीन महिला और चार पुरूष सदस्य थे। अप्रैल 96 में पीसीपी के लिए हम सभी रोहतक पहुँचे थे। यूनिवर्सिटी के आसपास ठहरने की इच्छा थी इसलिए छोटूराम धर्मशाला में दो कमरे लिये गये। प्रचंड गर्मी और धर्मशाला के साधनहीन कमरे! हमारा हाल अत्यंत बुरा था। टीम मैंने बनायी थी सो छोड़कर भाग नहीं सकता था और न ही अधिक खर्च करने का दबाव किसी पर डाल सकता था। दूसरा बड़ा संकट भोजन को लेकर था। वहाँ रोटी तो मेरी पसंद के लायक बनती थी, किन्तु पता नहीं दाल कौन थी और सब्जी में टिंडे का बोलबाला था। सब्जी मीठी लगती थी जिसके सहारे रोटी खाना सम्भव नहीं था। वहाँ के लोग भोजनालय में आते, दाल-रोटी का ऑर्डर करते और घर से लाये मक्खन मिलाकर मजे खाते और निकल लेते थे। हम बैठे टुकुर-टुकुर उन्हें देखते रहते थे। लगभग एक सप्ताह तक इसी उधेड़बुन में पड़े रहे थे कि क्या चुनूँ कि भरपेट खा सकूँ। उस संकट में वह भी खाने को मजबूर हुआ था जिसे दूसरों को भी खाते नहीं देख सकता था। चाऊमीन, जिसे देखकर मुझे पिल्लू खाने की फीलिंग आती थी। भूखे मरने से बचने के लिए मैंने चाऊमीन खाना शुरू कर दिया था और कई-कई बार खाया था। नतीजतन कुल सत्ताईस दिनों के रोहतक प्रवास में मेरी दशा इतनी बुरी हो गयी थी कि सुधा मुझे देखकर रो पड़ी थी। उसने साफ शब्दों में मुझे दुबारा रोहतक जाने से मना कर दिया था।

आवासन और भोजन की उस दिक्कत ने हमें समाधान की राह दिखा दी थी। हमने अपने साथ बीएड कर रहे एक स्थानीय साथी से मदद लेकर अगली बार के लिए एक फ्लैट भाड़े पर बुक करा लिया था। सैद्धांतिक परीक्षा के लिए लगभग एक माह का प्रवास फिर करना था। इस बार पूरा राशन-बासन लादकर हम फरक्का एक्सप्रेस से रोहतक आये थे। मालिक मकान ने सामने के किराना दुकानदार को हमारा केयर टेकर बना दिया था, जिनके सहयोग से टेंट हाउस से हमने बिछावन, फर्नीचर आदि भाड़े पर ले लिये थे। बिजली पंखे का वहाँ कुटीर उद्योग चलता था सो तीन पंखे खरीद लिये गये थे। चौका-बर्तन व झाड़ू-पोछा के लिए एक बाई ठीक कर ली थी। नाम था संतरा बाई। दोमंजिले फ्लैट के ऊपरी तल पर तीनों महिलाएँ और नीचे चारों पुरुषों ने डेरा डाल दिया था। खुद सब्जी-दूध आदि खरीदते और खुद पकाते खाते थे। सब्जी मंडी में ढेर की ढेर सस्ता पनीर मिलता था सो अधिक जोर उसी पर रहता था, क्योंकि हमारी पसंद की सब्जियाँ कम मिलती थीं।

Image result for hariyana me aurtein
वहाँ रहकर और लोगों से मिलकर समझ में आया कि हरियाणा के लोग सुखी क्यों हैं! वहाँ स्कूल जाने वाले बच्चों को छोड़कर बाकी सभी लोग काम करते हैं। धनी परिवार की औरतें भी पुरुषों को कम पर भेजकर खुद कुछ काम करने निकल जाती हैं या घर में ही कुछ उत्पादक कार्य करती हैं। काम को पूजा मानना कोई काल्पनिक बात नहीं है वहाँ। एक शाम हमारे किराना दुकानदार ने खबर दी कि संतरा बाई सुबह काम पर नहीं आ पायेगी क्योंकि उसका बेटा बाइक दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में भर्ती है। सुबह सवेरे हमने आपस में काम का बटवारा करके शुरुआत की ही थी कि दो लड़कियाँ कॉलेज ड्रेस में बैग लटकाये दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयीं और बोलीं, “सर जी, हम संतरा बाई की बेटियाँ हैं। झाड़ू बर्तन दो। काम कर जाऊँ।” हम सहानुभूति जताते हुए बोले, “बेटे तेरा भाई अस्पताल में है। हम सभी शिक्षक हैं। तुम्हारी पढ़ाई का समय है। फिर भाई की देखभाल की जरूरत है। तुम चली जाओ। हम अपना काम कर लेंगे।” “नहीं सर जी, मेरी माँ ने आपसे पूरे पैसे लिये हैं काम करने के। हम काम करके कॉलेज जाएँगी। हमें काम करने दो प्लीज! अभी भाई के पास माँ है। हम वहाँ जाएँगी त फिर वह आ जाएगी।” उन दोनों ने हमारी एक नहीं सुनी। काम करके ही गयीं।
एक दिन हमारे फ्लैट के निचले तल के शौचालय में जाम की समस्या उत्पन्न हो गयी, जिसके चलते ऊपरी तल के शौचालय पर भार बढ़ गया और महिलाओं को दिक्कत आने लगी। संकट दूर करने को अपने केयर टेकर से कहा तो उन्होंने एक व्यक्ति को भेज दिया। साफ-सुथरा कुर्ता-पजामा पहने कंधे पर तौलिया लिये एक सज्जन नमूदार हुए और हमारे बीच कुर्सी खींचकर बैठ गये और पूछा, “क्या सर जी, पखाना जाम हो गया है? ठीक करवाना है? 70 रुपये लगेंगे।” हमने समझा था कि यह ठेकेदार होगा। उसी हिसाब से हमने मोलभाव करना चाहा, पर वह अड़ गया और बोला, “सत्तर मतलब सत्तर। बोलो हाँ या ना?” हम कष्ट में थे इसलिए घिचपिच करना मुनासिब नहीं था। हामी भरते ही ठेकेदार वाला हमारा भरम टूट गया। उसने कहा,” फिनायल तेल, झाड़ू, सर्फ और दो बाल्टी पानी दो। टॉयलेट दिखाओ।” उसने तौलिया लपेटा और कुर्ता पजामा खोलकर अलगनी पर टांग दिया। फिनायल की बोतल खोलकर आँगन में चेम्बर के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींची फिर लोहे का ढक्कन उठाया। अंदर का गड्ढा पूरा तिलचट्टे से भरा था। वह झाड़ू लेकर टूट पड़ा। झाड़ू के निरन्तर प्रहार से लगभग सभी तिलचट्टों को मार डाला फिर आधी बाल्टी पानी मारकर पाइपों में बहा दिया। फिनायल की लक्ष्मण रेखा के बाहर एक भी तिलचट्टा नहीं भाग सका था। हम सभी के लिए यह भारी कौतुक था। सभी मंत्रमुग्ध हो देख रहे थे। बाँस की एक लंबी फट्ठी लेकर उसने चेम्बर के सभी तीन पाइपों के अंदर-बाहर खोंचा मारकर साफ किया। पुनः पानी मारकर बहाव जाँच लिया। ढक्कन लगाकर टॉयलेट में आया और पैन के पाइप में हाथ डालकर कचरा निकाला। पानी डलवाकर देख लिया और वाशिंग पाउडर छिड़ककर हथेली और ब्रश से रगड़ने लगा। सबसे अद्भुत यह बात थी कि इन सारे काम के दौरान वह मगन होकर फिल्मी गीत गुनगुना रहा था। टॉयलेट की सफाई करते हुए उसने कहा था, “सर जी, ऐसा साफ कर जाऊँगा कि टॉयलेट में बैठकर रोटियाँ खा लो।” हम सभी दंग थे। काम पूरा करके उस कर्मयोगी ने हमसे शैम्पू मांगा और जमकर स्नान किया। कुर्ता और पजामा पहनकर तौलिया धोया व सत्तर रुपये लेकर चला गया। तीन-चार दिन बाद मैं और विनोद जी परीक्षा देकर रिक्शे से वापस आ रहे थे। एक नुक्कड़ पर चाय की दुकान से उसने हमें देख लिया तो जोर से आवाज लगायी, “क्यों मास्टर जी, टॉयलेट ठीक है ना?” हमने हामी भरते हुए मन ही मन उसे प्रणाम किया था। इसे कहते हैं काम की पूजा! उस समय एसटीडी फोन कॉल बहुत महंगा था। हमारे घरों में लैंडलाइन फोन था। हम एक निश्चित समय पर अपने घर फोन करते थे, जिसमें बड़ी राशि खर्च हो जाती थी जो बहुत अखरती थी। हमने एक ट्रिक ईजाद किया कि घर से इनकमिंग कॉल करवा लें। एक-दो दिन टेलीफोन बूथ वाली महिला ने बर्दाश्त किया फिर बिगड़ गयी। “अजी मैंने कोई धर्मार्थ सेवा केन्द्र नहीं खोल रखा है। अब इनकमिंग कॉल मंगाओगे तो हाफ चार्ज देना होगा।” मेरी नजर में यह भी अपने काम और पेशे की पूजा ही थी।

रोहतक से जुड़ा एक प्रसंग बड़ा ही मजेदार है। दोस्ती होने के बाद से अबतक पहली और आखिरी बार विनोद जी मुझसे गुस्सा हुए थे। लगभग चार-पाँच घण्टे तक उन्होंने मुझसे बात नहीं की थी। मैंने भी कोई सफाई देने और मनाने की कोशिश नहीं की थी। वे खुद ही उकताकर बोले थे, “मतलब कि कोई रूठे भी नहीं! अगर कोई रूठे तो कोई मनाये ही नहीं! यह तो हद है।” सारे लोग ठहाका मारकर हँस पड़े थे।।
वापसी के। एक दिन पहले हम कपड़े की शॉपिंग करने गये थे। मोलतोल की चतुराई देखकर दुकानदार ने सवाल किया था, “भाई, आपलोग इतने बुद्धिमान हो फिर राबड़ी देवी को सीएम के रूप में कैसे बर्दाश्त करते हो?” हमने जवाब दिया था कि बिहार ने दुनिया को लोकतंत्र की अवधारणा दी है। वैशाली दुनिया का पहला गणतंत्र था। हम लोकतंत्र की इज्ज़त करते हैं। राबड़ी देवी के साथ विधायकों का बहुमत है, इसलिए वे मुख्यमंत्री हैं और हम उन्हें बिहार की मुखिया मानते हैं। दुकानदार निरुत्तर होकर हमारा मुँह ताकता रह गया था।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
.
exam
09Dec
दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (80)

  पवन कुमार सिंह   जनवरी 1994 के पहले सप्ताह में सीबीएसई से पत्र मिला कि मुझे...

munger school of yoga
07Dec
दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (79)

  पवन कुमार सिंह    योगविद्यालय से बुलावे के लिए जो पोस्टकार्ड आया था, उसमें...

01Dec
दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (78)

  पवन कुमार सिंह    बाबूजी के स्वर्गवास के बाद उनकी बंदूक के उत्तराधिकार की...

27Nov
दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (76)

  पवन कुमार सिंह    दीप्तिनगर के मध्य अवस्थित सेंट जोसेफ्स स्कूल के...