Category: स्तम्भ

shukriya imran sahab
पुस्तक-समीक्षा

शुक्रिया इमरान साहब: परिवेश से बाख़बर कहानियां

 

  • अजय चन्द्रवंशी

 

चर्चित युवा कथाकार इंदिरा दांगी की कहानी संग्रह ‘शुक्रिया इमरान साहब’ में कथानक के कई रंग हैं। अवश्य इसमें युवा वर्ग के प्रेम, रोमांस,उनके बदलते नैतिक और जीवन मूल्यों की अधिकता है; मगर साथ ही इसमें अपने परिवेश के प्रति सजगता भी है। उम्र के एक पड़ाव में रोमांस, आकर्षण की अधिकता स्वाभाविक है, जिसका चित्रण संग्रह के कई कहानियों में है। ये प्रेम और आकर्षण भावी जीवन की दिशा तय करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। स्त्री-पुरुष का परस्पर और परिवेश (समाज) के साथ अन्तःक्रिया से जीवन के हकीकतों से परिचय हो जाया करता है। विवाह-पूर्व के रोमांस का अर्थ यह नही की दाम्पत्य में में इसका लोप हो जाता है। सम्बन्धों में जीवंतता जीवन के हर पड़ाव में सम्भव है। लेखिका ने ‘बिसवां अफेयर और वेटिंग टिकिट’ कहानी में इसे सार्थक ढंग से व्यक्त किया है, जहां पति-पत्नी का परस्पर आकर्षण पूरे ‘पारिवारिकता’ के साथ बरकरार है। हालांकि इस कहानी में बस इतना ही नही है; इसमें एक ऐसे परिवार का भी जिक्र है जो बेवजह अपनी सहजता खो कर आडंबर रच रहा है। फिर बेटी के प्रति उनका द्वितीयक व्यवहार भी उजागर होता है, जो आज भी बहुत से परिवारों में ‘स्वाभाविक’ रूप से होता है।

indira dangi

इंदिरा दांगी

सामान्यतः युवा लेखिकाओं के बारे में यह धारणा बन जाती है या बना दी जाती है कि वे ‘स्त्री विमर्श’ पर ही कहानियां लिखती हैं। मानो स्त्री-विमर्श कोई नकारात्मक मूल्य हो! आज जागरूक स्त्री वर्ग अपनी बातें अपने ढंग से कह रही हैं; उनकी कहन में मुखरता है; चीजों को देखने का उनका अपना नज़रिया है, जिसे वे व्यक्त कर रही हैं। हाँ मगर यह भी है कि सही या गलत महज स्त्री या पुरुष होने से नही हो जाता। स्त्री विमर्श की भी अपनी उपलब्धि और कमियाँ हैं। स्त्री विमर्श वहां पर आडम्बर लगने लगता है जब उसे मात्र ‘देह की मुक्ति ‘तक सीमित किया जाता है। स्त्री की समस्या इसके अलावा सामाजिक-आर्थिक भी है और उसके खुद के दृष्टिकोण भी उसके आर्थिक-वर्ग से प्रभावित होते हैं। कहने का मतलब यह है कि स्त्री की समस्या गरीबी और रोजी-रोटी की भी है।विमर्श एक बात है, विमर्श का ‘आतंक’ दूसरी बात।

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इंदिरा जी के प्रस्तुत संग्रह की कुछ कहानियाँ उनके दृष्टिकोण की व्यापकता और विषय के विविधता को दिखाती हैं। मसलन संग्रह के शीर्षक कहानी ‘शुक्रिया इमरान साहब’ में इमरान गरीब तबके का व्यक्ति है जो स्कूल बस का ड्राइवर है और पार्ट टाइम में किराए का ऑटो चलाता है। उसको स्कूल के एक बच्चे की मम्मी से, जो बच्चे को रोज बस बिठाने आती है, से ‘प्रेम’ हो जाता है। इमरान शादी-शुदा है; पत्नी से कोई अनबन भी नही है। मगर उस स्त्रीं के प्रति उसका आकर्षण लगातार बढ़ता जाता है, और वह फैंटेसी में जीने लगता है। स्त्री उसके ‘प्लेटोनिक प्रेम’ से अनजान है। मगर इमरान का यह एकतरफा आकर्षण कहीं पर भी ‘असामाजिक’ रूप नही लेता, अवश्य वह घर में खोया-खोया रहता है। उसके लिए उस महिला को देख लेना बस काफी है। कहानी में कई मोड़ आते हैं; आखिर में उस महिला को मदद के बदले जब वह इमरान को ‘शुक्रिया इमरान साहब कहती है’ तो इमरान को मानो सबकुछ मिल जाता है। कहानी के पृष्ठभूमि में राजनीतिक नेताओं के दांव-पेंच भी है; साम्प्रदायिकता की छाया में पनप रहे परस्पर अविश्वास भी है, जो इमरान के ‘फैंटेसी’ को समझने में सहायक है। इमरान के इस आकर्षण के कारण की पड़ताल की जाए तो कई बातें उभर कर आती हैं।  एक तो स्त्री-पुरुष का परस्पर आकर्षण प्राकृतिक है, दूसरा इमरान का परिस्थितिजन्य अभाव भी काल्पनिक इच्छापूर्ति के रूप में इस फैंटेसी को उपजने में मदद की होगी। मगर कथाकार इस बात से सतर्क है कि ‘मनोविज्ञान’ विवेक को हर नही लेता, इसलिए इमरान कहीं पर भी असंयत व्यवहार नही करता। कहानी मे अब्बास चचा और चाची भी हैं, जिनका बेटा उन्हें अपने हाल पर छोड़ कर अलग रहता है, मगर ममतावश चाची उसके लिए उसके लिये तरह-तरह के व्यंजन बनाकर ले जाती है, जिसे वह कभी खाता नही। विडम्बना है कि माँ-बाप जिस बच्चे के लिए अपना सबकुछ लुटा देते हैं, उसी से उपेक्षा मिलती है। कुल मिलाकर यह कहानी कई कोणों से अपनी सार्थकता सिद्ध करती है।

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‘शहर की सुबह’ कहानी भी निम्न मध्यमवर्गीय शहरी लोगों की मजबूरी और बेबसी को उजागर करती है, जहां ख़ुद का गुजारा मुश्किल से होता है; ऐसे में मेहमान की कल्पना ही डरा देती है। मगर सामाजिकता का तकाजा कि मुस्कुराना भी पड़ता है। कहानी में ‘रचना’ के माध्यम से ‘स्त्री पक्ष’ को भी उभारा गया है क्योंकि गृहस्थी की छोटी-छोटी समस्याओं का सामना उनको ही अधिक करना पड़ता है। रचना को जैसे ही पता चलता है कि मेहमान उसके घर को ही तलाश कर रहे हैं; वह घर मे ताला लगाकर निकल जाती है, ताकि वे थोड़ी देर इन्तजार कर के चले जाएं। जाहिर है इसमें उसकी चालाकी नही मजबूरी है। उसके घर से बाहर रहने के घटनाक्रम में पूरे कॉलोनी की दिनचर्या और जीवन उभरकर आता है। अंततः रचना जब साहस कर के उधारी से सामान खरीदकर कर घर जाती है तो मेहमान लौट रहे होते हैं। वे केवल मिलने आये थे, क्योकि घण्टेभर बाद उनकी ट्रेन थी। सुखद यह कि वे लौटते समय उसे सौ रुपये भी देते हैं। यह सौ रुपये भी उसके लिये कम नही है; उसके ज़ेहन में कई जरूरतें कौंध जाती है।

‘सरकारी मदद आ रही है’ में सरकारी तंत्र के कछुआ चाल को दिखाया गया है, जहाँ मदद के इन्तज़ार में जरूरतमंद का निधन हो जाता है। कहानी मार्मिक है; गांव से आया मजदूर वर्ग का ‘हरि ‘अपनी बहन की इलाज कराने में सक्षम नही है। बड़ी मुश्किल से सूबे के मुख्यमंत्री से सरकारी सहायता का आश्वासन मिलता है। इस आश्वासन को सहायता में परिणित होने में इतना अधिक समय लगता है कि जब सहायता पहुंचती है तब उसकी बहन का निधन हो चुका होता है। इस बीच घटित घटनाक्रमों में कथाकार ने हरि की कर्मठता, धैर्य, बेचैनी, ममत्व का और सरकारी तंत्र के लापरवाही, उपेक्षा, असंवेदनशीलता का सार्थक चित्रण किया है।

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‘ये जो साहित्य है मेरी जान’ में साहित्य के नाम पर फैले आत्ममुग्धता और पाखंड जो बहुतों में ऐय्याशी की सीमा तक पहुंच गई है का बखूबी चित्रण हुआ है। अपने आस-पास की दुनिया से बेखबर ‘साहित्यकारों’ की कथाकार ने अच्छी खबर ली है। ऐसे में जबकि लेखिका ख़ुद काफी संख्या में प्रेम कथाएं लिखी है; यह व्यक्तव्य कितना सार्थक है “जबकि आधी दुनिया अव्यवस्था और अपमान से या तो मर रही है या कुहनियों के बल घिसट रही है, मैं चर्चित प्रेम कहानियां लिखने वाला दंभी लेखक बना हुआ हूँ? कहां से आया हूँ और कहां जा रहा हूँ? ये मेरा कुल सृजन, ये मेरा साहित्य, ये जीवन मेरा-न घमंड है, न ऐय्याशी, ये मेरी ज़िम्मेदारी है!” प्रेम कहानियां लिखने में कोई बुराई नही है; गलत है दिन-दुनिया से बेख़बर होना।

‘उस रात वे अकेली लड़कियां’ में दूर-दराज से शहरों में पढ़ने आयी लड़कियों की समस्याएं; खासकर अनचाहे मोबाइल कॉल द्वारा उन्हें परेशान करने, धमकी देने का जिक्र है। लड़की-लड़के का परस्पर आकर्षण, प्रेम संबंध का बनना-टूटना स्वाभाविक है, मगर कुछ आपराधिक प्रवृत्ति के तत्व हमेशा रहते हैं जो अपने मे ‘काबिलियत’ तो पैदा नही कर पातें; बल्कि दुसरो को परेशान करते रहते हैं। कथाकार ने दिखाया है कि इससे मुक्ति प्रतिकार के साहस में ही है।

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अन्य कहानियों में ‘पहाड़’ में बालमन के जिज्ञासा से लेकर दृढ़संकल्प तक को रोचक ढंग से दिखाया गया है। बचपन में ऐसी घटनाएं कमोवेश हम सबके साथ अलग-अलग रूप में घटित हुई होती है।अन्य कहानियां ‘एक प्याली कॉफी’, ‘रेस्तरां में बॉयफ्रेंड के साथ’, ‘वो लड़की, मैं और ट्रेन’, ‘मुझसे शादी करोगी?, ‘हमे मुस्कराना आता है’, ‘जिसे मैं फोन नही करती’ मुख्यतः प्रेम कहानियां हैं, जिसमे युवावस्था के प्रेम, आकर्षण, रोमांस, उसके उतार-चढ़ाव, नाटकीयता है; जो उस उम्र की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यहां लडकियां भी ‘बोल्ड’ हैं, मुखर हैं, अपना हित-अहित समझती हैं। वे सम्बन्धों का गणित जानती हैं और पुरुष को आकर्षित करने का जतन भी करती हैं। ‘वो लड़की, मैं और ट्रेन’ में ‘प्रेमजाल’ बिछाकर पुरुष को ठग भी लेती है।

इस तरह संग्रह में कई रंग की कहानियां हैं। यह महत्वपूर्ण है कि कथाकार की दृष्टि अपने आस-पास के दुनिया से बेखबर नही है। जितना वह अपनी दुनिया को देखती है उतना ही अपने परिवेश की दुनिया को भी। कहन के ढंग में भी सहजता है, जो कहानियों को पठनीय बनाती है। कहीं पर भी भारी-भरकम और बोझिल शब्दों का प्रयोग नही हुआ है; इस तरह प्रचलित शब्दों के प्रयोग से पाठकों को आसानी होती है।

पुस्तक- शुक्रिया इमरान साहब (कहानी संग्रह)
लेखिका- इंदिरा दांगी
प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 300 रुपये (हार्ड बाउंड)

ajay chandravanshi

लेखक इतिहास एवं आलोचना में रूचि रखते हैं तथा कवर्धा (छ.ग.) में सहायक विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी हैं|

सम्पर्क-  +919893728320, 

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