Category: सिनेमा

सिनेमा

प्यार की अनकही दास्तान ‘ब्रीणा’

 

{Featured in IMDb Critics Reviews}

 

निर्देशक – पवन कुमार शर्मा
स्टार कास्ट – संजय मिश्रा, आस्था सावंत, नीरज सूद, यशपाल शर्मा, राजेश जैस, मंदाकिनी गोस्वामी, आदित्य श्रीवास्तव, गौरी वानखेड़े, अंशुल कुमार

हमारे देश में अनेकों प्रेम की दास्तानें आज भले ही कब्र में चैन की सांस ले रही हों, आराम फरमा रही हों। लेकिन उनका वह दौर था जब उन्होंने अपने समाज से लड़ाईयाँ लड़ीं, संघर्ष किया और आज वे प्रेमियों के पूजक बन गये हैं। भले ही उनके मायने आज बदल गये हों तथाकथित प्यार करने वाले लोगों के लिए लेकिन प्रेम अगर सच्चा हो तो वह अपनी राहें खुद बना ही लेता है।

ऐसी ही एक प्रेम कहानी है हिमाचली प्रेम कहानी। लाहुला और शिव की जो कब्र में दफन तो नहीं हो पाई लेकिन वह नदी में जरूर डूब गयी और उस नदी का पानी सारा प्रेममय हो गया। उस प्रेम के मीठे पानी के सहारे पूरे समाज में लाहुला ने जो अलख जगाई उस लाहुला की प्रेम की लोक गाथा को उसी के समाज ने विस्मृत सा कर दिया ताकि कोई और लाहुला जन्म न ले सके। हिमाचल के एक व्यक्ति ने बीड़ा उठाया उस लड़की की प्रेम कहानी को समाज के सामने लाने का। वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि साल 1989 में दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अभिनय में आखरी गोल्ड मैडल हासिल करने वाला छात्र भी बना, वह व्यक्ति है पवन शर्मा जिनकी बनाई फ़िल्म ‘वनरक्षक’ भी यूनिक कहानी है।

खेकराम और रज्जो

फ़िल्म की कहानी लोककथा पर आधारित है, उस लोककथा को आजतक किसी ने साहित्य में नहीं लिखा है। लाहुला की एक बड़ी बहन रज्जो है जिसकी शादी हुई है खेकराम से खेकराम के दो भाई और हैं सुक्खी, रामलाल। रज्जो ब्याही तो खेकराम से गयी लेकिन उसे बिस्तर साझा करना पड़ रहा है अपने देवरों के साथ भी। रज्जो और लाहुला कि माँ के साथ भी ऐसा ही हुआ था इसलिए उसकी माँ अपनी जमीन, जायदाद बचाने और उसे अपने बेटे के लिए सुरक्षित रखने के लिए लाहुला की जिन्दगी को दांव पर लगाया और गाँव के एक साहूकार से उसकी शादी कर दी। साहूकार की पहली बीवी आत्महत्या कर चुकी है और लाहुला का जो भाई है वह फ़िल्म में दिखाई तो नहीं देता लेकिन सारी लड़ाई उसी के लिए लड़ी जा रही है।

लाहुला की माँ

लाहुला की माँ ने भी कभी उसके बाप तथा ताऊ के साथ बिस्तर बांटा था। अब उसकी माँ को शिव और लाहुला का प्रेम रास नहीं आता इसलिए वह अपने पति की न सुनकर अपनी मन मर्जी कर रही है लाहुला भी अपने माँ-बाप के प्यार को परखने के लिए अपने प्रेम की आहुति दे दी। अब कुछ यूं हुआ कि लाहुला अपने से चौगुनी उम्र के किसी और व्यक्ति से ब्याह रचाने के बाद तथा ब्रीणा हासिल करने के बाद बीच रास्ते अपनी डोली रुकवाकर नदी में कूद कर जान दे दी। आज भी हिमाचल के उस गाँव में एक मेला लगाया जाता है जिसे बसोआ नाम दिया गया है उसमें गुड्डे-गुड़िया की शादी की जाती है और अंत में उन्हें नदी में बहा दिया जाता है।

फ़िल्म की कहानी बड़ी ही प्यारी होने के साथ-साथ दुखदाई भी है। फ़िल्म स्त्री समाज पर सदियों से हो रहे अत्याचार की बात भी करती है तो वहीं प्रेम की अनकही, अनसुनी दास्तान को भी हमारे सामने लाती है। गलती एक इंसान ने की हो तो चल जाता है लेकिन उसी गलती को पूरा समाज करे तो वह उस समाज के लिए दाग बन जाता है। उसी दाग को मिटाने की भरपूर कोशिश करती है ब्रीणा। ब्रीणा दरअसल वह धनराशि है जो लड़की के माँ-बाप को लड़के वाले देते हैं। उससे पहले वे बाथड़ा/बाठड़ा नाम का खेल भी करते हैं जिसे एक तरह से गरीबों का स्वयंवर कहा जा सकता है। इसमें जो सबसे ज्यादा ब्रीणा लड़की के परिवार वालों को देता है लड़की का परिवार उसी के साथ अपनी लड़की को ब्याहकर भेज देता है।

लाहुला और शिव

लाहुला जिस शिव से प्रेम करती है उसके भी तीन भाई थे लेकिन शिव उनसे अलग रह रहा है और वह अपनी लाहुला को उनके साथ नहीं बांटना चाहता वह उसे हर वो खुशी देना चाहता है जिसकी हकदार वह लाहुला को समझता है। लाहुला इतनी खूबसूरत है कि खूबसूरती भी उससे माफी माँगे, झरने जैसी लाहुला का शरीर किसी लचीली बेल की डाल की माफिक है। लाहुला का मानना है कि गलत चीजें को रोने से नहीं बल्कि रोकने से रुकती है। अब लाहुला कितनी इसमें सफल हो पाई यह तो फ़िल्म देखने के बाद दर्शक ही बता सकते हैं। लेकिन यह प्रथा अब हिमाचल से लगभग लुप्त हो चुकी है लेकिन उनकी प्रेम कहानी आज भी कही जाती है।

फ़िल्म के गीत प्रसिद्ध गीतकार ‘इरशाद कामिल’ तथा नरेश पंडित ने लिखे हैं और आवाज दी है ‘साधना सरगम’, ‘सुनिधि चौहान’, जसपिंदर नरूला ने। फ़िल्म में यशपाल शर्मा, संजय मिश्रा, राजेश जैस, आस्था सावंत , अंशुल कुमार, गौरी वानखेड़े का अभिनय बेहतरीन रहा और ये सभी किरदार अपना-अपना कर्मक्षेत्र बड़ी ही खूबसूरती से निभाते नजर आए। हालांकि निर्देशन की कुछ एक कमियाँ और बैकग्राउंड स्कोर की कमियों से भी फ़िल्म अछूती नहीं है लेकिन जब बेहद सीमित बजट आपके पास हो और कहानी के नाम पर चंद लाइन ही हों तब ऐसी बेहतर फ़िल्म बनाना बड़ा कठिन और जोखिमभरा हो जाता है। फ़िल्म के गाने ‘ रंग बदले’, ‘तू है सहारा’, ‘ताल दरिया’ आपका मन मोह लेते हैं तो साथ ही फ़िल्म की कहानी भी आपको कुछ नया और हटकर दे जाती है।

यह फ़िल्म अब तक दो दर्जन से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित की जा चुकी है और कुछ दिन के लिए डी टी एच पर भी दिखाई गयी थी। फ़िल्म फेस्टिवल्स के कई दौरे करने के बाद यह फ़िल्म एक मुकम्मल ओटीटी की खोज में लगी हुई है। जैसे ही यह किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आए इसे बिना कहे लपक लीजिएगा। ऐसी प्यारी, सुंदर, बेहतरीन प्रेम कहानियाँ जितनी खूबसूरती से दिखाई जाती हैं उन्हें देखा और सराहा भी उसी खूबसूरती से जाना चाहिए।

एक बार एक लेख ‘भारतीय सिनेमा का मंत्र – ॐ प्रेमाय स्वाहा’ में मैंने लिखा था – प्रेम शून्य से ब्रह्मांड और ब्रह्मांड से शून्य की यात्रा तय करता है। प्रेम के निकलते ही वे मठों, आश्रमों, ऑफिसों में तब्दील होने लगते हैं और फाइलों के भार से दबा यह संसार वीतरागी हो जाता है। ओफ़! कितना अनर्थ होगा न प्रेमाभाव में। इसीलिए मैं इसे प्रेम युग की संज्ञा देता हूँ और खुद को भी भाग्यशाली मानता हूँ कि इस युग में मैं भी जरुर कोई मजनूं, हीर, रांझा, रोमियो जैसा महान प्रेमी बन जाउंगा और लोग मेरे नाम की प्रेम के साप्ताहिक महापर्व और अश्वमेघ यज्ञ में सबसे अधिक आहुतियाँ लगाया करेंगे। ॐ प्रेमाय: स्वाहा! इस फ़िल्म की कहानी भी कुछ उसी तरह की है लेकिन बावजूद इसके यह उन सबसे अलग और विशेष है।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

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