Category: साहित्य

शख्सियतसाहित्य

एक मिथकीय व्यक्तित्व – शलभ श्रीराम सिंह

 

शलभ श्रीराम सिंह (05 नवम्बर 1938-22 अप्रैल 2000) से मेरी बहुत मुलाकातें नहीं रहीं। जिस समय शलभ जी विदिशा आए मैं तब विदिशा छोड़ चुका था। 1980 में मैं महाराष्ट्र राज्य के नांदेड शहर में बिजली बोर्ड की नौकरी में आया था। संभवतः उन्हीं दिनों के आसपास शलभ जी विदिशा आए थे और डॉ विजय बहादुर सिंह के यहां टिक गये थे। शलभ जी से मेरी मुलाकातें भी नांदेड आने जाने के दौरान ही हुईं होंगीं। नांदेड से एक वर्ष बाद विदिशा आने पर और फिर अगले वर्ष वह नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी पर इलाहबाद जाते समय। बाद में एकाध बार फिर कभी विदिशा पहुंचने पर। कुल जमा तीन चार मुलाकातें। वे भी बस औपचारिक। लेकिन शलभ जी मेरे लिए आकर्षण का सबब अवश्य थे। उनके बारे में जो कहानियां प्रचलित थीं उनमें एक एडवेंचर भी था और थ्रिल भी। वह किसी से डरते नहीं थे।

मद्यपान के प्रभाव में उन्होंने क्या क्या कारनामे कर दिखाए यह विदिशा के लोगों की जुबान पर था। डॉ विजय बहादुर सिंह से क्या क्या कहासुनी हुई या किस मंत्री को नशे की हालत में मंच पर जानबूझ कर लात जमा दी वगैरह। उनका व्‍यवहार अप्रत्याशित होता था जिसमें ड्रामा का भी एक पुट होता था। लेकिन मैने जब भी उन्हें देखा सहज स्थिति में ही देखा। एक बार उनके संग्रह ‘निगाह दर निगाह’ पर समीक्षा लिखी थी जो इलाहबाद से निकलने वाली पत्रिका लेखन में छपी थी। इसके संपादक विद्याधर शुक्ल थे। उस समीक्षा से शलभ जी प्नसन्‍न नहीं थे। उसपर उन्होंने विद्याधर जी से कहा कि शैलेन्द्र मुझे जानते नहीं हैं। मेरे आदमी चारों तरफ हैं। मैं चाकू मार दूंगा। विद्याधर जी ने जब यह वाकया सुनाया तो मैं मुस्कराया भी और थोड़ा दुख भी हुआ कि मैने शायद ठीक से नहीं लिखा।

उनकी नौटंकी मैं जानता था अतः सहज रहा। लेकिन जब विद्याधर जी ने आगे बताया कि यह भी कह रहे थे कि अपने ही अपनों को मारते हैं तो मुझे वाकई अफसोस हुआ। तभी मेरे मन में आया कि शलभ जी पर कोई बड़ा काम करना चाहिए। उनके जीते जी ऐसा कुछ न हो सका। पर उनकी मृत्यु के बाद ‘धरती’ का एक अंक आयोजित किया जो 2005 में इंदौर से प्रकाशित किया। शलभ जी एक युयुत्सु कवि और मिथक पुरुष के रूप में मेरे सामने थे।

सातवें दशक के मध्यकाल में शलभ ने ’युयुत्सावादी’ कविता का आन्दोलन खड़ा कर उसकी विचार पीठिका विकसित की और उसे अपने व्यक्त्तिव के साथ जीते भी रहे। युयुत्सावादी कविता का सम्बन्ध ‘युयुत्सा’ नामक पत्रिका से रहा है। युयुत्सावादी कविता के प्रवर्तक शलभ श्रीराम सिंह थे। उनकी मान्यता थी कि आदिम युयुत्सा ही साहित्यसर्जन की मूल प्रेरणा है। उनका यह भी कहना था कि “मैं साहित्यसर्जन की मूल प्रेरणा के रूप में उसी आदिम युयुत्सा को स्वीकारता हूँ जो कहीं न कहीं प्रत्येक क्रांति, परिवर्तन अथवा विघटन के मूल में प्रमुख रही है। वह युयुत्सा जिजीविषावादी, मुमूर्षावादी, विद्रोहात्मक अथवा प्लैटोनिक कुछ भी हो सकती है।”

सन् 1960 के बाद भिन्नता की प्रतीति कराने वाली ऐसी पीढ़ी के द्वारा रचित साहित्य सृजित हुआ जिनमें विद्रोह एवं अराजकता का स्वर प्रधान था। हालाँकि इसके साथ-साथ सहजता एवं जनवादी चेतना की समानान्तर धारा भी साहित्य-क्षेत्र में प्रवहमान रही जो बाद में प्रधान हो गयी। साठोत्तरी लेखन में विद्रोही चेतनायुक्त आन्दोलन प्राथमिक रूप से कविता के क्षेत्र में मुखर हुई। इसलिए इससे सम्बन्धित सारे आन्दोलन मुख्यतः कविता के आन्दोलन रहे। हालाँकि कहानी एवं अन्य विधाओं पर भी इसका असर पर्याप्त रूप से पड़ा और कहानी के क्षेत्र में भी ‘अकहानी’ जैसे आन्दोलन ने रूप धारण किया। साठ के बाद की कविता में असंतोष, अस्वीकृति और विद्रोह का स्वर बहुत साफ तौर पर उभरा है। नयी कविता में भी असंतोष और अस्वीकृति का स्वर विद्यमान है, किन्तु साठ के बाद इस स्वर ने और तीखे व्यंग्य और विद्रोह का रूप धारण कर लिया है, जीवन की टूटती मूर्तियों के बहुत करीब जाकर उनकी टूटने की तल्खी, व्यथा और उसमें से फूटती अस्वीकृति की उग्रता को पहचाना है।

साठोत्तरी हिन्दी साहित्य का पहला दशक (1960-70) आधुनिकतावाद से विशेष प्रभावित है। इस संदर्भ में ध्यातव्य है कि आधुनिक और आधुनिकता में अन्तर है। ‘आधुनिक’ ‘मध्यकालीन’ से अलग होने की सूचना देता है। ‘आधुनिक’ वैज्ञानिक आविष्कारों और औद्योगीकरण का परिणाम है जबकि ‘आधुनिकता’ औद्योगीकरण की अतिशयता, महानगरीय एकरसता, दो महायुद्धों की विभीषिका का फल है। डॉ० बच्चन सिंह के अनुसार “वस्तुतः नवीन ज्ञान-विज्ञान, टेक्नोलॉजी के फलस्वरूप उत्पन्न विषम मानवीय स्थितियों के नये, गैर-रोमैंटिक और अमिथकीय साक्षात्कार का नाम ‘आधुनिकता’ है।”

आधुनिकतावादी साहित्य एक विशेष प्रकार का साहित्य है। यह स्थापित संस्कृति, मूल्य और संवेदना को अस्वीकार करती है। यह दुनिया की मान्यताओं को मंजूर नहीं करती, परम्परा को बेड़ी के रूप में लेती है। आधुनिकतावादी अन्तर्यात्रा करता है, मूल्यों का मखौल उड़ाता है, वह विद्रोही होता है। भीड़ का विरोध करता है, वह व्यक्ति की मुक्ति का विश्वासी है। वह अपने को अ-मानव की स्थिति में पाता है, और स्नेह, कृतज्ञता आदि को निष्कासित कर देता है। संयम की कमी, प्रयोग, साहित्य रूपों की तोड़-फोड़, शॉक देने की मनोवृत्ति, आक्रोश-क्षोभ-हिंसा की आकांक्षा आदि इसकी विशेषताएँ या ‘मोटिफ’ हैं।

नयी कविता से विलगाव अनुभव करते हुए काव्य-क्षेत्र में जो अनेक प्रवृतियाँ सक्रिय रहीं, उनमें सबसे अधिक उल्लेखनीय है गिन्सबर्ग आदि अमेरिकी बीटनिकों तथा उनसे प्रभावित बंगाल के मलय रायचौधुरी और सुबिमल बसाक जैसे भूखी पीढ़ी के कवियों के समानांतर हिंदी में उभरने वाले राजकमल चौधरी तथा अकविता और अस्वीकृत कविता से सम्बद्ध कुछ अन्य कवि जिन्होंने ‘हेटरो सेक्सुअलिटी’ एवं ‘ओपन सीक्रेसी’ की बीट धारणाओं को अपनाकर समाज से अपने को ‘डिसएफिलिएट’ करने का प्रयत्न किया। उनकी कविता में यौन शब्दावली का नंगा प्रयोग, अपने विक्षोभ और आक्रोश को व्यक्त करने के लिए प्रायः एक संस्कारहीनता एवं विकृति के रूप में मिलता है।

राजकमल चौधरी को इस दशक की अगुवाई करने वाला कवि माना गया है। राजकमल चौधरी में आधुनिकता अपनी समग्रता में दिखाई पड़ती है। इस समय की अधिकांश रचनाओं पर चौधरी की छाप देखी जा सकती है। बीटनिक आन्दोलन हिन्दी में एक फैशन की तरह आया और कुछ ही समय में निष्प्रेरक हो गया क्योंकि उसकी जड़ें देश के यथार्थ में नहीं थीं।[8] वस्तुतः ये गुस्से के कवि थे। अपनी आक्रोशपूर्ण वाणी में ये अपना गुस्सा उतारते रहे। पूर्ववर्ती समस्त मूल्यों और परम्पराओं को नकार कर वे अपनी चीखों, जख्मों और यौन-विद्रूपताओं को कविता में व्यक्त करते रहे। परन्तु, युयुत्सावादी, नव प्रगतिशील या नव प्रगतिवादी कवियों ने सामाजिक मूल्यों पर बल देते हुए इन बीटनिकों से अपनी असहमति व्यक्त की।

अप्रैल 1965 की ‘रूपाम्बरा’ में ‘प्रारंभ’ के अंतर्गत स्वदेश भारतीय द्वारा ‘सबका एक मात्र कारण युयुत्सा’ की घोषणा करते हुए शलभ श्रीराम सिंह का यह उद्धरण दिया गया था। ‘रूपाम्बरा’ के ही अगस्त 1966 के ‘अधुनातन कविता अंक’ में ‘युयुत्सावादी नवलेखन प्रधान सहकारी प्रयास’ के रूप में सामने आया, तीन कवियों के वक्तव्य सहित। संपादक ने नयी संवेदनशीलता की बात भी उठायी। विमल पांडेय, रामेश्वरदत्त मानव, ओम् प्रभाकर, बजरंग बिश्नोई आदि ने भी अपने आप को इस आंदोलन से संबंधित किया। विमल पांडेय ने ‘युयुत्सावाद’ को ‘एंग्री यंग मैन’ से संबद्ध करने का प्रयत्न किया। श्री ओम् प्रभाकर ने ‘युद्धेच्छा’ को सनातन वृत्ति मानते हुए युयुत्सा को जिजीविषा का पर्याय माना है। बजरंग बिश्नोई ने प्रतिबद्धता के प्रश्न को युयुत्सा से जोड़ दिया है।

जीवन काल में उन्होंने ’कल सुबह होने के पहले’, ’अतिरिक्त पुरूष’, ’नागरिक नामा’, ’राह-ए हयात’, ’निगाह दर निगाह’, ’अपराधी स्वयं’, ’प्यार की तरफ जाते हुए’, ’ध्वंस का स्वर्ग’, ’जीवन बचा है अभी’, ’उन हाथो से परिचित हूँ मैं’, ’अंगुली में बधी हुई नदियां’ आदि कालजयी कृतियां दी। इसी के साथ ’राह-ए-हयात’ उर्दू में और ’इन द फाइनल फेज’ अंग्रेजी में तथा ’घूमन्त दरा जाय कड़ा नाड़ार शब्द’ नामक पुस्तक बंगला में प्रकाशित है। डॉ. राम कृपाल पाण्डेय के सम्पादन में उनकी लम्बी कविताओं का संकलन ’कविता की पुकार’ प्रकाशित है। वस्तुत: शलभ को अलग पहचान देने और अपने समय का महत्वपूर्ण कवि बनाने वाली चीज है उनकी व्यापक, सकारात्मक पक्षधरता और पूर्वाग्रह से पूर्णत: मुक्त जीवनदृष्टि। उन्होंने नकारात्मकता के बजाय संघर्ष या युद्ध को अपनी कविता का महत्वपूर्ण पक्ष बनाया।  शलभ श्रीराम सिंह: प्रेम और प्रकृति का नहीं, बग़ावत का कवि

लेकिन क्या शलभ सिर्फ कवि थे? ऐसा कहना शायद उनके साथ अन्याय करना होगा। अगर कविता अपने विचारों का संसार रचने का औजार है, जो वह निश्चित रूप से है ही। तो कहा जाना चाहिए कि शलभ का विचार और चिंतन-संसार भी उतना ही समृद्ध है जितनी उनकी कविताएं। यह उनका चिंतन ही था जिसने युयुत्सा को ऐसे वाद के तौर पर प्रतिष्ठा दिलायी, जिसमें अस्पष्टता के लिए कोई जगह नहीं है। उनकी साफ-साफ मान्यता है कि मानव सभ्यता का इतिहास युद्धों का इतिहास है और अलग-अलग देश व काल में अलग-अलग कारणों से युद्ध होते रहे हैं। ये कारण व्यक्तिगत हों या वर्ग, वर्ण, राष्ट्र या राज्य को लेकर पैदा हुए राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, नस्ली या साम्प्रदायिक कारण। ये युद्ध विचारों से जन्म लेते हैं और जिन्दगी के किसी भी मोड़ पर इनसे आमना-सामना हो सकता है। इनसे नजरें फेरकर जो संसार को शांतिभूमि कहते हैं, वे और कुछ नहीं आने वाले इन्कलाब की राह रोकने का निष्फल प्रयत्न कर रहे होते हैं।

शलभ की मानें तो विवेकानन्द, गालिब, फ्रायड, कार्ल माक्र्स और महात्मा गांधी सब अलग-अलग युद्धों के जनक रहे हैं और युयुत्सा मानव की केन्द्रीय प्रवृत्ति व इतिहास को प्रतिफलित करने वाला संघर्षबोध है। यह संघर्षबोध उनके अनुसार जीवन में गति और सौभाग्य का सूचक है। उनका जनान्दोलनों में गाया जाने वाला एक बहुत लोकप्रिय गीत है :- नफस-नफस कदम-कदम / बस एक फिक्र दम-ब-दम/ घिरे हैं हम सवाल से/ हमें जवाब चाहिए/ जवाब दर सवाल है कि इन्कलाब चाहिए। अब शलभ नहीं हैं और परिस्थितियां ऐसी कि उन्हें अभीष्ट इन्कलाब की राह और कठिन होती लगती है। इन्कलाब का झंडा बुलंद करने वाले हाथ या तो थककर पस्त हो गये हैं या उन्होंने अपनी दिशा बदल ली है। ऐसे में कई लोगों को आने वाला समय और अंधेरा लग सकता है या कि आशंकाएं कुछ ज्यादा ही सता सकती हैं पर शलभ ऐसा नहीं मानते थे।

डॉ ओमप्रकाश ग्रेवाल ने लिखा है- ‘अतिरिक्त पुरुष’ संग्रह की रचनाओं में एक दबंग और आत्मविश्वास से भरे हुए व्यक्तित्व की झलक हमें अवश्य मिलती है। कवि के स्वर में दृढ़ता और जुझारूपन की गूंज भी स्पष्ट सुनाई देती है। जिस कवि-व्यक्तित्व की तस्वीर यहां उभर कर आती हे, उसके बारे में कहा जा सकता है कि उसके जीवन की कठिनाइयों का तीखा अहसास है और उन कठिनाइयों पर विजय पाने की अदम्य निर्णय-शक्ति भी उसके पास है। इस युयुत्सावादी कवि की ‘सदा कुल प्राण-प्यास’ अथवा उसके ‘पौरुष’ का प्रभाव हम इन रचनाओं में देखते हैं ‘सृष्टि-चक्र के भीतर’ कविता में ‘फुफकारते दिगन्तग्रासी महासर्प के फण पर/दांतों से कलम दबाये विराजमान’ जिस ‘श्यामा’ की कल्पना ‘सृष्टि-चक्र के भीतर’ कविता में की जाती है वह वास्तव में अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा के बारे में कवि की अपनी अवधारणा को ही लक्षित करती है। मानव-स्वभाव की इस शुद्ध तात्विक ऊर्जा के प्रवाह के अहसास के कारण ही कवि के गीत हमें प्रभावशाली लगने लगते हैं :

अंधकार में जीवित अग्निशिखा के स्वर से-
बंधा हुआ स्वरमंडल कोई उभर रहा स्तर-स्तर पर
रागबद्ध करने को जिसको
व्याकुल हो जाएगा अग-जग
कल सूर्योदय के प्रकाश में !
बजता है…

किंतु इस प्रकार की ‘ओजस्विता’ से हमें एकदम प्रभाव नहीं हो उठना चाहिए। इस प्रकार के उद्घोषपूर्ण नाद में ऐसी अमूर्तता रहती है जो वास्तव में यथार्थ को ठीक से न समझ पाने की सूचक है। जिस धरातल पर कवि की कल्पना काम करती है, वहाँ हमारा जीवन ‘अंधकार’ और ‘अग्नि-शिखा’ जैसी कुछ ऐसी अतिव्यापक अवधारणाओं में बंधकर रह जाता है कि तत्कालीन सामाजिक विशिष्टता हमारी चेतना में उभर कर नहीं आ पाती। जो स्वर-मंडल यहाँ स्तर-स्तर उभर रहा है उसे ‘कोई’ कहकर लक्षित किया गया है। हमारी तत्कालीन वस्तुस्थिति की केंद्रीय सच्चाई इस ‘कोई’ स्वर में लक्षित नहीं होती। जिस ‘त्वरारोही शक्ति के सम्मुख’ यह युयुत्सावादी कवि अपने-आपको वहां खड़ा पाता है, वहां उसके लिए ‘नीति-अनीति का ज्ञान/कितना कठिन है।’ इस प्रकार की समाजातीत आदिम शक्ति की परिकल्पना की ओर हम इसीलिए संशकित रहते हैं कि वहां नीति और अनीति में भेद करने वाली हमारी विवेक-बुद्धि क्षीण पड़ जाती है और वास्तविक मानवीय ऊर्जा केे स्थान पर हमें एक दम्भी व्यक्ति का आत्म-प्रक्षेपण नजर आने लगता है।

उंगली में बांधकर नदियों को घुमाता हुआ वह
किसी पहाड़ी की चोटी पर बैठा गा रहा है।

ऐसी परिकल्पना के आधार पर समाज के वर्गों पर आधारित भेद को और ऐतिहासिक पड़ावोंं के अंतर को आसानी से नकारा जा सकता है और यह घोषित किया जा सकता है कि हम सबके सब प्रकारान्तर से उसी गति की ध्वनि जी रहे हैं तथा इस गीत की टेक ‘निरंतर दुहराई जाने पर भी नयी है।’ जिस ‘अग्नि जैसे मनुष्य’ की कवि ‘अतिरिक्त पुरुष’ शीर्षक वाली रचना में कल्पना करता है वह शोषण के विरुद्ध संघर्ष करने वाले लोगों के सामूहिक व्यक्तित्व का सूचक नहीं है। ऐसा ‘अतिरिक्त पुरुष’ तो ‘हर देश’ की छाती में ‘कुछ दहकते हुए घरों’ में जीवित रहता है। इसीलिए कवि यह निष्कर्ष निकालता है कि

देशों और मनुष्यों और भाषाओं के बीच
जितना और जो कुछ खाली है वहीं और वहीं
कविता है।

जिस प्रकार की कर्मठता और निर्णय-शक्ति नीचे उद्धृत पंक्तियों में उभरती है उसकी अमूर्तता और तर्कहीन कट्टरता की ओर भी हमें सतर्क रहना चाहिये:

तुम्हें पर्वतों से झरना संगीत और आकाश में तन खड़ा
विश्वास दिखाई क्यों नहीं देता? पठारों पर दौड़ते वसंत के
पैरों की आहट वृक्षों के पत्तों पर अंकित हो गयी है
तुम तो पतझर का अभिवादन भी नहीं स्वीकार सके
कि उसके जुड़े हुए हाथों हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा,
तुम्हारी आस्था की उंगलियों में उलझा तार
रात के अंधेरे में ही क्यों झनझनाता है।

आकाश में तन कर खड़े होने वाले इस विश्वास की अतिरिक्त अहंवादिता से जो प्रतिगामी राजनीति उभरकर आ सकती है। उसकी गूंज इस संग्रह की कई रचनाओं में पाकर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। ‘अतिक्रमण’ शीर्षक रचना में कवि कहता है कि :

विभाजित मनुष्यता के पक्ष में उठाकर-
पूज्य होने की इच्छा से मुक्त हो चुका हूं मैं!
सीमा- चाहे कोई भी हो
उसका अतिक्रमण न कर पाने की स्थिति में
किसी भी पक्षधरता को ओढ़ लेना असंभव है मेरे लिए!

बहरहाल शलभ जी का जो भी और जैसा भी मूल्यांकन हुआ वह अधूरा और अपर्याप्त ही कहा जायेगा। आवश्यकता इस बात की है कि आगे उनपर वस्तुपरक और गंभीर विवेचन और आलोचना होनी चाहिए। ऐसी प्रत्याशा की जा सकती है।

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