Category: स्तम्भ

गाँधी से मुलाकात

घोड़ा-न्याय

गांधी से मुलाक़ात (भाग 5)

 

  • हेमंत

“सौ साल पहले आप चम्पारण आये। उस वक्त के कई ऐसे वाकये होंगे, जो चम्पारण-सत्याग्रह के दौर में काफी महत्वपूर्ण रहे होंगे। वे उस समय की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए होंगे या न भी हुए हों। इतिहास की किसी किताब में दर्ज हुए हों या न हुए हों। क्या आप ऐसा कोई वाकया सुनाना चाहेंगे, जो आपकी नजर में, आजादी के बाद जन्मी पीढ़ी के लिए जानना जरूरी हो?
“हां, एक वाकया तो बहुत दिलचस्प था। उसे मैं कभी भूल नहीं सकता। वह कहीं छपा या नहीं, यह तो मैं नहीं कह सकता। यह तो आप जैसे युवाओं का काम है, जो आजकल इतिहास पर ‘पड़े’ हुए हैं, लेकिन इतिहास ‘पढ़ते’ नहीं।”
“अब आप नया राग मत अलापिए। इतिहास में पड़ने और इतिहास को पढ़ने पर आगे कभी बहस होगी, तो आप अपना ज्ञान बघारियेगा। अभी वाकया सुनाइए।”
वे मुस्कराए। बोले – “ठीक है। अभी वाकये पर ही रहूंगा।…चंपारण-सत्याग्रह के समय एक बार जुलूस निकला। उसमें आचार्य कृपलानी घोड़े पर बैठे आये। उन पर लापरवाही से हांकने (rash driving – रैश ड्राइविंग) का अभियोग लगाकर उन्हें तीन सप्ताह की कैद की सजा दी गई।
“‘प्रोफेसर’ जेल में गए! इसमें सत्याग्रह कैसा?”

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“मनुष्य पर जब अभियोग लगाया जाता है तब या तो वह अपराधी होता है या निर्दोष। अगर अपराधी हो तो प्रायश्चित स्वरूप जेल जाए और निरपराध हो तो न्यायाधीश को शिक्षा देने के लिए जेल में जाए। अगर सारे निर्दोष लोग अपनी निर्दोषिता बताकर जेल में जाना पसंद करें, तो अंत में निर्दोष को शायद ही जेल हो…।”
“यह तो आपका अजीब तर्क है? सरकार उलूल-जलूल अभियोग लगाकर उनको जेल भेज दिया, और आपलोग देखते रह गए? कोर्ट में केस नहीं लड़े?”
“प्रोफेसर के मामले में बहुत-सी विशेषताएं थीं। उनका मामला कोई घोड़े को तेजी से झांकने का नहीं था। वह तो बहाना था। उस मामले का हेतु यही था कि किसी भी प्रकार मुझे और मेरे द्वारा चम्पारण आंदोलन को अप्रिय बनाया जाए। मुझ पर कुछ ना किया जा सके और मेरे आदमी पर किया जा सके, तो भी प्रतिपक्षी को आनंद मिलेगा, ऐसी मान्यता थी इसके पीछे थी। ऐसे समय प्रोफेसर को जेल में जाकर अपना स्वरूप दिखाना आवश्यक था। फिर चम्पारण की प्रजा जेल में जाने से बहुत डरती थी। उसे निर्भय बनाने का वह ‘सुंदर’ अवसर मिला। इसे छोड़ा नहीं जा सकता था। खुद प्रोफेसर के लिए भी अनायास प्राप्त होने वाले उस अनुभव को छोड़ देना ऐसा ही होता, जैसे लक्ष्मी तिलक लगाने आए, तब वह मुंह छिपा लिया जाए!”
“इसका माने ये कि अपील भी नहीं की?
“हां, सत्याग्रह की दृष्टि से तो अपील करनी ही नहीं थी, लेकिन अपील न करने में सत्याग्रह के शुद्ध पालन गौण हेतु था। मेरा ख्याल था कि मामला इतना कमजोर है कि हम अपील वगैरह करके उसे बड़ा रूप नहीं दें। इसका अच्छा परिणाम ये हुआ कि हम न्यायधीश का ‘पक्षपात’ और मूर्खता दोनों आसानी से दिखा सके। फिर यह गारंटी तो कोई वकील दे नहीं सका कि अपील में हम जीतेंगे ही। वकीलों को मैंने बता दिया था कि अपील आप अपनी जोखिम पर करें। अगर हार कर आओगे, तो आपको ही दोष दूंगा।”
“मुकदमे में अपील नहीं की, तो ऊपर की अदालत में रिवीजन में जाते? वह तो हो सकती थी?
“हां, रिवीजन यानी नजरसानी ही हो सकती थी। लेकिन नजरसानी में ऊपर की अदालत भी हकीकत में नहीं पड़ती, सिर्फ कानून की भूल सुधारती। लेकिन प्रोफ़ेसर के मामले में कानून की खिड़की की गुंजाइश नहीं थी…।”

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“अब ये कैसा सत्याग्रह हुआ? सरकार झूठे केस लादे और जेल भेजे, तो उसको, विरोध किए बिना, मान लें।”,
“सत्याग्रह यही तो है! खुद कष्ट भोग कर अन्याय का मुकाबला करना। न्यायधीश का निर्णय केवल ‘अ-न्याय’ था। सो जेल में जाने का दुख उठाकर प्रोफेसर ने ‘सत्याग्रह’ किया। उसमें ‘सत्याग्रह’ और संसार जिसे ‘व्यवहार’ कहता है, उस व्यवहार-न्याय की भी रक्षा हुई।”
“तो आप ये वाकया सुनाकर हमें ये पाठ पढ़ा रहे हैं कि आपके ‘सत्याग्रह’ में सफाई की भी गुंजाइश नहीं?
“नहीं, नहीं, मैं कहना चाहता हूं कि शुद्ध सत्याग्रह में सफाई की गुंजाइश नहीं। आज कल हम जो सत्याग्रह देख रहे हैं न, वे शुद्ध नहीं, मिश्रित हैं। मिश्रता हमारी कमजोरी का माप है और उसकी निशानी है। जब शुद्ध सत्याग्रह होगा, तब दुनिया उसका आश्चर्यजनक प्रभाव देखेगी, यह मेरा दृढ़ विश्वास है।”
गोष्ठी में गोलाकार सजी कुर्सियों पर बैठे युवाओं ने तालियाँ बजाई। ‘अब मैं चला’ कहते हुए वे उठ खड़े हुए। हाथ जोड़ कर नमस्कार कहा। तभी एक युवक उठा और बोला – सर, सर… बुरा न मानें, तो हम एक बार पूछना चाहते हैं…।”
“बुरा किस बात की? पूछिए?”

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“हमने अपने स्मार्ट फोन में आपकी पूरी स्टोरी कैच कर ली है। गांधी स्टाइल में आपका एक्टिंग लाजवाब है। वैरी इंटरेस्टिंग इसलिए..। हम चाहते हैं कि इसे फेस बुक वाल टैग करें। प्लीज, आप ही बताइए, इसका टाइटिल क्या रखें…?”
वे रुके। पलभर के लिए गम्भीर हुए। उस युवक को देखा। फिर हंसते हुए बोले – “कहानी का टाइटिल ‘घोड़ा न्याय’ हो तो कैसा रहेगा…?”
जोरदार हंसी और तालियों से गूंज के बीच वे लपकते हुए बाहर निकल गए!

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार हैं|

सम्पर्क- +919430887611

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