Category: व्यंग्य

लोहे की न लोहार की

गुजरी जी को कैसे मिला ऑक्सीजन!

 

आज फिर फोन आया। गाँव से गुजरीजी फोन पर थे। उन्होंने कहा, “लगता है गाँव में ऑक्सीजन की कमी हो गयी है।”
मुझे हैरानी हुई, “ऐसा कैसे हो सकता है?”
हताश स्वर में गुजरीजी बोले,  “सब कह रहे हैं, पिछले कुछ सालों में गाँव इतनी ऊंचाई पर पहुंच गया कि ऑक्सीजन की कमी हो गयी।”
“सबके कहने पर क्यों जाते हैं आप?”
“पांचवी क्लास में मैंने भी विज्ञान की किताब में पढ़ा था कि ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम हो जाती है, सो हो गयी। मुझे भी बोध हुआ है।”
इन दिनों पूरे देश में एक नया बोध विकसित हुआ है-‘ऑक्सीजन बोध’। विकट कोरोना काल में इस बोध का विस्तार ‘सिलेंडर शोक’ तक जा पहुंचा है, और अब जब गुजरीजी का ‘बोध’ देश के ‘शोक’ के समकक्ष हो गया तो उन्होंने मुझे फोन किया। ऑक्सीजन के नाम पर कई दिनों से डर रहा मेरा दिल गुजरीजी के फोन पर कुछ ज्यादा ही धड़कने लगा।

यहाँ एक बार फिर से यह बताना जरूरी है कि गुजरीजी मेरे गाँव मोतिया के ‘धड़कते’ हुए लोगों में से एक हैं। 69 लग गया है। 70 साल की तरफ मुंह है। गाँव में रहते हैं। कभी अपने हिसाब से गाँव के सबसे आधुनिक आदमी थे। देस-परदेस घूम आए हैं। इब्ने सफी, गुलशन नंदा और गोड्डा के शंकर टॉकिज ने उनके दिमाग में ऐसी ऑर्गेनिक खाद डाली थी कि उनका ज्ञान कम उम्र में ही लहलहाने लगा था। गाँव की गलियों के वे सदाबहार बादशाह रहे और माहे-तिमाहे उनके ऊपर मजनूत्व का दौरा पड़ते भी हम लोगों ने देखा है। कुल मिलाकर यह कि गुजरीजी का ज्ञान विशद था। वह जबरदस्त स्थानीय तांत्रिक थे। आयुर्वेद में उनका दखल बचपन से था। मात्र 11 साल की उम्र में उन्होंने लाजवंती की जड़ से ‘वशीकरण का अर्क’ बनाने की विधि का न सिर्फ आविष्कार कर लिया था, बल्कि तभी अपने से दोगुने उम्र के लड़कों को ‘तैयार माल’ सप्लाई भी करते थे। 

यही नहीं, वह गाँव में साइकिल के सबसे बड़े कारीगर रहे, लेकिन सिर्फ अपनी साइकिल के लिए। साइकिल का एक हैंडल पकड़कर पैदल पूरे गाँव में घूमने की कला, बहुतों ने उनसे ही सीखी। वह एक ऐसे दिव्य पेट्रोमैक्स के मालिक थे, जो बिना रुके अद्भुत रोशनी करती थी। उनकी जिन्दगी में जोश इतना कि अगर जहाज लेकर निकलते तो एक-दो नया देश तो खोज ही लेते। लेकिन विधि का विधान ! गाँव की गलियों में ऐसा खपे कि जिन्दगी की लपलपाती तलवार म्यान में ही रिटायर हो गयी, और अब ऊपर से यह ऑक्सीजन समस्या।

मैंने पूछा, “आपने परख के देखा, सचमुच ऑक्सीजन की कमी हो गयी है?”
उनके स्वर में आत्मविश्वास लौटता दिखा, “पांचवी क्लास की विज्ञान की किताब मेरे हाथ में है, इसमें लिखा है कि लकड़ी के प्रज्वलित होने से ऑक्सीजन की पहचान होती है। मैंने लकड़ी जलाकर देखी, बुझ गयी। जली ही नहीं।”
टालने के लिहाज से मैंने कहा, “लकड़ी शायद गीली हो?”
वे फिर बुझ-से गये- “मुखिया के दालान से लेकर आए थे टेस्ट करने। सबसे ज्यादा धूप उन्हीं के दलान पर चमकती है, गीली तो नहीं लगी।”
डॉक्टर कहते हैं, ऑक्सीजन हृदय पर काम का बोझ कम करती है। लेकिन यहाँ ऑक्सीजन की बातों से मुझे अपने हृदय का बोझ बढ़ता हुआ लगा। उधर गुजरीजी लाइन पर मुस्तैद थे- “मुझे क्या शिमला निकल जाना चाहिए?”

मुझे आश्चर्य हुआ, “क्यों ?”
“सुनते हैं वहाँ ऑक्सीजन ही ऑक्सीजन है। वैसे भी अब तक मैंने शिमला के नाम पर सिर्फ ‘मिर्च’ ही देखी है। बहाना है तो सोचता हूं, साक्षात देख ही आऊं!”
फोन पर मैं हड़बड़ाया, “अभी आप कहाँ हैं?”
“एक सूखे कुएं में कूदने जा रहा हूं।”
“मतलब !”
गुजरीजी की आवाज में रूखापन था, “ऑक्सीजन की खोज में।”
मुझे लगा जैसे गुजरीजी के शरीर में सी.डब्ल्यू. शेले की आत्मा प्रवेश कर गयी है, जो लगभग 350 साल पहले ऑक्सीजन की खोज में ऐसे ही भटकते रहे होंगे।
मैने कहा, “सूखे कुएं में क्यों होगी ऑक्सीजन? मत कूदिए।”

अपने देश में शादी करने निकला शख्स जिस तरह किसी की सलाह नहीं मानता, उसी तरह गुजरीजी नहीं माने- “ऊंचाई पर ऑक्सीजन नहीं तो नीचे गहराई में तो होगी। मैं आकाश-पाताल एक कर दूंगा, लेकिन ऑक्सीजन को ढूंढ निकालूंगा।”
“कुएं में कार्बन डाइऑक्साइड हो सकती है, जो खतरनाक है।”

गुजरीजी के ज्ञानकोश का दरवाजा भक्क से खुल गया- “अजीब बात है। ऑक्सीजन का न होना खतरनाक है। कार्बन डाइऑक्साइड का होना खतरनाक है। दोनों रंगहीन और गंधहीन है। ये रंगहीन और गंधहीन के होने और न होने के बीच मेरी जिन्दगी झूल रही है। क्या करूं, शिमला निकल जाऊं?”

“कुछ दिन और ‘मिर्च’ देखकर ही संतोष कर लीजिए, लेकिन अभी शिमला की तो सोचिए मत।”

“तो फिर क्या सोचूं?” उनकी आवाज गूंजने लगी थी, जैसे कुएं में गूंजती है। वह उतर चुके थे।

मैंने थोड़ी ऊंची आवाज में कहा, “ऑक्सीजन सोचिए।”

“कैसे सोचूं ऑक्सीजन। जिसका कोई रंग नहीं। गंध नहीं। जो दिखती नहीं, उसे कैसे सोचें?”

मैंने तर्क किया, “भगवान भी नहीं दिखते, लेकिन सोचते हैं न?”

“तो ऑक्सीजन भगवान है?” गुजरीजी भी तर्क पर उतर आए।

शिमला न निकल जाएं, इसलिए मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता रहा, “भगवान नहीं, लेकिन अभी भगवान से कम भी नहीं? मुझे लगता है, गाँव को इतना ऊपर नहीं जाना चाहिए कि ऑक्सीजन की कमी हो जाए।”

गुजरी जी नरम पड़े, “…तो अब गाँव को मैं नीचे तो खींच नहीं सकता। आदमी को बहुत ऊपर नहीं जाना चाहिए। जो थोड़ा ऊपर है, सिलेंडर ढूंढ रहा है। मेरे जैसे जो सूखे कुएं में हैं, वे कार्बन डाइऑक्साइड में खड़े हैं।”

जिन्दगी में कई बार जब आपके पास कोई तर्क और जवाब न हो तो फोन का नेटवर्क बड़ी मदद करता है…आवाज उनकी कट-कटकर आ रही थी, मैंने उन्हें उनके ‘ऑक्सीजन बोध’ पर छोड़ा और भरे मन से फोन जरूर काट दिया, लेकिन इस संवाद से सीख यह टपकी कि जिन्दगी में ऑक्सीजन हो तो आदमी ऊपर उठता है, न हो तो बहुत ऊपर उठता है और कार्बन डाइऑक्साइड आदमी को कुएं में उतारती है। इन सबके बीच सबके मन में एक शिमला बसा रहता है।

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